वाल्मीकि रामायण काल्पनिक नहीं है।

!!    श्रीमद्वाल्मीकिरामायण   !!
भगवान् वाल्मीकि रचित भगवान् श्रीराम का निवास रामायण आदि काव्य ही नहीं ऐतिहासिक वृत्तान्त है । वेदवेद्य परमेश्वर श्रीराम के अवतीर्ण होने पर वेद ही प्राचेतस महर्षि (वाल्मीकि) से रामायण रूप से प्रकट हुए ।
“वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे ।
वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद् रामायणात्मना !!”
स्वयं वाल्मीकि कह रहे हैं –
“वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभु: “(वाल्मीकि १/४/६)
किन्तु पाश्यात्यों को रामायण आँखों में चुभती है क्योंकि इसमें स्वयं वेदवेद्य भगवान् ही श्रीराम रूप से अवतरित बताए गए हैं और रामायण वेदों का उपबृंहण है । पाश्चात्यों और उनके  तथाकथित भारतीय अन्वेषणकारी अनुयायी भी रामायण में प्रक्षिप्त कह कर श्रीमद्रामायण के महत्त्वको समाप्त करना चाहते हैं जिससे त्रिलोकवन्दित भगवान् श्रीराम को परब्रह्म परमात्मा न मानकर साधारण मनुष्य सिद्ध कर सकें । अन्वेषणकारियों की ये दुरभिसंधि ही है जो वाल्मीकि रामायणके उत्तरकाण्ड जैसे महत्वपूर्ण काण्ड को प्रक्षिप्त कहने की दृष्टता मात्र है । वस्तुतः कोई भी आस्तिक भारतीय रामायण जैसे पवित्र ग्रन्थ के विषय में ऐसा सोच भी नही सकता । शास्त्र के किसी अंश को निकाल देना अङ्ग भङ्ग करने के पाप है और किसी भी अंश को अलग से जोड़ना काँटा चुभोने के समान पाप ही है ,इस लिए ऐसी कुत्सित सोच पाश्चात्यों के दिमाग की उपज ही हो सकती है । वाल्मीकिरामायण स्वयं में पूर्ण है ।
वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त कहने का खण्डन ।
शङ्का १. रामायण के बालकाण्ड में दी पहली अनुक्रमणिका(प्रथम सर्ग) में युद्ध काण्ड तक का ही उल्लेख है इसमें उत्तर काण्ड की चर्चा नहीं है ।
निवारण- वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में अनुक्रमणिका है ही नहीं ,वो तो वाल्मीकि द्वारा देवर्षि नारद से पूछने पर नारदजी द्वारा श्रीराम का संक्षिप्त परिचय है जो मूलरामायण है जिसे सुनकर वाल्मीकि ने २४००० श्लोकों में रामायण की रचना की । वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण की अनुक्रमिका तो बालकाण्ड  के ३ सर्ग में है जिसमे स्पष्ट सीता त्याग की उल्लेख है जो उत्तर काण्ड में है -.
” स्वराष्ट्ररञ्जनं चैव वैदेहयाश्च विसर्जनम् । (बाल०३/३८)”
रही बात नारदजी द्वारा सुनाए श्रीराम चरित्र में क्यों नहीं था सीता त्याग तो इसका उत्तर है रामायण की रचना प्रारम्भ वाल्मीकि ने श्रीराम के राज्याभिषेक के समय की थी ।
” प्राप्तराजस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषि: !
चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत् ।। (बाल०४/१)
तब तक भगवान् की राज्याभिषेक ही हुआ था जब नारदजी ने मूलरामायण सुनाई और श्रीरामके राज्याभिषेक के दिन से वाल्मीकि ने रामायण की रचना प्रारम्भ की जो चरित्र उनके सामने घटित हुए उनका वर्णन किया । वाल्मीकिरामायण २४००० श्लोकों ,५०० सर्ग और उत्तर काण्ड सहित ६ और काण्ड में रचना का बालकाण्ड में स्पष्ट उल्लेख मिलता है –
“चतुर्विंशत्साहस्राणि श्लोकानामुक्तवानृषि: !
तथा सर्गशतान् पञ्च षट्काण्डानि तथोत्तरम् ।।(बाल०४/२)
इन प्रमाणों से ये सिद्ध नही होता कि बालकाण्ड में केवल युद्धकाण्ड तक का वर्णन है ।
शङ्का २. युद्धकाण्ड के अंतिम सर्ग में ऋषियों ,वानरों और विभीषण की विदाई हो गयी थी फिर उत्तर काण्ड में पुनरावृत्ति प्रक्षिप्त होने का प्रमाण है ।
निवारण- ये कारण प्रक्षिप्त कहने के लिए युक्तिसङ्गत नहीं है क्योंकि युद्धकाण्ड के अंत में मात्र २ श्लोको में विदाई की है जिसका उत्तरकाण्ड में वाल्मीकि ने विस्तार से वर्णन किया है इसमें प्रक्षिप्त होने का प्रमाण नहीं है यदि यही कारण माना जाए तब तो माहाभारत भीष्मपर्व में १३ वे अध्याय में भीष्म की मृत्यु और १४ वे अध्याय में कुरु-पांडव युद्ध के १० दिन तक के युद्धकाvalmiki647_100517012424संक्षिप्त वर्णन सञ्जय ने धृतराष्ट्र के सामने किया ,फिर धृतराष्ट्र के कहने पर सञ्जय ने युद्धका विस्तार से वर्णन किया और भीष्म का पराभव भीष्म पर्व के ११९वे अध्याय हुआ । भीष्म की मृत्यु १३वे अध्याय में हो गयी थी तब का ११९वे सर्ग तक के १०६ अध्याय प्रक्षिप्त हो गए ? जिन अध्यायों में कौरव पांडवो की सैन्य बल, प्रमुख योद्धा ,युद्ध के नियम और सबसे महत्वपूर्ण भगवतगीता भी सम्मिलित है । महाभारत के भीष्म पर्व के १०दिन के युद्ध को सञ्जय पहले संक्षेप में सुनाकर फिर विस्तार से सुनाते हैं ऐसे ही रामायण के युद्धकाण्ड में ऋषियों ,वानरों और राक्षसों की विदाई संक्षेप में सुनाई फिर उत्तर काण्ड में विस्तार से वर्णन किया ,इसमें प्रक्षिप्त होना सङ्गत नहीं है ।
शङ्का -३.रामायण के युद्धकाण्ड के अंतिम सर्ग में फलश्रुति दी है जो ग्रन्थ के समाप्त होने का प्रमाण है ।
निवारण – फलश्रुति ग्रन्थ का समाप्त होने का प्रमाण नहीं । यदि फलश्रुति ही समाप्त होने का प्रमाण माने तब तो बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में भी फलश्रुति दी है तब क्या प्रथम सर्ग के अतिरिक्त सम्पूर्ण रामायण ही प्रक्षिप्त है ?
“पठन् द्विजो वागृषभत्वमीयात् स्यात् क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात् ।
वणिग्जन: पूण्यफलत्वमीयात् जनश्च शुद्रोऽपि महत्त्वमीयात् !!(बाल १/१००)
पर ये समझना क्या असङ्गत नहीं है ? गीता के १५वे अध्याय में भगवान् ने कहा है -मैंने यह गुह्यतम शास्त्र तुम्हारे लिए कहा है । इसको जानकर बुद्धिमान् पुरुष कृतकृत्य हो जाता है –
“इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत !”(गीता १५/२०)
अब क्या फलश्रुति के अनुसार यह मान लिया जाए की गीता १५ अध्याय की है और अंत के ३ अध्याय प्रक्षिप्त है ?
रामायण युद्ध काण्ड की फलश्रुति रावणवध जैसे महत्त्वपूर्ण काण्ड होने के कारण है जैसे के महाभारत के १०० पर्व में १८ पर्व महत्त्वपूर्ण होने से फलश्रुति दी गयीं हैं । इस लिए फलश्रुति के कारणउत्तर काण्ड को प्रक्षिप्त कहना सङ्गत नहीं ।
शङ्का ४. उत्तर काण्ड की शैली अन्य काण्डों की शैली है अलग है इस लिए प्रक्षिप्त है ।
निवारण -उत्तरकाण्ड की शैली अलग होना प्रक्षिप्त सिद्ध नही करती । चारो वेदों में  यजुर्वेद की शैली अलग है तो क्या यजुर्वेद को वेद नहीं माना जाए ?? उत्तरकाण्ड से भी अलग शैली सुंदर काण्ड की है तो क्या सुंदर काण्ड को प्रक्षिप्त माना जाए ? इस लिए शैली में अंतर होने से प्रक्षिप्त मानना सङ्गत नहीं ये तो संस्कृत साहित्य विशेषता है  ।
शङ्का -५.   उत्तर काण्ड में (रावण चरित्र के में) अशुद्ध श्लोक का बाहुल्य है इस कारण प्रक्षिप्त है ।
निवारण -ये तर्क बिल्कुल गलत है । जिसे अशुद्धियाँ कहते हैं वे आर्ष पाठ हैं ,अशुद्धियाँ नहीं हैं। अन्यथा रघुवंश ,माघ,किरातादि में बिल्कुल अशुद्धियाँ न होने से उन्हें वेदों से भी प्राचीन मानना पड़ेगा और वेदों में वैसी अशुद्धियाँ होने से उन्हें अत्यन्त अर्वाचीन (कालिदास के बाद का ) कहना होगा ,परन्तु यह सब वस्तुस्थिति के बिल्कुल विरुद्ध है । ये अशुद्धियाँ न होकर आर्ष पाठ हैं । ये तर्क सङ्गत ही नहीं है ।
शङ्का  ६.  युद्धकाण्ड की अपेक्षा उत्तर काण्ड में पाठ भेद कम है इस लिए उत्तर काण्ड अर्वाचीन है ।
निवारण -प्राचीन काल में कंठस्थ विद्याओं का ही सर्वाधिक महत्त्व होता था । वेदों के सम्बन्ध में आज भी वही परिपाटी प्रचलित है । दुर्गासप्तशती में भी ,जिनके बहुत ही अधिक अनुष्ठान आज भी गौड़,मैथिल एवं दक्षिण पाठ में प्रचलित हैं ,पाठ भेद उपलब्ध हैं ।
पाठ भेद में कमी होने से उत्तरकाण्ड की अर्वाचीनता मानना निष्प्रमाण है ।  वाल्मीकि रामायण की अपेक्षा रामचरित मानस अत्यंत ही अर्वाचीन ग्रन्थ है लेकिन पाठ भेद बहुत ज्यादा हैं इस लिए ये तर्क असङ्गत है ।
शङ्का ७. महाभारत आदि में उत्तर काण्ड नही है इस लिए प्रक्षिप्त है ।
निवारण – महाभारत में वर्णित रामोपाख्यान वाल्मीकि रामायण का संक्षिप्त रूप है विस्तृत रामायण नहीं , संक्षिप्त रामायण में कुछ अंश छूट जाना स्वभाविक है । यदि सम्पूर्ण वृत्तांत ही आजाए उसमे  तब फिर संक्षिप्त कहाँ रहा ?  महाभारत में प्रसङ्ग के अनुसार रामकथा दी गयी है इस लिए वहाँ सीता त्याग का प्रसङ्ग न होने से वर्णन नहीं है फिर भी रावण वंश और शम्बूक वध उत्तर काण्ड का वर्णन मिलता ही है इस लिए ये तर्क भी असङ्गत ही है ।
शङ्का – ८. प्रारम्भ में रामायण रामराज्य के बाद समाप्त होती थी इस लिए सुखान्त थी इसका अनेक रामायणों में सुखान्त अंत हुआ है ,उत्तर काण्ड प्रक्षिप्त होने से रामायण दुखांत बना दी ।
निवारण -ये शङ्का भी निर्मूल ही है । यद्यपि अनेकभक्तों ने भावानुसार ही भगवान् की कथा का अंत किया है तथापि समस्त रामायणों में सीता त्याग की कथा मिलती ही है ।
रहा प्रश्न सुखान्त रामायण का तो सुखान्त होना नाटक या उपन्यास में ही होता है वास्तव में वाल्मीकि रामायण ऐतिहासिक महाकाव्य है इसी लिए आदि कवि को घटनाक्रम का यथावत वर्णन करना वांछित है । जो घटना घटी उसका  वैसा ही वर्णन किया वाल्मीकि ने   ये तर्क भी सङ्गत नहीं  ।
शङ्का ९.  उत्तर काण्ड की वेदवती ही सीता है ये वर्णन अन्य काण्डों में उल्लेख नहीं इस लिए उत्तर काण्ड प्रक्षिप्त है ।
निवारण – ये तर्क भी युक्ति सङ्गत नहीं है । प्रसङ्गानुसार सीताजी के पूर्व जन्म का वर्णन न आना उत्तर काण्ड को प्रक्षिप्त सिद्ध करने में समर्थ नहीं है ।
स्वयं युद्ध काण्ड में रावण ने माँ सीताको वेदवती के रूप में पहचान लिया था और वेदवती के शाप का भी उल्लेख किया है –
“शप्तोऽहं वेदवत्या च यथा सा धर्षिता पुरा !”(युद्ध ०६०/१०)
शङ्का १०. १७ वी १८ वी सदी में उत्तर काण्ड जोड़ा गया था रामायण में ,पाश्चात्य विद्वान Frederika Richardson ने  अपने ग्रन्थ 
The Iliad of the east में ६ काण्डों रामायण की टीका की है इस लिए १७ वी सदी से पहले उत्तर काण्ड प्रचलित नहीं था  ।
निवारण – ये तर्क भी असङ्गत ही है ।ईसा पूर्व पहली सदी में विक्रमादित्य के नवरत्न महाकवि कालिदास ने रघुवंश में , सातवाहन वंश के राजा विक्रमादित्य के समकालीन ईसा पूर्व पहली सदी में हाल के राजकवि गुढाड्य  की बृहत्कथा में ,सोमदेव् कृत कथासरित्सागर में ,जैमिनि के अश्वमेध और भवभूति के उत्तरचरित में उत्तर काण्ड में बहुत भावपूर्ण वर्णन मिलता है ।
शङ्का ११. पुष्पक विमान को युद्ध काण्ड में ही श्रीराम ने कुबेर के पास भेज दिया था और उत्तर काण्ड में पुष्पक विमान अयोध्या में रहता है इस लिए प्रक्षिप्त है ।
निवारण – युद्ध काण्ड में श्रीराम ने पुष्पकको कुबेर केपास भेज दिया था किन्तु ये नहीं कहा है कि फिर कभी मत आना । उत्तरकाण्ड के ४१ वे सर्ग में पुष्पक को स्वयं कुबेर ने श्रीराम की सेवा में भेजा था ये कह कर रावण का वधकर के पुष्पक को जीता है और श्रीराम उसे स्वीकार करते हैं   ।
शङ्का १२. वाल्मीकि रामायण युद्ध काण्ड तक ही है क्योंकि उत्तर काण्ड में राम का चरित्र नही है इस लिए उत्तर काण्ड राम का अयन (श्रीराम का निवास )नहीं है ।
निवारण – यह कहना भी युक्ति सङ्गत नहीं कि ‘रामायण (राम -अयन अर्थात् राम का पर्यटन ) न रह कर वह पूर्ण रामचरित्ररूप में विकसित हुई ।’ अर्थात् उनकी दृष्टि में पहले राम का अयन ही रामायण थी । परन्तु उन्हें मालुम होना चाहिए कि राम का अयन अर्थात् निवासस्थान ही रामायण है । धात्वर्थ के अनुसार साङ्गोपाङ्ग सचरित्र तथा सोपाख्यान राम का ज्ञान और प्राप्ति जिससे हो अथवा जिसमें निहित है उसी को रामायण कहते हैं ।
इण् गतौ या अय् गतौ धातु से अयन शब्द बनता है । ज्ञान ,गमन,प्राप्ति सभी गति का अर्थ होता है ।
“रामस्य सोपाख्यानस्य सचरित्रस्य अयनं ज्ञानं प्राप्तिर्यस्माद् यस्मिन् वा तद्रामायणम् ।”
रामायण वास्तव् में रामचरित्र है ही नही । रामायण तो सीता चरित्र है अन्यथा  श्रीराम स्वचरित्र  सुनना क्यों चाहते ? श्रीराम रामायण इस लिए सुनना इस लिए पसन्द किया क्योकि रामायण में माँ सीताका पावन चरित्र है –
रामायण प्रारम्भ करते हुए श्रीलवकुश कहते हैं
“काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत् ।
पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरितव्रतः ।। (बाल०४/७)
अर्थात् महर्षि वाल्मीकि ने सीताके चरित्रसे युक्त सम्पूर्ण रामायण नामक महाकाव्यका ,जिसका दूसरा नाम पौलस्त्यवध अथवा रावणवध था अध्ययन कराया ।इस लिए ये शङ्का भी असङ्गत है ।
ये सब शङ्काएँ  निर्मूल और असङ्गत हैं उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त सिद्ध करने की ।अब यदि उत्तर काण्ड को रामायण से अलग कर दिया जाए तब अवश्य ही असङ्गती रहेगी , कैसे वो बताता हूँ –
उत्तरकाण्ड के न होने पर पहली असङ्गति सुंदरकाण्ड में रावण हनुमान् जी को देखकर उन्हें भगवान् नन्दी समझता है और नन्दी का शाप याद करता है , नन्दी के शाप को पुनः युद्धकाण्ड ६० सर्ग में उल्लेख करता है ,यदि उत्तरकाण्ड रामायण का अंग नहीं तब ये प्रसङ्ग अधूरा ही रह जाएगा । नन्दीने क्यों शाप दिया था रावण को ?
दूसरा कारण -युद्धकाण्ड में ब्रह्माजी का वरदान जिसमें मनुष्यों से भय का उल्लेख करता है , ये प्रसङ्ग उत्तरकाण्ड न होने से कैसे ज्ञात हो कि मनुष्यों से क्यों भय का वरदान दिया रावण को ?
तीसरा कारण -युद्धकाण्ड में रावण वेदवती के शाप को याद करके सीता के रूप में रावण को मारने के लिए वेदवती ही जन्म लेती हैं । यदि उत्तर काण्ड निकाल दिया जाए तब वेदवती कौन थी ? रावण को क्यों शाप दिया ?
चौथा कारण – किसी भी इतिहास के वक्ता अथ से इति तक सम्पूर्ण वृतान्त सुनाते हैं । ग्रन्थ का अथ (प्रारम्भ ) वक्ता ही करता है और ग्रन्थ का इति ( समापन ) भी वो ही वक्ता करता है ये आर्ष ग्रंथों का नियम है जैसे –
श्रीमद्भागवत के रचियता व्यासजी हैं और वक्ता श्रीशुकदेवजी हैं और श्रोता सार्वभौम सम्राट परीक्षित हैं ,श्रीमद्भागवत का अथ श्रीशुकदेवजी ने “वरीयानेषु ते प्रश्न:”०( भा०२/१/१)
से प्रारम्भ करते हैं और इति “एतत्रे कथितं तात”०(भा०१२/६/१३) श्लोक से भागवतजी का समापन करते हैं इसी प्रकार श्रीविष्णुपुराण का  महर्षि पाराशर अथ “साधुमैत्रेय धर्मज्ञ”०(विष्णु/१/१/१२) से करते हैं और इति “इति विविध मजस्य”०(विष्णु/६/८/११) से करते हैं । महाभारत के वक्ता वैशम्पायन हैं और श्रोता महाराज जनमेजय । वैशम्पायन  महाभारत का अथ “गुरवे प्राङ्नमस्कृत्यं “०(आदिपर्व०६१/११) से करते हैं और इति “यो गोशतं कनक”०(स्वर्गारोहन पर्व /५/६८) से करते हैं ।
वाल्मीकि रामायण में लवकुश
अथ “सर्वा पूर्वमियं ऐषामासीत् कृतस्ना वसुंधरा । (बाल०५/१) से प्रारम्भ करते हैं । किन्तु यदि उत्तरकाण्ड प्रक्षिप्त है तब रामायण का इति युद्धकाण्ड में लवकुश नहीं करते हैं यहां तक की युद्धकाण्ड में लवकुश श्रीराम दरवार में गान कर रहे हैं ये भी उल्लेख नहीं तब तो ये असङ्गत ही होगा । और उत्तरकाण्ड में ९५ वे सर्ग में लवकुश के रामायण गान द्वारा श्रीराम को ज्ञात होता है की लवकुश श्रीराम के ही पुत्र हैं और रामायण गान की इति होती हैं जो की युक्ति सङ्गत है ।
पांचवा कारण – बालकाण्ड में श्रीराम के दरवार में महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण का गान दो जुड़वां राजकुमार गान करते हैं ।
“कुशीलवौ तु धर्मज्ञौ राजपुत्रौ यशस्विनौ ।
भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ ।।(बाल०४/५)
उत्तर काण्ड प्रक्षिप्त है तो ये रामायण गान करने वाले दोनों राजकुमार कौन थे ? ये दोनों यमल भाई भी थे । और दोनों का रंग रूप ,नख -शिख तक श्रीराम जैसा था
“रूपलक्षणसम्पनौ मधुरस्वरभाषिणौ !
बिम्बादिवोत्थितौ बिम्बौ रामदेहात् तथापरौ ।। (बाल०४/११)
अर्थात् -सुंदर रूप और शुभ लक्षण उनकी सहज सम्पत्ति थे । वे दोनों भाई बड़े मधुर स्वर से वार्तालाप करते थे । जैसे बिम्ब से प्रतिबिम्ब प्रकट होते हैं ,उसी प्रकार श्रीरामके शरीर से उत्पन्न हुए वे दोनों राजकुमार दूसरे युगल श्रीराम ही प्रतीत होते थे ।
अब यदि उत्तर काण्ड प्रक्षिप्त है तब श्रीरामके पुत्र  लवकुश क्यों बाल्मीकि के आश्रम में रहते थे ? और क्यों रामायण का गान करते थे जबकि वे तो राजपुत्र थे । लवकुश का रामायण सुनाने के बाद क्या हुआ ? ये सब उत्तरकाण्ड के अभाव में असङ्गत ही रहेगा । उत्तर काण्ड के होने से सभी प्रसङ्ग स्वतः सङ्गत हो रहे हैं ।
इस प्रकार उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त मानना भारी भूल ही नहीं महान् अपराध भी है । वाल्मीकि रामायण के ग्रन्थ नहीं अपितु भगवान् श्रीसीताराम का वाङ्मय स्वरूप हैं वेदों का उपबृंहण है । करोड़ों हिन्दुओ की आस्था ,और विश्वास है । वाल्मीकिरामायण पवित्र ग्रन्थ रत्न है कृपया श्रीमद्वाल्मीकिरामायण के अङ्गभङ्ग करके दुष्प्रचार न करें । भगवान् श्रीसीताराम अन्वेषणकारियों को सद् बुद्धि प्रदान करें ।
                            
💞जय श्रीसीताराम 💞
सत्यमार्ग पर आइये सत्य जान जाइये

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