जाति बचावो
*जाति वैचित्र्यवाद*- *(अति विचित्र भगवत गति, को जग जानन जोग)* *इस प्रघट्ट मे 'जाति' शब्द की परिभाषा 'समानप्रसवात्मिका जाति' अभीष्ट नहीं अपितु किसो एक ही जाति विशेष मे दीख पड़ने वालो परम्परागत वे विशेषताए हैं जिनको आजकल 'नस्ल' के नाम से याद किया जाता है । पाश्चात्य जगत् आज पशु पक्षी और वृक्षो की नस्लो को सुरक्षित रखना और उनकी अभिवृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करना तो अपना कर्तव्य समझता है परन्तु मनुष्य की भी कोई खास नस्ल होती है और उसकी रक्षा करना भी आवश्यक है, दुर्भाग्यवश्य यह तथ्य अभी तक इन लोगो की खोपडी मे नही बैठ पाया है। यह सभी जानते हैं कि कहने मे 'ग्राम' एक साधारण वृक्ष है, परन्तु उसमे कलमी, लगडा, सफेदा, बम्बई, मलगोवा, तोता-परी और सिन्दूरी आदि अनेक जातियें पाई जाती हैं, जिनका रंग रूप और स्वाद एक दूसरे से सर्वथा विचित्र होता है, इसी प्रकार प्रयाग मे अमरूद की, नागपुर मे सतरे को, और बम्बई मे केले को जो नस्लें विद्यमान है वे अपने वैचित्र्य के कारण अन्यत्र उपलब्ध नहीं होती। पशुओ मे खास कर वैलो और घोड़ो की कई विशेष नस्ले पाई जाती है । अग्रेजो ने अपने शासनक...