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रजस्वला धर्म

*स्त्रियोंके रजस्वला होनेका आख्यान-* प्राचीन समयकी बात है, एक बार देवराज इन्द्रने ऐश्वर्यके अभिमानवश अपने गुरु बृहस्पतिका अपमान कर दिया, तब आचार्य बृहस्पतिने इन्द्रसे अपमानित होकर देवताओंका परित्याग कर दिया और वे योगबलसे अन्तर्धान हो गयज। आचार्यके अभावमें इन्द्रसहित देवता असुरोंके भयसे बहुत भयभीत हो गये। तब ब्रह्मादि सभी देवता आपसमें परामर्श करके त्वष्टाके पुत्र विश्वरूप ऋषिके पास गये और ऊनसे अपना आचार्य बननेकी प्रार्थना की। पहले तो परम तपस्वी  विश्वरूपजीने पुरोहिती और परिग्रहकी निन्दा की, किंतु फिर देवताओंके अनुनयविनय करनेपर वे इसके लिये तैयार हो गये। विश्वरूप बडे़ तपस्वी थे। उन्होंने अपनी *वैष्णवी-विद्या* के प्रभावसे असुरोंपर विजय दिलायी और असुरोंद्वारा छीनी गयी सारी सम्पत्ति देवताओंको वापस दिला दी। आचार्य विश्वरूपके तीन सिर थे, इसलिये वे त्रिशिरा भी कहलाते है थे। उनके पिता त्वष्टा बारह आदित्य देवताओंमें थे। इसलिये वे यज्ञके समय बड़े उच्च स्वरमें देवताओंको आहुति देते थे, परंतु उनकी माता दैत्योंकी बहन होनेसे असुरकुलकी थी। इसलिये वे भीतरसे दैत्योंके पक्षपाती थे और स्नेहवश गुप्तरू...

उत्तम प्रायश्चित मंत्र

#महामन्त्र_को_क्या_विलोम_क्रम_से_जपना_चाहिए!! मित्रो! शुक्लयजुर्वेद की एक छोटी सी उपनिषद है जिसका नाम है #कलिसंतरणोपनिषत् । इस उपनिषद में नारद जी के द्वारा ब्रह्मा जी को प्रश्न पूछने पर कि ," हे! भगवन  पृथ्वी पर भ्रमण करता हुआ मैं कैसे कलिकाल को पार कर सकता हूँ?' ब्रह्मा जी ने कहा 'अच्छा प्रश्न पूछा है। यह सर्व वेदों  का रहस्य और गोपनीय बात है। तो यह सुनो कि जिससे कलिकाल के संसार को पार कर जाओगे। भगवान् आदि पुरुष नारायण के #नामोच्चारण मात्र से ही मनुष्य कलियुग को झाड़कर फेंकने वाला बन जाता है।' #भगवत_आदिपुरुषस्य_नारायणस्य_नामोच्चारण_मात्रेण_निर्धूतकलिर्भवति ॥१।। तब नारद ने फिर पूछा-'वह नाम क्या है ?' तब हिरण्यगर्भ ब्रह्मा बोले-हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे'-इस प्रकार ये सोलह नाम कलिकाल के पापों को नाश करने वाले हैं। इससे बड़ा उपाय सभी वेदों में दिखाई नहीं देता। इन सोलह नामों से सोलह कलाओं से आवृत जीव के आवरण का नाश होता है। इसके बाद जैसे बादलों के हट जाने से रविमण्डल साफ प्रकाशित होता है, वैसे ही जीव के...

मंदिरो ब्राह्मणो की स्थिति

#कलियुग की वर्तमान स्थिति में #नूतन_मंदिरों की आवश्यकता क्यूँ नहीं ? पूरा विवरण पढैं.. (१) भारतवर्ष में इतने पुराने मंदिरों हैं कि जिसका पुनरोद्धार कर वैदिक अनुशासन से संचालित करने की आवश्यकता हैं | (२) वर्तमान में किस वर्ण के व्यक्ति को कौनसे देवताओं की प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिये इनके अधिकारी कौन हैं यह बिना जाने ही प्रतिष्ठाएँ होती हैं | (३)मंदिरों की स्थापत्य कला जाननें वाले विश्वकर्मा के वंशज की संख्या कम और अपने नित्यकर्मों से च्युत हैं | सोमपुरा शिल्पी की जगह किसी भी वर्ण के कारीगर मानहिन और शल्यदोष पूर्ण मंदिरों की रचना करतें दिख रहैं हैं जिसमें न उपयोग में लिए जाने वाले शल्य विधिहिन निर्मित ईंट, बिना शिल्पशास्त्र से चकासे पत्थर, रेती, लोहा आदि का उपयोग होता हैं | (४) महत्वपूर्ण निर्माण से पहिले  भूमिशोधन के लिए उपयुक्त भूमि भी नहीं देखतें जहाँ जिन्हों ने बताया वहाँ बिना भूमिपरिक्षण किए भूमिग्रहण करकें |भूमिपूजन(खात मुर्हूत) जूठे दूर्मुर्हूतों में फूरसत के दिन में होतें हैं, शिलान्यास से पूर्व शल्यशोधन अनुचित हो रहैं हैं | न कोई क्षेत्रफल की आयव्यय देखता हैं कि न भूशुद...

स्वधर्म और आपद्धर्म

#स्वधर्म और #आपद्धर्म - प्राण संकट में भी स्वधर्म का त्याग नही करना चाहिए!! *वेदादिशास्त्रों* को पढ़ना-पढाना, यज्ञ करना-करना, दान देना और दान लेना - ये छः कर्म ब्राह्मण के लिये रचे गये हैं । इनमें यज्ञ करना, दान देना और वेदादिशास्त्रों को निष्कारण पढ़ना - ये तीन तो धर्म-पालन के लिये आत्मोन्नति के कारक हैं और यज्ञ कराना, दान लेना और वेदादिशास्त्रों को पढ़ाना - ये तीन आजिवीका के लिये मुख्य स्वधर्म हैं। प्रजा की रक्षा, दान देना, यज्ञ करना,अध्ययन और विषयों में अनासक्ति --> *" (प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः।। मनुः १/८९।।)"* शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव -- ये सब के सब कर्म क्षत्रिय के हैं --> *"(शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।। गीता १८/४३।।)"* पशुओं की रक्षा,दान देना, यज्ञ करना, अध्ययन,व्यापार तथा ब्याज और खैती ये सब वैश्योचित स्वधर्म हैं-> *"(पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य...

क्या वाल्मीकि तथा वेदव्यास शूद्र थे ?

क्या वाल्मीकि तथा वेदव्यास शूद्र थे ? श्रीमद्रामायणके रचयिता भगवान् वाल्मीकि और महाभारतके रचयिता भगवान् वेदव्यासजीके विषममें जितनी भ्रान्तियाँ हैं ,उतनी अन्य किसी क्रान्तदर्शी महर्षिके विषयमें नहीं । मैकालेकी अनौरस संतान वामपंथियोंने भगवान् वाल्मीकि और व्यासजीको किरात-भील-मल्लाह आदि बना दिया है ,जबकि यह शास्त्र विरुद्ध है ,असत्य है । आदिकवि भगवान् वाल्मीकि आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकिरामायणमें स्वयंका परिचय देते हैं , वे किसी किरात-दस्यु कुलोत्पन्न नहीं थे ,अपितु ब्रह्मर्षि भृगुके वंशमें उत्पन्न ब्राह्मण थे । रामायणमें भार्गव वाल्मीकिने २४००० श्लोकोंमें श्रीराम उपाख्यान ‘रामायण’ लिखी ऐसा वर्णन है – “संनिबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विंशत्सहस्र कम् ! उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना !! ( वाल्मीकिरामायण ७/९४/२५) महाभारतमें भी आदिकवि वाल्मीकि को भार्गव (भृगुकुलोद्भव) कहा है , और यही भार्गव रामायणके रचनाकार हैं – “श्लोकश्चापं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना ! आख्याते रामचरिते नृपति प्रति भारत !!” (महाभारत १२/५७/४०) शिवपुराणमें यद्यपि उनको जन्मान्तरका चौर्य वृत्ति करने वाला बताया है ...

सनातन वैदिक मान्यता सिद्धान्त सङ्ग्रह

इन सनातन वैदिक सिद्धान्ताें मैं सभी सनातन वैदिक (हिन्दु) ओं काे सहमत हाेकर आगे बढना उचित दीखता है--- १. चार वेद ऋक्, यजु, साम, अथर्व की (शुक्ल कृष्ण दाेनाें प्रकार के यजुर्वेदाें की शाखासहित) सभी शाखाएँ अपाैरूषेय वेद हैं । २. एेतरेय, शतपथ, तैत्तिरीय, पञ्चविंश इत्यादि ब्राह्मणग्रन्थ भी अपाैरूषेय वेद हैं । ३. वेदाें का परम प्रामाण्य है । ४. जन्मना जाति और संस्कार तथा अाचार से जातित्व की पूर्णता मान्य है । जन्मना जाति व्यवस्था पुनर्जन्म के सिद्धान्त अनुरूप न्यायपूर्ण है । ५. चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) । ६. चार आश्रम (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, सन्न्यास) । ७. गृहस्थ-आश्रम की श्रेष्ठता और गुरुत्व तथा आचार्यत्व (गृहस्थ ब्राह्मण ही गुरु और आचार्य बन सकते हैं) । ८. शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, छन्दःशास्त्र, वेदाङ्गज्याेतिष-- इन छः वेदाङ्ग तथा मीमांसाशास्त्र के अनुसार का वेदार्थ ही सही है और उसके अनुसार आचार का ग्रहण करना चाहिए। ९. स्कन्दस्वामी, उद्गीथ, वेङ्कटमाधव, उवट, भट्टभास्कर, सायण, महीधर, मुद्गल आदि प्राचीन विद्वानाें से रचित वेदव्याख्याएँ प्रामा...

ब्राह्मण को स्ववेद शाखा का अध्ययन करना चाहिए

अपनी वेदशाखा का अध्ययन अावश्यक अपने वेद ऋग्/यजु/साम की जो शाखा अपने पूर्वजों की परम्परा से प्राप्त है, उसी का अध्ययन गुरुमुखोच्चारण अनूच्चारण से प्राप्त करना चाहिए ।  अपनी शाखा का अध्ययन कर वेदान्तर की एक शाखा , जो अपने सूत्रकार  निर्देश करते हैं, उसका अध्ययन करना चाहिये । यह अध्ययन संस्कार कर्म कहलाता है । उत्पत्ति , आप्ति, विकृति, संस्कृति  भेद से संस्कार कर्म चार प्रकार के होते हैं । इनमें अध्ययन  आप्ति संस्कार कर्म है । 'भूतभाव्युपयोगं हि द्रव्यं संस्कारमर्हति ' - जो द्रव्य भूतकाल में उपयुक्त है अथवा भाविकाल में उपयोक्ष्यमाण है , वह संस्कार का अर्ह है - इस न्याय से प्रश्न होता है कि अध्ययन संस्कार से संस्कृत स्वाध्याय का क्या भूत में उपयोग है या भाव्युपयोग है ? तो भूतोपयोग असम्भव होने से भावि अग्निहोत्र आदि कर्मों में उपयोग माना जाता है । और इस प्रकार उपयोग होने पर भी आकांक्षा बनी रहती है कि  कर्मों में उपयुक्त स्वाध्याय  का प्रयोजन क्या है ?  तो अन्ततः स्वीकार करना होगा कि दूसरे प्रमाणों से अनधिगत प्रयोजनवान् जो अर्थ है , उसका ज्ञ...

शुद्ध जाति

शुद्ध जाति भगवान् का अवतार जाति व्यवस्था  और आश्रम व्यवस्था की रक्षा के लिये होता है , क्योंकि उसी में समस्त विश्व का  लौकिक सुख  और आत्मकल्याण है । -श्री आद्य शंकराचार्य । ===================== #जाति_व्यवस्था - मनुष्य की पहचान, उसकी चार प्रधान  जातियॉ हैं - १.ब्राह्मण  (ये ब्राह्मण माता व ब्राह्मण पिता की सन्तान होती है ) २.क्षत्रिय  (ये क्षत्रिय माता व क्षत्रिय पिता की सन्तान होती है ) ३.वैश्य  (ये वैश्य माता व  वैश्य पिता की सन्तान होती है ) ४.शूद्र  (ये शूद्र  माता व  शूद्र  पिता की सन्तान होती है ) इन चार जातियों के परस्पर सम्मिश्रण से  अनुलोम व प्रतिलोम  जातियॉ प्रकट होती हैं । इस संसार में मुख्यतः दो प्रकार के मानव हैं - एक वो जो अपनी   उपर्युक्त  मूल पहचान खो चुके हैं । एक वो जो अपनी  उपर्युक्त   मूल  पहचान  के साथ  प्रसिद्ध हैं । #आश्रम_व्यवस्था - मनुष्य को अपने अनुरूप शास्त्रीय मर्यादा में   इन चार आश्रमों का पालन ...

द्धिजो को प्याज लसुन का निषेध

प्याज लहसुन न खाऐं प्याज  -लहसून  से  बचिये   - ----------------------------- प्याज  और  लहसून  खाना    पाप है ।  जो  प्याज  व  लहसून  खाता  है  ,  उसमें  राक्षसी  वृत्तियाँ  उदय  होती  हैं  ,   वह   ईश्वर  की  आज्ञा  स्वरूप   शास्त्रों  के   विरुद्ध  चलने  के  कारण  नरक  जाता  है ,    उसका  आध्यात्मिक  विकास  बाधित  हो  जाता है  और  यह  नियम  है  कि  मानव  का  अध्यात्म  अवरोधित  होने  पर  उस प्राणी को  जन्म -मृत्यु  के  घोर   चक्रव्यूह (८४ लाख योनि प्रधान)  में  भटकना  पड़ता  है  ।  ब्राह्मण  ,  क्षत्रिय  अथवा  वैश्य  को   इसे  खाने    का  पाप  ...

शास्त्र मे विधि निषेध किस लिए है??

शास्त्र का विधि निषेध किसके लिए है? शास्त्रीय विधि-निषेध  शास्त्रनिष्ठ -प्रज्ञावानों  के लिये है - ये सब जो विचार हम यहॉ प्रकट करते हैं कि ऐसा शास्त्रसम्मत है, ऐसा अनुचित ,  वे सब शास्त्र में श्रद्धा रखने वाले प्रज्ञावान् पुरुषों  के लिये हैं,    शास्त्र के नाम पर स्वार्थ साधने वाले उन्मत्तों के लिये नहीं  । #शंका- शास्त्र में श्रद्धा रखने वाले प्रज्ञावानों को उचित अनुचित बताना कितना संगत है , क्योंकि वे तो प्रज्ञासम्पन्न हैं , शास्त्र में श्रद्धा रखते हैं ।  वे तो  बिना उद्देश्य या बिना प्रयोजन के कहीं प्रवृत्त हो ही नहीं सकते ! #समाधान -   नहीं , ऐसा नहीं है ।  शास्त्र में श्रद्धा रखने वाले  प्रज्ञावान् पुरुषों की भी कुछ प्रवृतियां बिना उद्देश्य एवं बिना प्रयोजन की देखी जाती हैं  । यदि ऐसा ना हो तब निष्प्रयोजन प्रवृति पर धर्मशास्त्र  ऐसा अंकुश न लगाते  -  #न_कुर्वीत_वृथा_चेष्टाम् ।  (मनु० ४।६३) उन्मत्त व्यक्तियों की प्रवृत्ति को रोकने के लिए उक्त मनु वचन की सार्थकता नहीं म...

क्या जाति से हिंदू धर्म को नुकसान हुआ है??

जात पात से हिन्दु नहीं वंटा है आरएसएस/महासभा आदि------> हिन्दू तो जात -पात में ही बंट कर रह गया ,  इसीलिये एक नही है । #खण्डन - हिन्दू अपने जात -पात में #बंटा नही है अपितु  अखण्डित होकर #बंधा है । ये श्रुति स्मृति प्रतिपादित  जात-पात का बन्धन ही हिन्दू  की एकता और अखण्डता है । हिन्दू का जात- पात विधर्मियों वाला जात -पात नहीं है, जो एक दूसरे  के एकता सूत्र तोड़ती है  ।  ये तो वो  डोरी है जो मणियों से मणि को जोड़ती है । सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं #स्वधर्म , निरत श्रुति नीती ।। ….........ये हमारा हिन्दू रामराज्य है । जिसकी महिमा वेदों ने, सन्तों ने सबने गायी है । तुम आरएसएस और महासभा आदि के तथाकथित  सनातन हिन्दू धर्म के ज्ञानविज्ञान से विहीन विचारक ! कहॉ ले जा रहे हो हमारे हिन्दू समाज को ? तुमको हिन्दू धर्म शास्त्रों , हिन्दू परम्परा की कख नही ज्ञात ,  तुम  शिखा सूत्र संस्कार विहीन क्या जानो क्या है हिन्दू धर्म !   एकता के नाम पर हिन्दू जात-पात पर  मिथ्या आक्षेप कर  कर के सनातन हिन्दू...

वैदिक जाति व्यवस्था : आक्षेप और समाधान

वैदिक जाति व्यवस्था और आक्षेप व समाधान वैदिक जाति व्यवस्था :  आक्षेप और समाधान - #आक्षेप- एक पण्डित  व्यक्ति  शूद्र का दिया पानी तो नहीं पी रहा पर उसका बनाया घड़ा प्रयोग कर रहा है । कितनी नकारात्मक बात है !  इससे सिद्ध है कि   पण्डित द्वेषी , लोभी  और अभिमानी होते हैं । #उत्तर - एक पंडित  व्यक्ति  शूद्र का दिया पानी तो नहीं पी रहा पर उसका बनाया घड़ा प्रयोग कर रहा है । इसी बात को सकारात्मक भी लिया जा सकता है नकारात्मक भी । ये  सामने वाले व्यक्ति की निजी मानसिकता पर निर्भर करता है कि वो इसे कैसे  व्यवहार में लाता है । हिन्दू धर्म में जाति की व्यवस्था गलत नहीं है , वरन् वे लोग गलत हैं जो इस व्यवस्था को  नकारात्मक बना  देते हैं । तर्क दिया जाता है  कि पंडित शोषक है जो बस अपना काम निकालता है दूसरे की मेहनत पर और फिर उन्हें नीच कह कर औकात दिखाता है, इस पर आक्षेपकर्ता विधर्मियों  से हमारा कहना  यह है कि  पानी लाना तो सबसे बडी मेहनत है, पूरा कुंआ खोदना पड़ता है  पानी को पाने  ...

ब्राह्मणो ने देश पे राज किया ??

जो लोग कहते हैं पण्डितों ने  देश पर राज किया उनको उत्तर जो लोग कहते हैं पण्डितों ने  देश पर राज किया - वे ये बतायें  सतयुग से लेकर आज तक के इतिहास में भारत में कितने पण्डित राजा  बने  ? जो ये कहते हैं कि राजसत्ता  पण्डितों की गुलाम थी , वे हमें ये बतायें कि  राम राजा न बन कर  वनवासी बने , क्या इसमें  वशिष्ठ ऋषि  की मनमानी थी  ? ( वशिष्ठ ऋषि  से पूछकर कैकेयी ने राजा दशरथ से हठ  नहीं किया  ! ) महाभारत का  ऐतिहासिक युद्ध हुआ , क्या इसमें वेदव्यास ऋषि की मनमानी थी ? (  वेदव्यास से पूछकर धृतराष्ट्र ने दुर्योधन का पक्ष नहीं लिया ! ) चाणक्य का भरी सभा में अपमान हुआ , क्या ये चाणक्य की जी हजूरी  थी ?  पण्डित (ब्राह्मण)  संसार के सुख वैभव से दूर रहकर  साधना तपस्या में लीन रहने वाली जाति रही है ।    पण्डित उस दीपक की तरह है , जो   मार्गदर्शन करता है  उसका,  जो उसे अपनी हथेली में उठाता है ।  पण्डित तो प्रकाश का नाम है । पर उसे उठाना उसकी म...

ब्राह्मण परिचय

ब्राह्मण के १२ मुख्य वातें प्रत्येक सनातनधर्मलम्बी को अपनी कुल परम्परा का सम्पूर्ण परिचय निम्न  ११ (एकादश) बिन्दुओं के माध्यम से ज्ञात होना चाहिए - [१ ]  गोत्र । [२ ]  प्रवर । [३ ]  वेद । [४]  उपवेद । [५]  शाखा । [६]  सूत्र । [७]  छन्द । [८]  शिखा । [९]  पाद  । [१०]  देवता । [११]  द्वार । ​   [१] गोत्र - गोत्र का अर्थ है कि वह कौन से ऋषिकुल का है या उसका जन्म किस ऋषिकुल से सम्बन्धित है । किसी व्यक्ति की वंश-परम्परा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। हम सभी जानते हें की हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान है, इस प्रकार से जो जिस ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया । इन गोत्रों के मूल ऋषि – विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भारद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है। इन गोत्रों के अनुसार इकाई को । इस प्...