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मदिरापान‌ निषेध

*शास्त्र मे मदिरापान निषेध* क्या मदिरा का सेवन करना जातीय गौरव हो सकता है?? एक षडयंत्र की तहत मदिरा को जातीय गौरव बताया गया, ब्राह्मणों के ब्राह्मणत्व , क्षत्रियों के क्षत्रियत्व ,वैश्यों के वैश्यत्व को क्षीण करने का षडयंत्र मात्र है और कुछ नही , द्विज कौन ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य, जिनका दो बार जन्म हो प्रथम माता के गर्भ से द्वितीय संस्कार द्वारा उन्हें द्विज कहते है जो द्विज मद्यपान करते है उनका द्विजत्वं भ्रष्ट हो जाता है अतः द्विजो के लिए स्पष्ट वचन है शास्त्रो का "अदेयं चाप्यपेयं च तथैवास्पृश्यमेव च। द्विजातीनामनालोक्यं नित्यं मद्यमिति स्थितिः ॥" तस्मात् सर्वप्रकारेण (सर्वप्रयत्नेन) मद्यं नित्यं विवर्जयेत्। पीत्वा पतति कर्मभ्यस्त्वसम्भाष्यो भवेद् द्विजः॥" .. (कूर्मपुराण, उ० १७। ४२-४३; पद्मपुराण, स्वर्ग० ५६ । ४३-४४) द्विजातियोंके लिये मदिरा किसीको देना, स्वयं उसे पीना, उसका स्पर्श करना तथा उसकी ओर देखना भी पाप है। उससे सदा दूर ही रहना चाहिये-यही सनातन मर्यादा है। इसलिये पूर्ण प्रयत्न करके सर्वदा मदिराका त्याग करे। जो द्विज मद्यपान करता है, वह द्विजोचित कर्मों...

सनातन धर्म के ऊपर वामपंथी आक्षेपों का उत्तर

*सनातन धर्म के ऊपर वामपंथी आक्षेपों का उत्तर* आजकल एक वामपंथी लेख बहुत प्रचारित हो रहा है, जिसमें कुछ प्रश्न (आक्षेप) किये गए हैं। *धर्मविरोधी जन ये प्रश्न करते तो हैं किंतु कभी स्वयं उसका उत्तर नहीं खोजना चाहते। इसका कारण यह है कि इनमें जिज्ञासा अथवा ज्ञान के प्रति श्रद्धा नहीं होती है, मात्र विवाद के आधार पर अपना अस्तित्व दृढ़ करने का निरर्थक प्रयास करते हैं।* वैसे तो इनमें से अधिकांश प्रश्न अत्यंत ही निम्नस्तरीय हैं तथा कोई भी सामान्य अध्ययन वाला व्यक्ति इनका उत्तर अत्यंत सरलता से दे सकता है, किन्तु मैं अपनी ओर से कुछ शास्त्रीय आलोक में इनका समाधान कर रहा हूँ - प्रश्न ०१ - सभी देवी देवताओं ने भारत में ही जन्म क्यों लिया? क्यों किसी भी देवी देवता को भारत के बाहर कोई नहीं जानता ? उत्तर ०१ - सर्वप्रथम तो यह गलती सुधारें कि देवताओं ने जन्म लिया है। उनका जन्म लौकिक नहीं होता इसीलिए वे अवतार लेते हैं, जन्म नहीं। जहां उनके जन्म की चर्चा आयी है वहां अवतार का ही अर्थ समझना चाहिए। साथ ही, असंख्यात देवताओं में सभी अवतार नहीं लेते, कुछ देवता ही अवतार ग्रहण करके लोककल्याण का कार्य सम्प...

वर्णाश्रमधर्म

#हिन्दू_संस्कृति_व_वर्णाश्रमधर्म ••• #भाग-१ भारत ही वह राष्ट्र है जिसने समग्र ज्ञाननिधि को समग्र विश्व के कल्याणार्थ मानवमात्र के लिए प्रदान किया।सनातन वैदिक आर्य हिन्दुओं के पूर्वजों ने विश्व को धर्मशास्त्र,अर्थशास्त्र,कामशास्त्र,मोक्षशास्त्र,ज्यौतिष,गणित तथा चिकित्सादि का विज्ञान सुलभ करवाया।१८ विद्याओं व ६४कलाओं का प्रदाता भारत ही है।स्वल्प कालखण्ड की संकटघड़ी को छोड़कर हमारे पूर्वजों ने अपनी ज्ञानशक्ति के बल पर सम्पूर्ण पृथिवी पर निर्बाध शासन किया। जब प्राचीनकाल में भारत में #वर्णाश्रम_व्यवस्था चरम पर थी तो सम्पूर्ण दृष्टि से भारत एक अत्यन्त सुसम्पन्न राष्ट्र था। बौद्धिक दृष्टि से आर्य हिन्दू जाति संसार की सर्वश्रेष्ठ नस्ल है अब इस विषय में संसार के सभी बुद्धिजीवियों में मतैक्यता है।अतःइसके विषय में कुछ कहना पिष्टपेषण ही होगा। इस सर्वश्रेष्ठता का रहस्य क्या है???? जी,इसका रहस्य है वर्णाश्रम-व्यवस्था। क्योंकि सनातन वैदिक आर्य हिन्दुओं के पूर्वजों नें अपने धर्मशास्त्र का अनुपालन कर अपनी रोटी-बेटी का सम्बन्ध सभी से न कर अपने रक्त को विशुद्ध रखा।संकरता न होने दी। आर्य हिन्दू...

वामपंथी प्रक्षिप्तवाद /क्या शास्त्रो मे मिलावट है?

प्रक्षिप्तवाद हिन्दू समाज गिर रहा है। गिरने का अर्थ सभी प्रकार से है। राजनैतिक, सामाजिक, चारित्रिक, वैचारिक, धार्मिक, हर प्रकार से गिर रहा है। पहले नभोमंडल में था यह समाज, आज धरातल पर है। अब इसको एक नया शौक चढ़ गया है। अब इसे रसातल जाना है। रसातल जाने में अगर भूतल बाधक बने तो बोरिंग करके इसे रसातल जाना है। इसका कारण जानते हैं, क्या है ? धार्मिक, राजनीतिक आदि बड़ी बातें छोड़ भी दें, तो वैयक्तिक स्तर पर भी इसके चार कारण हैं - १) स्वयं के हिन्दू होने पर घमंड ! २) मस्तिष्क की अपेक्षा वाणी का अधिक सक्रिय रहना। ३) स्वयं को पूर्ण और सबसे अधिक समझदार मानकर बिना वस्तुस्थिति को समझे ही प्रतिक्रिया देना। ४) ग्रंथोल्लिखित बातों की अपेक्षा मन:कल्पित बातों को प्रधानता देना। हिंदुओं में एक नया स्वभाव आया है। "मार लाठी" का स्वभाव। बिना सोचे, समझे, बस लाठी पटक देनी है। हिन्दू सहमा हुआ है, हिन्दू डरा हुआ है। वह डरता है कि कहीं उसके सामने कोई उसके धर्म के विषय में कोई आपत्ति न कर दें, और वह डरता है, इस बात से कि कहीं वह उत्तर न देने के कारण "बुरा" तो नहीं बन जायेगा। कहीं यदि वह...