मंदिरो ब्राह्मणो की स्थिति

#कलियुग की वर्तमान स्थिति में #नूतन_मंदिरों की आवश्यकता क्यूँ नहीं ? पूरा विवरण पढैं..

(१) भारतवर्ष में इतने पुराने मंदिरों हैं कि जिसका पुनरोद्धार कर वैदिक अनुशासन से संचालित करने की आवश्यकता हैं |
(२) वर्तमान में किस वर्ण के व्यक्ति को कौनसे देवताओं की प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिये इनके अधिकारी कौन हैं यह बिना जाने ही प्रतिष्ठाएँ होती हैं |
(३)मंदिरों की स्थापत्य कला जाननें वाले विश्वकर्मा के वंशज की संख्या कम और अपने नित्यकर्मों से च्युत हैं | सोमपुरा शिल्पी की जगह किसी भी वर्ण के कारीगर मानहिन और शल्यदोष पूर्ण मंदिरों की रचना करतें दिख रहैं हैं जिसमें न उपयोग में लिए जाने वाले शल्य विधिहिन निर्मित ईंट, बिना शिल्पशास्त्र से चकासे पत्थर, रेती, लोहा आदि का उपयोग होता हैं |
(४) महत्वपूर्ण निर्माण से पहिले  भूमिशोधन के लिए उपयुक्त भूमि भी नहीं देखतें जहाँ जिन्हों ने बताया वहाँ बिना भूमिपरिक्षण किए भूमिग्रहण करकें |भूमिपूजन(खात मुर्हूत) जूठे दूर्मुर्हूतों में फूरसत के दिन में होतें हैं, शिलान्यास से पूर्व शल्यशोधन अनुचित हो रहैं हैं | न कोई क्षेत्रफल की आयव्यय देखता हैं कि न भूशुद्धि के लिए अनिवार्य गोबर-गोमूत्र व भूमिपर गौनिवेशन हो रहा हैं | शिलान्यास के मूर्हुतों में भी व्यवधान उत्पन्न कर दिए जातें हैं | (भूमिपूजन(खात) व शिलान्यास में भी कोई कोई ब्राह्मण ताँबे के कलश और  लोहा आदि पञ्चधातु को जमीन में गाड़ देतें हैं जो शल्य में गिने जातें हैं | स्तंभमूर्हुत की आवश्यकता भी नहीं रखतें | आगे मोभ रखने के मुर्हूत, देहली रखने के मुर्हूत, द्वार रखने के मुर्हूतों पर ध्यान नहीं दिया जाता | #आचार्य द्वारा शिल्पि की निर्मित प्रतिमाओं के लक्षण, प्रतिमा के लिए हुए पत्थर के लक्षणों पर ध्यान नहीं दिया जाता | मानहिन द्वार भी कही कहीं बनायें जातें हैं | देवतास्थापन के लिए भूगृह की योग्य विथियों पर ध्यान केन्द्रित नहीं होतें | और तो और पर ये लोभी #ब्राह्मणों जो अनुचित देवतावर्ग में न आने वालें #साधु_संत_महात्माओं की मूर्तिओं की प्रतिष्ठा का समर्थन करतें हैं ये ग्राहक-अपेक्षितपूर्ति करनेवालें #शिल्पीओं भी कम नहीं, #पुराने_शिल्पशास्त्रों के ग्रन्थों में जो जो देवतादि का वर्णन साङ्गोपाङ्ग न मिलता हो उन उन संत आदि की प्रतिमाएँ भी निर्माण कर देतें हैं | करैगे ही न सभी ने धर्म को बेच खाया हैं,यश=प्रतिष्ठा पाने(× <--- यह शब्द अन्ततः याद रखें इनका मूल्यांकन बाद में करैंगे)मंदिरो से पैसे एँठने के लिए धूर्त यजमानों की माँग अनुसार संत आदि की  प्रतिमाओं की लोभ से छूट पहले #ब्राह्मण ने दी,बाद में #शिल्पी ने भी अपना धर्म छोड़ा कह नहीं सकतें थे  ये लोग ? कि ऐसा किसी भी #शिल्पग्रन्थों_में #संत_आदि_प्रतिमाओं_का_विवरण_नहीं हैं | किसी काल में उत्तम शास्त्रसम्मत शिल्पीयों के हाथ नीचे तैयार होने वाले छैनी चलानेवालों ने धीरे धीरे सिर्फ शरीरधारी आकारों के निर्माण कार्य को #बिना_शिल्पशास्त्र पढैं. सिख लिया और यही आगे जाकर वर्तमान में ऐसी अनुचित मूर्तियाँ बनाने में माहिर हो गयें | इनका लाभ #धूर्तों ने उठा लिया जो मन चाहे बनवा लो कल गाँधीजी, मोदिजी, बच्चन आदि के मंदिर बन जाय तो इसमें नविनता की कोई गुंजाईश नहीं |
(५) मंदिर तैयार हो जाने के बाद वर्तमान में प्रतिष्ठा के मुर्हूत भी जूठे निकलतें हैं ->( १ प्रतिष्ठा के प्रारंभ दिन में अग्निवास का दिन, २ प्रासाद वास्तु के मुर्हूत --> किसी किसी मास में नहीं भी होतें तो मंदिरनिर्माण के बाद जिस मास में वृषवास्तु की गिनति हो सकें उसी दिन करना चाहिये इसे भी अवगण्य करते हैं , ३ कलशचक्र प्रवेश के लिए -- ये भी कितनी बार तो कलशचक्र व चन्द्रमावास वामार्क आदि वास्तुशास्त्र सूचक मुर्हूतकाल को निकाले हुए प्रतिष्ठा के दिनों में अवगण्य किए जातें हैं | कहीं कहीं तो मुख्य देवता को स्थिरकर प्रतिष्ठा के मुर्हूतलग्नों के समय चूक जातें हैं अथवा अवगण्य किए जातें हैं |
(६)आचार्य-वरणीय ब्राह्मण व यजमान के लिए उचित हैं कि -> केवल द्विजों को वर्णानुसार प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा करवाने के अधिकारी कहैं हैं | अतः अनुपवीतीयों जिनके कालक्रम से उपनयन संस्कार न हुए हैं वह व्रात्यों को स्मृतियाँदि शास्त्रों में अयाज्यों कहैं हैं जिसको वैदिक कर्म करवाने से #अयाज्ययाजन का दोष लगता ही हैं |ये द्विज बाह्य ही मानें जातें हैं क्योंकि यथार्थ उपनयन-संस्कार से ही द्विजत्व सिद्ध होता हैं |  अधिकारी  द्विज द्वारा अनिवार्य नित्यकर्मों सन्ध्योपासनादि को यथावत् करतें हुए होने चाहिए - तीन ही दिनों यदि द्विज सन्ध्योपासना नहीं करतें तो वे शूद्रत्व को प्राप्त होतें हैं इन्हें द्विजत्व में पुनः प्रवेश करवाने के लिए प्रायश्चित्त पूर्वक पुनरुपनयन होना अनिवार्य हैं  | पुनरुपनयनाधिकारीयों जैसे  लहसुन,प्याज,गाजर,मशरुम, सलगम आदि को खानेवाला मदिरादि अपेयों को ग्राह्य न करने वाला होना चाहिये ऐसे पतितों का भी शास्त्रों में प्रायश्चित्त पूर्वक सम्पूर्ण विधान से पुनरुपनयन कहा हैं | ये सब अनधिकारी ही हैं |
किसी किसी पंडित का मानना हैं कि #देहशुद्धिप्रायश्चित्त कर्म करकें द्विजों(कालक्रम से उपवीती हो)को अधिकार दिये जातें हैं,परंतु यह भी विधान कहीं कहीं निरर्थक ही दिखाई देता हैं प्रायश्चित्त के व्रतों और प्रत्याम्नायों का यथाविधि शरणागति से कोई पालन नहीं कर रहैं है जहाँ देखों वहाँ बस जल रखकर संकल्पपूर्ति करो; लेकिन संकल्प की पूर्ति तो तब होगी जब शास्त्रावश्यक अनिवार्य प्रायश्चित्तोदिष्ट कर्म व्रत-प्रत्याम्नायादि का कथन यथायोग्य जानकर क्रियान्वित हो  |

किसी किसी ग्रन्थों में यजमान के #प्रतिनिधिवरण विधान बताया हैं यह भी #शास्त्रोचित_नहीं क्योंकि - प्रथम तो सूतकादि संकट अवस्थाओं में उचित-मुर्हूत का त्याग न हो इसलिये ही प्रतिनिधि-ब्राह्मण का वरण होता हैं ।शास्त्रों में एकयजमान-साध्य कर्म ही मान्य किये हुए हैं | बहुधा यजमान जिसमें व्रात्य-पतित आदि का समावेश होगा वह तो पङ्क्तिपावन द्विज रहैंगे ही नहीं, और अधिकारी प्रतिनिधिब्राह्मण का वरण करने के बाद भी अनधिकारी व्रात्य आदि की आवश्यकता ही नहीं रहती। सामूहिक-यजन में अयाज्ययाजन का दोष रहता हैं | प्रतिष्ठा में प्रतिमाओं को लाने-जाने और स्थापित करने में स्थपति,शिल्पी ब्राह्मण,यजमान आदि  कालक्रम से प्राप्त उपवीती द्विजों जो पतित न हो उनकी ही आवश्यकता मानी गईं हैं | अनुपवीतीयों,व्रात्यों और नित्यकर्मच्युतों की नहीं | आज वर्तमान युग में कहीं कहीं आचार्यादि ब्राह्मणगण भी नित्यसन्ध्योपासनादि रहित व अभक्ष्याभक्षण तथा न पीने की चीजे पीएँ जा रहैं हैं जिस दोषों के कारण वह शूद्रत्वको प्राप्त होतें हैं जहाँ तक इन्हों की प्रायश्चित्त द्वारा शुद्धि और पुनरुपनय विधान से कर के द्विज में सम्मिलित नहीं किएँ जाते तबतक यह सभी यजमान समेत अनधिकारी ही हैं |
(७) वर्तमान में मंदिरों में आवश्यक वर्णाश्रम का पालन नहीं हो रहा हैं पतितों द्वारा प्रवेश,प्रतिमाओं का स्पर्श पूजन आदि हो रहा हैं |
(८ अ ) जिस पातकी द्विजों के पाप से समस्तेन्द्रियों सहित शरीर के प्राणकोष ही मलिन हो तो विचार करें कि यह तो मंदिरों में किए जाने वाली सनातन संस्कृति की अक्क्षुण्णता का रक्षण करने वाली देवप्रतिमाओं के विग्रह में कैसे प्राणोर्ज्जा का सन्निधापन होगा ?
जिस मंदिरों के गर्भगृहों में देवताओं की शुभ ऊर्जायें एकत्रित होकर भक्तजनों को विशुद्ध कर भगवद्रूपता दे रही थी वहाँ आज  ऐसे दूषित दोषों के कारण ऐसे मंदिरों में ही विविध षड्यंत्रीयों द्वारा पापाचार का केन्द्र बनते जा रहैं हैं |
(ब) मंदिरों में नित्य अर्चन के लिए भी नित्यकर्मप्रवृत्त, सदाचारी,निर्लोभी ,भक्ष्याऽभक्ष्यादि में विवेक रखनेवाले तथा जो जो देवता-विग्रह स्थापित हैं उनकी पूजा पटल विधानों को आचार्यद्वारा शिक्षित हो ऐसा ब्राह्मण होना चाहिये यह भी अवगण्य हो रहा हैं |
(९) सब से अहम बात यह हैं कि मंदिर निर्माण और प्रतिष्ठा होने के बाद मंदिरों का शास्त्रसम्मत परिपालन,अनुशासन और मानसिक-आर्थिक व शरीरशक्ति अनुसार  संरक्षण की जवाबदारी निभाने की होती हैं वहाँ कहीं कहीं यह भी व्यवस्था कलंकित रहती हैं और तो और किसी किसी मंदिरों में तो बिना कारण बिना खंडित हुए आदि अनुचित दुर्लक्ष्यों से प्रतिवर्ष या वारंवार पुनःप्रतिष्ठाएँ करतें रहतें हैं क्यों ? समाज से इस पुनःप्रतिष्ठामहोत्सव नाम से पैसे एँठ़ने के लिए |
(१०) शास्त्रों में अनुचित विधान और परिपालन के दोषपूर्ण नूतन-मंदिरों बाँधने की आवश्यकता के जगह आज ८० से ज्यादा वर्षों पुराने संस्कृति के धरोहर पुराने मंदिरों का नवनिर्माण करकें खंडित प्रतिमाओं का जिर्णोद्धार कर विसर्जन के बाद अधिकारीयों द्वारा पुनःप्राणप्रतिष्ठा करवाने की आवश्यकता अधिक  हैं और उनका फल नयें मंदिरो से कईं गुने अधिक फल हैं आदि......
वर्तमान में पू,पाद विश्व वंदनीय जगन्नाथ-पुरी #शंकराचार्य #निश्चलानंदसरस्वतीजी जैसे वैदिकसंस्कृति संरक्षण पक्षधर  शंकराचार्य-पीठाधिकारी के मार्गदर्शन व देख रेख में ही मंदिरों का परिपालन व्यवस्था आवश्यक हो यह महत्त्वपूर्ण हैं |

प्रतिष्ठा अर्थात् यहाँ यश और दैवी-विग्रहात्मक-प्राणप्रतिष्ठा
जिसका जैसा अनुचित कर्मों से मीथ्या यश फैला होगा इतने इनके शत्रू बलवान् होगे, अनुचित प्राणप्रतिष्ठा विधान जैसा कोई शत्रू नहीं सावध रहैं ---> #न_प्रतिष्ठासमो_रिपुः ||

हम तो दूरी बनाये रखतें हैं ऐसे अनुचित विधानों से ..

धर्म की जय हो !
अधर्म का नाश हो !
प्राणियों में सद्भावना हो !
विश्व का कल्याण हो !
नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव !!

कौन कहता हैं कि वर्तमान काल में नूतनमंदिरो की आवश्यकता हैं ? नूतनमंदिरकर्ता-प्रतिष्ठाकर्ता स्वयं दौनों - नराधमीयों को निमंत्रण दे रहे हैं कि नहीं , १००वर्ष पुराने  से लेकर अद्यतन तक का एक मंदिर बताईये जिस में स्वशाखीय-सन्ध्योपासनाप्रवृत ब्राह्मण-पूजारी सेवा करता हो ? एक मंदिर बताईये जिसमें पतित ब्राह्मण पूजारी न हो ? एक मंदिर बताईये जिसमें वैश्वदेव होता हो... अरे यह बात तो बड़े दूर की रही प्रतिष्ठा करवानेवाले आचार्यों ही पतित होतें हैं, यजमान अनुपनीत होतें हैं, अनुपनीतों का मूर्तिमानयन् से लेकर मंदिर में मूर्तिप्रतिष्ठित हो जाने के बाद भी -स्त्री,पतित,अनुपवीत आदि का स्पर्शमंदिरों में हो रहा हैं...
प्रतिष्ठा तो तब संभव हैं कि जब प्रतिष्ठा की "स्नपनविधा के बाद" कोई भी -स्त्री,पतित,अनुपवीत आदि प्रतिमा का स्पर्श ही न करें, प्रतिष्ठा हो जाने के बाद भी प्रशासन ठिक हो..
हो क्या रहा हैं , "स्नपनविधा" के बाद अनुचितों का स्पर्श होता हैं फिर काहें कि दुषित प्रतिमाकी प्रतिष्ठा हो सकती हैं ?। इस स्थिति में तो "पुनः कुटिरहोम और स्नपनविधा" को आचरना चाहिये सकृतप्रतिष्ठा के बाद में कौतुकबन्धनवाला कंकणमोचन तक और आगे भविष्य में भी - अनुचितों का स्पर्श ही नहीं होने देना चाहिये, उचित अधिकारी भी उपनीत हो साथ में पतित न हो -जिसका जनेऊ भ्रष्ट होने के कारणों से द्विजत्व से गिर जाते हैं वे सभी पतित हैं...

अरे श्रोतव्यः ! कोई आपकी प्रतिकृती को भी आपके सामने तहसनहस करें तो आपका रक्त गरम हो जाता हैं, तो फिर भविष्य में होने वाले नष्टभ्रष्ट मंदिरों का सत्य तो आप दिनप्रतिदिन वर्तमान में भी पूर्वापर ज्ञानके बल से दैखतें हैं, सुनतें हैं , आगे की जान सकतें हैं..  फिर मंदिरों के देवताओं की जानबूझ के प्रतिष्ठा कर अवहेलना करवाने में आपका किंचित् भी हस्तक्षेप न हो यह अवधारणा प्रत्येक पंडितों के हृदय में होनी चाहिये....

भविष्योत्तर पुराण म०प ९/७४-७५ के अनुसार "(सुस्थितं दुःस्थितं वाऽपि शिवलिङ्गं न चालयेत्। चालनाद्रौरवं याति न स्वर्गं न च स्वर्गभाक्।। #उत्सन्ननगरग्रामे_स्थानत्यागे_च_विप्लवे।#पुनःसंस्थानधर्मेण_स्थापयेदविचारयन्।।)"
इन दो प्रमाणो में से
#सुस्थितं_दुःस्थितं_वाऽपि_शिवलिङ्गं_न_चालयेत्। --- इतने अर्ध श्लोक को सामने रखकर "प्रतिष्ठामयूख" धर्मसिन्धु" "निर्णयसिन्धु" प्रभृति अनेक निबंधकारों ने यह वचन स्यंभू अनादिसिद्ध, महापुरुष-प्रतिष्ठापित लिङ्ग के चालन के निषेध में ही उपयोग बताया। लेकिन रूढिवादी पण्डितोने और समाज ने "#न_चालयेत्। इतना भाग पकडकर आततायीयों का आक्रमण होने दिया और महामूल्य प्राणों का बलिदान दे दिया। आततायी गर्व करने लगे कि हमने हिन्दु संस्कृति का नाश किया ।
#सर्वान्_बलकृतानर्थानकृतान्_मनुरब्रवीत्। यह मनुवचन और " #केवलं_शास्त्रमाश्रित्य_न_कार्यो_धर्मनिर्णयः। इन दो वचन और भविष्योत्तर पुराण के दूसरे वचन की ओर देखा भी नहीं। परिणाम स्वरूप हमारी संस्कृति के प्रतीकरूप अनेक मन्दिर उद्ध्वस्त हो गए और उन मंदिरो की कला का भी साथ में नाश हुआ , हो रहा हैं।
#उत्सन्ननगरग्रामे०००इत्यादि वचनपर खूब सावधानी से ध्यान देना  आवश्यक हैं ->[ प्राचीन शिवालय या मन्दिर हैं, लेकिन उस मन्दिर की पूजा करनेवाले अधिकारी शहर या गाँववाले उस स्थान को छोडकर चले जाय, अपने स्थान से प्रतिमा कहीं भी तितरवितर पडी हो, राष्ट्र में दंगा, आततायी म्लेच्छों का आक्रमण या दुर्भिक्ष में महामारी जैसी बडी आपत्तिओं में उस प्रतिमा का चालन करके और सुरक्षित स्थान में पुनः प्रतिष्ठा(अनुपवीत पतित आदि के प्रतिमा को स्पर्श से भी पुनः प्रतिष्ठा) करने में कोई पाप नहीं, लेकिन अधिकतम पुण्य हैं।]

हम दैखते हैं कि शिवालय नष्ट हो गया हैं। शिवलिंग इधर उधर अपवित्र स्थान में पडा हैं। कुत्ते वगैरह प्राणी उसके पर मलमूत्रादि त्याग करते हैं। ऐसी अवस्था में हिन्दु होकर "शिवलिंगं न चालयेत्" इस पूँछ को पकडकर बैठ जाना, यह भारतीय संस्कृति का विनाशक चिन्ह हैं।

भारत में ऐसे अनेक स्थान आज भी हैं जहाँ चारों ओर म्लेच्छ  वगैरह वस्ती से घिरे पडे हैं। एक ओर अनावश्यक नूतन मंदिरों बनते जा रहे हैं। जैसे काश्मीर के श्रीनगर में #श्री का धाम, काल्टी में #शंकराचार्यजी की जन्मभूमी , वैसे अनेक स्थानों की दुर्दशा होने पर भी हाथ जोडकर बैठ रहना हिन्दु धर्म का कलंक हैं।
तात्पर्य यह हैं कि #न_चालयेत्।। इस सिद्धांत को रूढ न मानकर "#उत्सन्न००आदि वचन के अनुसार श्लोक में बताए हुए और तत् समान निमित्तो में शिवलिङ्ग या प्रतिमा का चालन करके अनार्यों से दूर सुरक्षित अन्य जगह पुनःप्रतिष्ठा करना शास्त्र सम्मत हैं। [[ इससे यह भी सिद्ध हैं कि महापुरुषद्वारा प्रतिष्ठित प्रतिमाएं भी  पूर्वोक्त कारणो से दूषित होती हैं और पुनः प्रतिष्ठा के योग्य हैं। मैं संकेत कर रहा हूँ कि  अनुपवीत,व्रात्य,पतित और स्वशाखीय संस्कार से उपनीत होते हुए भी जो विप्र नित्य स्वशाखाविधा से सन्ध्योपासना नहीं करते अथवा सातदिन भी जिसकी नित्यसन्ध्योपासना बंध हो चूकी हो, अथवा पुनरुपनयन निमित्तक निषिद्धाचरण-सेवन से  द्विजत्वभ्रष्ट होने वाले द्विज का भी स्पर्श पूजन में अनधिकार हैं, यदि इन्हों का स्पर्श हुआ तो भी पुनःप्रतिष्ठा के योग्य हैं, पुनः प्रतिष्ठा के बाद कहे हुए अनधिकारीयों का स्पर्शपूजन में साक्षात् निषेध होने से यदि प्रतिमा को  स्पर्श हुआ तो पुनःप्रतिष्ठा होगी यह शास्त्रनिश्चित हैं, आजकल यही निषेधों का पालन नहीं हो रहा हैं ऐसे मंदिरो में शिष्टो को दर्शन-नमस्कार आदि नहीं करना चाहिए --->

यः शूद्रेणार्चितं लिङ्गं विष्णुं वा प्रणमेन्नरः।
न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा प्रायश्चित्तायुतैरपि।। नमेद्यः शूद्र संस्पृष्टं लिङ्गं वा हरिमेव वा।
स सर्वयातनाभोगी यावदाचन्द्रतारकम्।।#पाखण्डपूजितं_लिंगं_नत्वा_पाखण्डतां_व्रजेत्।
आभीरपूजितं लिंगं नत्वा नरकमश्नुते।। योषिद्भिः पूजितं लिंगं विष्णुं वापि नमेत्तु यः। स कोटिकुलसंयुक्तं आकल्पं रौरवं वसेत्।।
[ त्रिस्थलीसेतौ ]
( शास्त्रोचित विधिनिषेध के पालन सिद्धांत के साथ नूतन प्रतिष्ठा का विचार १५०वर्षो से इस चलते कलियुग में अनावश्यक और असंभव हैं।)

वर्तमान में होने वाली मूर्तिप्रतिष्ठाओं में -- अयाज्यों का समूह में याजन तथा "(अशुचित्वस्पर्शादिजन्य दोष निवृत्ति हेतु ही शास्त्रविधान से मूर्तिस्नपन विधान) होने के बाद भी यदि अनुपवीतों ,व्रात्य आदि पतितों के द्वारा स्पर्श कर मूर्तियों का शैयाधिवास होता हैं (१)इस प्रकार जो फिरसे #अनुक्त_स्पर्श हुआ उसका क्या समाधान ? (२) ऐसी अनुचित स्पर्श युक्त मूर्तियों में कैसे #न्यासप्रकरण संभव ? (३) मंदिरों में यही शयनाद्दुत्थापित मूर्तियों का मधुपर्कार्चन कर प्रवेश पूर्व भी #अनुचितस्पर्श (४) मूर्ति स्थिर करनेवाला भी अनुपवीत (५) प्रतिष्ठा के बाद भी संध्योपासनादि रहित ब्राह्मणादि से पूजन (६) अरे इन्हीं प्रतिष्ठा में लहसुन, प्याज,बीट,गाजर , मशरुम आदि अभक्ष्य का सेवन करनेवाले तथा स्वशाखीय संध्योपासना रहित ब्राह्मणों और अन्य पतित ब्राह्मणों  का वरण व मूर्तियों का वारं वार स्पर्श (७) प्रतिष्ठा के बाद भी मूर्तियों को अनुपवीत आदि का स्पर्श होता हैं --
जब शुरुआत ही अनुचित होती हैं तो मंदिरों का संचालन भी अनुचित ही रहैगा और न वर्णाश्रम मर्यादा का पालन आदि...
ऐसे अनगिनत कार्यों के कारण वर्तमान में #मूर्तिप्राणप्रतिष्ठा संभव नहीं हैं.....

मंदिरो में #मूर्तिप्राणप्रतिष्ठा से पहिले जो प्रतिमाओ की  स्नपनविधा  होती हैं वह अशुचित्वदोष परिहारार्थ हैं, (अनुपवीत, व्रात्य, स्त्री, संकर आदि) का मूर्ति को स्पर्श हुआ हो तो उसका निराकरण इस स्नपनविधासे हैं जिससे मूर्ति में शुचित्वता की प्राप्ति होती हैं । परंतु प्रतिष्ठा से पहिले और स्नपनविधा के बाद इन्हीं अनुचितों का स्पर्श आजकल हो ही रहा हैं । सिद्धांत की मर्यादा में शास्त्रीयपक्ष तो यह अनिवार्य हो जाता हैं कि ऐसी स्नपनविधा के बाद आपत्ति हुई हो तो पुनःस्नपनविधा को सम्पन्न कर मात्र अधिकृत उपनीत(जो पतित)न हुए हो अर्थात् जिस दोषो के कारण द्विजत्व भ्रष्ट हो जाता हैं वे अपराध  के दोषानुसार जहाँ जहाँ प्रायश्चित्त व पुनःउपनयन अनिवार्य  कहा वे वे दोष हुए ही न हो अथवा तो हुए हो तो उचित प्रायश्चित्त करके पुनःउपनीत हुआ हो वे उस स्थाप्यमूर्तियों का स्पर्श कर मंदिर के गर्भगृह में स्थापित करे और प्रतिष्ठा के आचार्यो भी उपर कहे पुनरुपनयन निमित्त दोषो से पतित न हुए हो वे प्रतिष्ठा करवाए,  परंतु ऐसा कलियुग में अधिकाधिक 90% नहीं हो रहा हैं ।
दूसरी आपत्ति भी यह हैं कि मंदिरो में भी पतित न हुए पूजारी पूजा करने में अधिकृत हैं वह पूजारी पुनरुपनयन निमित्त अपराधो से बचे..  यह भी अधिकाधिक 90% मंदिरो में नहीं हैं.... मंदिरो में भी विना वैश्वदेव किए नैवेद्यभोग नहीं लगाया जा सकता, पतितों अनाचारीओं के स्पर्श से दूषित प्रतिष्ठित प्रतिमा का भी सिद्धांत के अनुसार प्रोक्षणविधापूर्वक पुनःप्राणप्रतिष्ठा अनिवार्यरूप से कही हैं। यह तो यह हुआ कि कुछ ही घण्टो में प्रतिष्ठितप्रतिमाए भी दूषित हो जा रही हैं तो फिर प्रतिष्ठा का प्रयोजन ही क्या रहा?  पंडितो को यह समजना उचित हैं कि कलियुग में प्रतिष्ठा करना अर्थात् देवापराध करना हैं...

 अधिकाधिक नूतनप्रतिमा के प्रतिष्ठा महोत्सव अनुपवीत, व्रात्य, संकर और सभी प्रकार के अयाज्यो को साथ में बीठाकर सामूहिकयाजन हो रहा हैं...  यह खैल कईं वर्षो का हैं,  #अयाज्ययाजनदोष ,, इसमें तो जो आचार्य रहे वे तो अयाज्यो के याजन करने से ही सद्यःपतित होकर स्वयं अनधिकारी हो जाते हैं.. जबतक कि वे स्वयं अपना अयाज्ययाजन निमित्त छहवर्ष का षड्ब्दप्रायश्चित्त सम्पन्न कर पुनःउपनयन नहीं करवाते..

सर्वत्र शिवालयों में विधिनिषेध की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं ! कैसे हो शिवरात्रि मंगलमय ?

उत्तर --->
पंडितलोग --द्रव्यलोलुपतावशात् कलिकाल में प्रतिष्ठा करवा देते हैं, परंतु संचालको पर शास्त्रीय विधिनिषेध का निरन्तर अनुशासन नहीं रखते -- इस प्रकार नये मंदिरो में अनुशासक देवालयाचार्यो की कमी ही हैं, अथवा विधायक आचार्य हो तो भी संचालक अपनी मनमानी से संचालन करते हैं  कलिकाल में विधिनिषेधज्ञ-आचार्यों की सुनते हैं कौन ? दूसरा चिंतन यह हैं कि जब कलिकालुष्यता का कोई उपाय ही न हो साथ में आचार्यो और संचालक अपने कर्तव्य से विमुख हो तो प्रतिष्ठाएँ करनी ही नहीं चाहिए ।  ऐसे भी अनधिकृतो के स्पर्श से प्रतिष्ठित देवता में से देवता चलायमान ही होते हैं, इसलिये तो विधिनिषेध पद्धति ग्रन्थो में "(प्रोक्षणविधा पूर्वक पुन: प्रतिष्ठा कही है)" प्रतिष्ठा में मूर्तिमानयन् से लेकर प्रतिष्ठाविधि में पतित न हुआ उपनीत द्विज ही अधिकारी हैं , प्रतिष्ठोपरांत भी अनधिकृतों का स्पर्शपूजा में निषेध हैं ...
"न प्रतिष्ठासमो रिपु:"
अशास्त्रीय मतावलम्बी दूर रहे।
प्रश्न नही स्वाध्याय करें।।
शास्त्री पुलकित

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