वामपंथ नारीवाद को जवाब

सभ्य और संस्कारित समाजमें स्वेच्छाचार कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता । लेकिन वामपंथी लेखिकाएँ शास्त्रों पर अपनी खीज उतारती हैं ,कि शास्त्रोंने स्त्रियों को स्वेच्छाचार से वञ्चित किया है ,पुरुषोंको सभी अधिकार हैं । अब ऐसी कुण्ठित मानसिकता वालों को बता दूँ ,पुरुषोंके लिये शास्त्रों चार आश्रमोंका विधान किया है ,ब्रह्मचर्य ,गृहस्थ ,वानप्रस्थ और संन्यास । इन सभी आश्रमोंका विधान ब्राह्मणोंके लिये अनिवार्य है । चारमें से तीन आश्रमोंमें अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालम आवश्यक है ही साथ ही गृहस्थ आश्रम में प्रवेश भी ब्रह्मचारीका ही है ,अब्रह्मचारीका नहीं और गृहस्थ पुरुष को परस्त्री गमन महापाप कहा गया है जिसका प्रायश्चित बड़ा कठोर है ।
(१) ब्रह्मचर्य आश्रम । जीवनके २५ वर्ष अखण्ड ब्रह्मचर्यके द्वारा वेदअध्ययन करना अनिवार्य हैं , ब्रह्मचारी न तो जूता पहन सकता है न छाता लगा सकता है , केवल पांच घरों से जितनी भिक्षा मिले उसे गुरुको समर्पित कर ब्रह्मचर्य जीवन का निर्वाह करे । गुरुके जागने से पहले जग जाए ,गुरुके सोनेके बाद ही सोये , गुरुके आदेश देने पर ही बैठे तब तक खड़ा ही रहे , भूमि पर शयन करे , ठंडे जल से स्नान करे ,नित्य सन्ध्या-गायत्री करता हुआ गुरुकी सेवा में लीन रहे । वेदअध्ययन पूर्ण होने यदि इच्छा होतो समावर्तन संस्कारके बाद गृहस्थ आश्रममें प्रवेश करे ।
(२) गृहस्थ आश्रम में नियमित यज्ञ-अग्निहोत्र-देव-अतिथि का पूजन करता हुआ , देवऋण-पितृऋणसे मुक्त होनेका उद्योग करे । ब्राह्मणों के लिये गृहस्थ धर्म में दान लेने का तो अधिकार तो है पर न तो माँगने का न परिग्रह करनेका । जीवन निर्वहन करना कठिन हो जाए तो शिलोच्छवृत्ति को अपनाए पर कभी किसी की दासिता स्वीकार न करे । गृहस्थ ब्राह्मण को सदैव तितिक्षु ,अपरिग्रही और तपस्वी होना चाहिये । केवल पितृऋणसे उऋण होने के लिये ही स्त्रीसङ्ग करे , सदैव जितेंद्रिय रहकर वेदाध्ययन करता रहे और कराता रहे , कभी प्रमाद न करे ।
(३) गृहस्थ धर्म पालन करके ५१ वे वर्ष में वानप्रस्थ हो जाए , मृगचर्म और वल्कल ही धारण करे , भूमि पर ही शयन करे ,किसी ग्राम में न रुके । फलमूलादिका ही भोजन करे अथवा ५ घरों से जब सब भोजन कर चुके हों तब शायं काल में भिक्षा माँगकर २४ घण्टे में १ बार भोजन करे , उतनी ही भिक्षा में अन्न संग्रह करे कि कल के लिये न बचे और न कभी कल की चिंता करे , नित्य अग्निहोत्र करे ,कृच्छ्-चन्द्रायण आदि व्रतोका और गर्मियोंमें पञ्चाग्निका सेवन ,शीतमें गीले वस्त्रोंमें और वर्षा ऋतु में खुले में रहकर तप करे ,कभी मरने की कामना न करे और सदैव ‘ॐ’ का चिंतन करता रहे ।
(४) वानप्रस्थ आश्रम के बाद ७५ वर्ष की आयु में संन्यास ले ले अथवा वैराग्य होने पर ब्रह्मचर्य आश्रम से ही संन्यास ले ले ,अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालन करता हुआ अरण्य में अथवा नगरके बाहर किसी मन्दिर में निवास करे और एक जगह कभी न रुके निरन्तर चलता रहे ,जहाँ शाम हो वहीं भूमि पर शयन करे । २ कोपीन ,१ कंथा ,१ कमण्डल और दण्ड को छोड़कर शेष सभी वस्तुओं को त्याग दे । निरंतर ‘तद्विष्णु परमं पदम् ‘ श्रुतिका गान करता हुआ एक भुक्त केवल ८ ग्रास भोजन करे । जब जर्जर देह से संन्यास धर्म के नियम पालन करने में असमर्थ हो जाए ,तो योगमार्ग से अथवा अग्निसमाधि से ब्रह्मलीन हो जाए ।
ब्रह्मचर्यके नियम
“ब्रह्मचर्य सदा रक्षेदष्टधा मैथुनं पृथक् ।
स्मरणं कीर्तनं केलि: प्रेक्षणं गुह्यभाषणम् ।।
संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिष्पत्तिरेव च ।
एतन्मैथुनमष्टाङ्गं प्रवदत्ति मनीषिणः ।
विपरीतं ब्रह्मचर्यमेतदेवाष्ट लक्षणम् ।।(दक्षस्मृति ७/३१-३३)
अष्टविधि ब्रह्मचर्य पालन में निम्न आठ कार्यों का त्याग करना चाहिये ।
(१) स्त्रियोंका काम भाव से स्मरण ।
(२) स्त्रियोंके अङ्ग-प्रत्यङ्ग तथा सौन्दर्यका वर्णन करना ।
(३) स्त्रियोंके साथ काम भावपूर्वक हास्य-विनोद करना ।
(४) स्त्रियोंका काम भावसे दर्शन करना ।
(५) स्त्रियोंके साथ एकान्त में कामबुद्धि से सम्भाषण करना ।
(६) कामासक्त होकर स्त्रियोंकी प्रीति की अभिलाषा करना ।
(७) स्त्रियोंके साथ कामासक्त होकर रमण की इच्छा करना ।
(८) स्त्रियों से प्रत्यक्ष समागम करना । इन अष्टमैथुनके त्याग से ही अखण्ड ब्रह्मचर्यकी रक्षा होती है ।
इन संन्यास आदि चारों कठिन आश्रमोंका विधान केवल ब्राह्मणोंके लिये हैं ,क्षत्रियके लिये वानप्रस्थ आदि तीन आश्रमोंका विधान है , वैश्य-शूद्रके लिये ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रमका ही विधान है । स्त्रीके लिये किसी भी कठिन आश्रमका विधान नहीं केवल गृहस्थ आश्रम ही विहित है । गृहस्थाश्रम से पूर्व घर में ही ब्रह्मचारिणी रहकर अध्ययन करने का नियम है ,कहीं जंगलों में रहकर भिक्षा मांगके तपोमय जीवनका नियम नहीं है । फिर भी वामपंथी लेखिकाएँ ये कहती हैं ,कि शास्त्रोमें स्त्रीको स्वतंत्रता नहीं सदैव अधीन ही रखा है । वानप्रस्थ और संन्यास जैसे कठोर आश्रम का विधान करने वाले ब्राह्मणों की स्वतन्त्रताकी बात क्यों नहीं करते ,वे तो युगों युगों से आश्रमों में बंधे हुए हैं , स्वतंत्रत नहीं हैं , और धर्मनिष्ठ ब्राह्मण* को मृत्यु स्वीकार हैं लेकिन ऐसी स्वतंत्रता स्वीकार नहीं जिसमें वैदिक धर्म और ब्राह्मण धर्म का लोप हो । ऐसे ब्राह्मणों को मिटाकर राष्ट्र का कौन सा हित होगा ?
।। जय श्री राम ।।

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