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राम जी ने सीता जी का त्याग क्यों किया ?

#प्रश्न : राम जी ने सीता जी का त्याग क्यों किया ?                           और इस प्रसंग के कारण आर्य समाजी उत्तर कांड को प्रक्षेप कहते हैं । कुछ मानसिक रोगी श्री प्रभु के चरिचत्र पर प्रश्न उठाने का दुःसाहस करते हैं । 😠😠😠😠😠😠😠😠 #उत्तर : सब से पहले तो हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि राम और सीता में सर्वदा अभेद है यदि कोई राम और सीता को अलग समझता है तो यह उसका अज्ञानता मात्र ही है । जेहिं यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करै सुनि सोई॥ कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी॥ रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं॥ नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा॥ जिसने यह कथा पहले न सुनी हो, वह इसे सुनकर आश्चर्य न करे। जो ज्ञानी इस विचित्र कथा को सुनते हैं, वे यह जानकर आश्चर्य नहीं करते कि संसार में रामकथा की कोई सीमा नहीं है। उनके मन में ऐसा विश्वास रहता है। नाना प्रकार से राम के अवतार हुए हैं और सौ करोड़ तथा अपार रामायणें हैं। वाल्मीकि कृत आर्ष रामायण के उत्तर कांड में यह कथा वर्णित...

जीव को वर्ण की प्राप्ति कैसे होती है

जीव को वर्ण की प्राप्ति कैसे होती है तथा समाज में इस व्यवस्था का क्या स्थान है? यथा आपका शरीर समाज का अंग है, और आपके नेत्रकर्णादि शरीर के अंग जिसके उपांग कोशिका, पुतली, रोम आदि अंगों के भी हैं। वैसे ही सनातन समाज का हिस्सा वर्ण है और फिर उन वर्णों के अंग तदनुरूप जातियां हैं और जातियों में भी उपजातियां हैं। पूर्वकाल तथा वर्तमान में भिन्नता जातिवाद से ही दृश्य है।    यथा गृह में भिन्न भिन्न कक्ष, वहाँ अलमारियाँ और उसमें भी अनेक खण्डों की व्यवस्था होती है, तथैव समाज रूपी गृह में वर्णरूपी कक्ष और जातिरूपी अलमारियों के खण्ड रूपी उपजातियां हैं। वर्ण समष्टि है और जाति व्यष्टि। जाति भी संस्कृत है सो यावनी 'अल-जात' से उसका संबंध नहीं जोड़ना चाहिये।       "ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान् सर्वेषां प्राणिनामिह।"                     (श्रीमद्भागवत महापुराण)      जन्म से ही ब्राह्मण सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है।       "जन्मनैव महाभागो ब्राह्मणो नाम जायते। नमस्य: सर्वभूतानामतिथि: प्रसृताग्रभुक्...

सोशियल मिडिया मे वेदमंत्र की मर्यादा का उल्लंघन

#वेदघोष_के_विड़ीयों_का #सोशियलमिड़ीया_में_दुष्प्रचार सामूहिक यज्ञों आदि का ऐसा व्यसन हुआ हैं कि कुछ अच्छे से अच्छे वैदिकों !  इस सोशियल मिड़ीया में भी  अनधिकृतों -->  जनेऊ-रहितों(व्रात्य),शाखारण्ड,शूद्र,म्लेच्छ, नित्य-सन्ध्योपासनारहित-द्विजों तथा पतित-ब्राह्मणों के मध्य #वेदमंत्रघोष_के_विड़ीयो अपलोड़ किया करतें हैं.. जिसको आपका परिचय हैं वह तो जानते ही हैं कि आपमें या आपके शिष्य में कितनी सक्षमता हैं। यह सब विद्यालय तक सिमित रहे तो ही शास्त्र की मर्यादा हैं- "#श्रुतं_मे_गोपाय || तैत्तरीय शि०१/४/१।। और न तो यह व्यवसायीकरण की श्रृंखला में आता है कि उसकी प्रायोगिक विज्ञापन(जाहेरात करनी)चाहिये। हम सबको समादर पूर्वक निवेदन करतें हैं कि ऐसा अनुचित कार्य न हो।। कलियुग से पहिले न तो कैमेरे थे और न तो विड़ीयो-शूटिंग के साधन, फिर भी अध्ययन-अध्यापन की आर्ष-पद्धति सुरक्षित थी .. और आज न तो स्व-स्वशाखा का कहीं अध्ययन हो रहा हैं और न तो स्व-स्व शाखा के उपनयन -- ये सब द्विज की वैकल्पिक कल्पना भी सार्थक नहीं, क्योंकि परशाखीय जनेऊ, नित्यकर्म, जनेऊ और समस्त संस्कार तथा ...