सनातन धर्म के ऊपर वामपंथी आक्षेपों का उत्तर

*सनातन धर्म के ऊपर वामपंथी आक्षेपों का उत्तर*

आजकल एक वामपंथी लेख बहुत प्रचारित हो रहा है, जिसमें कुछ प्रश्न (आक्षेप) किये गए हैं।

*धर्मविरोधी जन ये प्रश्न करते तो हैं किंतु कभी स्वयं उसका उत्तर नहीं खोजना चाहते। इसका कारण यह है कि इनमें जिज्ञासा अथवा ज्ञान के प्रति श्रद्धा नहीं होती है, मात्र विवाद के आधार पर अपना अस्तित्व दृढ़ करने का निरर्थक प्रयास करते हैं।*

वैसे तो इनमें से अधिकांश प्रश्न अत्यंत ही निम्नस्तरीय हैं तथा कोई भी सामान्य अध्ययन वाला व्यक्ति इनका उत्तर अत्यंत सरलता से दे सकता है, किन्तु मैं अपनी ओर से कुछ शास्त्रीय आलोक में इनका समाधान कर रहा हूँ -

प्रश्न ०१ - सभी देवी देवताओं ने भारत में ही जन्म क्यों लिया? क्यों किसी भी देवी देवता को भारत के बाहर कोई नहीं जानता ?

उत्तर ०१ - सर्वप्रथम तो यह गलती सुधारें कि देवताओं ने जन्म लिया है। उनका जन्म लौकिक नहीं होता इसीलिए वे अवतार लेते हैं, जन्म नहीं। जहां उनके जन्म की चर्चा आयी है वहां अवतार का ही अर्थ समझना चाहिए। साथ ही, असंख्यात देवताओं में सभी अवतार नहीं लेते, कुछ देवता ही अवतार ग्रहण करके लोककल्याण का कार्य सम्पादित करते हैं। दूसरी बात यह, कि भारत के बाहर भी लोग देवताओं को जानते हैं, किन्तु भिन्न नाम-रूप-गुण के साथ। उदाहरण के लिए, सूर्यतत्व को नियंत्रित करने वाली शक्ति को भारतीय संस्कृति में आदित्य या सविता कहते हैं, तो यूनान में उसे Apollo कहा जाता था। मिस्र में सूर्य का नाम Ra, चीन में Xihe तथा जापान में Amaterasu है।  जिस प्रकार से अलग अलग भाषा के लोग पशु, पक्षी, प्राकृतिक संसाधन एवं पारिवारिक सम्बन्धों को अलग अलग नाम से बुलाते हैं, किन्तु तात्पर्य वही रहता है, वैसे ही अलग अलग देशों में भी अलग अलग नाम, रूप एवं विधियों से देवताओं को पुकारा जाता था। देवताओं का यह विशेष गुण है कि उपासक की भावना के अनुसार वे स्वरूपधारण कर लेते हैं। जिसने जितना आध्यात्मिक विकास किया, जिसकी प्रज्ञा का स्तर जैसा रहा, उसने देवताओं के स्वरूप का वैसा ही अनुभव किया।

अब प्रश्न इस बात का है कि देवताओं ने भारत में ही क्यों अवतार ग्रहण किया !! आप हमें यह बताईये, कि जब आप हवाई जहाज से उतरते हैं, तो सीधा अपने घर पर ही उतरते हैं या विमान के अड्डे पर ? जब आप रेलगाड़ी से यात्रा करते हैं तो वे आपको सीधा आपके सटीक गंतव्य तक पहुंचाती है या अपने सर्वाधिक उपयुक्त निर्धारित स्थान पर ?

ठीक उसी प्रकार, अवतार भी इधर उधर न होकर भारतभूमि में ही होते हैं, क्योंकि यह सर्वाधिक उपयुक्त स्थल है। भारतभूमि की संस्कृति, समाज, कौशल, पवित्रता एवं ज्ञान-विज्ञानसम्मत व्यवस्था के कारण ही यहां दिव्यावतार होते हैं।

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
(ब्रह्मपुराण, अध्याय १९, श्लोक - ०१)

जो समुद्र से उत्तर दिशा, एवं हिमालय से दक्षिण दिशा की ओर स्थित है, उस वर्ष का नाम भारतवर्ष है, जहां की प्रजा भारती(य) कहलाती है।

अतः सम्प्राप्यते स्वर्गो मुक्तिमस्मात् प्रयाति वै।
तिर्य्यत्वं नरकं चापि यान्त्यतः पुरुषा द्विजाः॥
इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यं चान्ते च गच्छति।
न खल्वन्यत्र मर्त्त्यानां कर्म्मभूमौ विधीयते॥
(ब्रह्मपुराण, अध्याय - १९, श्लोक - ०४-०५)

इसी (भारत) से व्यक्ति स्वर्ग जाता है, यहीं के मोक्ष के लिए प्रस्थान करता है, पशु पक्षी आदि की योनि में भी यहीं से जाता है एवं इसे ही कर्मभूमि निर्धारित किया गया है, इसके अतिरिक्त कहीं अन्यत्र यह बात नहीं है।

अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महामुने।
यतो हि कर्म्मभूरेषा यतोऽन्या भोगभूमयः॥
अत्र जन्मसहस्राणां सहस्रैरपि सत्तम।
कदाचिल्लभते जन्तुर्मानुष्यं पुण्यसंचयात्॥
(ब्रह्मपुराण, अध्याय - १९, श्लोक - २३-२४)

इस पूरे जम्बूद्वीप में भारतवर्ष अत्यंत श्रेष्ठ है, क्योंकि यह कर्मभूमि है, जबकि अन्य सभी भोगभूमि हैं। हज़ारों जन्मों के पुण्य जब संचित होते हैं तब किसी किसी को यहां मनुष्य योनि में जन्म मिलता है।

क्षारोदधेरुत्तरं यद्धिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
ज्ञेयं तद्भारतं वर्षं सर्वकर्मफलप्रदम्॥
अत्र कर्माणि कुर्वन्ति त्रिविधानि तु नारद।
तत्फलं भुज्यते चैव भोगभूमिष्वनुक्रमात्॥
भारते तु कृतं कर्म शुभं वाशुभमेव च।
तत्फलं क्षयि विप्रेन्द्र भुज्यतेऽन्यत्रजन्तुभिः॥
अद्यापि देवा इच्छन्ति जन्म भारतभूतले।
संचितं सुमहत्पुण्यमक्षय्यममलं शुभम्॥
कदा लभामहे जन्म वर्षभारतभूमिषु।
कदा पुण्येन महता यास्याम परमं पदम्॥

(नारद पुराण, पूर्वभाग, प्रथमपाद, अध्याय - ०३, श्लोक - ४६-५०)

खारे समुद्र से उत्तर एवं बर्फ के पर्वत (हिमालय) से दक्षिण के भूभाग को सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाला भारतवर्ष जानना
चाहिए। हे नारद ! यहां तीन प्रकार के (उत्तम, मध्यम, अधम) कर्मों को करने के बाद उसके फल को अन्य भोगभूमि में क्रमशः भोगा जाता है। भारत में किया गया शुभ  अथवा अशुभ कर्म प्राणियों के द्वारा अन्यत्र (स्वर्ग-नरक आदि सूक्ष्म लोकों में, पुष्कर-शाल्मलि आदि सूक्ष्म द्वीपों में अथवा अमेरिका-रूस आदि म्लेच्छ देशों में) भोगा जाता है। आज भी देवतागण इस भारतभूमि में जन्म लेने के लिए, महान् निर्मल अक्षय पुण्य के सञ्चय हेतु इच्छा करते हैं। वे कहते हैं - "वह दिन कब आएगा, जब हम भारतभूमि में जन्म लेंगे और कब महान् पुण्यबल से परमपद (मोक्ष) को प्राप्त करेंगे !!

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च भागशः।
इज्यायुतवणिज्यादि वर्तयन्तो व्यवस्थिताः॥
तेषां सव्यवहारोऽयं वर्तनन्तु परस्परम्।
धर्मार्थकामसंयुक्तो वर्णानान्तु स्वकर्मसु॥
(मत्स्यपुराण, अध्याय - ११४, श्लोक - १२-१३)

(इस भारत में) विभागपूर्वक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं उनके मध्य में शूद्रों का वास है जो यज्ञ, रक्षा, व्यापार आदि के माध्यम से व्यवस्थित हैं। वे सभी आपस में अच्छा व्यवहार करते हुए अपने अपने वर्णानुसार कर्म करते हुए, धर्म-अर्थ-काम में लगे रहते हैं। 

भारते तु स्त्रियः पुंसो नानावर्णाः प्रकीर्तिताः।
नानादेवार्चने युक्ता नानाकर्माणि कुर्वते॥
परमायुः स्मृतं तेषां शतं वर्षाणि सुव्रताः।
(कूर्मपुराण, पूर्वभाग, अध्याय - ४७, श्लोक - २१)

भारत में (ब्राह्मणादि) अलग अलग वर्णों वाले स्त्री-पुरुष रहते हैं जो विभिन्न देवताओं के पूजन और विभिन्न आजीविका वाले कर्मों को करते हैं। उनकी परमायु सौ वर्षों की बताई गई है।

(यदि यहां वर्ण का अर्थ शारीरिक रंग से लें, तो भी देखते हैं कि भारत में गोरे, काले, और सांवले, तीनों रंग के लोग बहुतायत से हैं)

शुभानामशुभानां च कर्मणां जन्म भारते।
पुण्यक्षेत्रेऽत्र सर्वत्र नान्यत्र भुञ्जते जनाः॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृतिखण्ड, अध्याय - २६, श्लोक - १५)

(अत्यंत प्रबल) शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप भारत में यदि जन्म मिले तो इस पुण्यक्षेत्र में ही उसका फल भोगना होता है, अन्यत्र नहीं। (सामान्य के लिए म्लेच्छ भूमि में जन्म मिलता है और वहीं भोगते हैं, किन्तु अत्यंत तीव्र प्रारब्ध के पाप-पुण्य भारत में ही क्षीण किये जाते हैं)

अवतारो हरेः प्रोक्तो भूभारहरणाय वै।
पापात्मनां विनाशाय धर्मसंस्थापनाय च ।
(श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, स्कन्ध -०४/अध्यायः ०१, श्लोक - २८)

भगवान् विष्णु के अवतार पृथ्वी के (अधर्मजन्य) भार को दूर करने के लिए होते हैं। पापियों के नाश एवं धर्म की पुनः स्थापना के लिए होते हैं।

जिन म्लेच्छ देशों के लोग, सौ साल पहले तक ढंग से नहाना और धोना नहीं जानते थे, जहां तीन सौ वर्ष पहले तक लोकशिक्षण के लिए सार्वजनिक विद्यालय नहीं थे, जिन देशों में गैलेलियो को केवल इसीलिए दण्डित किया गया कि उसने कुछ अलग बात कही, वहां देवताओं का अवतार होगा ही क्यों ? हमारे यहां तो अनादिकाल से ही निरंतर ज्ञान विज्ञान की भौतिक एवं दिव्यस्तरीय परम्परा रही है। भला आपने सुना है कि रूस या अमेरिका के राष्ट्रपति हमारे देश में आए हों और सीधा किसी अंधेरी गुफा में प्रवेश कर गए हों ? अथवा हमारे ही देश के राष्ट्राध्यक्ष किसी और देश में गए किन्तु वहां के अधिकारियों से न मिलकर किसी खदान में घुस गए ? नहीं न ... वैसे ही देवता भी वहीं और उसी के पास आते हैं, जहां उनके अनुकूल व्यवस्था और उद्देश्यपूर्ति में सहायक लोग होते हैं।

प्रश्न ०२ - जितने भी देवी देवताओं की सवारियां हैं, उनमें सिर्फ वही जानवर क्यों हैं जो कि भारत में ही पाये जाते हैं ? ऐसे जानवर क्यों नहीं, जो कि सिर्फ कुछ ही देशो में पाये जाते हैं, जैसे कि कंगारू, जिराफ आदि ?

उत्तर ०२ - यह प्रश्न ही बड़ा अज्ञानमूलक है। जब भारत में अवतार होंगे तो वैसे पशु ही वाहन बनाये जाएंगे जो भारत में उपलब्ध हों। वैसे मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि देवताओं के वाहन लौकिक पशु नहीं होते हैं, वे पशु पक्षी के जैसे दिखते हैं किंतु धर्ममय होते हैं। धर्म के ही आधार पर देवतत्व स्थित होता है। भगवान् शिव के वाहन नंदीश्वर हैं, जो बैल के रूप में धर्म ही हैं।
वृषो हि भगवान् धर्म:
(स्कन्दपुराण)
देवी का जो सोमनन्दी नामक वाहन है, वह आकृति से सिंह है, किन्तु वह भी धर्ममय ही है।
सिंहं समग्रं धर्ममीश्वरम्
(वैकृतिक रहस्य)

ऐसे ही विष्णुदेव के गरुड़, सरस्वती देवी का हंस, आदि सभी ज्ञानादि के प्रतीक धर्मरूप ही हैं। वैसे देवताओं के अनेक दिव्य विमानों का वर्णन भी शास्त्रों में व्यापकता से प्राप्त होता है।

दूसरी बात, इस प्रश्न में विरोधाभास है। देवताओं के वाहन केवल भारत में ही पाए जाते हैं, ऐसी बात नहीं है, अपितु कंगारू, जिराफ आदि तो एक दो देशों में ही पाए जाते हैं, किन्तु देवताओं के वाहन बहुतायत से लगभग पूरी पृथ्वी में पाए जाते हैं। आजकल लोगों के स्वार्थ, प्रदूषण, शिकार आदि के कारण बहुत स्थानों की जैव विविधता संकट में पड़ गई है किंतु हम आज भी देख सकते हैं कि देवताओं के वाहन जिस आकृति को धारण करते हैं वे भारत के अतिरिक्त भी अन्य अनेकों देशों में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हैं।

उदाहरण के लिए - गंगादेवी का मगरमच्छ, गणेश जी का चूहा, कुमार कार्तिकेय का मोर, देवी का सिंह, विष्णु भगवान् का गरुड़, यमराज का भैंसा, इन्द्र का हाथी और घोड़ा, शनिदेव का कौवा, सरस्वती का हंस, अग्निदेव का भेड़ा, वायुदेव का हिरण आदि प्राणी तो लगभग सारे भूमंडल पर पाए जाते हैं। शिव जी का वृषभ भी पहले व्यापकता से उपलब्ध था किंतु अब म्लेच्छों के प्रभाव से भारत में ही गोवंश संकट की स्थिति में है।

प्रश्न ०३ - सभी देवी देवता हमेशा राज घरानों में ही जन्म क्यों लेते थे ? क्यों किसी भी देवी देवता ने किसी गरीब या शूद्र के यहां जन्म नहीं लिया ?

उत्तर ०३ - आप पहले तो यह स्पष्ट करें कि आप पूछना क्या चाहते हैं ? गरीब के यहां जन्म नहीं लिया, या शूद्र के यहां जन्म नहीं लिया ? क्या तात्पर्य है ? गरीब अलग है, शूद्र अलग है। गरीबी का शूद्र होने से कोई सम्बन्ध नहीं है। यहाँ ये नकली शोषण का रोना बन्द करो। सनातनी शास्त्रों में कहां लिखा है कि शूद्र को गरीब ही रहना चाहिए, शूद्र धन संग्रह नहीं कर सकता है आदि आदि ? कहीं नहीं लिखा है ऐसा। हां, यह अवश्य लिखा है कि ब्राह्मण को अकिंचन होना चाहिए, धनसंग्रह से बचना चाहिए, त्यागमय अपरिग्रही जीवन बिताना चाहिए, और इस बात के सैकड़ों प्रमाण मिलेंगे। समाज के नब्बे प्रतिशत कौशल कृत्य एवं आजीविकायें शूद्र के लिए धार्मिक रूप से आरक्षित हैं, जिन्हें यदि ब्राह्मण अपना ले तो दोषी होगा।

रही बात गरीब की, तो किसी भी वर्ण का व्यक्ति गरीब हो सकता है। धनी होना अथवा दरिद्र होना तो निजी प्रारब्ध का विषय है, इसमें शूद्र या ब्राह्मण की बात नहीं है। हमारे देश में तो हरिश्चंद्र, नल, युधिष्ठिर, सुरथ, द्युमत्सेन, आदि पुरातन चक्रवर्ती राजाओं एवं महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी जैसे बड़े बड़े शासकों ने भी अपने जीवन में कई कई बार घोर दरिद्रता एवं अभाव झेला है। हां, इसके बाद भी उन्होंने अन्यायपूर्ण तरीके से किसी शूद्र के धन को छीना नहीं।

भगवान् यूं ही कहीं सोते जागते अवतार नहीं ले लेते हैं। जगत्पिता के माता-पिता बनने के लिए सहस्रों वर्षों की अपार तपस्या एवं भक्ति लगती है। जैसे द्रोण और धरा ने तपस्या की, जैसे कश्यप और अदिति, स्वायंभुव मनु एवं शतरूपा, कर्दम एवं देवहूति, दक्ष एवं प्रसूति, मेना एवं हिमालय ने तपस्या की, तब जाकर उनके घर दिव्यावतार हुए। तो भगवान् का प्राकट्य कहाँ होगा यह तो तपस्यारत भक्तों के आधार पर निश्चित होता है किंतु अवतार के बाद भगवान् अपने भक्तों के प्रति कृपा करने में भेद नहीं करते। वे विदुर, शबरी, कुब्जा, गणिका, उद्धव, व्याध, निषाद, सुदामा, सुग्रीव, अक्रूर, मोरध्वज, आदि सबों पर कृपा करते हैं। और हां, उसका अवतार तो मनुष्य के अतिरिक्त मछली, कछुआ, हंस, सर्प, सिंह, वाराह, अश्व आदि अनेक योनियों के रूप में होते रहता है, यह उनकी इच्छा एवं अवतार के उद्देश्य का विषय है कि कब कौन सा स्वरूप धारण करेंगे। आपलोग जैसी अनर्गल शंका करते हैं, उससे स्पष्ट है कि कभी वास्तव में शंका समाधान हेतु प्रयास नहीं करते। वैसे एक बात पूछूँ ? बौद्धों का आदि ललितविस्तर ग्रंथ यह क्यों कहता है कि बुद्धावतार केवल ब्राह्मण या क्षत्रिय कुल में ही हो सकता है ?

प्रश्न ०४ - पौराणिक कथाओं में सभी देवी देवताओं की दिनचर्या का वर्णन है, जैसे कि कब पार्वती ने चंदन से स्नान किया, कब गणेश के लिये लड्डू बनाये, गणेश ने कैसे लड्डू खाये.. आदि। लेकिन जैसे ही ग्रंथों की स्क्रिप्ट खत्म हो गयी, भगवानों की दिनचर्या भी खत्म... तो क्या बाद में सभी देवी देवताओं का देहांत हो गया ? अब वो कहाँ है ? उनकी औलादें कहाँ है ?

उत्तर ०४ - पहली बात तो यह कि पुराणों में किसी की "दिनचर्या" का वर्णन नहीं है। पुराणों में ही पुराणों के लक्षण और परिभाषा बताई गई है, पुराणों के एक, पांच एवं दस लक्षण होते हैं।
एक लक्षण में - कल्याणकारी मार्ग का उपदेश है।
पञ्चलक्षणों में - सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित का स्थान है।
दस लक्षणों में - सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति एवं आश्रय का स्थान आता है।

चूंकि सर्वाधिक प्रसिद्ध पांच लक्षण ही हैं, इसीलिए उनका सामान्य परिचय दे देता हूँ। शास्त्रों के नानाविध विषय एवं रहस्य कोई संस्थान बना लेने से, आधुनिक पढ़ाई करके शोध विद्यार्थी या पीएचडी करने से, अथवा समितियों से सम्मानित होकर नहीं गम्य होते। कोई परिवार, समाज, परिषद्, संघ या समिति बनाने से भी शास्त्रों का संरक्षण नहीं होता। मूल परम्परागत आचार्यपीठ एवं शिष्यबल का संरक्षण एवं संवर्धन किये बिना कोई आधारभूत लाभ नहीं हो सकता है।

अनुवादों की वर्तमान शैली ने मूल परिभाषा एवं धारणा को विकृत करने का अक्षम्य अपराध किया है। गूगल से माइथोलॉजी का अर्थ पूछो तो पौराणिक बताता है। हमारे शास्त्रों से पूछो तो सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित के वर्णन से युक्त ग्रंथों को पुराण कहते हैं, ऐसा बताते हैं। इसी को यदि अलग-अलग देखें तो आंग्ल में Origin of Universe, Expansion of Universe, Origin of Life, Systematic division of Time with Theory of Relativity, Chronological order of Events and History आदि के समकक्ष कह सकते हैं।

अंग्रेजी में पढ़कर कितना उन्नत और वैज्ञानिक लगा न ? जबकि संस्कृतनिष्ठ हिंदी में लगा होगा कि पता नहीं क्या क्या कह दिया। संस्कृतनिष्ठ हिंदी में कहें तो अंधविश्वास और माइथोलॉजी लगती है किंतु अंग्रेजी में कहें तो वैज्ञानिक लगता है, यही हमारे समाज की शिक्षित मूर्खता का प्रमाण है। मैं समझ नहीं पाता कि माइथोलॉजी में पौराणिक क्या है एवं पुराणों में माइथोलॉजी क्या है। दो नितांत भिन्न विषय एवं सन्दर्भों का पर्याय रूप में प्रयोग करने का उद्देश्य मात्र सनातनी समाज को सनातनी ज्ञान एवं गौरव से घृणास्पद रीति के द्वारा वंचित रखना ही है।

अब दूसरी बात, पुराणों के संस्करण प्रत्येक ४३,२०,००० वर्ष में, द्वापरांत के समय, किसी योग्य देवतुल्य विद्वान् को वेदव्यास के पद पर स्थापित करके नवीनीकृत किये जाते हैं, जिनमें कुछ पाठभेद के साथ अलग अलग कल्पों का वर्णन होता है। किस कल्प में क्या क्या हुआ, पूरी दिनचर्या का एक एक विवरण, एक एक बात का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। भविष्य पुराण का मत है कि कल्पों के विस्तार और एक एक का हिसाब असंभव है। कल्प की क्षमता ब्रह्मा के एक दिन के बराबर है। आप ठीक ठीक बता सकते हैं कि आपके पूरे जीवन में कौन सी घटना ठीक किस दिन हुई थी ? नहीं न ... केवल मुख्य मुख्य बातों की तिथि बता सकते हैं। किंतु ९० प्रतिशत के विषय में केवल घटना बता पाते हैं, दिन नहीं। वैसे ही ब्रह्मा के एक एक दिन यानी कल्प में हिसाब नहीं रखे जाते।

केवल मुख्य मुख्य कल्पों के बात उल्लिखित हैं। वैसे भी सौ करोड़ रामायण एवं सौ करोड़ पुराण संहिता में पृथ्वीलोक को मात्र आठ दस लाख तक मिले हैं। हज़ार में बस एक रुपया। तो एक एक बात पृथ्वी वालों को बताई नहीं जा सकती, क्योंकि उनकी क्षमता और अधिकार उतने का नहीं है। सरकार जब बजट निकालती है तो केवल रकम बताती है, एक एक नोट का नंबर नहीं बताती। जब हम अपने इस क्षुद्र जीवन की सामान्य घटनाओं में एक एक दिन का हिसाब नहीं बता सकते तो गूढ़ लीलाओं का एक एक कल्प का हिसाब कैसे रखेंगे ? वर्तमान ब्रह्मा के ही जीवन में अभी तक छत्तीस हज़ार कल्प बीत चुके हैं। उनके नामों तक की गणना सम्भव नहीं है, घटनाओं की बात तो दूर है। मैंने अनेकानेक ग्रंथों के शोध से अभी तक मात्र तीन चार सौ कल्पों के नाम खोजे हैं। केवल वर्तमान ब्रह्मा के भुक्त कल्पों में से मात्र एक प्रतिशत के नाम ...

पूर्वकाल में भी देवता ऐसे सड़क पर घूमते नहीं रहते थे। उस समय भी केवल तपोबल से युक्त अधिकारी को ही उनके दर्शन होते थे। तो देवताओं की स्थिति आज भी वही है, तो पहले थी। पूर्वकाल में लोग अधिक संस्कार और सद्गुणों से युक्त होते थे इसीलिए देवताओं के साक्षात्कार का लाभ बहुतों को मिलता था। अब इसका अभाव हो गया है, ऐसे लोगों की संख्या कम हो गयी है, इसीलिए देवताओं के प्रत्यक्ष सानिध्य का लाभ गिने चुने महात्माओं को ही मिलता है। देवता भी हैं और दैत्य भी। दैत्यों की औलादें आज भी धर्म पर प्रहार कर रही हैं, एवं देवताओं की औलादें उनका प्रत्युत्तर दे रही हैं।

प्रश्न ०५ - ग्रंथों के अनुसार पुराने समय में सभी देवी देवताओं का पृथ्वी पर आना-जाना लगा रहता था, जैसे कि किसी को वरदान देने या किसी पापी का सर्वनाश करने। लेकिन अब ऐसा क्या हुआ जो देवी देवताओं ने पृथ्वी पर आना बंद ही कर दिया ?

उत्तर ०५ - ऐसा नहीं है कि पहले देवगण बराबर पृथ्वी पर आते जाते ही रहते थे। वे तो आवश्यकता के अनुसार ही आवागमन करते हैं। पहले धर्मात्मा अधिक थे, तुम जैसे देश और धर्म के द्रोही कम थे, इसीलिए देवताओं की धर्मसम्मत रीति से उपासना करने वालों की संख्या अधिक होने से देवताओं का वरदान आदि देने के लिए आना जाना अधिक होता था। अब आवश्यकता कम है, तो उस हिसाब से ही आवागमन करते हैं। पहले भी देवताओं का आवागमन होता था तो वे सबको नहीं दिखते थे, अपितु जिससे कार्य है, उसी के सामने प्रकट होते थे, आज भी वे जब आते हैं तो केवल विशेष व्यक्तियों को ही दर्शन मिलता है, सार्वजनिक रूप से सबके सामने नहीं आते हैं।

न देवा यष्टि(दण्ड)मादाय रक्षन्ति पशुपालवत्।
यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम्॥
(महाभारत, उद्योगपर्व, अध्याय - ३५, श्लोक - ३३)

देवता लाठी लेकर किसी की रक्षा नहीं करते। वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसे सद्बुद्धि से युक्त कर देते हैं। (उसी प्रकार जिसे नष्ट करना चाहते हैं, उसे दुर्बुद्धि दे देते हैं। रावण, दुर्योधन, कंस आदि के नाश का प्रारम्भ उनकी दुर्बुद्धि से ही हुआ)

प्रश्न ०६ - जब भी कोई पापी पाप फैलाता था, तो उसका नाश करने के लिये खुद भगवान् किसी राजा के यहां जन्म लेते थे। फिर 30-35 की उम्र तक जवान होने के बाद वो पापी का नाश करते थे, ऐसा क्यों ? पापी का नाश जब भगवान खुद ही कर रहे है तो 30-35 साल का इतना ज्यादा वक्त क्यों ? भगवान सीधे कुछ क्यों नहीं करते, जिस प्रकार उन्होंने अपने खुद के ही भक्तों का उत्तराखण्ड में नाश किया ?

उत्तर ०६ - इस प्रश्न से ही यह स्पष्ट है कि प्रश्नकर्ता केवल निजी द्वेष से प्रश्न कर रहा है, न कि किसी जिज्ञासा से। साथ ही उसने कभी धर्मग्रंथों का मुख्यपृष्ठ भी नहीं देखा है तभी ऐसे प्रश्न कर रहा है। तीन चरणों में इसका उत्तर देता हूँ।

१) भगवान् "जब भी कोई पापी पाप करता है", तब अवतार ले लेते हैं ऐसा नहीं है। पापियों को दण्ड देने के लिए उन्होंने शासन एवं राजा की व्यवस्था की है।

गुरुरात्मवतां शास्ता राजा शास्ता दुरात्मनाम् ।
इह प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः ॥
गरुडपुराण, प्रेतकाण्ड (धर्मकाण्ड), अध्याय - ४६, श्लोक - ०८)

आत्मतत्व के जिज्ञासु पर उनका गुरु शासन करता है, अनुचित आचरण करने वालों पर राजा शासन करता है (उन्हें नियंत्रित करता है चाहे वे बात से समझें, या लात से)। जो लोग यहां पर राजा की दृष्टि से छिपकर पाप करते हैं, उनपर सूर्यपुत्र यमराज शासन करते हैं। यही मत स्कन्दपुराण, महाभारत, नारदस्मृति, आदि का भी है।

पापियों को दण्ड देने का काम पहले तो राजा का है, फिर यमराज का है। यदि कोई व्यक्ति वरदान आदि के दुरुपयोग से अत्यंत प्रबल हो जाए, उसकी नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करने में राजा आदि लौकिक शासक एवं यमराज आदि दिव्य शासक भी समर्थ न हो सकें, तब ऐसी स्थिति में, देवताओं एवं भक्तों की विशेष प्रार्थना पर ही भगवान् अवतार ग्रहण करते हैं। अथवा स्थितिभेद से यदि किसी व्यक्ति को दण्डस्वरूप राक्षस, वृक्ष, शिला या पशु आदि होने का श्राप मिला हो एवं उसका उद्धार केवल भगवान् के ही द्वारा निश्चित किया गया हो, तभी भगवान् के अवतार लेते हैं।

२) भगवान् बिना अवतार लिए ही दुष्टों का संहार कर सकते हैं, जैसा कि उन्होंने सुमाली, मधु, कैटभ आदि कई दैत्यों को बिना किसी अवतार के ही सीधे देवासुरसंग्राम आदि के अवसरों पर मारा था। हां, यदि विशेषरूप से अवतार लिया हो तो भी सदैव ३०-३५ वर्ष की आयु तक प्रतीक्षा नहीं करते हैं। श्रीकृष्ण के रूप में भगवान् ने कुछ दिनों की आयु से ही राक्षसों का संहार प्रारम्भ कर दिया था। दस वर्ष की भौतिक आयु तक वे पूतना, तृणावर्त, अघासुर, बकासुर आदि अनेकानेक राक्षसों का शमन कर चुके थे। श्रीराम के रूप में भी भगवान् ने ताड़का आदि का संहार चौदह वर्ष की आयु में ही किया था।  भुशुण्डि महारामायण में तो ब्रह्माजी ने श्रीरामावतार के कई बाललीलाओं का वर्णन करते हुए भगवान् श्रीराम ने अत्यंत बाल्यकाल में ही जिन राक्षसों का वध किया है, उनके नाम और घटनाओं का वर्णन किया है।

३) भगवान् कई बार संसार में लम्बा समय इसीलिए व्यतीत करते हैं क्योंकि उनका कार्य केवल अधर्मियों का नाश करने का ही नहीं है, अपितु धर्ममार्ग की स्थापना करने का भी है। स्वयं श्रीहनुमान् जी प्रभु श्रीराम जी उपासना करते हुए कहते हैं कि - हे प्रभो ! आपकी यह जो लीला है, यह जो अवतार है, वह केवल राक्षसों के वध के लिए नहीं है। वह मनुष्यरूप में इसीलिए है, ताकि मानवीय आदर्शों का आचरण करते हुए आप मनुष्यों को उसी आदर्श की शिक्षा दें।

मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणम्
रक्षोवधायैव न केवलं विभो:
(श्रीमद्भागवत महापुराण, पञ्चम स्कंध, अध्याय - १९, श्लोकार्द्ध - ०५)

इसीलिए भगवान् की लीलाओं में दिव्य एवं प्राकृत दोनों गुणों को समयानुसार जोड़कर उसका रहस्य समझना चाहिए, कि कहां उन्होंने दिव्य व्यवहार किया है, एवं कहाँ मानवों के समान प्राकृत व्यवहार किया है, अन्यथा सदैव उलझे ही रहेंगे।

उत्तराखण्ड आदि की घटनाओं में सर्वथा मनुष्य का स्वार्थ ही जिम्मेदार है। प्रकृति तो ये सब चेतावनी देती है, स्वार्थी अधर्मपरक, तुम जैसे लोग ही नहीं समझते। नदियों को अप्राकृतिक रूप से अवरुद्ध करोगे, वृक्षों एवं वन्य प्राणियों का अंधाधुंध विनाश करोगे, प्राकृतिक संसाधनों, खनिजों का दोहन करोगे, मोबाइल विकिरण, परमाणु परीक्षण, भीषण युद्ध आदि के माध्यम से जलवायु को विकृत करोगे, तीर्थस्थलों की मर्यादा भंग करके उन्हें मनोरंजन और होटलबाजी का माध्यम बना दोगे, देवता, विप्र, गौ, स्त्री, बालक, अनाथ एवं असहायों पर अत्याचार करोगे, और जब प्रकृति उसका दण्ड देगी तो कहते हो कि भगवान् गलत हैं ?

प्रश्न ०७ - अगर हिन्दू धर्म कई हज़ार साल पुराना है, तो फिर भारत के बाहर इसका प्रचार-प्रसार क्यों नहीं हुआ और एक भारत से बाहर के धर्म “इस्लाम-ईसाई” को इतनी मान्यता कैसे हासिल हुई ? वो आपके अपने पुरातन हिन्दू धर्म से ज़्यादा अनुयायी कैसे बना सका? हिन्दू देवी-देवता उन्हें नहीं रोक रहें ?

उत्तर ०७ - यह आपका एक और भ्रम है। सनातनी ग्रंथों के अनुसार हमारे धर्म का अस्तित्व कुछ चंद हज़ार वर्षों का नहीं, अपितु ब्रह्मांडीय स्तर पर अनादि और अनंत है, इसीलिए बाकियों के समान इसका निश्चित प्रवर्तक ज्ञात नहीं होता। हमारे ग्रंथों में या कब से प्रारम्भ हुआ, किसने चलाया, कब तक चलेगा, ये सब बातें नहीं हैं। यह "है", बस इतना ही है। हिन्दू धर्म को जानने के लिए विशेष प्रज्ञा का होना आवश्यक है, जो अत्यंत परिश्रम और पुण्यबल से ही सम्भव है। जो देश तीन चार सौ वर्ष पहले तक ढंग से कपड़े पहनना, साफ सफाई रखना एवं खेती करना भी  नहीं जानते थे, वे हिन्दू धर्म के विषय में बताए जाने और भी कैसे समझेंगे ?

आपके बताए गए ईसाई-इस्लाम आदि के उदाहरण में ही आपका उत्तर निहित है। हिन्दू धर्म में तलवार के भय या धन के प्रलोभन से सदस्य नहीं बनाए जाते हैं। कुरान और बाइबल के नाम पर करोड़ों लोगों को पिछले दो हज़ार वर्षों में मार दिया गया, जिसे जिहाद कहते हैं, क्रूसेड कहते हैं। हिंदुओं ने तलवार के दम पर अपने सदस्य बढ़ाने के लिए करोड़ों गैर हिंदुओं को कब मारा ? क्या कहते हैं उस नरसंहार को ? हमारे यहां तो रामायण एवं महाभारत के युद्ध में भी दोनों पक्ष हिन्दू धर्म वाले ही थे। भय और लोभ से यदि म्लेच्छ देशों में किसी मान्यता के अधिक सदस्य बन गए तो इससे उनकी श्रेष्ठता सिद्ध नहीं हो जाती। संसार में रोगियों की संख्या अधिक है, चिकित्सकों की कम, किन्तु महत्व चिकित्सकों का ही है। वैसे ही अधर्म को मानने वालों की संख्या अधिक है, धार्मिकों की कम, किन्तु महत्व धार्मिकों का ही है।

देवी देवताओं को कोई राजनीतिक पार्टी नहीं बनानी है कि वे अपनी सदस्यता बढ़ाने में लगे रहेंगे। यदि रात्रि को अन्धकार फैल रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं कि सूर्य की क्षमता समाप्त हो गयी। इसका अर्थ यह है कि सूर्य तो पहले जैसा ही है, किन्तु पृथ्वी का ही भाग विशेष सूर्य से विमुख हो गया है। सूर्य के सम्मुख होते ही अन्धकार पुनः दूर हो जाएगा। वैसे ही धर्म से विमुख लोग कलियुग में अधिक होंगे, ऐसे स्वाभाविक युगधर्म की घोषणा तो हजारों वर्षों पहले ही ग्रंथों में कर दी गयी थी। पुनः धर्म के सम्मुख होने से पाप का नाश होगा, यह बात भी सहज रूप से सिद्ध है।

प्रश्न ०८ - अगर हिन्दू धर्म के अनुसार एक जीवित पत्नी के रहते, दूसरा विवाह अनुचित है, तो फिर राम के पिता दशरथ ने चार विवाह किस नीति अनुसार किये थे ?

उत्तर ०८ - ऐसा कोई सर्वमान्य नियम तो सनातन धर्म में नहीं है, कि एक ही पत्नी हो, किन्तु एकपत्नीव्रती को विशेष सम्मान दिया जाता है और आदर्श के रूप देखा जाता है। उसे विशेष पुण्यबल की प्राप्ति भी होती है। यज्ञादि से पूर्व के पुण्याहवाचन में हमलोग विशेष रूप से अरुंधतिपति वशिष्ठ आदि एकपत्नीव्रत का पालन करने वालों के नाम से अर्चना निवेदित करते हैं, किन्तु बहुविवाह वालों के लिए नहीं।

राजाओं और प्रजापति श्रेणी के देवताओं को विवाह में छूट है।राजागण वैवाहिक सम्बन्धों से राजनीतिक गठबंधन भी करते, साथ ही अनेकों राजघरानों से सम्बन्ध होने पर विपत्ति में राष्ट्र अकेला नहीं पड़ता था। कश्यप आदि प्रजापतियों को इसीलिए छूट है क्योंकि उनका कार्य ही सृष्टि के प्रारम्भ में जनसंख्या को बढ़ाना है। वैसे आपको बता दूं कि अनेक पद्मपुराण, बृहद्धर्म पुराण और रामायणों में राजा दशरथ की तीन, चार और अधिकतम साढ़े सात सौ पत्नियों का उल्लेख भी है, जो अलग अलग कल्पों में हुए। वैसे तुम्हें कभी उन लोगों पर भी प्रश्न करना चाहिए, जो पहले से तेरह शादी करने के बाद भी, बुढ़ापे में, ६ वर्ष की बच्ची से शादी कर लेते हैं।

प्रश्न ०९ - अगर शिव के पुत्र गणेश की गर्दन शिव ने काट दी, तो फिर यह कैसा भगवान् है, जो उस कटी गर्दन को उसी जगह पर क्यों नहीं जोड़ सका ? क्यों एक निरपराध जानवर (हाथी) की हत्या करके उसकी गर्दन गणेश की धड़ पर लगाई ? एक इंसान के बच्चे के धड़ पर हाथी की गर्दन कैसे फिट आ गयी ?

उत्तर ०९ - यदि आपने श्रद्धा से ग्रंथों को पढ़ा होता तो जानते कि पुराणों में केवल गणेश जी के मस्तक कटने की ही बात उल्लिखित नहीं है, और भी कई घटनाएं हैं, जिन्हें या तो अज्ञानता से, या जानबूझकर आपने अनदेखा किया है।

भगवान् शिव, जिनका विशेष प्रभाव मृतसंजीवन का ही है, उनके लिए गणेश जी को पुनर्जीवित करना कठिन नहीं था। किंतु पूर्वकाल में एक हाथी ने देवत्व एवं सर्वज्ञता का वरदान मांगा था, जो पशुदेह में सम्भव नहीं था, इसीलिए उसके मस्तक को गणेश जी के मस्तक के स्थान पर लगाया गया।

दूसरी बात, वह हाथी निरपराध नहीं था, वह मार्ग में उत्तर दिशा की ओर मस्तक करके सो रहा था, और मार्गशायी एवं उत्तरशायी के प्राणों का अधिकारी देवता होते हैं, इसीलिए उसके मस्तक को देवतागण ले गए। हाथी का ही मस्तक इसीलिए भी लगाया गया क्योंकि ब्रह्म की पञ्चशक्तियों में अनुग्रह नाम वाली शक्ति के स्वामी गणपति होते हैं, जिसका अथर्ववेदोक्त अनादि स्वरूप हाथी के मस्तक वाला ही है, किन्तु भौतिक अवतार में इसका अभाव था जिसे संशोधित करना आवश्यक था। वे कोई "इंसान" के बच्चे नहीं थे जिनके साथ ऐसा न हो सके। देवताओं में अपनी दिव्य शक्ति से इच्छानुसार रूप व्यवस्थापन की क्षमता होती है। एक ओर आप कहते हैं कि शिव जी कैसे भगवान् थे, दूसरी ओर आप कहते हैं कि गणेश जी "इंसान" के बच्चे थे !! इंसान में भले आजकल की तकनीक से यह सम्भव नहीं हो, देवताओं के स्तर पर सम्भव है।

इतने के बाद भी शिव जी ने बाद ने उस हाथी को भी पुनर्जीवित कर दिया था, जिसका वर्णन भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व, खण्ड ४ के अध्याय १२ में है।

शिव जी ने स्वयं ब्रह्म होते हुए भी गणेश जी के साथ जो क्रोध में कृत्य किया उसके लिए स्वयं ही अपना दण्ड निर्धारित भी किया, क्योंकि देवता स्वयं भी धर्म की मर्यादा का पालन करते हैं।

तदा त्वया समं तात पुरे शोणितसंज्ञके।
संग्रामः सुमहानेव भविष्यति सुनिश्चितम्॥
तत्राहं सर्वलोकस्यस पश्यतस्तद्रणाजिरे।
सशूलस्तंभितोऽवश्यं भविष्यामि त्वयैव हि॥
(महाभागवत उपपुराण, अध्याय - ३५, श्लोक - ३०-३१)

शिव जी ने भगवान् विष्णु से कहा कि (इसी कृत्य के प्रायश्चित्त हेतु) भविष्य में कृष्णरूप से शोणितपुर में बाणासुर के साथ जब आपका युद्ध होगा, तब मैं आपके विरुद्ध लड़ते हुए शस्त्रसहित स्तम्भित हो जाऊंगा, पराजित हो जाऊंगा।

प्रश्न ११ - अगर हिन्दू धर्म में मांसाहार वर्जित है, तो फिर राम स्वर्णमृग (हिरण) को मारने क्यों गए थे ? क्या मृग हत्या जीव हत्या नहीं है ?

उत्तर १० - भगवान् जानते थे कि या हिरण नहीं, मारीच नाम का राक्षस है, इसीलिए उस राक्षस का वध करने ही गए थे। बिना गए भी मार सकते थे किन्तु फिर सीताहरण का प्रसङ्ग कैसे होता, बाकी सारी घटनाओं के अभाव में रावणवध का उद्देश्य पूरा नहीं होता।

मायैषा राक्षसस्येति कर्तव्योऽस्य वधो मया॥
एतेन हि नृशंसेन मारीचेनाकृतात्मना ।
वने विचरता पूर्वम् हिंसिता मुनिपुंगवाः॥
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकाण्ड, अध्याय - ४३, श्लोक - ३९)

रामजी ने लक्ष्मण से कहा - ये इस राक्षस की माया है, जिसका वध करना मेरा कर्तव्य है। इसी निर्दयी मारीच के द्वारा पूर्वकाल में अनेकों मुनिश्रेष्ठ मारे गए हैं।

प्रश्न ११- राम अगर भगवान् है, तो फिर उसको यह क्यों नहीं पता था कि रावण की नाभि में अमृत है ? अगर उसको घर का भेदी न बताता कि रावण की नाभि में अमृत है, तो उस युद्ध में रावण कभी नहीं मारा जाता। क्या भगवान् ऐसा होता है ?

उत्तर ११ - ये घटना कैसे जानते हो तुम ? देखने तो गए नहीं थे !! निश्चय ही किसी रामकथानक सम्बन्धी ग्रंथ में पढ़ा होगा !! तो तुम्हें थोड़ा और आगे पढ़ना चाहिए था, कि कैसे युद्ध के बाद भगवान् तो समस्त वानर सेना को जीवित करा दिया था। जो इच्छानुसार मृत्यु और जीवन पर नियंत्रण करे, भगवान् ऐसा होता है। अथवा उतनी दूर तक न भी पढ़ा होगा तो समुद्रबन्धन के प्रसङ्ग के बाद ही लंका के युद्ध तक पहुंचे होंगे। तो समुद्र ने श्रीराम जी की स्तुति में भयभीत होकर जो कहा था उसे पढ़ने के बाद तुम्हें ज्ञात हो जाता कि भगवान् कैसे होते हैं। यदि इन बातों पर तुम्हें विश्वास नहीं तो फिर नाभिअमृत की बात पर इतना विश्वास क्यों कर रहे हो ? केवल धर्म को गाली देने के लिए ?

भगवान् केवल दुष्टों मारते नहीं हैं, लोकमर्यादा की रक्षा भी करते हैं। विभीषण जी उनके मंत्री थे, शत्रु के भेद जानते थे। रामजी ने यह दिखाया कि एक कुशल राजा को सदैव अपने मंत्रियों से परामर्श करके ही समाधान निकालना चाहिए !!

विभीषण जी घर के भेदी नहीं थे। वे रावण को धोखा देकर नहीं भागे थे। उन्हें स्वयं रावण ने लात मार कर अपमानित किया और कहा कि राम के पास चले जाओ। विभीषण की कल्याणकारी बात रावण के स्वार्थबुद्धि में समाहित नहीं हो रही थी, इसीलिए रावण ने अपने अहंकार में ऐसा किया था। विभीषण जी ही केवल रावण को समझा रहे थे, ऐसा नहीं है। मन्दोदरी, प्रहस्त, माल्यवान्, पुलस्त्य, कुम्भकर्ण, और उनसे पहले मारीच, जटायु आदि कितनों ने रावण को अनेकों प्रकार से समझाया था।

विभीषण जी को बिना मांगे ही, रामजी ने लंका का राजा बना दिया था। अब लंका के राजा विभीषण थे। रावण तो केवल सिंहासन पर कब्जा करके बैठा था और बैठकर निरपराध स्त्रियों का अपहरण करके बलात्कार करता था। विभीषण जी ने उसके अत्याचार को चुनौती देते हुए श्रीरामकृपा से उसकी सत्ता नष्ट की और स्वयं धर्मपूर्वक शासन को आगे बढ़ाया। तुम्हें गणेश जी के प्रसङ्ग में हाथी निरपराध दिखता है, फिर बलात्कारी रावण के शिकार में फंसी निरपराध स्त्रियां क्यों नहीं दिखती हैं ?

प्रश्न १२ - तुम कहते हो कि कृष्ण तुम्हारे भगवान् हैं, तो क्या नहाती हुई निर्वस्त्र गोपीयों को छुपकर देखने वाला व्यक्ति, भगवान् हो सकता है ? अगर ऐसा काम कोई व्यक्ति आज के दौर में करे, तो हम उसे छिछोरा-नालायक कहते हैं। तो आप कृष्ण को भगवान क्यों कहते हो ?

उत्तर १२ - इसका उत्तर दो बिंदुओं में समझाता हूँ।

१) भगवान् कृष्ण का यह दैनिक कार्य नहीं था कि जहां स्त्रियां नहा रही हों, वहां जानकर छिप कर देखते हैं। उन्होंने बस एक बार, गोपियों को यह शिक्षा देने के लिए, कि निर्वस्त्र होकर जलाशय में नहीं स्नान करना चाहिए, उनके वस्त्रों को छिपा दिया था। उस समय गोपियों एवं श्रीकृष्ण की भौतिक आयु पांच-सात वर्ष की ही थी। ऐसे में उनमें सांसारिक दृष्टि से भी दोषबुद्धि अव्यावहारिक है।

२) माहेश्वर तन्त्र, आनंद रामायण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, पद्मपुराण आदि के अनुसार पूर्वकाल के अनेक अप्सरा, ऋषिगण एवं वेद की ऋचाओं का ही गोपिरूप में प्राकट्य हुआ था क्योंकि वे भगवान् की लीला का सौभाग्य प्राप्त करना चाहते थे। वस्त्र हरण की घटना के समय भी वे गोप बालिकायें श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कात्यायनी व्रत का अनुष्ठान कर रही थीं और इस कारण भी भगवान् कृष्ण का उनसे पतिभाव होने के कारण दोषबुद्धि उचित नहीं है।

प्रश्न १३ - हिंदुओं में बलात्कारियों के प्रमाण अधिक क्यों होते हैं ?

उत्तर १४ - हिंदुओं के किसी ग्रंथ में बलात्कार का समर्थन नहीं है। यदि किसी ने मोहवश ऐसा किया भी, तो भले ही वह देवता हो, उसे कठोर दण्ड दिया गया, ऐसा भी वर्णन है। हमारे यहां सामाजिक या धार्मिक, किसी भी रूप से बलात्कार और बलात्कारी का समर्थन नहीं है। बलात्कार की कुधारणा हिंदुओं की है ही नहीं।

आज के कानून में भी देख लें कि गैर हिन्दू, अथवा धर्म मे आस्था न रखने वाले लोगों की संख्या ही  ही बलात्कारियों की सूची में सबसे अधिक है। यह केवल भारत ही नहीं, पूरे विश्व की समस्या है। जब से इस देश में म्लेच्छों का आक्रमण हुआ, तब से ही ऐसे मामले बढ़े हैं। गैर हिन्दू लोग तो अपने सगे सम्बन्धी और पुत्री, बहन, भतीजी, पोती, सास, बहू आदि से भी व्यापक बलात्कार करते हैं, जो सर्वविदित है। आज भी देख लें कि किसी हिन्दू ने यदि बलात्कार किया है तो उसके समर्थन में हिन्दू समाज खड़ा नहीं होता, उसका या उसके परिवार का सामाजिक बहिष्कार होता है। जबकि गैर हिन्दू बलात्कारियों को गिरफ्तार करने के लिए गयी हुई पुलिस पर उस बलात्कारी के समुदाय वाले पत्थरबाजी करते हैं, तहर्रुश गेमिया के नामपर एकजुट होकर बलात्कार करते हैं और बलात्कारी को आर्थिक सहायता भी देते हैं।

प्रश्न १४ - शिव के लिंग (पेनिस) की पूजा क्यों करते हैं ? क्या उनके शरीर में कोई और चीज़ पूजा के क़ाबिल नहीं ?

उत्तर १४ - लिंग इतना ही बुरा है तो आशा है कि तुम्हारे जैसे प्रबुद्ध व्यक्ति ने उसे अभी तक काट कर फेंक दिया होगा। लिंग का अर्थ चिह्न, प्रतीक, लक्षण आदि होता है एवं व्यापकता में यही भाव भी है। विष्णु के चरण, ब्रह्मा का मस्तक एवं शिव का लिंग पूज्य हैं। पूर्वकाल में ब्रह्मा एवं विष्णु के मध्य हुए लीला विवाद में एक दिव्य ज्योति:पुंज लिंगाकृति में प्रकट हुआ था जिसके माहात्म्य को जानने के बाद सबों ने उसकी पूजा की। यह कोई स्थूल जननेन्द्रिय नहीं है, अपितु दिव्य ज्ञान एवं ऊर्जा का अनंत प्रवाह है। ब्रह्माजी ने ब्राह्मी लिपि के दिव्याक्षरों से इसकी पूजा की थी।

ब्रह्मा ब्रह्माक्षरैर्दिव्यैर्लिङ्गं पूजयते सदा।
(शिवधर्म उपपुराण)

साथ ही बताया गया है कि आकाश को ही लिंग, एवं पृथ्वी को उसका आधार बताया गया है, जिसके मध्य सभी प्राणी निवास करते हैं।

आकाशं लिङ्गमित्याहु: पृथिवी तस्य पीठिका।

उसी आकाशधरामण्डल का जीवनीय प्रारूप शिवलिंग के प्रतीक में हम पूजते हैं। किन्तु चूंकि तुमने प्रश्न में लिंग का स्पष्ट भाव जननेन्द्रिय से रखा है, इसीलिए मैं उसी दृष्टिकोण से उत्तर दूंगा। हम शिवलिंग की पूजा इसीलिए करते हैं क्योंकि ऐसा ही ब्रह्मा जी का आदेश है।

लिङ्गं यत्पतितं तस्य देवदेवस्य शूलिनः।
पूजयध्व प्रसन्नेन मनसा परमेश्वरम्॥
(वारुणोपपुराण, अध्याय - ०८, श्लोक - १८)

शूलधारी देवाधिदेव शिव जी का यह लिंग, जो गिरा है, आप सब उस निमित्त प्रसन्न मन से उन परमेश्वर का पूजन करें।

अब प्रश्न करेंगे कि शिवलिङ्ग क्यों गिरा था एवं उसके पूजन की बात क्यों आयी, तो उसके लिए एक कथा संक्षिप्त रूप से बताता हूँ। यह कथा स्कन्दपुराण के नागरखण्ड के पहले ही अध्याय में मिल जाएगी, मैं केवल मुख्य मुख्य श्लोक दे रहा हूँ।

हरस्य पूज्यते लिंगं कस्मादेतन्महामते।
विशेषात्संपरित्यज्य शेषांगानि सुरासुरैः॥

ऋषियों ने पूछा - सभी देवताओं एवं असुरों के द्वारा शिवजी के शरीर के अन्य अंगों को छोड़कर विशेषतः लिंगभाग की ही पूजा क्यों होती है ?

इसका उत्तर दिया गया - एकबार शिवजी ने विरक्त भाव का प्रदर्शन करते हुए भिक्षा की लीला की। अब शिव जी तो अवधूत वेश वाले ठहरे, योगी हैं, मोह माया से परे तो दिगम्बर रूप में ही, बिना वस्त्र के ही भिक्षाटन के उद्देश्य से चल पड़े। कुछ समय बाद एक वन में ऋषियों के आश्रम के समीप जाकर भिक्षा की याचना की।

अथ ते मुनयो दृष्ट्वा तं तथा विगतांबरम्।
कामोद्भवकरं स्त्रीणां प्रोचुः कोपारुणेक्षणाः॥
यस्मात्पाप त्वयास्माकमाश्रमोऽयं विडंबितः।
तस्माल्लिंगं पतत्वाशु तवैव वसुधातले॥

शिव जी के उस अद्भुत दिगम्बर वेश को देखकर ऋषिपत्नियाँ काममोहित हो गईं। इस बात से ऋषियों को क्रोध हो गया। (वे भूल गए कि समस्त पुरुषों में शिव तथा स्त्रियों में शक्तितत्व निहित है एवं) उन्होंने शिव जी को श्राप दे दिया कि आपके इस अशोभनीय वेश और उसके परिणाम से उत्पन्न पापकारी कृत्य से हमारा आश्रम भ्रष्ट हो गया है, अतः आपका यह लिंग तुरन्त पृथ्वी पर गिर जाए।

ऋषियों के श्राप से वैसा ही हुआ। उस समय उस लिंग की ऊर्जा को धारण करने में पृथ्वी समर्थ न हो सकी, सो वह भेदन करता हुआ, पाताल में स्थित हो गया। इसके बाद सृष्टि में ऊर्जा का भयंकर असंतुलन हुआ जिससे प्रलय की स्थिति आ गयी।

संधारय पुनर्लिंगं स्वकीयं सुरसत्तम॥
नोचेज्जगत्त्रयं देव नूनं नाशममुपेष्यति।

ब्रह्माजी ने देवगणों के साथ आकर शिव जी से प्रार्थना की, हे देवश्रेष्ठ ! आप अपने लिंग को पुनः धारण कर लें, अन्यथा निश्चय ही तीनों लोकों का नाश हो जाएगा। शिव जी ने एक शर्त रखी।

अद्यप्रभृति मे लिंगं यदि देवा द्विजातयः।
पूजयन्ति प्रयत्नेन तर्हीदं धारयाम्यहम्॥

आज के बाद यदि सभी देवता, ऋषि आदि प्रयत्नपूर्वक मेरे लिंग का पूजन करेंगे तो ही मैं इसे पुनः धारण करूँगा।

फिर ब्रह्मा जी ने पाताल में जाकर शिवलिङ्ग की विधिवत् पूजा की, एवं सब कुछ सामान्य हुआ।

एतस्मात्कारणाल्लिंगं पूज्यतेऽत्र सुरासुरैः।
हरस्य चोत्तमांगानि परित्यज्य विशेषतः॥

यही कारण है कि शिवलिंग की, बाकी शिवांगों से विशेष प्रधानता है। (वैसे हमलोग पञ्चवक्त्र पूजन में मुख की प्रधानता से भी पूजन करते हैं।)

(स्कन्दपुराण, नागरखण्ड, अध्याय - ०१)

प्रश्न १५ - खजुराहो के मंदिरों में काम-क्रीड़ा और उत्तेजक चित्र हैं, फिर ऐसे स्थान को मंदिर क्यों कहा जाता है ? क्या काम-क्रीडा, हिन्दू धर्मानुसार पूजनीय है ?

उत्तर १५ - निःसन्देह हिंदुओं में काम क्रीड़ा पूजनीय है। भला तुमने कैसे जन्म लिया ? पेड़ से तोड़े गए थे या डाऊनलोड हुए थे ? केवल देवालय को ही मन्दिर कहते हैं ऐसी बात नहीं है। शब्दकल्पद्रुम आदि में मन्दिर शब्द की परिभाषा है -

मन्दन्ते मोदन्ते लोका यत्र ...
मन्द्यते सुप्यतेऽत्र मन्द्यते स्तूयते  इति वा ...

जहां जाने से लोग प्रसन्न हो जाये, सो जाएं या शांतचित्त होकर स्थिर हो जाएं, उसे मन्दिर कहते हैं। इसीलिए सामान्य घर को भी मन्दिर कहते हैं, क्योंकि वहां आप विश्राम करते हैं।

कामदेव को विष्णु का अंश कहते हैं।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।
(श्रीमद्भगवद्गीता)

धर्मसम्मत काम को भगवान् का ही अंश बताया गया है, क्योंकि वह गृहस्थ आश्रम एवं लोकविस्तार का आधार है। नंदीश्वर को भगवान् शिव ने कामशास्त्र का उपदेश किया था जो परम्परा से वात्स्यायन ऋषि के पास आया और उन्होंने कामसूत्र की रचना की। राजा पुरूरवा ने उर्वशी से देवकाम सीखकर कामकुंजलता की रचना की। शास्त्रसम्मत काम क्रीड़ा मान्य है।

स्वामी कार्तिकेय के विवाह के बाद देवताओं ने उन्हें उपहार दिये जिनमें कामशास्त्र भी था।

कामशास्त्रं कामदेवो ददौ तस्मै मुदाऽन्वितः॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, गणपतिखण्ड अध्याय - १७, श्लोक - १२)

वेदों में भी काम की महिमा उसकी लोकधारण शक्ति के कारण बताई गई है।

कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामः समुद्रमाविवेश।
कामेन त्वा प्रति गृह्णामि कामैतत्ते
(अथर्ववेद, काण्ड - ०३, सूक्त - २९, मन्त्र - ०७)

खजुराहो के मंदिर भी कामशास्त्र को समर्पित हैं, किन्तु लोक में बहुतों के लिए अनुपयुक्त होने से इन्हें निर्जन वन, गुफाओं में बनाया गया है, ये अलग बात है कि संसार में जनसंख्या की भीड़ बढ़ने से ये समाज के सामने प्रकट हो गए। ये मन्दिर इस बात को भी दिखाते हैं कि कलियुग में लोग केवल कामशास्त्र पर ही आश्रित हो जाएंगे।

वस्तुतः उपर्युक्त सभी प्रश्न, बिना स्वस्थ अध्ययन या चिंतन के, मात्र अपना क्षोभ व्यक्त करने एवं सनातन धर्म पर आक्षेप करके अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करने के उद्देश्य से खड़े किए गए हैं, तथा ऐसे प्रश्नों को देशद्रोही शक्तियां ही प्रायोजित करती हैं।

श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु
His Holiness Shri Bhagavatananda Guru

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