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व्रात्यदोष

#षोडश_संस्काराः_खंड_१३९_उपनयनम् (पतितसावित्रिक प्रायश्चित्तानि) #आषोडशाद्वर्षाद्_ब्राह्मणस्यानतीतः_कालो_भवति ||पा-गृ२/५/३६|| #आद्वाविंशाद्_राजन्यस्य||पा-गृ२/५/३७|| #आचतुर्विंशाद्_वैश्यस्य||पा-गृ२/५/३८|| ब्राह्मण बालक के उपनयन संस्कार की अवधि सोलह वर्ष तक ही है. क्षत्रिय कुमार के उपनयन की अवधि बाइस वर्ष की ही है और वैश्य कुमार के उपनयन की अन्तिम अवधि चौबीस वर्ष की ही है. पारस्करादि गृह्यसूत्रों के सिद्धांत की सम्पुष्टि मनुने भी की है---> #आषोडशाद्_ब्राह्मणस्य_सावित्री_नातिवर्तते | #आद्वाविंशेः_क्षत्रबन्धोः_आचतुर्विंशतेर्विशः ||मनु२|| अब गृह्यसूत्रों तथा वैदिक मत से- #अत_ऊर्ध्वं_पतितसावित्रीका_भवन्ति ||पा-गृ२/५/३९|| ऊपर कही गयी अवधि के बाद वे पतितसावित्री वाले हो जातें है. #नैनानुपनयेयुर्नाध्यापयेयुर्न_याजयेयुर्न_चैभिर्व्यवहरेयुः ||पा-गृ२/५/४०|| इन पतितसावित्री वालें कुमारों का कोई आचार्य ! #व्रात्यप्रायश्चित् के बिना  उपनयन-संस्कार न कराए, इन्हें वेदादि न पढाए, इनसे यज्ञादि न कराए और इन लोगों के साथ किसी तरह का व्यवहार न करे. (यहाँ गृह्यसूत्रकारों ने वेदाज्ञासे कहा है...

उपवास

#उपवास_व्रत ==#एक_नियम_संयम--!! नियमो का पालन करना ही व्रत की सिद्धि है!! अनेक वार जल पीने से ,पान खाने से,दिन में सोने से,ओर मैथुन करने से व्रत भंग हो जाता है। नोट--नमक आदि पदार्थ सर्वदा व्रत में त्याज्य है।।  जल,फल,मूल,दूध ,हविष्य(घी)ब्राह्मण की इच्छापूर्ति ,गुरु का वचन,तथा ओषध ----ये आठ व्रत के नाशक नही है!!  क्षमा,दया,सत्य,दान,शौच,इन्द्रिय संयम,देवपूजा,अग्निहोत्र,सन्तोष तथा चोरी न करना---ये दश नियम सम्पूर्ण व्रतों में आवश्यक माने गये है!! उपवास करनेवाले मनुष्य को कांसे का वर्तन,मसूर ,चना,कोदो,साग,मधु, पराया अन्न,तथा स्त्री संग का त्याग करना चाहिए।। ------व्रती को फूल,अलंकार,सुन्दर वस्त्र,सुगन्ध ,दातुन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए!! उपवास के दिन शरीर मे तेल लगाकर नहाना छोड़ दे! --क्योकि यह कुरूप बनानेवाला(सौंदर्य का विनाशक)है!! उपवास के दिन लकड़ी की दातुन नही करनी चाहिए-अन्यथा नरक की प्राप्ति होती है।। किसी भी प्रकार के प्लास्टिक से दन्ता धावन न करे!!  #अस्कृज़्जलपणाच्च_ताम्बूलस्य_च_भक्षणम्! #उपवासःप्रदुष्येत_दिवा_स्वप्नाच्च_मैथुनात्!! #अष्टौ_तान्य...

ब्राह्मण के बारे मे निराधार बाते

ब्राह्मणो के बारे में फैलाई गई निराधार बातें — 1) एक तरफ तो कई लोग कहते है कि ब्राह्मण इतना बङा जातिवादी है कि दुसरे के घर का पानी नही पीता और अगले ही पल वो कहते है कि ब्राह्मण हमारे घर की खीर खा जाता है आखिर ये दोनो बाते कैसे संभव है कि ब्राह्मण तुम्हारे घर का पानी भी नही पीता और खीर भी खा जाता है..?? 2)एक तरफ तो कहेगे कि ब्राह्मण भीख मांग कर खाने वाली जाति है और दुसरी तरफ कहते है कि ब्राह्मणो ने हमारा शोषण कर लिया….भला ये कैसे संभव है कि एक भीख मांगने वाला किसी का शोषण कर ले… ??? 3)एक तरफ तो ब्राह्मण को पांखङी कहते है और दुसरी तरफ कहते है कि सबसे ज्यादा वामपंथी भी इसी जाति मे है। 4)एक तरफ कहेगे कि ब्राह्मण कायर व डरपोक कौम है और दुसरी तरफ कहेगे कि इन्होने हमारा शोषण कर लिया आखिर एक कायर व डरपोक आदमी दुसरे का शोषण कैसे कर सकता है,, जब ब्राह्मण सबका शोषण कर रहा था बांकी स्वघोषित शक्तिशाली जाति के लोग आखिर अपना शोषण कैसे करवा रहे थे… ????? 5)एक तरफ कहेगे कि ब्राह्मणो ने हमे मंदिरो मे जाने नही दिया और दुसरी तरफ कहेगे कि ब्राह्मण मंदिर मे बुलाकर लुट लेता है…एक बात तय कर लो कि तुम्हे...

वामपंथ नारीवाद को जवाब

सभ्य और संस्कारित समाजमें स्वेच्छाचार कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता । लेकिन वामपंथी लेखिकाएँ शास्त्रों पर अपनी खीज उतारती हैं ,कि शास्त्रोंने स्त्रियों को स्वेच्छाचार से वञ्चित किया है ,पुरुषोंको सभी अधिकार हैं । अब ऐसी कुण्ठित मानसिकता वालों को बता दूँ ,पुरुषोंके लिये शास्त्रों चार आश्रमोंका विधान किया है ,ब्रह्मचर्य ,गृहस्थ ,वानप्रस्थ और संन्यास । इन सभी आश्रमोंका विधान ब्राह्मणोंके लिये अनिवार्य है । चारमें से तीन आश्रमोंमें अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालम आवश्यक है ही साथ ही गृहस्थ आश्रम में प्रवेश भी ब्रह्मचारीका ही है ,अब्रह्मचारीका नहीं और गृहस्थ पुरुष को परस्त्री गमन महापाप कहा गया है जिसका प्रायश्चित बड़ा कठोर है । (१) ब्रह्मचर्य आश्रम । जीवनके २५ वर्ष अखण्ड ब्रह्मचर्यके द्वारा वेदअध्ययन करना अनिवार्य हैं , ब्रह्मचारी न तो जूता पहन सकता है न छाता लगा सकता है , केवल पांच घरों से जितनी भिक्षा मिले उसे गुरुको समर्पित कर ब्रह्मचर्य जीवन का निर्वाह करे । गुरुके जागने से पहले जग जाए ,गुरुके सोनेके बाद ही सोये , गुरुके आदेश देने पर ही बैठे तब तक खड़ा ही रहे , भूमि पर शयन करे , ठंडे जल स...

देव उपासना में निषिद्ध वस्त्र

देव उपासना में निषिद्ध वस्त्र “( न स्यूते न दग्धेन पारक्येन विशेषतः | मूषिकोत्कीर्ण जीर्णेन कर्म कुर्याद्विचक्षणः ||महा भा०||)” सिले हुए वस्त्र से , जले हुए वस्त्र से, विशेषकर दूसरे के वस्त्र से, चूहे से कटे हुए वस्त्र से धर्मकार्य नहीं करना चाहिए. “(जीर्णं नीलं संधितं च पारक्यं मैथुने धृतम् | छिन्नाग्रमुपवस्त्रं च कुत्सितं धर्मतो विदुः ||आचारादर्शे नृसिंहपुराणवचन)” जीर्ण, नीला, सीला हुआ, दूसरे का, संभोगावस्था में पहना हुआ, जिसका तत्र भाग कटा हो एवं छोर रहित वस्त्र धर्मकी दृष्टि से धारण न करें, “(अहतं यन्त्र निर्मुक्तं वासः प्रोक्तं स्वयंभुवा | शस्तं तन् मांगलिक्येषु तावत् कालं न सर्वदा ||कश्यपः||)” यन्त्र(मील) से निकले हुए बने हुए वस्त्र को “अहत” वस्त्र माना हैं | वह यन्त्र से निकला हुआ कपड़ा विवाह आदि मांगलिक कार्य में उतने ही समय तक ठीक हैं, हमेशा के लिए नहीं. “( अन्यत्र यज्ञादौ तु इषद्धौतमिति | #न_च_यज्ञादिकमपि #मांगलिक्यमेवेत्याशंकनीयम् / विवाहोत्सवादेरैहिकसुखस्याभ्युदयस्य च मांगलिकत्वात् / यज्ञोदेस्तु #धर्मरूपादृष्टफलदत्वेन मांगलिकत्वाभावात् ” ||मदन पारि० शातातपः ||...

गायत्री मंत्र

गायत्रीसाधनाऔर_सिद्धि।। ।।१।। गायत्री प्रब्रह्म का मातृ स्वरूप है। समस्त पापों के शमन के लिए गायत्री जप अत्यंत महत्वपूर्ण है। गायत्री मंत्र में 3 विभाग हैं-- प्रणव,महाव्याहृति और मंत्र। इनको त्रिपदा भी कहा जाता है। यह जप करने वालों कि पाप से रक्षा करती हैं अतएव गायत्री कहलाती हैं। गायत्री को वेदों का सार कहा गया है--#सर्ववेदानांगायत्रीसारउच्यते। गायत्री के तीनों भाग तीन वेदों से संग्रहित किए गए हैं-- #त्रिभ्यएववेदेभ्यपादं_पादमुदाहृतम्। गायत्री की उपासना वैदिक उपासना है और यह समस्त देवताओं को प्रसन्न करने वाली और परब्रह्म की विशुद्ध उपासना है। इससे ज्ञात अज्ञात समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। वेदों का सार होने के कारण यह वेदों से भी श्रेष्ठ है।--#चतुर्वेदात्परागुर्वीगायत्रीमोक्षदास्मृता। 3 वर्णों के लिए गायत्री अमृत के समान है और ब्राह्मणों के लिए तो कामधेनु कहीं गई है। गायत्री जप के बिना ब्राह्मण ब्राह्मण कहलाने के लायक नहीं है। वेद का अध्ययन जो करता है लेकिन गायत्री को जो नहीं भजता वह ब्राह्मण भी यथार्थ ब्राह्मण नहीं है।-- #किं_वेदै: पठितै: सर्वै: सेतिहासपुराणकै:। सांगै: सावि...

स्पर्शास्पर्श विवेक

#अन्त्यजों_का_मन्दिर_प्रवेश_निषेध_क्यों-? सबसे पहले हम यह सोचें कि हिंदू ही मूर्तिपूजा क्यों करतें हैं, जब कि अन्य धर्मवाले मूर्तिपूजक नहीं हैं | हिंदुओं के मूर्तिपूजा करने का कारण यही हैं कि शास्त्रों ने यह बतलाया हैं कि मूर्तिपूजा से वे भगवत्कृपा के अधिकारी हो सकतें हैं | मुसल्मान मूर्तिपूजा नहीं करतें; क्योंकि कुरानने बतलाया हैं कि ऐसा नहीं करना चाहिये | हमें अपने शास्त्रोंपर विश्वास हैं, कुरानपर नहीं; इसलिये हमलोग मूर्तिपूजा करते हैं | यदि शास्त्रोंपर विश्वास न हो तो मूर्तिपूजा का कुछ अर्थ ही नहीं हैं | शास्त्रों के कोई वचन हमें यदि गलत मालूम होते हैं तो हमें यह मान लेना चाहिये कि हमने उन वचनों का वास्तविक अभिप्राय समझा ही नहीं | पर यदि हम यह समझ बैठें कि शास्त्रों के वचन ही गलत हैं और हम सही हैं तो यह कहना चाहिये कि शास्त्रोंपर हमें सच्चा विश्वास ही नहीं हैं | जो शास्त्र मूर्ति की पूजा करने को कहतें हैं,वे यह भी बतलातें हैं कि यह पूजा कैसे करनी चाहिये | पूजा के जो नियम हैं, उनमें एक नियम यह भी हैं कि किस प्रकार के लोगों को मन्दिरमें प्रवेश न करने देना चाहिये | यदि हम यह सोचें...

संन्यास

#संन्यास आश्रम_के_अधिकारी_अनाधिकारी तथा संन्यासियों_के_भेद_भ्रमोछेदन ◆◆◆👇👇👇 मित्रो!  हमारे सनातन धर्म में चार वर्ण है और चार ही आश्रम है। चार वर्णों हैं-  ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र और चार आश्रम है-  ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम । श्रेष्ठता की दृष्टि से कहीं-कहीं गृहस्थाश्रम को श्रेष्ठ माना गया और कहीं-कहीं सन्यास आश्रम को ।  इसमें हमारा मत यह है  जहां धर्म के दृष्टिकोण से देखा जाता है,  उस समय गृहस्थाश्रम को श्रेष्ठ माना जाता है  क्योंकि जीवन धारण करने के लिए गृहस्थ आश्रम पर  तीनों आश्रम ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम निर्भर रहते हैं  और जहां मोक्ष के दृष्टिकोण से देखा जाता है , वहां सन्यास आश्रम को श्रेष्ठ माना जाता है । यदि स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो श्रेष्ठता की दृष्टि से पहले दर्जे पर सन्यास आश्रम , दूसरे दर्जे पर वानप्रस्थ आश्रम , तीसरे दर्जे पर गृहस्थ आश्रम और चौथे दर्जे पर ब्रह्मचर्य आश्रम  माना जाता है ।  अब देखिए कि प्रत्येक वर्ण का कितने आश्रमों में अधिकार है!!  ब्राह्मण ...

श्राद्ध मृत्युभोज से ऊर्जा नष्ट होती है

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क्या मृत्युभोज से ऊर्जा नष्ट होती है । श्राद्धप्रक्रियाके निरूपणमें परिष्कृत एवं परिवर्धित संस्करण । कुछ शंकाओका समाधान कर रहा हूँ शङ्का – मृत्युभोज — से ऊर्जा नष्ट होती है महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखा है कि ….. मृत्युभोज खाने वाले की ऊर्जा नष्ट हो जाती है। जिस परिवार में मृत्यु जैसी विपदा आई हो उसके साथ इस संकट की घड़ी में जरूर खडे़ हों और तन, मन, धन से सहयोग करें लेकिन……बारहवीं या तेरहवीं पर मृतक भोज का पुरजोर बहिष्कार करें। महाभारत का युद्ध होने को था, अतः श्री कृष्ण ने दुर्योधन के घर जा कर युद्ध न करने के लिए संधि करने का आग्रह किया । दुर्योधन द्वारा आग्रह ठुकराए जाने पर श्री कृष्ण को कष्ट हुआ और वह चल पड़े, तो दुर्योधन द्वारा श्री कृष्ण से भोजन करने के आग्रह पर कृष्ण ने कहा कि ’’सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुनैः’’ अर्थात् “जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो, खाने वाले का मन प्रसन्न हो, तभी भोजन करना चाहिए। लेकिन जब खिलाने वाले एवं खाने वालों के दिल में दर्द हो, वेदना हो, तो ऐसी स्थिति में कदापि भोजन नहीं करना चाहिए।” वैदिक धर्म में मुख्य 1...