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न हिन्दु पतितो भवेत्

‼️ #हिन्दु_भी_पतित_होता_है ‼️ !! महादेव !! "न हिन्दु पतितो भवेत्" इस वाक्य को दिखला के लोग कहते है कि हिन्दू कभी पतित ही नहीं होता , चाहे कुछ भी करे या ना करे । वे लोग अपने को सर्वदा पवित्र मानता है ये उनका भ्रम जाल मात्र है कुकी पतित को उद्धार करने के लिए ही धर्म शास्त्रों ने प्रायश्चित आदि का विधान किया । लोग कहते है हम भक्ति करेंगे धर्म शास्त्र को नहीं मानेंगे , उनका ये बचन भी भ्रम मात्र ही है । भक्ति के बड़े अचार्य नारद जी अपने भक्ति सुत्र में कहते है "#शास्त्र_रक्षणम्" जितना भी बड़ा भक्त हो शास्त्र के मर्यादा विधि निषेध आदि का पालन करों "#अन्यथा_पतित्याशङ्कया" नहीं तो पतित वन जाओगे । अव हम आगे करपात्री जी के लेख दे रहे है जहा उन्होंने शास्त्र वचनों से सिद्ध किया कि हिन्दु पतित होता है । आगे के लेख "#विदेश_यात्रा_शास्त्रीय_पक्ष " नामक ग्रन्थ से । (आगे के लेख में जिस स्थान में विदेश यात्रा शब्द आयेगा बहा आप हिन्दुओं के मन मुखी आचरण का अनुमान लगा लेना हम भी अलग करके कोटेशन में लिख देंगे ) [ #हिन्दु_भी_पतित_होता_ही_है ] ...

विवाह मे कितने फेरे ??

#विवाह_में_कितने_फेरे? धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज ★★★★★★★★★★★★★★ यह भांवर(७7फेरे)केवल भ्रममात्र हैं।सार्वजनिक रुप से 4४ फेरे ही होने चाहिए -आज कल विवाह में कहीं तो 7 फेरों का प्रचलन है, तो कहीं 4 का , इस विषय पर बहुत विवाद सुनने में आ रहा है। राजस्थान, गुजरात और मिथिला आदि प्रान्तों में कई स्थानों में 4 फेरों की परम्परा है और उत्तर प्रदेश आदि कुछ प्रान्तों के कतिपय स्थलों में 7 फेरों की परम्परा। । यहाँ सप्रमाण यह तथ्य प्रस्तुत हैं, कि “फेरे कितने होने चाहिए । यहाँ एक बात ध्यान में अवश्य रखनी है कि सभी बातें शास्त्रों में ही उपलब्ध नहीं होती हैं । जैसे — वर वधू का मंगलसूत्र पहनाना,गले में माला धारण करवाना, वर वधू के वस्त्रों में ग्रन्थि लगाना ( गांठ बांधना ),वर के हृदय पर दही आदि का लेपन, ऐसे बहुत से कार्य हैं जो गृह्यसूत्रों में उपलब्ध नही हैं । इन सब कार्यों में कौन प्रमाण है ? इसका उत्तर है –”अपने अपने कुल की वृद्ध महिलायें ;क्योंकि वे अपने पूर्वजों से किये गये सदाचारों का स्मरण रखती हैं । इसलिए विवाहादि कार्यों में इनकी बात मानने का विधान शास्त्रों ने किया है ।शुक्ल ...

नामोच्चार से पार्थिव शिवलिंग पुजन

नामोच्चार से पार्थिव शिवलिंग पुजन कि विधि आवश्यक सामग्री शुद्ध मिट्टी गंगाजल देशी गौ माता का कच्चा दुग्ध कंकु अक्षत् चंदन धुप दीप नैवेध के लिए देशी गुड/सक्कर कपुर पुष्प तांबे के पात्र घंटी माचीस संकल्प :- दक्षिण हाथ मे जल लेकर संकल्प करे जल को जमीन पर छोड दे। अत्रार्ध महामांगल्य फलप्रद मासोत्तमे मासे (अमुक मास का नाम) मासे (अमुक पक्ष कृष्ण या शुक्ल) पक्षे (अमुक तिथि का नाम) शुभ पुण्य तिथौ (अमुक वार का नाम) वासरे (अमुक गोत्रोच्चार -कश्यप) गोत्रोत्पन्नस्य ( स्ववेद नाम उच्चार शुक्ल यजु) वेदान्तर्गत (स्वशाखा नाम उच्चार माध्यंदिनी) शाखाध्यायी (अमुक प्रवर काश्यप अावत्सार नैध्रुव ईति त्रि )प्रवरान्वितोऽहं, (अमुक -उपाध्याय ) अवटंकी अमुक महोदस्य आत्मजः/आत्मजा:/सहधर्मचारिणी(विवाहित स्त्री के लिए ) (अमुक नाम) शर्मा अहं ममोपात्त दुरीतक्षयार्थम् देवतापूजनादि अधिकार प्राप्ति अर्थं परमेश्वर प्रीत्यर्थं च मम् सर्व धर्मसहमत मनोकामनापुर्ति अर्थम् पार्थिवेश्वर महादेवस्य पुजनं अहं करीष्ये। सर्व प्रथम भगवान श्री गणेश का स्मरण अौर ध्यान करे पुष्प+अक्षत चढाते - श्री गणेशाय नमः श्री हराय नमः नामोच्च...

सुस्वप्न दर्शन के फल का विचार

ब्रह्म वैवर्त पुराण श्रीकृष्ण जन्म खण्ड (उत्तरार्द्ध): अध्याय 77 सुस्वप्न दर्शन के फल का विचार नन्द जी ने पूछा- प्रभो! किस स्वप्न से कौन- सा पुण्य होता है और किससे मोक्ष एवं सुख की सूचना मिलती है? कौन-कौन सा स्वप्न शुभ बताया गया है? श्री भगवान बोले- तात! वेदों में सामवेद समस्त कर्मों के लिए श्रेष्ठ बताया गया है। इसी प्रकार कण्वशाखा के मनोहर पुण्यकाण्ड में इस विषय का वर्णन है। जो दुःस्वप्न है और जो सदा पुण्य-फल देने वाला सुस्वप्न है, वह सब जैसा पूर्वोक्त कण्वशाखा में बताया गया है; उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। यह स्वप्नाध्याय अधिक पुण्य-फल देने वाला है। अतः इसका वर्णन करता हूँ। इसका श्रवण करने से मनुष्य गंगा स्नान के फल की प्राप्ति होती है। रात के पहले पहर में देखा गया स्वप्न एक वर्ष में फल देता है। दूसरे पहर का स्वप्न आठ महीनों में, तीसरे पहर का स्वप्न तीन महीनों में और चौथे पहर का स्वप्न एक पक्ष में अपना फल प्रकट करता है। अरुणोदय की बेला में देखा गया स्वप्न दस दिन में फलद होता है। प्रातःकाल का स्वप्न यदि तुरंद नींद टूट जाए तो तत्काल फल देने वाला होता है। दिन को मन में जो कुछ देखा और...

शिवरात्रि

।।#शिवरात्रि_पूजन।। पुष्प मात्र अर्पण करने से भी शिव प्रसन्न हो जाते हैं-- न स्नानेन न वस्त्रेन न धूपेन न चार्च्चया । तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासतः ॥” इति शङ्करोक्तेः ॥ * ॥स्कान्दे । शिव की विशेष कृपा के लिए रात्रि के प्रत्येक पहर में शिव को. स्नान करवाकर पूजा करें-- ततो रात्रौ प्रकर्त्तव्यं शिवप्रीणनतत्परः । प्रहरे प्रहरे स्नानं पूजाञ्चैव विशेषतः ॥ शिवरात्रि के व्रत को चांडाल आदि सभी कर सकते हैं-- शिवरात्रिव्रतं नाम सर्व्वपापप्रणाशनम् । आचाण्डालमनुष्याणां भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् व्रत में यदि जागरण भी हो जाए तो महान फल है-- उपवासप्रभावेण बलादपि च जागरात् ।शिवरात्रेस्तथा तस्य लिङ्गस्यापि प्रपूजया । अक्षयान्लभते लोकान् शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥”पाद्मे । सभी को बारह वर्ष या चौबीस वर्ष तो शिवरात्रि का व्रत अवश्य करना चाहिए- वर्षे वर्षे महादेवि नरो नारी पतिव्रता । शिवरात्रौ महादेवं कामं भक्त्या प्रपूजयेत् ॥” ईश्वानसंहितायाम् “एवमेव व्रतं कुर्य्यात् प्रति संवत्सरं व्रती ।द्वादशाब्दिकमेतद्धि चतुर्व्विंशाब्दिकं तथा । सर्व्वान् कामानवाप्नोति प्रेत्यचेह च मानवः ॥ प्रदोषव्य...

पुराणोक्त पितृ स्तोत्र

पुराणोक्त पितृ -स्तोत्र : अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्। नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।। इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा। तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि।। नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा। द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलिः।। देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्। अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येऽहं कृतांजलिः।। प्रजापतं कश्यपाय सोमाय वरूणाय च। योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः।। नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु। स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।। सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा। नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।। अग्निरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम्। अग्निषोममयं विश्वं यत एतदशेषतः।। ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः। जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः।। तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः। नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।। अर्थ: रूचि बोले - जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्यदृष्टि सम्पन्न हैं, उन पितरों को मैं सदा नमस्कार...

पुराणोक्त बलिवैश्वदेव

स्त्री-अनुपनीत-शूद्राद्यधिकृत-बलिवैश्वदेव - तीन आचमन करे , हाथ धोकर नमो भगवते वासुदेवाय मन्त्र से प्राणायाम करे (अर्थात् श्वास का यथाशक्ति रोधन करे) अग्निस्थापन क्रम - जल से स्थंडिल को सिंचित करना , ईंधन को प्रेक्षित करना , कर्पूर वा बाती स्थंडिल में रखना, किसी ज्वलनशील काष्ठादि से प्रदीप्त वह्नि को ग्रहणकर उसमें से क्रव्यादंश नैर्ऋत्य में त्यागना, स्थंडिल स्थित कर्पूर या बाती को हस्तस्थिताग्नि द्वारा प्रदीप्त करना - ह्रीं वह्निचैतन्याय नमः। काष्ठ-गोबरकंडे आदि से अग्नि को अच्छी तरह प्रदीप्त करना अक्षत से आवाहन करना - रं अग्नये नमः इत्यावाह्य। ध्यानम्- "( अग्निरूपमथो वक्ष्ये सिद्ध्यर्थं सर्वकर्मणाम्। यतस्तस्मिन्नविज्ञाते होमो भवति निष्फलः।। स्मरेदग्निं द्विजो होष्यन् रक्तं गोवृषरूपिणम्। विततोर्द्ध्वाननं मध्ये बृहत्कर्णं सुलोचनम्।। चतुःश्रृंगं त्रिपादं च द्विशीर्षं सप्तहस्तकम्। द्विपुच्छं च त्रिधाबद्धं चतुर्नेत्रं त्रयीमयम्। शृंगाश्चत्वार उद्दिष्टा या ऊर्द्ध्वा समिधश्च ताः। वैदिके तान्त्रिकं वक्त्रे पादाः परिधस्त्रयः।। ऋगाद्याश्च त्रयोवेदाः पुरुषार्थास्तदीक्षणः।। छन्दांसि सप्त...

शिवरात्रि मे भांग प्रयोग का निषेध

भगवान् शिव का नाम लेकर गांजा, भांग, चरस आदि सेवन ! भूतभावन भगवान् भोलेनाथ नशे की किसी भी पदार्थ का सेवन करते हों, ऐसा हमको आजतक किसी भी शास्त्र में नहीं दिखा । विजया शब्द का अर्थ भांग भी होने से कुछ लोग वेद में आये विजया शब्द का अर्थ भांग करते हैं, जबकि भगवान् शिव के धनुष का नाम विजया है और सभी आचार्यों ने अपने भाष्य में धनुष ही अर्थ किये हैं । मूलमंत्र में भी विजया के बाद धनुष का उल्लेख होता है "विज्यं धनु: कपर्दिनो विशल्यो बाणवाँ२ उत।" शिवपुराण, लिंगपुराण, स्कंदपुराण, पद्मपुराण आदि में भगवान् शंकर के चरित्र आये हैं, किन्तु भांग, गांजा पीने का वर्णन कहीं भी नहीं है । यहां तक कि भगवान् आद्य शंकराचार्य रचित शिवमानस-पूजा-स्तोत्र में भगवान् शिव को चढ़ने वाले सभी पदार्थों का कल्पना किया गया है और उसमें गांजा, भांग का नाम कहीं भी नहीं आया है । इसीलिये अपने दुर्व्यसन को भगवान् शिव पर आरोपित करने का पाप न करें ! जबकि हमारे धर्मशास्त्रों में तो आया है ~~ "विजया कल्पमेकं च दश कल्पं च नागिनी। मदिरा कल्पसहस्राणि धूमसंख्या न विद्यते ।।" अर्थात् भांग खाने वाला एक क...

ब्राह्मण के क्रोध के परिणाम क्या है ।

#ब्राह्मणाः_कुपिता_हन्युर्भस्मीकुर्युः_स्वतेजसा ॥ #देवान्कुर्युरदेवांश्च_नाशयेयुरिदं_जगत् ॥ ब्राह्मण यद्यपि क्रोध से भर जाएँ तो अपने तेज से विरोधी का नाश ही कर दे । ब्राह्मण कोप से भर जाएँ तो देवताओं को अदेवता बना दे अथवा अधिक तो क्या संपूर्ण जगत का ही नाश कर दे । (स्कन्द पुराण प्रभास खण्ड , अध्याय 22 में भगवान के वचन)

गायत्री मंत्र का निषेध का श्रुति प्रमाण

सावित्रीं लक्ष्मीं यजुः प्रणवं यदि जानीयात् स्त्री शूद्रः स मृतोऽधो गच्छति तस्मात्सर्वदा नाचष्टे यदाचष्टे स आचार्यस्तेनैव स मृतोऽधो गच्छति ॥7॥ गायत्री (सावित्री) मंत्र, लक्ष्मी मंत्र, यजुस, और प्रणव मंत्र को यदि स्त्री या शूद्र जान ले, तब तो उसका मरण और अध:पतन ही होगा। इसलिए आचार्य को उनके आगे इन मन्त्रों का उच्चारण नहीं करना चाहिए। अगर आचार्य उनके आगे बोलेगा तो उसका मरण और अध:पतन होगा। (नृसिंहपूर्वतापिनोपनिषत)

सतीप्रथा के प्रमाण

सतीप्रथा ताः स्वपत्युर्महाराज निरीक्ष्याध्यात्मिकीं गतिम् । अन्वीयुस्तत्प्रभावेण अग्निं शान्तमिवार्चिषः ॥ (श्रीमद्भागवत ९/६/५५॥) वृद्धं तं पञ्चतां प्राप्तं महिष्यनुमरिष्यती । और्वेण जानताऽऽत्मानं प्रजावन्तं निवारिता ॥ ९/८/३॥ भागवत वनमें जानेपर बुढ़ापेके कारण जब बाहुककी मृत्यु हो गयी, तब उसकी पत्नी भी उसके साथ सती होनेको उद्यत हुई। परंतु महर्षि और्वको यह मालूम था कि इसे गर्भ है। इसलिये उन्होंने उसे सती होनेसे रोक दिया ॥ ३ ॥ एवं मित्रसहं शप्त्वा पतिलोकपरायणा । तदस्थीनि समिद्धेऽग्नौ प्रास्य भर्तुर्गतिं गता ॥ ३६॥ इस प्रकार मित्रसहको शाप देकर ब्राह्मणी अपने पतिकी अस्थियोंको धधकती हुई चितामें डालकर स्वयं भी सती हो गयी और उसने वही गति प्राप्त की, जो उसके पतिदेवको मिली थी। क्यों न हो, वह अपने पतिको छोडक़र और किसी लोकमें जाना भी तो नहीं चाहती थी ॥ ९/९/३६ ॥ भागवत देहं विपन्नाखिलचेतनादिकं पत्युः पृथिव्या दयितस्य चात्मनः । आलक्ष्य किञ्चिच्च विलप्य सा सती चितामथारोपयदद्रिसानुनि ॥ २१॥ विधाय कृत्यं ह्रदिनी जलाप्लुता दत्त्वोदकं भर्तुरुदारकर्मणः । नत्वा दिविस्थांस्त्रिदशांस्त्रिः परीत्य विवेश वह...

आंतरजातीय विवाह घातक है।

*अंतरजातीय__विवाह__धर्म__व__राष्ट्र__हेतु_विषाणु* *दैनिक भास्कर' (दिनांक १५. १. १९९७)*-के जयपुर-संस्करणमें यह समाचार प्रकाशित हुआ है-*'पाश्चात्त्य संस्कृति और आधुनिकताके माहौलमें पारम्परिक रीति-रिवाजोंसे विवाह करना भले ही दकियानूसी माना जाता हो; किन्तु वैज्ञानिक दृष्टिसे स्वास्थ्यके लिये यही उचित है। वैज्ञानिकोंने अन्तरजातीय विवाह-प्रथाको मानव-स्वास्थ्यके लिये हानिकारक बताया है। वैज्ञानिकोंका कहना है की समुदायसे बाहर शादी करनेवालोंकी सन्तानोंके शरीर मे किसी भी बिमारी होने की संभावना बढ जाती है।* *इण्डियन साइंस कांग्रेसके चौरासीवें वार्षिक सम्मेलन* में वैज्ञानिकोंने उक्त रहस्योद्घाटन किया। *वैज्ञानिकों एवं मानवशास्त्रियोंने कहा कि भारतकी पारम्परिक वैवाहिक व्यवस्थासे छेड़छाड़ करनेके जनस्वास्थ्यपर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेंगे।* विशेषज्ञोंने सदियों पुरानी वैवाहिक व्यवस्थाओंको विकृत करनेके जैविक दुष्परिणामोंके लिये आगाह किया। कलकत्ता विश्वविद्यालयमें मानव-विज्ञान-विभागमें मानव-जीन विषयके प्रोफेसर डॉ. देवप्रसाद मुखर्जीने अन्तरजातीय विवाहप्रथाके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभावोंकी चर्चा ...

क्या शास्त्रो मे मिलावट है ??

#क्या_हिन्दू_शास्त्रों_में_मिलावट_है आजकल एक नया फैशन चला है धर्मग्रन्थों को गरियाने और उन्हें नीचा दिखाने का और वह है ‘प्रक्षेप’ या ‘मिलावट’। हिंदुओं में एक ऐसी प्रजाति उग आई है जो हर ग्रन्थ के बारे में ऐसा बोलती मिलेगी की यह तो प्रक्षेप है, मिलावट है, इस ग्रन्थ की फलानी चीज बाद में मिला दी गई है, यह किसी और ने जोड़ दिया है। कोई इन ‘विद्वानों’ से पूछे की आप कौन हो हमारे ग्रन्थों की बातों को गलत कहने वाले? धर्मग्रन्थों में क्या सही है क्या गलत है यह तय करने वाले आप हो कौन? क्या असली है क्या मिलावट है यह तय करने का स्पेशल कोर्स कौन कराता है? अरे हो कौन आप? कोई वेदव्यास हो क्या शंकराचार्य हो? या कोई ठेकेदार हो शास्त्रों के? या कोई जज हो जो जजमेंट पास कर देते हो? ब्राह्मण ग्रन्थों, वेदांगों, उपनिषद से लेकर रामायण, गीता, पुराणों तक में ऐसे लोग हर जगह प्रक्षेप प्रक्षेप और मिलावट मिलावट का शोर मचाते रहते हैं- ये कुछ इस तरह कहते मिलेंगे- 1) ग्रन्थ का अमुक अंश प्रक्षेप है। 2) ग्रन्थ का अमुक अंश मिलावट है। 3) अमुक अंश बाद में जोड़ दिया गया है।4) यह तो असम्भव है, अवैज्ञनिक है, हो ही नहीं सकता है।...

ब्राह्मण कुल कि विशेषता

पराशर संहिता अनुसार ब्राह्मण कुल की विशेष महत्ता- वृषलस्तु पुरंदरः पितामहस्तु वैश्ययश्च। क्षत्रिय: परमो हरि: ब्राह्मणो भगवान् रुद्रः।। (पराशर संहिता) मनुष्य, इन्द्र की कृपा से शूद्र कुल में, ब्रह्मा की कृपा से वैश्य कुल में, विष्णु की कृपा से क्षत्रिय कुल में तथा महादेव की कृपा से ब्राह्मण कुल मे जन्म लेता है। अर्थात ब्राह्मण देवता का कुल श्रीभगवान महादेव की ही साक्षात् कृपा व अनुग्रह है। नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव साभार: श्री विश्वेश्वर मिश्र जी।

शिवरात्रि पूजन

।।#शिवरात्रि_पूजन।। पुष्प मात्र अर्पण करने से भी शिव प्रसन्न हो जाते हैं-- न स्नानेन न वस्त्रेन न धूपेन न चार्च्चया । तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासतः ॥” इति शङ्करोक्तेः ॥ * ॥स्कान्दे । शिव की विशेष कृपा के लिए रात्रि के प्रत्येक पहर में शिव को. स्नान करवाकर पूजा करें-- ततो रात्रौ प्रकर्त्तव्यं शिवप्रीणनतत्परः । प्रहरे प्रहरे स्नानं पूजाञ्चैव विशेषतः ॥ शिवरात्रि के व्रत को चांडाल आदि सभी कर सकते हैं-- शिवरात्रिव्रतं नाम सर्व्वपापप्रणाशनम् । आचाण्डालमनुष्याणां भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् व्रत में यदि जागरण भी हो जाए तो महान फल है-- उपवासप्रभावेण बलादपि च जागरात् ।शिवरात्रेस्तथा तस्य लिङ्गस्यापि प्रपूजया । अक्षयान्लभते लोकान् शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥”पाद्मे । सभी को बारह वर्ष या चौबीस वर्ष तो शिवरात्रि का व्रत अवश्य करना चाहिए- वर्षे वर्षे महादेवि नरो नारी पतिव्रता । शिवरात्रौ महादेवं कामं भक्त्या प्रपूजयेत् ॥” ईश्वानसंहितायाम् “एवमेव व्रतं कुर्य्यात् प्रति संवत्सरं व्रती ।द्वादशाब्दिकमेतद्धि चतुर्व्विंशाब्दिकं तथा । सर्व्वान् कामानवाप्नोति प्रेत्यचेह च मानवः ॥ प्रदोषव्य...

जाति बहिष्कार के नियम

कृते सम्भाषणात् पापं त्रेतायां स्पर्शनेन तु। द्वापरे त्वन्नमादाय कलौ पतति कर्मणा।। (पराशर स्मृति) कृतयुग मे पतित से संभाषण करने से पाप लिप्त होता है।त्रेतांयुग मे पतित के स्पर्श से द्धापर मे पतित का अन्न खाने से पाप लिप्त होता है कलियुग मे कर्म से ही पतित होते है।(किसी भी युग मे पतित से जितना संभव हो संभाषण स्पर्श या अन्नजल से बचना चाहिए ।) त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत्। द्वापरे कुलमेकं तु कर्त्तारं तु कलौयुगे ।। (पराशर स्मृति) कृतयुग मे पतित हो ऐसा देश त्याग करना चाहिए त्रेतायुग मे ग्राम का त्याग करना चाहिए द्धापर मे कुल का त्याग करना चाहिए कलियुग मे कर्ता व्यक्ति को जाति से बहिष्कृत करना चाहिए । अथ जाति बहिष्कृतं नरं शीध्रं जाति मध्ये आनये दित्याह स्कन्दे। ज्ञातित्यक्तो हि कुरुते पापं ज्ञातिविवर्जित:।। तत्पापं ज्ञातिबन्धुनां जायते मनुब्रवीत्।। ज्ञात्वापि विहितं कर्म जातिभि परिवर्जितम् ।। प्रायश्चिते पुनजार्तिमानयेन्मनुरब्रवीत् ।। ज्ञाति त्यक्तं तु पुरुषं ज्ञातिमध्ये समानयेत्।। प्रायश्चितेन् विधिना नोचे-भ्द्धांति व्रजत्यपि।। जाति से बहार किये मनुष्य को शीघ्र जाति मे ...

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ :- हिंदुत्व के नाम पर छल

मित्रों आप हिन्दू हैं और आपको अपने हिन्दू होने पर गर्व होता है। यदि ऐसा है तो आप उन लोगों के प्रति अवश्य ही क्रोधित होंगे जिन्होंने धर्म को या यूं कह लीजिए कि भगवा को, पैसा कमाने का धंधा बना लिया है, और यदि सबकुछ जानते हुए भी आप उनलोगों का जो धर्म को धंधा बना रखे है का, विरोध सिर्फ इसलिए नही करते है क्योंकि वो आप उनसे जुड़े पार्टी या उस संगठन के हिस्से है जिसके आप कार्यकर्ता हैं तो ये जान लीजिए कि आपने अपने पूर्वजों के दिये पहचान को त्याग कर चन्द नेताओ के चाकर बन चुके है, आपको भले पता न हो परन्तु आप गुलाम हो चुके हैं।..... सामान्य हिन्दुओं को ये बात पता नही होती है कि हिन्दुओं के पारम्परिक व्यवस्था में घुस कर कौन अधर्म फैला रहा है या यूं कह लीजिए भगवा कपड़े में कौन लुटेरा, कौन चोर धर्म का धंधा कर रहा है? आप लोग कहते है ना कि साधु सन्त पाखण्ड कर रहे है, वो लोगों को लुटते हैं। पर आप ये नही जानते कि आखिर कौन कर रहा हैं?... आइये मैं आपको बताता हूँ, अनेक पारम्परिक आखाड़ो में एक है जुना अखाड़ा, आज के समय यह अखाड़ा राजनीति का अड्डा और धर्म का धंधा करने वाला केंद्र बन चुका है। इस अखाड़े का प्रमुख छ...

संघ : विश्वसत्ता द्धारा सनातन धर्म विरुद्ध एक षड्यंत्र

विषय:- संघ एक छलावा भारत को संगठनवाद से मुक्ति का कारण सेक्रेट सोसाईटी अर्थात ब्रिटिश राजघराने की चाल स्वयंसेवकों को मनोवैज्ञानिक तरीके से भ्रमित करने के तरीके संघ के भ्रमित करने वाले कुछ झूठे जुमले और धारणाओं की समाज एवं स्वयंसेवकों के मन में स्थापना सनातन धर्म के मूल आधार वर्ण व्यवस्था पर भ्रमित करने की साजिस मुसलमानों पे संघ की योजना राममंदिर एवं मुसलमान साथियों दुनिया के जीतने भी बड़े संगठन आज किसी भी लोकतान्त्रिक देश में चल रहे हैं उनके पीछे कौन लोग है?, कौन उनकी नीति, रणनीति बनाता है?, कौन उनको धन देता है? आप सोच भी नहीं सकते बस ये जान लीजिये कि ऐसे सभी संगठनों पे उन लोगो का सीधा कब्ज़ा है जो ऐसे संगठनो को चलने दे रहे है और ऐसे लोगों को हम सीक्रेट सोसायटी के नाम से भी जानते है जिसके बारे में दुनिया को उतना ही पता है जितना वो स्वयं अपने बारे में जनाना चाहतें हैं और ये सेक्रेट सोसाईटी किसी भी देश या समाज में 100, 200 से 300 साल तक का प्लान करके अपना एजेंडा चलाती हैं| जिनमे से कई प्रभावी सेक्रेट सोसायटी ब्रिटिश राज परिवार एवं अन्य कई पश्चिमि राज परिवारों का है जिन्होंने दुनिया भर में ...