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भगवान आध शंकराचार्य

भगवान आध शंकराचार्य का शास्त्रीय स्वरुप एवं उनका भारत के धार्मिक आध्यात्मिक एकत्व मे‌ योगदान जगतगुरु भगवान आध शंकराचार्य सनातन हिंदू धर्म के सार्वभौम धर्मगुरु है। पुराणो से ईस विषय मे कुछ शास्त्रीय प्रमाण यहां प्रस्तुत है। कल्यब्दे द्विसहस्त्रान्ते लोकानुग्रहकाम्यया। चतुर्भि: सह शिष्यैस्तु शंकरोऽवतरिष्यति। । ( भविष्योत्तर पुराण ३६ ) अर्थ :- " कलि के दो सहस्त्र वर्ष व्यतीत होने के पश्चात लोक अनुग्रह की कामना से श्री सर्वेश्वर शिव अपने चार शिष्यों के साथ अवतार धारण कर अवतरित होते हैं। " निन्दन्ति वेदविद्यांच द्विजा: कर्माणि वै कलौ। कलौ देवो महादेव: शंकरो नीललोहित:। । प्रकाशते प्रतिष्ठार्थं धर्मस्य विकृताकृति:। ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनापि शंकरम्। । कलिदोषान्विनिर्जित्य प्रयान्ति परमं पदम्। (लिंगपुराण ४०. २०-२१.१/२) अर्थ:- " कलि में ब्राह्मण वेदविद्या और वैदिक कर्मों की जब निन्दा करने लगते हैं ; रुद्र संज्ञक विकटरुप नीललोहित महादेव धर्म की प्रतिष्ठा के लिये अवतीर्ण होते हैं। जो ब्राह्मणादि जिस किसी उपाय से उनका आस्था सहित अनुसरण सेवन करते हैं ; वे परमगत...

क्या हनुमान वानर नही थे ???

वामपंथी आर्य समाज द्धारा फैलाया गया झूठ *हनुमान जी सुग्रीव बाली आदि पुंछ वाले कपि(बंदर) नही थे* *उसका खंडन* सभी सनातनी तक यह बात फैलावे अपने बच्चो सत्य समजावे। अंग्रजो का गुप्त षडयंत्र वामपंथी आर्य समाज प्रारम्भ से ही अपनी मनमानी और कुत्सित मानसिकता का परिचय देता रहा है। *जो बातें इनके मत को पुष्ट करती हैं, मात्र उन्हें ही प्रामाणिक मानते हैं और शेष जो बातें इनके मस्तिष्क की क्षमता के बाहर होती हैं, उन्हें ये मिलावटी कहते हैं।* दयानन्द सरस्वती से पूर्व इस देश में ग्रंथों के *प्रक्षिप्त होने या अप्रामाणिक* होने का कोई प्रसङ्ग नहीं दिखता है। *इसीलिए जर्मन, रूसियों एवं अंग्रेजों ने थियिसोफिकल सोसाइटी के माध्यम से आर्य समाज की स्थापना और विस्तार करवा कर इस नए भ्रम को प्रोत्साहित किया।* अंग्रेज़ों का षड्यंत्र था की भारत अपने धर्म शास्त्र अौर परंपरा गत धर्मगुरु शंकराचार्यो वैष्णवाचार्यो से दुर हो।ईसलिए शास्त्र मे मिलावट है ऐसा झुठ फैलाने गुप्तरुप से यह संस्था की स्थापना  करवायी अौर हमारी‌ सनातन गुरकुल शिक्षा नष्ट करवायी। उस समय के तात्कालिक विद्वानों ने बिना किसी विशेष पर...