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शुद्रों को पढ़ने नहीं दिया जाता था

शुद्रों को पढ़ने नहीं दिया जाता था कहने बालों जरा इस पर ध्यान दो । 👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇 #पठन्_द्विजो_वाक्_ऋषभत्वम्_ईयात् | #स्यात्_क्षत्रियो_भूमि_पतित्वम्_ईयात् || #वणिक्_जनः #पण्य_फलत्वम्_ईयात् | #जनः #च_शूद्रो_अपि_महत्त्वम्_ईयात् ll                          (वा०रा०१/१/१००) भावार्थ: इस रामायण को ब्राह्मण पढ़े तो वेद शास्त्रों में पारंगत हो, क्षत्रिय पढ़े तो पृथ्वी पति हो वैश्य पढ़े तो उसका अच्छा व्यापार चले और शूद्र पढ़े तो उसका महत्त्व अर्थात अपनी जाति में श्रेष्ठत्व बढ़े या उन्नति हो । अब कोई बातयेगा यँहा पढ़ने का क्या अर्थ होता है? बिना सनातन धर्म के ज्ञान के जो विधवा विलाप करतें हैं वे अपने कथित संविधान और वामपन्थ के इतिहास का चश्मा हटता के देखें । हे ! शूद्रों वामपंथियो , नेताओं, मुल्लों ,ईसाइयों बौद्ध , और कथित समाज सुधारकों एवं नमाज़ियों के चक्कर मे आके सनातन धर्म का अपमान न करें अन्यथा आपकी  ही हानि है ।                         ...

ब्राह्मणग्रंथ वेद है

।। ब्राह्मण वेद हैं ।। कुछ मूर्खों का विधवा विलाप है कि ब्राह्मण ग्रन्थ वेद नहीं पुराण है ।  हमारा पक्ष है कि ब्राह्मणभाग पुराण नहीं बल्कि वेद हैं आज तक जितने भाष्यकार ऋषि महर्षि मुनि और आचार्य हो चुके हैं उन सबों ने मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग दोनों को एक जैसा वेद माना है । अतः हम कुछ प्रमाण प्रस्तुत करतें हैं यथा :―― सायणाचार्य ऋग्वेदादि-भाष्यभूमिका ( उपोद्धात ) में महर्षि आपस्तम्ब की यज्ञ-परिभाषा का प्रमाण उद्धृत करते हुए लिखते हैं कि- १)तच्चोदकेषु मन्त्राख्या। (मीमांसा २ । २३ ) २)शेषे ब्राह्मणशब्दः ।( मीमांस २ । ३३) अर्थात्-प्रेरणालक्षण श्रुति-समुच्चय को मन्त्र कहते हैं और शेष समस्त वेद का नाम ब्राह्मण है। इसीलिए सायण, आपस्तम्ब और जैमिनि की सम्मति में भी मन्त्र तथा ब्राह्मण दोनों ही वेद हैं। (३) न्यायाचार्य महर्षि गौतम जी ने वेदों की प्रमाणता सिद्ध करने के लिये पूर्वपक्ष में वेदों पर आक्षेप किये हैं और उन आक्षेपों के जो उदाहरण दिये हैं वे वर्तमान ब्राह्मणभाग के हैं । यदि ब्राह्मण भाग वेद न होता' तो वेदों पर शङ्का करने के लिये वेद भिन्न भाग का उदाहरण देना क्या मूल्य रखत...

वेदो मे पुराण के नाम

#वेदों_में_पुराणों_के_नाम 👇👇👇👇👇👇👇👇👇 ब्रह्मपुराण (क) ब्रह्म जज्ञानं प्रथमम् । ( यजुः १३ । ३) (ख) ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यम् । (बृहदारण्यक ६ । ३ । १८) अर्थात्-प्रथम पुराण का नाम ब्रह्म है और उस अग्रिम पुराण को वे ऋषि लोग जानते हुवे । (पद्मपुराण) अजस्य नाभावधि एकमपितं यस्मिन् विश्वा भुवनानि तस्थुः ।(ऋग्वेद १०। ८२।६)  अर्थात-अजन्मा विष्णु भगवान् की नाभि में एक अण्डरूप पद्मथा जिस में समस्त भुवनों की स्थिति थी । ( सायण ने यहां अण्ड काउल्लेख किया है और पुराणों में इसी अण्ड का पद्म रूप से वर्णन किया है) (विष्णुपुराण) स (प्रजापतिः) यजुर्योऽधिविष्णु (असृजत)। (तैत्तिरीय २ । ३।२।४) अर्थात्-प्रजापति परमात्मा ने यजुर्वेदमूलक विष्णुपुराण कोबनाया ( यहां सर्जन रूप क्रिया के योग से 'विष्णु' शब्द का अर्थ ग्रन्थ-विशेष ही युक्तियुक्त है । ) (अग्नि-पुराण) अग्निम वाचि श्रितः। (तैत्तिरीय ३।१०।८।४ अर्थात्--अग्निपुराण मेरी जिह्वा पर स्थित है यानी कण्ठान है । दयानन्दी शैली से यहां अग्नि शब्द का अर्थ भौतिक अग्नि नहीं हो सकता, क्योंकि वह किसी की जिह्वा पर थोड़े ही ठहर ...

सीता वनवास

आधुनिक समाज भगवान् श्रीरामको दोष दे रहा है कि “श्रीरामने लोकोपवादके चलते गर्भवती पत्नी को त्याग दिया ,कैसे पति थे राम जो पत्नी पर विश्वास भी नहीं था ” इस तरह न जाने कितने आरोप रामजी पर लगते और रामजी को अपराधी बना दिया , जबकि स्वयं माता सीताने कभी श्रीरामको दोष न दिया ,उनके राम उनके हृदय मन्दिर में सदैव विराजमान रहे – अब प्रसङ्ग पर आते हैं एक रजकके कारण लोक ोपवाद फैला कि सीता रावणके साथ रहकर आयीं और रामने स्वीकार कर लिया , किसने देखा सीताका हरण होते ? कौन था उस समय साक्षी ? ऐसे भीषण प्रश्न जिनका समाधान रामजी को करना था । रामजीके पास 2 विकल्प थे पहला प्रजाका दमन करें जो लोकोपवाद कर रहे हैं और दूसरा प्रजामें ये प्रचारकिया जाए कि सीता निर्दोष हैं ,अग्नि परीक्षा दे चुकी हैं सीता । किन्तु पहला विकल्प श्रीरामको मान्य नहीं ,प्रजाका दमन एक न्यायप्रिय राजा कर सकते दूसरे दमन करने से आंदोलन बढ़ता ही है समाप्त नहीं होता तो सीताजी के विषय में आंदोलन बढ़ता ही जाता । दूसरे विकल्प में राजकीय प्रचार ही माना जाता (प्रोपोगेंडा ही मानती प्रजा) ,श्रीराम शासक हैं अपनी तरह राजकीय प्रचार कर रहे हैं कि सीता नि...

गणेशजी को हाथी का मस्तिष्क क्यु ??

बहुत से लोग गणेश और शंकर पर ये कहकर गलत भाषा का उपयोग भी करते हैं कि जो अपने बेटे को नहीं पहचान सका वो शंकर भगवान कैसे हो सकता है??? इसी के लिए एक मित्र ने मुझसे ऐसा ही सवाल किया।। जो शायद सत्य से अनजान हिन्दुओं के लिए गुस्से का विषय बन जाता है।। किन्तु आपको सत्य से भी अवगत होना होगा जिससे आप ऐसे अनर्थक प्रश्नों के उत्तर जान सकें और भविष्य में जब भी आपसे कोई पूछे उनको बता सकें।। उत्तर:- शिव जी ने एक न्याय का उदहारण दिया था जो समझने के बहुत आवश्यक है।। जब गणेश का सर काटा गया उस समय गणेश ने अपनी माता के कहे अनुसार अपने कर्तव्य का पालन किया, परन्तु उस समय गणेश को अपनी क्षमता और शक्ति पर अहंकार था कि उसको माता शक्ति ने अपने शरीर के हल्दी चन्दन के अंश से बनाया तो जिस शक्ति और शिव के तप और संतुलन(मीज़ान) से आकाशगंगाएं अपनी धुरी पर केन्द्रित रहती हैं वो सबसे बलशाली है और जब शंकर जी कैलाश आये तब शंकर जी को अपने अहंकार के वश में होने के कारणवश गणेश के द्वारा अभद्र व्यव्हार हुआ।। जो उस समय एक बहुत ही चिंता का विषय थी क्योंकि जो स्वयं में इतनी शक्ति का अलौकिक सूत्र होने के बाद भी अपने अहंक...

द्रौपदी के पांच पति ही थे।

आजकल महाभारतके बारे में यह भ्रामक प्रचार किया जा रहा है ,कि द्रौपदीजीके पाँचों पाण्डव पति नहीं थे ,केवल युधिष्ठिर ही उनके पति थे । और इस भ्रामक प्रचारका श्रेय जाता है हमारे आर्यसमाजी बन्धुओंको , वे इस बात को कभी स्वीकार ही नहीं पाये हैं कि द्रौपदीजी पांचों पाण्डवोंकी पत्नी थीं और इसके लिये अनेक तर्क देते थे अब उन्होंने दावा किया है कि उन्होंने महा भारतमें बड़े परिश्रमके बाद २-३ श्लोक खोज लिये हैं जिनसे द्रौपदी अकेले युधिष्ठिरकी पत्नी सिद्ध होती हैं , पांचों पाण्डवोंकी नहीं । इस पर हम आगे चर्चा करेंगे पहले ये बता दूँ १ लाख श्लोकोंके बृहद ग्रन्थ में जो चीज खोजनी पड़े उसकी सत्यता संदिग्ध हो जाती है , क्या २-३ श्लोकोसे प्रसंग को बदला जा सकता है भला ? समाजी बन्धुओंका कहना है एक स्त्रीके पाँच पति नहीं हो सकते हैं यह आर्य संस्कृति में नहीं है आर्य कभी अनुचित कार्य नहीं कर सकते हैं (लेकिन ये ही बन्धु नियोग को सिद्ध करने में एक स्त्री के ११ पति तक बना देते हैं ) , इसीलिए यह प्रक्षिप्त है , यह हमारे इतिहास में विधर्मियों द्वारा मिलावट की गयी है , इसीलिए द्रौपदीके पाँच पतियों वाली घटना को महाभारत...

वाल्मीकि रामायण काल्पनिक नहीं है।

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!!    श्रीमद्वाल्मीकिरामायण   !! भगवान् वाल्मीकि रचित भगवान् श्रीराम का निवास रामायण आदि काव्य ही नहीं ऐतिहासिक वृत्तान्त है । वेदवेद्य परमेश्वर श्रीराम के अवतीर्ण होने पर वेद ही प्राचेतस महर्षि (वाल्मीकि) से रामायण रूप से प्रकट हुए । “वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद् रामायणात्मना !!” स्वयं वाल्मीकि कह रहे हैं – “वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभु: “(वाल्मीकि १/४/६) किन्तु पाश्यात्यों को रामायण आँखों में चुभती है क्योंकि इसमें स्वयं वेदवेद्य भगवान् ही श्रीराम रूप से अवतरित बताए गए हैं और रामायण वेदों का उपबृंहण है । पाश्चात्यों और उनके  तथाकथित भारतीय अन्वेषणकारी अनुयायी भी रामायण में प्रक्षिप्त कह कर श्रीमद्रामायण के महत्त्वको समाप्त करना चाहते हैं जिससे त्रिलोकवन्दित भगवान् श्रीराम को परब्रह्म परमात्मा न मानकर साधारण मनुष्य सिद्ध कर सकें । अन्वेषणकारियों की ये दुरभिसंधि ही है जो वाल्मीकि रामायणके उत्तरकाण्ड जैसे महत्वपूर्ण काण्ड को प्रक्षिप्त कहने की दृष्टता मात्र है । वस्तुतः कोई भी आस्तिक भारतीय रामायण जैसे प...

सीता माता अग्नि परिक्षा

माता सीता कि अग्नि परीक्षा पर आक्षेप और रहस्यों को न जानने के कारण नामजियो का इस प्रसङ्ग को तोड़ मोड़ कर बताना ,इस पर हमारा शास्त्र सम्मत खंडन और वैज्ञानिक विश्लेषण :~~~~~~~~~ चूंकि यह एक धर्मी विषय है अतः इसके लिए भगवान मनु ने कुछ निर्देश दिया है कि धर्म के विषय मे जब जिज्ञासा हो तो प्रामाण क्या होता है तो कहा "धर्म जिज्ञासा में श्रुति परम प्रमाण है " । '#धर्म_जिज्ञासमानानां_प्रमाणं_परमं_श्रुति:' (मनु.२.१३.) अतः हम इस घटना का समर्थ वेद से करवाना उचित समझते हैं वेद भगवान ने इस घटना के बारे में कहा कि । #सुप्रकेतैर्युभिरग्निवितिष्ठन्नुषद्भिर्वर्णैरभिराममस्थात् । ( साम उत्तरार्चिक १५ । २ । १ । ३) अर्थ-सुन्दर चिन्हों से और दीप्तिमान् वर्णों से उपलक्षित धुलोक की साधनभूत, रामपत्नी सीता सहित अग्निदेव रामचन्द्र के सम्मुख उपस्थित हुये । राम चरित मानस में तुलसीदास ने एक बहुत हि सुंदर बात कही है "अनेक पुराण, वेद और [तन्त्र] शास्त्रसे सम्मत तथा जो रामायणमें वर्णित है और कुछ अन्यत्र से भी उपलब्ध श्रीरघुनाथजी की कथाको तुलसीदास अपने अन्त:करणके सुखके लिये अत्यन्त मनोह...