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यज्ञ अधिकार विमर्श

🔥यज्ञ करने के अधिकारी 🔥 " वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनाद्धीत् , ग्रीष्मे राजन्यो वर्षासु वैश्यः। " ( शतपथब्राह्मण २|१|३|५ ) " वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत , ग्रीष्मे राजन्यम् , शरदि वैश्यम्। " ( आपस्तम्भधर्मसूत्र १|१|१|१९ ) उपर्युक्त श्रुतियों के द्वारा ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य इन तीन वर्णो को ही आधान ( अग्निहोत्र ) तथा उपनयन का अधिकार है -- अतः उपनीत ( यज्ञोपवीतधारी ) ही ' वेदस्वाध्याय ' का अधिकारी होता है और अधीत वेद - पुरूष ही याज्ञादि का अधिकारी होता है । " असतो वा एष सम्भूतः यच्छ्रूद्रः ।" ( तैत्तिरीयब्राह्मण ३|२|३|९ ) उपर्युक्त प्रमाणों से स्पष्ट है कि शूद्र द्विजाति धर्मों से बहिष्कृत है - उन्हें श्रौतयज्ञ करने का अधिकार नहीं है -- श्रौतयज्ञ करने का अधिकार केवल द्विजाति को ही है -- द्विजाति को भी प्रत्येक श्रौतयज्ञ करने का अधिकार नहीं है -- अधिकार की दृष्टि से द्विजाति के लिये भी पृथक् - पृथक् यज्ञ करने का निर्देश किया ग...

एकलव्य भ्रमभंजन

■●> एकलव्य :-- एक शास्त्रीय दृष्टिकोण महाभारत को काल्पनिक कहने वाले पाश्चात्यविद् तथा वामपन्थी इतिहासकार एकलब्य बिषय को बार बार उठाकर जनमानस में वैमनस्यता का बीज बोता है इन तथाकथित इतिहासकारों के अनुसार विश्वविख्यात अयाख्यान महाभारत जब काल्पनिक ही है तो उसमें आये हुए कथानक वास्तविका कैसे ?? उन धूर्त तथाकथित इतिहासकारों के सामने प्रथम यही प्रश्न रखना चाहिए फिर देखिए क्या होता है । अस्तु यह एक ऐसा बिषय है जिसकी भ्रांति जनमानस में ऐसा व्याप्त है बड़े से बड़ा विद्वान भी इस बिषय को लेकर यह तक कह डालते है कि एकलव्य के साथ जो हुआ वह न्याय नही है ___________________________________________________ सनातन धर्म मे जितनी महता एक श्रोतीय ब्राह्मण की है उतनी ही महता एक स्वधर्मप्रायण शुद्र की है ■● अपि शुद्रं च धर्मज्ञं सद् वृत्तमभिपूजयेत् (महाभारत अनुशाशन पर्व ४८/४८) स्व स्व धर्मानुरक्त धर्मानुरागी का सम्मान तो स्वयं ईश्वर भी करता है इस लिए शूद्रकुल में उतपन्न हुए विदुर को भी साक्षात् धर्म का अंश माना गया ,निषादराज गुह्य तो हमारे इष्टदेव श्रीरामचन्द्र के सखा तक हुए फिर निषादराज ह...

न हिन्दु पतितो भवेत्

‼️ #हिन्दु_भी_पतित_होता_है ‼️ !! महादेव !! "न हिन्दु पतितो भवेत्" इस वाक्य को दिखला के लोग कहते है कि हिन्दू कभी पतित ही नहीं होता , चाहे कुछ भी करे या ना करे । वे लोग अपने को सर्वदा पवित्र मानता है ये उनका भ्रम जाल मात्र है कुकी पतित को उद्धार करने के लिए ही धर्म शास्त्रों ने प्रायश्चित आदि का विधान किया । लोग कहते है हम भक्ति करेंगे धर्म शास्त्र को नहीं मानेंगे , उनका ये बचन भी भ्रम मात्र ही है । भक्ति के बड़े अचार्य नारद जी अपने भक्ति सुत्र में कहते है "#शास्त्र_रक्षणम्" जितना भी बड़ा भक्त हो शास्त्र के मर्यादा विधि निषेध आदि का पालन करों "#अन्यथा_पतित्याशङ्कया" नहीं तो पतित वन जाओगे । अव हम आगे करपात्री जी के लेख दे रहे है जहा उन्होंने शास्त्र वचनों से सिद्ध किया कि हिन्दु पतित होता है । आगे के लेख "#विदेश_यात्रा_शास्त्रीय_पक्ष " नामक ग्रन्थ से । (आगे के लेख में जिस स्थान में विदेश यात्रा शब्द आयेगा बहा आप हिन्दुओं के मन मुखी आचरण का अनुमान लगा लेना हम भी अलग करके कोटेशन में लिख देंगे ) [ #हिन्दु_भी_पतित_होता_ही_है ] ...

विवाह मे कितने फेरे ??

#विवाह_में_कितने_फेरे? धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज ★★★★★★★★★★★★★★ यह भांवर(७7फेरे)केवल भ्रममात्र हैं।सार्वजनिक रुप से 4४ फेरे ही होने चाहिए -आज कल विवाह में कहीं तो 7 फेरों का प्रचलन है, तो कहीं 4 का , इस विषय पर बहुत विवाद सुनने में आ रहा है। राजस्थान, गुजरात और मिथिला आदि प्रान्तों में कई स्थानों में 4 फेरों की परम्परा है और उत्तर प्रदेश आदि कुछ प्रान्तों के कतिपय स्थलों में 7 फेरों की परम्परा। । यहाँ सप्रमाण यह तथ्य प्रस्तुत हैं, कि “फेरे कितने होने चाहिए । यहाँ एक बात ध्यान में अवश्य रखनी है कि सभी बातें शास्त्रों में ही उपलब्ध नहीं होती हैं । जैसे — वर वधू का मंगलसूत्र पहनाना,गले में माला धारण करवाना, वर वधू के वस्त्रों में ग्रन्थि लगाना ( गांठ बांधना ),वर के हृदय पर दही आदि का लेपन, ऐसे बहुत से कार्य हैं जो गृह्यसूत्रों में उपलब्ध नही हैं । इन सब कार्यों में कौन प्रमाण है ? इसका उत्तर है –”अपने अपने कुल की वृद्ध महिलायें ;क्योंकि वे अपने पूर्वजों से किये गये सदाचारों का स्मरण रखती हैं । इसलिए विवाहादि कार्यों में इनकी बात मानने का विधान शास्त्रों ने किया है ।शुक्ल ...

नामोच्चार से पार्थिव शिवलिंग पुजन

नामोच्चार से पार्थिव शिवलिंग पुजन कि विधि आवश्यक सामग्री शुद्ध मिट्टी गंगाजल देशी गौ माता का कच्चा दुग्ध कंकु अक्षत् चंदन धुप दीप नैवेध के लिए देशी गुड/सक्कर कपुर पुष्प तांबे के पात्र घंटी माचीस संकल्प :- दक्षिण हाथ मे जल लेकर संकल्प करे जल को जमीन पर छोड दे। अत्रार्ध महामांगल्य फलप्रद मासोत्तमे मासे (अमुक मास का नाम) मासे (अमुक पक्ष कृष्ण या शुक्ल) पक्षे (अमुक तिथि का नाम) शुभ पुण्य तिथौ (अमुक वार का नाम) वासरे (अमुक गोत्रोच्चार -कश्यप) गोत्रोत्पन्नस्य ( स्ववेद नाम उच्चार शुक्ल यजु) वेदान्तर्गत (स्वशाखा नाम उच्चार माध्यंदिनी) शाखाध्यायी (अमुक प्रवर काश्यप अावत्सार नैध्रुव ईति त्रि )प्रवरान्वितोऽहं, (अमुक -उपाध्याय ) अवटंकी अमुक महोदस्य आत्मजः/आत्मजा:/सहधर्मचारिणी(विवाहित स्त्री के लिए ) (अमुक नाम) शर्मा अहं ममोपात्त दुरीतक्षयार्थम् देवतापूजनादि अधिकार प्राप्ति अर्थं परमेश्वर प्रीत्यर्थं च मम् सर्व धर्मसहमत मनोकामनापुर्ति अर्थम् पार्थिवेश्वर महादेवस्य पुजनं अहं करीष्ये। सर्व प्रथम भगवान श्री गणेश का स्मरण अौर ध्यान करे पुष्प+अक्षत चढाते - श्री गणेशाय नमः श्री हराय नमः नामोच्च...

सुस्वप्न दर्शन के फल का विचार

ब्रह्म वैवर्त पुराण श्रीकृष्ण जन्म खण्ड (उत्तरार्द्ध): अध्याय 77 सुस्वप्न दर्शन के फल का विचार नन्द जी ने पूछा- प्रभो! किस स्वप्न से कौन- सा पुण्य होता है और किससे मोक्ष एवं सुख की सूचना मिलती है? कौन-कौन सा स्वप्न शुभ बताया गया है? श्री भगवान बोले- तात! वेदों में सामवेद समस्त कर्मों के लिए श्रेष्ठ बताया गया है। इसी प्रकार कण्वशाखा के मनोहर पुण्यकाण्ड में इस विषय का वर्णन है। जो दुःस्वप्न है और जो सदा पुण्य-फल देने वाला सुस्वप्न है, वह सब जैसा पूर्वोक्त कण्वशाखा में बताया गया है; उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। यह स्वप्नाध्याय अधिक पुण्य-फल देने वाला है। अतः इसका वर्णन करता हूँ। इसका श्रवण करने से मनुष्य गंगा स्नान के फल की प्राप्ति होती है। रात के पहले पहर में देखा गया स्वप्न एक वर्ष में फल देता है। दूसरे पहर का स्वप्न आठ महीनों में, तीसरे पहर का स्वप्न तीन महीनों में और चौथे पहर का स्वप्न एक पक्ष में अपना फल प्रकट करता है। अरुणोदय की बेला में देखा गया स्वप्न दस दिन में फलद होता है। प्रातःकाल का स्वप्न यदि तुरंद नींद टूट जाए तो तत्काल फल देने वाला होता है। दिन को मन में जो कुछ देखा और...

शिवरात्रि

।।#शिवरात्रि_पूजन।। पुष्प मात्र अर्पण करने से भी शिव प्रसन्न हो जाते हैं-- न स्नानेन न वस्त्रेन न धूपेन न चार्च्चया । तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासतः ॥” इति शङ्करोक्तेः ॥ * ॥स्कान्दे । शिव की विशेष कृपा के लिए रात्रि के प्रत्येक पहर में शिव को. स्नान करवाकर पूजा करें-- ततो रात्रौ प्रकर्त्तव्यं शिवप्रीणनतत्परः । प्रहरे प्रहरे स्नानं पूजाञ्चैव विशेषतः ॥ शिवरात्रि के व्रत को चांडाल आदि सभी कर सकते हैं-- शिवरात्रिव्रतं नाम सर्व्वपापप्रणाशनम् । आचाण्डालमनुष्याणां भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् व्रत में यदि जागरण भी हो जाए तो महान फल है-- उपवासप्रभावेण बलादपि च जागरात् ।शिवरात्रेस्तथा तस्य लिङ्गस्यापि प्रपूजया । अक्षयान्लभते लोकान् शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥”पाद्मे । सभी को बारह वर्ष या चौबीस वर्ष तो शिवरात्रि का व्रत अवश्य करना चाहिए- वर्षे वर्षे महादेवि नरो नारी पतिव्रता । शिवरात्रौ महादेवं कामं भक्त्या प्रपूजयेत् ॥” ईश्वानसंहितायाम् “एवमेव व्रतं कुर्य्यात् प्रति संवत्सरं व्रती ।द्वादशाब्दिकमेतद्धि चतुर्व्विंशाब्दिकं तथा । सर्व्वान् कामानवाप्नोति प्रेत्यचेह च मानवः ॥ प्रदोषव्य...