यज्ञ अधिकार विमर्श
🔥यज्ञ करने के अधिकारी 🔥 " वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनाद्धीत् , ग्रीष्मे राजन्यो वर्षासु वैश्यः। " ( शतपथब्राह्मण २|१|३|५ ) " वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत , ग्रीष्मे राजन्यम् , शरदि वैश्यम्। " ( आपस्तम्भधर्मसूत्र १|१|१|१९ ) उपर्युक्त श्रुतियों के द्वारा ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य इन तीन वर्णो को ही आधान ( अग्निहोत्र ) तथा उपनयन का अधिकार है -- अतः उपनीत ( यज्ञोपवीतधारी ) ही ' वेदस्वाध्याय ' का अधिकारी होता है और अधीत वेद - पुरूष ही याज्ञादि का अधिकारी होता है । " असतो वा एष सम्भूतः यच्छ्रूद्रः ।" ( तैत्तिरीयब्राह्मण ३|२|३|९ ) उपर्युक्त प्रमाणों से स्पष्ट है कि शूद्र द्विजाति धर्मों से बहिष्कृत है - उन्हें श्रौतयज्ञ करने का अधिकार नहीं है -- श्रौतयज्ञ करने का अधिकार केवल द्विजाति को ही है -- द्विजाति को भी प्रत्येक श्रौतयज्ञ करने का अधिकार नहीं है -- अधिकार की दृष्टि से द्विजाति के लिये भी पृथक् - पृथक् यज्ञ करने का निर्देश किया ग...