भगवान आध शंकराचार्य

भगवान आध शंकराचार्य का शास्त्रीय स्वरुप एवं उनका भारत के धार्मिक आध्यात्मिक एकत्व मे‌ योगदान

जगतगुरु भगवान आध शंकराचार्य सनातन हिंदू धर्म के सार्वभौम धर्मगुरु है।

पुराणो से ईस विषय मे कुछ शास्त्रीय प्रमाण यहां प्रस्तुत है।

कल्यब्दे द्विसहस्त्रान्ते लोकानुग्रहकाम्यया।
चतुर्भि: सह शिष्यैस्तु शंकरोऽवतरिष्यति। । ( भविष्योत्तर पुराण ३६ )
अर्थ :- " कलि के दो सहस्त्र वर्ष व्यतीत होने के पश्चात लोक अनुग्रह की कामना से श्री सर्वेश्वर शिव अपने चार शिष्यों के साथ अवतार धारण कर अवतरित होते हैं। "

निन्दन्ति वेदविद्यांच द्विजा: कर्माणि वै कलौ।
कलौ देवो महादेव: शंकरो नीललोहित:। ।
प्रकाशते प्रतिष्ठार्थं धर्मस्य विकृताकृति:।
ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनापि शंकरम्। ।
कलिदोषान्विनिर्जित्य प्रयान्ति परमं पदम्। (लिंगपुराण ४०. २०-२१.१/२)
अर्थ:- " कलि में ब्राह्मण वेदविद्या और वैदिक कर्मों की जब निन्दा करने लगते हैं ; रुद्र संज्ञक विकटरुप नीललोहित महादेव धर्म की प्रतिष्ठा के लिये अवतीर्ण होते हैं। जो ब्राह्मणादि जिस किसी उपाय से उनका आस्था सहित अनुसरण सेवन करते हैं ; वे परमगति को प्राप्त होते हैं। "

कलौ रुद्रो महादेवो लोकानामीश्वर: पर:।
न देवता भवेन्नृणां देवतानांच दैवतम्। ।
करिष्यत्यवताराणि शंकरो नीललोहित:।
श्रौतस्मार्त्तप्रतिष्ठार्थं भक्तानां हितकाम्यया। ।
उपदेक्ष्यति तज्ज्ञानं शिष्याणां ब्रह्मासंज्ञितम।
सर्ववेदान्तसार हि धर्मान वेदनदिर्शितान। ।
ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनोपचारत:।
विजित्य कलिजान दोषान यान्ति ते परमं पदम। । ( कूर्मपुराण १.२८.३२-३४)
अर्थ:- " कलि में देवों के देव महादेव लोकों के परमेश्वर रुद्र शिव मनुष्यों के उद्धार के लिये उन भक्तों की हित की कामना से श्रौत-स्मार्त -प्रतिपादित धर्म की प्रतिष्ठा के लिये विविध अवतारों को ग्रहण करेंगें। वे शिष्यों को वेदप्रतिपादित सर्ववेदान्तसार ब्रह्मज्ञानरुप मोक्ष धर्मों का उपदेश करेंगें। जो ब्राह्मण जिस किसी भी प्रकार उनक‍ा सेवन करते हैं ; वे कलिप्रभव दोषों को जीतकर परमपद को प्राप्त करते हैं। "
व्याकुर्वन् व्याससूत्रार्थं श्रुतेरर्थं यथोचिवान्।
श्रुतेर्न्याय: स एवार्थ: शंकर: सवितानन:। । ( शिवपुराण-रुद्रखण्ड ७.१)
अर्थ:- "सूर्यसदृश प्रतापी श्री शिवावतार आचार्य शंकर श्री बादरायण - वेदव्यासविरचित ब्रह्मसूत्रों पर श्रुतिसम्मत युक्तियुक्त भाष्य संरचना करते हैं। "

यह हुआ उनका शास्त्रीय स्वरुप जिससे वो भगवान सिद्ध है।

अब प्रश्न आता है कि अवतार होने के बाद भगवान शंकराचार्य ने क्या किया जिससे इन्हें संसार का गुरु(जगत् गुरु) माना जाए तो इसका उत्तर कुछ इस प्रकार है की 2527 वर्ष पहले भारत मे प्रमुख रूप से बौद्धों और जैनों के अलावा चार्वाक कापालिक तंत्र आदि सहित 72 ऐसे मत पंथ थे जो मूल सनातन धर्म शास्त्रो से अलग मनमाना सिद्धान्त बनाकर लोगो को भटका रहे थे।
भगवान शंकराचार्य ने 32 वर्ष की आयु तक पूरे भारत मे कई बार चक्कर लगा कर जितने भी पंथ मत थे सबके साथ शास्त्रार्थ किया और इस प्रकार शास्त्रार्थ से वो भारतवर्ष जो की सनातन धर्म की राजधानी है उसको जीत लिया। इस संसार मे सब शंकराचार्य के शिष्य हो गए कोई ऐसा नही बचा जो शंकराचार्य के सिद्धान्तो को गलत ठहरा सके क्योंकि शंकराचार्य के सिद्धान्त ही वस्तुतः मूल वैदिक सनातन धर्म सिद्धान्त है, इस प्रकार शंकराचार्य जगतगुरु बने
शंकराचार्य के सिद्धान्तो के अन्तर्गत निर्गुण निराकार भी है और सगुण साकार भी है, शैव भी है वैष्णव भी हैं शाक्त भी है और गाणपत्य तथा सौर आदि सभी आ जाते है। अर्थात शंकराचार्य के सिद्धान्तो में सबका समावेश है।
अगर देखे तो शंकराचार्य स्वयं वैष्णवाचार्य भी हैं, इन्हें षण्मत्प्रतिस्थापिकाचार्य भी कहा जाता है। जिनमे पांचों सम्प्रदाय सहित निर्गुण निराकार भी शामिल है। इन्होंने सभी 6 मतों को सत्य माना और स्थापित किया।
ईतना ही नही भगवान शंकराचार्य ने सभी ६ दर्शन का सन्मान कर सनातन धर्म मे ही समाहित कर लिया।
इस प्रकार शंकराचार्य ने सनातन धर्म मे एकत्व स्थापित किया।

भगवान शंकराचार्य जब चार पीठो की रचना की तो उन्होंने उन चार पीठो के लिए "मठाम्नाय महानुशासनम्" लिखा।उसकी हस्तप्रत आज भी मठो मे सुरक्षित है।
मठाम्नाय महानुशासनम् मे‌ भगवान शंकराचार्य की आज्ञा है...

कृते विश्वगुरुर्ब्रह्मा त्रेतायामृषिसत्तम: ।
द्वापरे व्यास एव स्यात् कलावत्र भवाम्यहम् ।।
अर्थात
सतयुग में ब्रह्मा, त्रेता में मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ, द्वापर मे वेदव्यास तथा कलयुग मैं (शंकराचार्य) जगद्गुरु हूँ।

अस्मतपीठसमारुढ: परिव्राडुक्तलक्षण: ।
अहमेवेति विज्ञेयो 'यस्य देव' इतिश्रुते: ।।
अर्थात
मेरे द्वारा बताए गए लक्षणों से सम्पन्न सन्यासी मेरे पीठ पर आसीन हो तो उसे मैं (शङ्कर) ही हूँ (इस प्रकार मेरा ही स्वरूप )समझना चाहिए, क्योंकि इस सम्बन्ध में "यस्य देव" श्रुति प्रमाण है।

महाराज सुधन्वा युधिष्ठिर के वंशज थे और उनके परम्परा से महिष्मति के चक्रवर्ती सम्राट थे, जब शंकराचार्य ने सारा जगत जीत लिया सारे संसार मे शंकराचार्य को शास्त्रार्थ की चुनौती देने वाला कोई नही बचा तब महाराज सुधन्वा ने आधिकारिक शासनादेश विज्ञप्ति जारी कर शंकराचार्य को जगतगुरु घोषित किया जो आज भी मठ मे सुलभ है।उसमे समग्र भारत वर्ष के शासको के शासक के रुप मे शंकराचार्य को उद् घोषित किया है।

भगवान आदि शंकराचार्य का जब आविर्भाव (ई.सा के ५०७ वर्ष पुर्व) हुआ उस समय विश्व मे न मुस्लिम थे न ईसाई न पारसी आदि थे।
अंग्रेजो को यह असह्य लगा।ईसलिए उन्होने छलबल कुटनीति का प्रयोग कर ईसा हे बाद मे हमारे भगवान अादि शंकराचार्य का जन्म खयापित कर दिया।



आज धरती पर जो भी भू-भाग है, वो उस समय सनातन संस्कृति से आच्छादित हो चुका था।

पूरे विश्व की राजधानी भारत को स्थापित करते हुए, आदि शंकराचार्य ने चारधाम पीठों की स्थापना की।

उन्होंने भले ही भारत के चार कोनों में शंकराचार्य पीठों की स्थापना की हो, लेकिन सनातन धर्म के शासन का क्षेत्र पूरे विश्व को ही माना।

बौद्ध सम्राट सुधन्वा जो कि युधिष्ठिर की वंश परंपरा के थे, बौद्ध पंडितों और भिक्षुकों के संपर्क में आकर वे बौद्ध सम्राट के रुप में ख्याति प्राप्त होकर वे शासन कर रहे थे। सनातन वैदिक आर्य हिंदु धर्म का दमन कर रहे थे।

तब आदि शंकराचार्य ने उनके हृदय को शुद्ध किया और सार्वभौमिक सनातन हिंदु धर्म मूर्ति के रूप में उन्हें फिर प्रतिष्ठित किया।

उन्हें पथभ्रष्ट होने और अन्य राजाओं पर भी शासन करने के लिए आदि शंकराचार्य ने चार दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में चार धाम पीठों की स्थापना की।

 इसमें से पूर्व और पश्चिम की जो पीठें हैं वे समुद्र के तट पर हैं।

भौगोलिक दृष्टि से भगवान शंकराचार्य ने बद्रीनाथ में ज्योतिर्मठ की स्थापना की, जो पर्वत माला के बीच में है। रामेश्वर के श्रंगेरी क्षेत्र जो इस समय कर्नाटक में है, वहां उन्होंने मठ की स्थापना की।

उत्तर-दक्षिण के मठ पर्वत माला के बीच हैं और पूर्व-पश्चिम के मठ समुद्र किनारे।

 चारों वेद और छह प्रकार के शास्त्र या कह सकते हैं 32 प्रकार की विद्याओं के प्रभेद और 32 कलाओं के प्रभेद, सबके सब सुरक्षित रहें, इसलिए एक-एक वेद से संबद्ध करके एक-एक शंकराचार्य पीठ की स्थापना की।

जैसे ऋग्वेद से गोवर्धन पुरी मठ (जगन्नाथ पुरी), यजुर्वेद से श्रंगेरी (रामेश्वरम्), सामवेद से शारदा मठ (द्वारिका) और अथर्ववेद से संबध्द ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) है।

 ब्रह्मा के चार मुख हैं, पूर्व के मुख से ऋग्वेद. दक्षिण से यजुर्वेद की, पश्चिम से सामवेद और उत्तर से अथर्ववेद की उत्पत्ति हुई है। इसी आधार पर शंकराचार्य ने चार पीठों की स्थापना की और उनको चार वेदों से जोड़ा है।

संन्यासी अखाड़े और परंपरा तो भारत में पहले भी थी, लेकिन आदि शंकराचार्य ने इन दशनामी संन्यासी अखाड़ों को भौगोलिक आधार पर विभाजित किया। दशनामी अखाड़े जिनमें सन्यासियों के नाम के पीछे लगने वाले शब्द से उनकी पहचान होती है।
वन, अरण्य, पुरी, भारती, सरस्वती, गिरि, पर्वत, तीर्थ, सागर और आश्रम, ये दशनामी अखाड़ों के संन्यासियों के दस प्रकार हैं। आदि शंकराचार्य ने इनके नाम के मुताबिक ही इन्हें अलग-अलग दायित्व सौंपे।

जैसे, वन और अरण्य नाम के संन्यासियों को, जो पुरी पीठ से संबद्ध है, इन्हें आदि शंकराचार्य ने ये दायित्व दिया कि हमारे वन (बड़े जंगल) और अरण्य (छोटे जंगल) सुरक्षित रहें, वनवासी भी सुरक्षित रहें, इनमें विधर्मियों की दाल ना गले।

पुरी, भारती और सरस्वती ये श्रंगेरी मठ से जुड़े हैं, सरस्वती सन्यासियों का दायित्व है हमारे प्राचीन उच्च कोटि के शिक्षा केंद्र, अध्ययन केंद्र सुरक्षित रहें, इनमें अध्यात्म और धर्म की शिक्षा होती रहे। भारती सन्यासियों का दायित्व ये है कि मध्यम कोटि के शिक्षा केंद्र सुरक्षित रहें, यहां विधर्मियों का आतंक ना हो।

 पुरी सन्यासियों का दायित्व तय किया कि हमारी प्राचीन आठ पुरियों जैसे अयोध्या, मथुरा और जगन्नाथपुरी आदि सुरक्षित रहें। तीर्थ और आश्रम नाम के संन्यासी जो द्वारिका मठ से सम्बद्ध हैं, तीर्थ सन्यासियों का दायित्व तीर्थों को सुरक्षित रखना और आश्रम सन्यासियों का काम हमारे प्राचीन आश्रमों की रक्षा करना था।

कुछ सालों पहले समुद्र के रास्ते से कुछ आतंकियों ने भारत वर्ष में घुसकर आतंक मचाया था।

 ये आदि शंकराचार्य की दूरदर्शिता ही थी कि उन्होंने ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) से सम्बद्ध सागर सन्यासियों को समुद्र सीमाओं की रक्षा का दायित्व दिया था।

 सेतु समुद्रम के कारण हमें ईंधन प्राप्त हो रहा है, इसी से समुद्र का संतुलन है, राम सेतु के टूटने से रामेश्वर का ज्योतिर्लिंग भी डूब जाएगा।

यूपीए सरकार के समय इसे तोड़ने के प्रस्ताव भी बन रहे थे। संतों ने आगे आकर इसे रोका।

आदि शंकराचार्य की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने सैंकड़ों साल पहले ही सागर नाम के संन्यासियों को समुद्र की रक्षा के लिए तैनात कर दिया था। गिरि और पर्वत नाम के सन्यासियों को पहाड़, वहां के निवासी, औषधि, प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए नियुक्त किया। ये भी ज्योतिर्मठ से संबद्ध हैं।

इस तरह दस तरह के संन्यासियों को उनके दायित्व सौंप दिए। अगर ये दशनामी संन्यासी अपने दायित्यों को ठीक से समझते और चारों शंकराचार्य इनका ठीक से नेतृत्व करते तो आज भारत की ये दुर्दशा नहीं होती।

धर्मराज्य की पुनर्स्थापना और सम्राट सुधन्वा की स्थापना के बाद आदि शंकराचार्य ने भारतीय सनातन ग्रंथों को क्रमबद्ध किया।
बौद्ध धर्म में जिन ग्रंथों को दूषित कर दिया गया था, उन सबको फिर से अपनी व्याख्याओं से शुद्ध किया। ब्रह्मसूत्र आदि की व्याख्या से सूत्र विज्ञान को विकसित किया।

आज शंकराचार्य के प्रागट्य दिन पर हम आप सब को आदि शंकराचार्य की गुरु परंपरा से जुडने के लिए आवाह्न करते है।


आचार्य कुमारिल भट्ट अौर भगवान आध शंकराचार्य

भारतीय वैदिक इतिहास में कुमारिल भट्ट तथा शंकराचार्य जी दोनों ही वेदों के परमोद्धारक हुए।

कुमारिल ने कर्मकांड पर किये जाने वाले आक्षेपों का मुंहतोड़ उत्तर तथा भगवान् शंकर ने ज्ञानकाण्ड के आक्षेपों का समाधान किया।

कुमारिल की जन्मभूमि के सम्बंध में विद्वानों में मतभेद पाया जाता है।
तिब्बती विद्वान तारानाथ जी ने इन्हें बौद्ध पण्डित धर्मकीर्ति का चाचा बताया है।

कुछलोग कहते है इनका जन्म दक्षिण भारत के "त्रिमलयक" नामक स्थान में हुआ, किन्तु इसमें संदेह है।

आनंद गिरी जी ने अपने दिग्विजय में इनका जन्म उद्ग्देश (उत्तर भारत) में बताया है ।
उद्ग्देश कश्मीर या पंजाब हो सकता है।

पूर्व मीमांसक सालिकनाथ ने इन्हें वार्तिककार भिक्षु कहा है, यह उपाधि उत्तर भारतीय ब्राह्मणों में ही पायी जाती है।
सालिकनाथ कुमारिल से ३०० वर्ष बाद पैदा हुए।

मिथिला के लोग इन्हें मैथिल ब्राह्मण कहते हैं।

कुमारिल धनाढ्यतम गृहस्थ थे। पांच सौ दास तथा दासियां थीं। चूड़ामणि देश के राजा के कुलगुरु थे।

बौद्ध दर्शन के विद्वान धर्मकीर्ति के साथ शास्त्रार्थ तथा उनके हारने की बात आती है।
धर्मकीर्ति त्रिमलय के निवासी थे, यह कुमारिल के पास वेदाध्ययन करने गये किन्तु बौद्घ समझकर इनको नहीं पढ़ाया।

तब ये दास के रूप में उनके घर में रहने लगे। वे इनकी परम् श्रद्धा से इतनी सेवा करने लगे कि पचास आदमी मिलकर भी इतनी सेवा नहीं कर सकते थे।

कुमारिल इनकी सेवा से इतने प्रभावित हुए कि इनको ब्राह्मण विद्यार्थियों के साथ दर्शन शास्त्र सुनने की आज्ञा मिली।

इन्होंने वैदिक दर्शनों के रहस्यों को अतिशीघ्र जान लिया।
तब वह अपने वास्तविक रूप में आये और ब्राह्मणों को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा। इन्होंने अनेकों दार्शनिकों को परास्त किया।

तब कुमारिल से शास्त्रार्थ किया, कुमारिल भट्ट भी परास्त हो गये।

इससे क्षुब्ध होकर कुमारिल ने बौद्धों को परास्त करने के उद्दयेश्य से बौद्ध भिक्षु का रूप धारण किया तथा बौद्ध सिद्धांतो का खंडन करने के लिए बौद्ध बनकर उनके शास्त्रों का अध्ययन करने लगे।

श्री शंकराचार्य जी से भी कुमारिल ने कहा था ---- " मैं बौद्घ धर्म की धज्जियां उड़ाना चाहता हूं इसीलिए बौद्घ भिक्षु हुआ।"

उस समय धर्मपाल नामक बौद्घ भिक्षु की कीर्ति चारों ओर फैली हुई थी, वे बौद्घ धर्म के नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्यक्ष थे।

क्षणिकविज्ञानवादी होने पर भी उन्होंने योगाचार्य तथा शून्यवाद के मौलिक ग्रन्थों पर पांडित्यपूर्ण टिकाएं लिखी है।
अतः कुमारिल ने धर्मपाल से ही बौद्ध दर्शनों का अध्ययन किया।

एक दिन धर्मपाल ने शिष्यों के प्रति बौद्ध सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए वेदों की घोर निंदा की।

इस निंदा को सुनकर बौद्ध भिक्षु के रूप में बैठे हुए कट्टर वैदिक धर्मावलम्बी कुमारिल के नेत्रों से अश्रुपात होने लगा।

निकट बैठे हुए भिक्षुओं ने देखा और धर्मपाल को बताया।

धर्मपाल एक बौद्ध भिक्षु को वेदों की निंदा सुनकर आँसू बहाते देखकर आश्चर्य में पड़ गए, तथा पूछा--- "तुम क्यों रोते हो?, क्या वेदनिन्दा सुनकर रोते हो ?"

कुमारिल ने कहा---- "हाँ, यही कारण है। आप वेदों के रहस्यों को बिना जाने ही मनमानी निंदा करते हो।"

इस घटना से कुमारिल का सच्चा रूप प्रगट हुआ। धर्मपाल रुष्ट हुए, इनको हटाने के लिए कहा। परन्तु दुष्ट विद्यार्थियों ने इन्हें वैदिक ब्राह्मण समझकर नालन्दा के ऊँचे शिखर से नीचे गिरा दिया।

वेद विश्वासी कुमारिल जी ने अपने को असहाय जानकर वेदों की शरण ग्रहण की।
राजभवन से नीचे गिरते हुए वह कहने लगे-----

"पतन् पतन् सौधतलान्यरोरुहम्,
यदि प्रमाणो श्रुतयो भवन्ति ।
जीवेम यास्मिन् पतितोऽसम स्थले
मज्जीवनेतत्श्रुतिमानता गति: ।।

यदीह सन्देहपदप्रयोगाद्
व्याजेन शास्त्र श्रवणाच्च हेतो:।
ममोच्चदेशात् पतताव्यनंक्षीत्
तदेकचक्षुर्विधिकल्पना सा ।।"

(यदि श्रुतियाँ प्रमाण है तो इस विषम स्थल पर गिरने से भी मैं जीवित रहूंगा। अर्थात श्रुतियों का प्रमाण ही मेरे जीवन का एकमात्र गति है।
यदि श्रुतियां ही प्रमाण है तो मेरे जीवन की रक्षा होगी , यदि प्रमाण नहीं है तो जीवन की रक्षा नहीं होगी। इसमें संदेहसूचक "यदि" शब्द का प्रयोग करने के कारण मेरा एक नेत्र नष्ट हो गया।ईस प्रकार वेदो मे कुमारिल भट्ट की रक्षा की।

कुमारिल तथा भगवान शंकराचार्य का चार्वाक, जैन, बौद्ध आदि दर्शनों का गम्भीर अध्ययन था, इतना अन्य दार्शनिकों को नहीं था।

इन दोनों की सामर्थ्य केवल संस्कृत ग्रन्थों तक ही सीमित नहीं थी, किन्तु इन्होंने पाली के ग्रन्थों का भी अध्ययन किया था।
इन बातों की पुष्टि माधव कृत दिग्विजय के सातवें सर्ग से होती है।

भगवान शंकराचार्य की‌ तरह इन्होंने भी दिग्विजय किया था। उत्तर भारतीय पंडितों को पराजित करने के अनन्तर दक्षिण भारत गये।

कुछ लोगों के मतानुसार वहां पर सुधन्वा राजा राज्य करते थे, इनकी राजधानी उज्जैनी थी, जिसका आजकल पता नहीं चलता।

वे वैदिक धर्मानुयायी होने पर भी जैनियों के पंजे में पड़े थे। कुमारिल दिग्विजय करते हुए उनके राज-दरबार में गये।

ज्ञान के भंडार वेद कूड़े में पड़े हुए थे, वैदिक ब्राह्मणों की निंदा हो रही थी, सुधन्वा को भी वेद में अनास्था हो गई थी, परन्तु रानी की अभी भी वेदों में निष्ठा थी। खिड़की पर बैठी रानी चिंता कर रही थी----

"किं करोमि क्व गच्छामि को वेदानुद्धरिष्यति ।"
(मैं क्या करूँ ?, कहाँ जाऊं ?, वेदों का उद्धार कौन करेगा ?)

कुमारिल मार्ग से जा रहे थे। रानी की हीनता भरी पुकार सुनकर खड़े हो गए तथा उच्च स्वर में कहा-----

"मा विषीद वरारोहे भट्टचार्योऽस्मि भूतले।।"
(हे रानी ! खेद मत करो , मैं भट्टाचार्य पृथ्वी पर विद्यमान हूँ।)

और यह कार्य उन्होंने कर दिखाया।

राजा इस शास्त्रार्थ से अत्यंत प्रसन्न और संतुष्ट हुये और राजा स्वयं कुमारिल भट्ट के शिष्य हो गये ! अब राजा के सहयोग से पुन: वैदिक धर्म का प्रचार शुरू हो गया ! इस मध्य ही कुमारिल भट्ट ने बौद्ध मत के खंडन के लिये सात ग्रंथों की रचना कर डाली ! इतना ही नहीं बौद्धों का सामना करने के लिये कुमारिल भट्ट ने अपने शिष्यों की एक विशाल मंडली भी तैयार कर ली ! अब कुमारिल भट्ट अपने शिष्यों के साथ बौद्ध मठों के विनाश के लिये गाँव-गाँव और जंगल-जंगल जाकर वनवासी की एक बड़ी “नागा सेना” का निर्माण करने लगे और इन्हीं नागा सेना को यह वचन दिया कि यदि “मैं भारत की भूमि से बौद्ध धर्म को नहीं उखाड़ पाया तो मैं अग्नि समाधि ले लूँगा !”

साथ ही कुमारिल भट्ट ने राजा के सहयोग से भारत के पांच कोने पर पांच वैदिक पीठ की स्थापना की तैयारी होने लगी ! इस तरह पूरे देश में कुमारिल भट्ट का “वेद का मंडन, बौद्ध खंडन” का आन्दोलन चल पड़ा ! कुमारिल भट्ट के शिष्य जगह-जगह शास्त्रार्थ करते और बौद्ध अनुयायियों को वेद अनुयाई बनाते ! बौद्ध धर्म के गुरु उनके नाम से ही घबराने लगे !

अब उन्होंने एक षडयंत्र रचा और कुमारिल भट्ट पर आरोप लगाया कि वह तो गुरुद्रोही हैं ! उन्होंने अपने बौद्ध गुरु के साथ झूठ बोलने का विश्वासघात किया है और आज मात्र वैदिक षडयंत्रकारियों की इच्छा पर राजनैतिक कारणों से अपने बौद्ध गुरु के सिद्धांतों का विरोध कर रहे हैं ! जिससे कुमारिल भट्ट के शिष्यों को जगह-जगह अपमानित किया जाने लगा !

बौद्ध धर्म षड्यंत्रकारियों के अत्यधिक विरोध के बढ़ने पर कुमारिल भट्ट को जब अपना लक्ष्य प्राप्त होता नहीं दिखा तो उन्होंने अपने संकल्प के अनुसार अग्नि समाधि लेने का निर्णय लिया ! जिसे बाद में बौद्ध धर्म अनुयायियों ने यह कहकर प्रचारित किया कि कुमारिल भट्ट ने गुरुद्रोह के प्रायश्चित में अग्नि समाधि ले ली !

किन्तु कुमारिल भट्ट की अग्निसमाधि से ठीक पहले भगवान शंकराचार्य अपना लिखा भाष्य ब्रह्म सूत्र पर शास्त्रार्थ करने पहुँच गये ! तब कुमारिल भट्ट ने शंकराचार्य लिखित भाष्य को देखा और बहुत प्रसन्न हुये ! किन्तु उन्होंने कहा “मै तो शास्त्रार्थ करने में असमर्थ हूँ क्योंकि मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार निश्चित नक्षत्र में अग्नि समाधि लेने जा रहा हूँ ! अत: आप मेरे प्रधान शिष्य मंडन मिश्र से मिलिये ! यह कह कर कुछ ही समय बाद कुमारिल भट्ट शान्त चित्त से अग्नि में प्रवेश कर गये !भगवान शंकराचार्य उनके वैदिक धर्म के प्रति समर्पण को‌ देखकर‌ प्रणाम किया।

फिर जब भगवान शंकराचार्य की भेट कुमारिल भट्ट के शिष्य मंडन मिश्र से हुई ! और मंडन मिश्र को पत्नी सहित शास्त्रार्थ में हराया तब शंकराचार्य को बौद्ध षडयंत्रकारिरों के षडयंत्र का पता चला ! तब उन्होंने राजा सुधन्वा से भेंट की और कुमारिल भट्ट द्वारा निर्मित योजना के अनुसार उनके शिष्यों तथा आदिवासी नागा अखाड़ों के सहयोग से भारत के चार पीठों के मध्य बनाकर धर्म प्रचार शास्त्रार्थ एवं क्षत्रिय धर्म के माध्यम से बौद्ध धर्म के सभी बौद्ध विहारों को भारत से उखाड़ फेंक कर कुमारिल भट्ट के संकल्प को पूरा किया!

और सत्य सनातन हिन्दू धर्म की पुनः स्थापना की ! और राजा सुधन्वा के सहयोग से कुमारिल भट्ट के अधूरे कार्य को अंतिम सफल रूप दिया !

ऐसे अद्भुत थे ! हमारे जगत आदि गुरु शंकराचार्य जी महाराज !

वैदिक ब्राह्मण ग्रुप गुजरात


कुम्भ मेला व आदिशंकराचार्य

समुन्द्र मंथन के समय 14 रत्न निकले जो कि सुर और असुरों ने बांट लिए लेकिन 14वें रत्न, अमृत कलश के लिए दोनों में भयंकर युद्ध हुआ क्योंकि दोनों पक्ष अमर होना चाहते थे। इसी अमृत कलश से कुछ बूंदें हरिद्वार (गंगा), प्रयाग (संगम), उज्जैन (शिप्रा) व नाशिक (गोदावरी) में गिरीं। यह युद्ध देवताओं के 12 दिन ( पृथ्वी के 12 वर्ष) चला जिसके कारण प्रत्येक 12 वर्ष में महाकुंभ का आयोजन होता है। हरिद्वार व प्रयाग में हर 6 वर्ष में अर्धकुंभ होता है। उज्जैन व नासिक में लगने वाले कुम्भ को सिंहस्थ भी कहा जाता है।

जब पूरा देश बौद्ध मत को मानने लगा व वेदों की संस्कृति समाप्ति पर थी आदि शंकराचार्य ने पूरे देश मे 3 बार पैदल प्रवास कर सनातन वैदिक धर्म का पुनरुद्धार कर देश मे स्थापित किया। लुप्त हो चुके वेदों को पुनर्स्थापित किया व ब्रह्मसूत्र, भगवदगीता व उपनिषदों पर भाष्य व अनेको रचनाओं को समाज मे देकर वैदिक संस्कृति की जयकार कराई।

चारों दिशाओं में पीठों की स्थापना के बाद दशनामी अखाड़ों के गठन किया। कुम्भ की आधुनिक व्यवस्था का श्रेय भी आदिशंकर को ही जाता है। आदिशंकर द्वारा स्थापित अखाड़ों में साधुओं को शास्त्र व शस्त्र का ज्ञान दिया जाता था। इसलिये कुम्भ में अखाड़ों की शाही सवारी निकलती है और शाही स्नान होता है और जिसकी अगुवाई नागा साधु करते हैं।

आदिशंकराचार्य ने कुम्भ मेले के आयोजन में चारों पीठों के शंकराचार्य व अखाड़ों का सफल प्रबन्ध हेतु समन्वय किया। आज कुम्भ को विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन कहा जाता है लेकिन पूरी व्यवस्था में भगवद्पाद आदिशंकराचार्य का उल्लेख नही होता अौर वर्तमान शंकराचार्यो की भी लोकतंत्र मे शासनतंत्र के द्धारा उपेक्षा होती है। यह भयंकर विडम्बना है। आदिशंकर ने मठामनाय व मठानुशासन द्वारा मठों की पूर्ण व्यवस्था का निर्धारण किया था जिससे सनातन धर्म की व्यवस्था में कोई कमी न आये। लेकिन आज राजनैतिक दलो के द्धारा अनेको स्वयम्भू शंकराचार्यों व महामण्डलेश्वरों की भी उतपत्ति हो गई है जो चिंता जनक है।

हम गृहस्थ ब्राह्मण का दायित्व है की‌ भगवान आदि शंकराचार्य मठो की सनातन शास्त्रीय मर्यादा की रक्षा का संकल्प करे।



श्री #आद्य #शंकराचार्य का अवतरण क्यों हुआ ?

आज से लगभग २५०० वर्ष पूर्व भारत में ऐसा भयावह समय उपस्थित हुआ था , जब सनातन वैदिक धर्म एवं यज्ञ यागादि कर्म एकदम उपेक्षित हो गये, नास्तिकवादी बौद्धधर्म ने वैदिक धर्मों का निषेध कर डाला , अनधिकारी तथाकथित वैदिकों को मोहित करके वेदादि धर्मशास्त्रों के प्रति अनास्था उत्पन्न कर दी गयी, वर्णाश्रमधर्म के वैदिक आचारों को केवल धन्धा कमाने का साधन बता कर बौद्धों ने सर्वत्र भ्रम- विद्वेष फैला दिया।वर्तमान मे‌ भी‌ यही स्थित हम देख रहे है।लेकिन आदि शंकराचार्य क समय मे ईससे भी बहोत भयावह स्थित थी।

सारांश सनातन वैदिक धर्म धर्मप्राण देश भारत में ही खिसक रहा था , दम तोड़ रहा था । मुट्ठी भर वैदिक, मूल संरक्षण में निरत रहकर वेदों के मूल की रक्षा कर रहे थे । वह चिंतित थे कि "को वेदान् उद्धरिष्यति ?"

सारा राष्ट्र अनीश्वरवाद में दीक्षित हो कर मौज -मजा -आनन्द उड़ाने के सिद्धान्त का पालन कर रहा था । त्याग का स्थान भोगवाद ने ले लिया । वैदिक कर्मकाण्ड की ऐसी दुर्दशा हो रही थी कि वेदों को भाण्डों, धूर्त्तों और निशाचरों की रचना बताया जा रहा था ।

तत्कालीन शासक भी विपरीत प्रभाव में बह गए थे । शक्तिशाली बौद्धों के समुदाय शिष्य और संघ के साथ राजाओं के महलों में प्रवेश करके घोषित कर देते थे कि राजा उनके मत का है, देश उनका है, वैदिक मार्ग का सर्वथा त्याग कर दो !

ऐसा भयावह समय इस राष्ट्र में उपस्थित होने पर जब यज्ञादि बंद होने से देवगण भी सन्तप्त हो गए १४ लोक का पोषण करने वाले‌ वेद धर्म शास्त्र के रक्षक विप्र आचार्य भी बौद्ध जैन चार्वाक प्रवाह मे‌ बह रहे थे या बहने मे शासनतंत्र के द्धारा मजबुर किये गये थे।
तो तब सब देवता कैलाश पर्वत पर भगवान् शंकर की शरण में गए और सम्पूर्ण स्थिति निवेदित करते हुए कहा - प्रभो ! आजकल कोई मनुष्य सन्ध्या वंदन आदि वैदिक -कर्म नहीं करता, ना ही सन्यास सेवन करता है । सभी पाखण्ड में निरत रहते हैं ।

यज्ञ शब्द भी कान में न पड़े, अतः कान बन्द कर लेते हैं लोग । परमात्मा का प्रतिपादन करने वाली श्रुतियों को बौद्धों ने दूषित कर अनर्थ कर डाला है । अधम कापालिक, ब्राह्मणों का सिर काट -काट कर भैरव की पूजा करते हैं । प्रभो ! अब तो दुष्टों का विनाश कर वैदिक धर्म की स्थापना कीजिए !

देवगणों की प्रार्थना स्वीकार करते हुए भगवान् शंकर ने कहा - कुमार कार्तिकेय ! तुम वैदिक धर्म के उद्धार के लिए भारत में अवतार लो ! ब्रह्मा जी व इन्द्र तुम्हारी सहायता के लिए उत्पन्न होंगे; हम स्वयं अवतरित होंगे तथा आप अन्य देवतागण भी मनुष्य रूप धारण कर भारतवर्ष में जन्म लो !

इस प्रकार कुमार कार्तिकेय कुमारिल भट्ट बने,

ब्रह्मदेव मण्डन मिश्र के रूप में आए,

इन्द्र राजा सुधन्वा के रूप में प्रकट हुए,

विष्णु भगवान् सनन्दन ( श्री पद्मपादाचार्य) और शेषनाग पतंजलि के रूप में इस धरती पर आ गये ।

वायु बने हस्तामलक तथा वरूण ने चित्सुख के रूप में जन्म लिया ।

बृहस्पति आनन्द गिरि और सरस्वती ने उभय-भारती के रूप में जन्म लिया । अन्य -अन्य देवता भी देवाधिदेव भगवान् शंकर के निर्देशानुसार इस पवित्र राष्ट्र में मानव के रूप में अवतरित हो गये वेद का उद्धार करने के लिए ।

वेद के तीन काण्ड हैं -
कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञान काण्ड ।

श्री मण्डन मिश्र तथा कुमारिल भट्ट ने कर्मकाण्ड का पुनरुद्धार किया। पतञ्जलि ने उपासनाकाण्ड की रक्षा की और सर्वोच्च ज्ञानकाण्ड का उद्धार करने के लिए स्वयं भगवान् शंकर श्री_आद्य_शंकराचार्य के रूप में इस धरा पर अवतरण हुए।

श्रुतिस्मृतिपुराणानामालयं करुणालयम् ।
नमामि भगवत्पादं शङ्करं लोकशङ्करम् ।।

साभार #शिवशर्माजी उमरेठ


भगवान आदि शंकराचार्य अौर चांडाल का प्रसंग

एक दिन आचार्य शंकर प्रातः काल शिष्यों सहित गंगा-स्नान करके नित्यकर्म के अनन्तर लौट रहे थे।

मार्ग में ही इन्हें मैले-कुचैले वस्त्र धारण किये हुए, मदिरा सिर पर रखे हुए, हाथ में चार कुत्तो की डोरी पकड़े हुए, दो पत्नियों सहित एक अन्त्यज को देखा।

उसको देखते ही शंकराचार्य जी ने "गच्छ, गच्छ" कहा ।

इसको सुनकर अन्त्यज बोला------

"आप किसे जाने के लिए कहते हो?
एक, अद्वितीय, निर्दोष, असंग, सत्य ज्ञानस्वरूप, अखण्ड आनंद ब्रह्म को दूर करते हो या अन्नमय कोष को ?

हे यतिवर ! अन्नमय कोष से अन्नमय कोष को दूर करते हो या चैतन्य से चैतन्य को दूर करते हो ?

हे विद्वन् ! गंगा में प्रतिबिंबित होने वाला सूर्य तथा चाण्डाल की वापी में प्रतिबिंबित होने वाले सूर्य में क्या अंतर है ?

सोने के घड़े के भीतर आकाश में तथा मिट्टी के घटाकाश में क्या कोई अंतर है ?

आत्मा में कोई भेद नहीं है, फिर यह ब्राह्मण है, यह चाण्डाल है, यह भेद भ्रम मात्र है।

यदि आप व्यवहार को लेकर कहते हो तो यह बनता नहीं, क्योंकि मैं पवित्र ब्राह्मण हूँ, तुम श्वपच हो, इसीलिए दूर हट जाओ।
हे मुनिवर ! आपका यह भेद-भ्रम मिथ्या है क्योंकि अनेकों शरीरों में एक ही आत्मा है।" इत्यादि उस चाण्डाल के वचन सुनकर आचार्यपाद ने "मनीषापंचक" नामक स्तोत्र की रचना की।

आचार्य कहा---- "जाग्रतादि तीन अवस्थाओं में जो एक चैतन्य है, जगत् साक्षी ब्रह्म, ब्रह्मा से लेकर चींटी पर्यंत सभी शरीरों में मणि में सूत्र के समान जो सबमें ओतप्रोत है।

"दृश्य मिथ्या है, द्रष्टा चैतन्य सत्य है" ऐसी जिसकी दृढ़ बुद्धि हो चुकी है, वह चाण्डाल हो या ब्राह्मण, वह मेरा गुरु है।"

इस स्तुति के पूर्ण होते ही वह चाण्डाल दोनों पत्नियों तथा कुत्तों सहित लुप्त हो गया तथा आचार्यपाद ने विशालाक्षी पार्वती सहित शिव को देखा।

देवता तथा महर्षि स्तुति कर रहे थे। वह कैलाश के समान श्वेत बैल पर सवार थे। उनका वस्त्र हाथी चर्म, तथा कुत्ते चार वेदों के रूप में, मस्तक पर विद्यमान गंगा मदिरा के रूप में, दो अनुचर स्वामी कार्तिक और गणेश के रूप में परिणत हो गये।

विश्वनाथ भगवान ही उनकी परीक्षा के लिए अन्त्यज के रूप में आये थे।

शिव रूप को उन्होंने दंड सहित प्रणाम करके एक स्तुति की रचना की‌ थी।
चाण्डाल के रूप को प्रणाम नहीं किया।

आजकल टी. वी. में चाण्डाल के रूप को दंड सहित प्रणाम करते दिखाया जाता है, जो कि धर्मशास्त्र, शास्त्रमर्यादा तथा दिग्विजयों के प्रमाण से सर्वथा विरुद्ध है।

वस्तुतः ऐसे विचार अत्यन्त भ्रामक तरीके से फैलाया गया है।भगवान शंकराचार्य का निरुत्तर होनेका तो कोई प्रश्न ही नहीं !  चाण्डाल की बातों का सीधा सा उत्तर यह होगा कि यद्यपि आत्मा और पञ्चभूत दोनों ही व्यापक होनेके कारण आत्मा से आत्मा और भूत से भूत हटाये नहीं जा सकते ; तथापि जीवित ब्राह्मणादि-देहविशिष्ट आत्मा से जीवित शूकरादि-शरीर को व्यावहारिक पवित्रता के लिए दूर रखना संभव और उचित भी हैं । व्यवहार में जल और विष, भोजन और विष्ठा, गंगाजल और कर्मनाशा का जल, गोमूत्र-गर्दभमूत्र, अस्थि-नरकपाल, व्याघ्रचर्म-गर्दभचर्म इत्यादि में भेद मान्य ही हैं । इसी व्यवहारिक दृष्टि से नीति-भेद , वर्णभेद ज्ञानी को भी मान्य हैं ।

शंकराचार्य की परम मान्य उपनिषदों में ही रमणीय कर्मों से ब्राह्मणादि-योनि  एवं निन्द्य आचरणों से श्व-सूकर चाण्डालादि योनियों की प्राप्ति कही गयी हैं -

// तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ //

~ छान्दोग्य उपनिषद ५.१०.७

वेदान्त में नित्य अनेकसमवेत रूप ' जाति ' मान्य नहीं हैं , किन्तु ' व्यवहारे भाट्टनयः ' के अनुसार व्यवहार में भट्टपाद का ही सिद्धान्त मान्य हैं । यज्ञ , दान, तप आदि की कर्तव्यता मुक्तकण्ठ से शंकराचार्य ने भी स्वीकार किया हैं । वेदाध्ययन, यज्ञादि सब जातिमूलक ही होते हैं । जाति स्वीकृत न होनेपर वेदाध्ययन, यज्ञादि असंभव ही ठहरेंगे।

इस दृष्टि से देखते हुए कौन कहता हैं कि व्यावहारिक सत्ता से भी शंकराचार्य को जातिभेद मान्य नहीं था ? उनका मत स्पष्ट हैं -

भावाद्वैतं सदा कुर्यात्क्रियाद्वैतं न कर्हिचित् ।
अद्वैतं त्रिषु लोकेषु नाद्वैतं गुरुणा सह ॥

~ श्री शंकराचार्य, तत्त्वोपदेशः , श्लोक ८७

सदा ज्ञानदृष्टि से अद्वैत की भावना करनी चाहिए । क्रिया में कभी भी अद्वैत नहीं होता (क्योंकि कर्ता-कारक-कर्म आदि त्रिपुटी-भेद के बिना क्रिया संभव ही नहीं) , गुरु के साथ सदा ही व्यवहारिक भेद स्वीकार करके प्रणामादि करना चाहिए ।

चाण्डाल का आशय यही था कि लोकसंग्रह के लिए यद्यपि व्यावहारिक भेद मान्य ही हैं, तथापि ब्रह्मज्ञ पुरुष के लिए तुच्छ जनसंग्रह की इच्छा से शुद्ध ब्रह्मबुद्धि से दृष्टि क्यों हटायी जाय ? सर्वबाधपूर्वक अखण्ड ब्रह्मदर्शन ही क्यों न किया जाय ? 


हर हर महादेव


भगवान आध शंकराचार्य अौर वेदव्यास
जिस समय आचार्य शंकर शिष्यों सहित भाष्य पाठ करने से पूर्व शांतिपाठ कर चुके थे, व्याख्या करने ही वाले थे।

इतने में ही एक वृद्ध ब्राह्मण वहां पर आ गये।

ब्राह्मण ने पूछा--- "तुम कौन हो?, क्या पढ़ाते हो ?"

शिष्यों ने कहा---- "ये हमारे गुरुजी है। स्वतंत्र रूप से उपनिषदों की शंका का समाधान करते हुए शारिरिक सूत्र भाष्य पढ़ा रहे हैं।"

तब वृद्ध ब्राह्मण ने कहा---- "क्या ये सभी सूत्रों का यथार्थ तत्व समझते हैं?
तो किसी एक सूत्र की व्याख्या सुनाएं।"

तब भाष्यकार ने कहा---- "सूत्र के भाष्यकर्ताओं, गुरुओं को मैं प्रणाम करता हूँ।
सूत्र के तात्पर्य जानने का अहंकार मुझमें नहीं है फिर भी आप जो पूछेंगे, यथासम्भव उत्तर दूंगा।"

तब ब्राह्मण ने तीसरे अध्याय के प्रथम पाद के प्रथम सूत्र की व्याख्या पूछी।

वृद्ध ने फिर कहा --- "तदनन्तर प्रतिपत्तौरंहति सम्परिष्वक्त: प्रश्न निरूपणाभ्यां" इति सूत्रस्य को वा भवताधिगत: ?
तदनन्तर शरीर त्यागने के बाद सूक्ष्म, कारण शरीर सहित जीव अकेला ही परलोक जाता है ?
अथवा अनेकों के साथ जाता है ?
पूर्व में भी पांचाल नरेश ने भी श्वेतकेतु, गौतम आदि से पूछा है--- इस सूत्र का आपने क्या अर्थ समझा है?

फिर वृद्ध बोले--- "जीव का मुख्य सचिव प्राण है। जीव प्राण, दशों इंद्रियां और मन सहित अविद्या, कर्म, पूर्व-प्रज्ञा इन सबको साथ लेकर , पूर्व देह को छोड़कर नवीन देह प्राप्त करता है।
अब प्रश्न होता है कि जीव देह के बिजभूत सूक्ष्म पंच महाभूतों के सहित जाता है या अकेले ?
इसका उत्तर दीजिये।"

वृद्ध की इस शंका का उत्तर देते हुए आचार्य शंकर ने कहा---- "शरीर त्यागने के बाद इन सबके सहित जाता है।

"तदनन्तर प्रतिपत्तौ"---- शरीर त्यागने के अनन्तर दूसरे शरीर में शरीर के बीजभूत सूक्ष्मभूतों सहित "रंहति" यानी गमन करता है, ऐसा समझना चाहिए।"

तो प्रश्न उठा--- "इस बात का निर्णय कैसे हुआ?"

तब आचार्य कहते हैं--- " 'प्रश्न निरूपणाभ्यां' छान्दोग्योपनिषद् में प्रश्न का उत्तर देते समय निर्णय किया। वेत्थ यथा पंचम्याहुतावाप: पुरुषो वचसो भवन्ति: (छा. ५/३३) गौतम ने पांचाल नरेश से पूछा-- "यज्ञ में छोड़ी गई आहुति पाँचवे स्थान पर जलरूप होकर पुरुष रूप प्राप्त करती है।
इसका निरूपण करते हुए कहा----"द्युपर्जन्य, पृथ्वी, पुरुष योषित्सु पँचस्वग्निषु श्रद्धा, सोम, वृष्टयन्न, रेतोरूपा: पंचाहुति: दर्शयित्वा। इति पंचम्याहुतावाप: पुरुष वचसोभवन्ति (छा. ५/९/१) तस्मादद्धि परिवेष्टितो जीवो रंहति व्रजतीति गम्यते।

अग्नि में श्रद्धापूर्वक छोड़ी हुई आहुति आकाश में पहुँचती है।
वहां से बादल, फिर पृथ्वी (अन्न) फिर पुरुष, स्त्री इन पांच अग्नियों के क्रमानुसार श्रद्धा, सोम, वर्षा, अन्न तथा वीर्य रूप में प्राप्त पांच आहुतियों को दिखाकर पांचवीं आहुति पुरुष के वीर्यरूपी जल से स्त्री के गर्भाशय में पहुँच कर रूप प्राप्त करती है, इसीलिए अकेला जीव नहीं जाता किन्तु जलादि से घिरा हुआ जाता है।"

वृद्ध ने कहा---- "हे यते! आपका व्याख्यान दूसरे वेद के श्रुति से विरुद्ध है।
अन्य श्रुति कहती है--- "जलूकावत् पूर्व देहं न मुन्चति यावत् न देहान्तरमाक्रमति।"
जोंक के समान जीव जबतक दूसरी देह में प्रवेश नहीं करता तबतक पूर्व देह का त्याग नहीं करता।"

इसी सूत्र के शांकभाष्य की व्याख्या करते हुए रत्नप्रभा टीका के कर्ता श्री स्वामी गोविंदानंद सरस्वती जी महाराज लिखते हैं----" आप:-- आगामी प्राप्त होने वाले स्थूल शरीर का बीज पंचसूक्ष्मभूत, पंचस्वग्निषु-- पांच अग्नियों में दी हुई, पंचम्यामाहुतौ-- पांचवीं आहुति पुरुष शब्द के नाम से कही जाती है। अर्थात पुरुष रूप में परिणत होती है किन्तु पंचम आहुति पुरुष रूप को कैसे प्राप्त करती है ? यह प्रश्न छान्दोग्योपनिषद् में पांचाल नरेश प्रवाहण ने श्वेतकेतु से किया था। वे इसका उत्तर नहीं दे सके, तब पिता गौतम से पूछा।
पिता भी इसका उत्तर नहीं जानते थे।
अतः सुकेशा सत्यवान् आदि महाशालीन नैष्ठिक ब्रह्मचारियों ने महाश्रोत्रियों के साथ समित्पाणि होकर राजा से पूछा।

एक वर्ष के अनन्तर अग्नि विद्या के अधिकारी जानकर राजा ने कहा---- "हे गौतम ! लौकिकाग्नि में विधि-विधानपूर्वक दी गई आहुति बादल और अग्नि सोमरूपा होकर श्रद्धा सहित जल की यजमान जब आहुति देता है, तो वह स्वर्ग लोक को प्राप्त करके सोम नाम वाले दिव्य देह में स्थित होती है।
पुण्यकर्म का फल क्षीण होनेपर शीघ्र ही बादलों को प्राप्त होती है।
पृथ्वी पर पानी बरसने से अन्न के रूप में आती है। पुरुष के अंतिम धातु के रूप में परिणत होकर स्त्री रूपी अग्नि को प्राप्त करके पुरुष रूप को प्राप्त करती है।
पंचम आहुति का यह स्वरूप निरूपण हुआ।

वृद्ध के पूर्व प्रश्न का उत्तर देते हुए आचार्य ने कहा-----

"एक शरीर को छोड़ने और दूसरे शरीर को ग्रहण करने पर भी जीव अपने कर्म, वासना, पूर्वप्रज्ञा आदि जिस शरीर के सम्बंध में आपको शंका है, वह भावी देह भावनामय है।
भावना से वह पिछले शरीर को बिना छोड़े भावी शरीर को प्राप्त करता है।
अतः विरोध नहीं है।"

वृद्ध ने पूछा--- "व्यापक आत्मा तथा व्यापीकरणों का दूसरे शरीर की प्राप्ति के लिए कर्मो के अधीन होकर इसे वृत्ति लाभ होता है ?

अथवा केवल आत्मा से वृत्ति लाभ होता है?

अथवा नये शरीर के समान वही इंद्रियां नये शरीर को प्राप्त होती है ?

अथवा नयी इंद्रियां उतपन्न होती है ?

अथवा केवल मन ही भोग स्थान पर जाकर प्रतिष्ठित होता है?

अथवा जैसे मेढक या पक्षी उछलकर या उड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान को जाता है, क्या वैसे ही एक शरीर से दूसरे शरीर में जीव जाता है ?

आचार्य शंकर----- "आपकी पुरुष के प्रति यह अति प्रभावशाली कल्पना मात्र है ।
आपके चारों विकल्प तथा तर्क श्रुति विरोधी होने से आदर के योग्य नहीं है।"

वृद्ध------ "प्रश्नोत्तर में ऊपर कहे गये वचनों के अनुसार केवल जल से मिलकर जीव जाता है। श्रुति में 'अप' शब्द के सामर्थ्य से सर्वसाधारण मनुष्यों को कैसे ज्ञान हो कि सूक्ष्म भूतों सहित जीव जाता है ?"

आचार्य शंकर---- "इसका उत्तर अगले सूत्र में दिया है---- 'त्रयात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात्---- जीव का शरीर तीन तत्वों का होने से, अग्नि, पृथ्वी, जल , इनमें से जल की प्रधानता होने से, सूत्र में तु शब्द से ऊपर की हुई शंका का समाधान किया जाता है।
त्रयात्मक 'अप' जल का त्रिवृत्करण (अग्नि, जल, पृथिवी) श्रुति में पाया जाता है।
इन तीनों से इनके आरम्भक आकाश तथा वायु, इन दो को ग्रहण कर लेना चाहिए।
तीन तत्वों का कार्य यह स्थूल शरीर है, यह तीन तत्व त्रिधातु रस, वात, पित्त, कफ रूप है। केवल जल से ही इनका आरम्भ होता है।
अन्य तत्वों की अपेक्षा जल अधिक है इसलिए 'आप: पुरुषवचसा' कहा।
प्रश्नोत्तर वाक्य में 'अप्' शब्द सभी प्राणियों के शरीरों में रस तथा रक्त रूप में द्रवीभूत तत्व के प्रधानता से कहा।

वृद्ध------ "तुम्हारा यह वचन श्रुति, युक्ति, तर्क तथा प्रत्यक्ष के विरुद्ध है, अतः माननीय नहीं है।
पुरुष शरीर में पार्थिव तत्व के अधिकता से पार्थिव शरीर कहते हैं, आपो कोई नहीं कहता।

आचार्य शंकर------ "इसमें दोष नहीं है। अन्य तत्वों की अपेक्षा शरीर में जल अधिक है।
सफेद, काले, शुक्र तथा शोणित से शरीर के बीजभूत दोनों में जल की अधिकता है। शरीरारम्भ के निमित्त कारण कर्म है। अग्निहोत्रादि कर्म जिनके सोमरस वल्ली विशेष का निकला हुआ रस, घी, दूध आदि पदार्थ द्रव्यमय है। ठीक-ठीक कर्म सहित विधि-विधान द्वारा श्रद्धापूर्वक दी हुई आहुति को जल रूप कहा।
वह किये हुए कर्म द्वारा जीव स्वर्ग में जाता है।
भाव यह है कि हवन सामग्री, वर्षा का जल तथा मनुष्य के उत्तपत्ति का कारण शुक्र-शोणित जलरूप है।
इसीलिए "अप्" कहा।
अतः यह व्याख्या दोषरहित है।

"प्राण गतेश्च" यह अगला सूत्र है।
प्राणों की ही एक शरीर से निकलकर दूसरे शरीर मे ले जाने की शक्ति है।
उसमें भी मुख्य प्राण के निकलने पर ही अन्य अपानादि निकलते हैं, न निकलने पर नहीं निकलते हैं।
वह प्राण आदिकों की गति का दूसरा आश्रयन होने से प्राण को गति का आश्रय कहा है। प्राणों के आश्रित सूक्ष्म पंच महाभूत भी निकलते हैं।
आश्रय रहित प्राण न कहीं स्थित है, न कहीं जाते हैं।
जीवित प्राणियों को देखने से यह सिद्ध होता है।"

इसप्रकार जैसे-जैसे आचार्य शंकर समाधान करते जाते थे, वैसे-वैसे सैंकड़ों तर्क देकर व्यासजी खण्डन करते जाते थे।
यहां पंडित लोग इस शास्त्रार्थ को देखकर विस्मय को प्राप्त हुए।
इनका आठ दिन तक शास्त्रार्थ चलता रहा।

तब अति बुद्धिमान पद्मपादाचार्य विचार करने लगे----

"यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है, निश्चय ही सूत्रकार भगवान वेदव्यास जी ही है। उनके बिना मेरे गुरुजी से इतना लंबा शास्त्रार्थ कोई कर ही नहीं सकता।"

ऐसा मन में सोचकर पद्मपादाचार्य जी ने दोनों गुरुओं के चरणों में प्रणाम करके कहा------

"शंकर: शंकर: साक्षात् व्यासो नारायण: स्वयम्।
तयोर्विवादे सम्प्राप्ते किंकर: किंकरोम्यहम्।।"

श्री शंकराचार्य जी साक्षात शंकर है। वृद्ध ब्राह्मण रूप धारी व्यासजी साक्षात नारायण है।
इन दोनों के विवाद में मुझ सेवक को क्या सेवा करनी चाहिए ?

पद्मपाद जी का यह वचन सुनते ही भाष्यकार तुरन्त उठे, दण्ड को संभाल कर इन मंत्रों से प्रणाम करने लगे-------

"नारायणं पद्मभवं वशिष्ठं ,
शक्तिं च तत्पुत्र पराशरं च।
व्यासं शुकम् गौड़पदं महान्तं
गोविंद योगीन्द्रमथास्य शिष्यं ।।"

अपने पूर्ववर्ती आचार्यों का स्मरण करते हुए परात्पर गुरूदेव व्यासजी के पादपद्मों में बारह बार नमन करते हुए सदण्ड प्रणाम किया।

यहां शंका होती है कि दण्डी स्वामी अपने पिता, बाबा, परबाबा आदि को भी यदि वे गृहस्थ हो तो प्रणाम नहीं कर सकते।
इन्होंने यतिधर्म के विरुद्ध ऐसा क्यों किया ?

इसका समाधान करते हुए माधवीय दिग्विजय के अपनी टीका में धनपति सूरी जी लिखते हैं---- "ब्रह्मविद्या के आचार्यों की परम्परा में व्यास जी शंकराचार्य जी के परम् गुरु के भी परम् गुरु हैं, इसीलिए प्रणाम किया।"

"नमो भगवते सूत्रकारयेति ननाम तम्।" अपने चरणों पर गिरे हुए आचार्यपाद को हृदय से लगाकर व्यासजी ने कहा--- "तुम मुझे पुत्र शुकदेव से भी अधिक प्रिय हो।
हे महामते! तुमने मेरे ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा है, इसको सुनकर तुम्हारे पास आया था।
तुम्हे देखने की मुझे बड़ी इच्छा थी।"

आचार्य मुनीन्द्र का वचन सुनकर हर्षित तथा रोमांचित हुए।

व्यासजी ने फिर कहा----- "तुम्हे सोलह वर्ष की आयु प्राप्त हुई थी, वह आज पूर्ण हो रही है। किंतु अभी आपको प्रस्थानत्रयी के भाष्यों का प्रचार-प्रसार सम्पूर्ण भारत के गेहे-गेहे, जने-जने में करना है तथा वेदविरुद्ध आस्तिक-नास्तिक मत-मतान्तरों का खंडन करके विशुद्ध वैदिक सनातन धर्म का झंडा लहराना है।
अतः मैं ब्रह्मा जी का आवाहन करके आपको आयु देना चाहता हूँ।"

ऐसा कहकर व्यासजी ने आवाहन तथा आकर्षणमन्त्र से ब्रह्मा जी को बुलाया।
ब्रह्मा जी ने व्यास जी से कहा---- "ये काल के भी महाकाल साक्षात शिवरूप ही है।चाहें तो अरबों-खरबों वर्ष रह सकते हैं।इनपर मेरा अधिकार नहीं है।"

तब ब्रह्मा जी की अनुमति समझकर व्यास जी ने १६ वर्ष की आयु और प्रदान की।
व्यासजी ने प्रस्थानत्रयी का भाष्य देखकर मुक्तकंठ से प्रसंसा की।विशेषकर ब्रह्मसूत्र के भाष्य को देखकर।

भगवान भाष्यकार ने कहा--- "हे महर्षि मान्य ! आपका ब्रह्मसूत्र तो सूर्य के समान है। सूर्य सबको प्रकाश देता है, सूर्य को कौन प्रकाश दे सकता है ?
मैंने तो अपने भाष्यरूपी दीपक से सूर्यरूपी आपके ब्रह्मसूत्र का नीराजन मात्र किया है।
ऐसी धृष्टता करते हुए भी मुझे लज्जा नहीं आती ! ,
आपके सूत्र की व्याख्या करते हुए मैंने आपके पदों का आश्रय लेकर ही पूर्वपक्ष का खंडन किया है तथा शिद्धान्त का प्रतिपादन युक्तियों से किया है।
गुरुओं से जो अर्थ मुझे प्राप्त हुआ उसे भाष्य में वर्णन किया है।"

आचार्यपाद ने ऐसा कहकर ब्रह्मा तथा व्यासजी को प्रणाम किया।
दोनों गुरु आयु की वृद्धि का आशिर्वाद देकर अंतर्ध्यान हो गये।



श्री पद्मपादाचार्य जी अौर आध शंकराचार्य

द्रविड़ देश के कावेरी तटवर्ती चोल देशीय ब्राह्मण सनन्दन नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे।
वह श्रीरंगम में तीर्थयात्रा करते हुए मामा के घर पहुंचे।

कुछ दिग्विजयों में इन्हें विष्णु का अंशावतार तथा कुछ में अरुण का अंशावतार कहा गया है।
माधवीय दिग्विजय में पिता का नाम अरुण और माता का नाम विमला कहा गया है।
कहीं-कहीं जैसे वायु तथा रुद्र के मिश्रित अंश से हनुमान जी को कहा है , वैसे ही इनको भी विष्णु और अरुण के अंश से बताया है।

सदानंदीय दिग्विजय में इन्हें चन्द्रमा का अंश, चिद्विलासीय में इनका जन्म अहोविल क्षेत्र में पिता माधव तथा माता लक्ष्मी के यहां हुआ था।
दोनों ने नृसिंह भगवान की आराधना करके स्वप्न में नृसिंह भगवान के दर्शन किये।
उन्होंने वरदान दिया कि मेरे अंश से तुम्हे पुत्र की प्राप्ति होगी।

गोविंदनाथीय दिग्विजय में श्रीकुण्ड ग्राम में सोमशर्मा ही नृसिंह भगवान की कृपा से सनन्दन के रूप में अवतरित हुए थे। विष्णु शर्मा भी इनका नाम था।

यह तीर्थयात्रा करते हुए काशी पहुँचे, आचार्य शंकर को देखते ही चरणों में गिर पड़े।

गुरुजी ने उठाकर पूछा--- "तुम कौन हो ? , घर कहाँ है?, कहाँ से आये हो?, बालक होने पर भी बुद्धिमान दिखते हो।"

इन्होंने कहा---- "मैं चोल देश से आया हूँ, मुझपर कृपा करो।
मेरे गुण, दोषों पर विचार न करके मुझे अपनाओ।"

वैदिक सनातन धर्म का प्रचार करने के लिए शिव आज्ञा प्राप्त करके अन्य देवता भी भगवान् शंकराचार्य के शिष्य के रूप में अवतरित हुये हैं।

ब्रह्मा मण्डन के रूप में, दुर्वासा ऋषि के श्राप से सरस्वती उभयभारती के रूप में, स्वामी कार्तिक कुमारिल भट्ट के रूप में, देवगुरु बृहस्पति हस्तामलकाचार्य के रूप में, अग्नि त्रोटकाचार्य के रूप में, इंद्र महाराज सुधन्वा के रूप में अवतरित हुए थे।

भगवत्पाद के प्रमुख चार शिष्यों के अतिरिक्त समित्पाणि, चिद्विलास, ज्ञानकन्द, विष्णुगुप्त, शुद्धकीर्ति, भानुमारीचि, कृष्णदर्शन, बुद्धिवृद्धि, विरंचिपाद, शुद्धानंद आदि अनेकों शिष्य थे।

बालक ने कहा -- "मैं सनन्दन हूँ।"
इनको गंगातट पर आचार्यपाद ने संन्यास दीक्षा दी।

सनन्दन को दीक्षा देने के अनन्तर आचार्य ने शारिरिक भाष्य पढ़ाना आरम्भ किया।
अनेकों शिष्यों के साथ सनन्दन अध्ययन करने लगे।

एकदिन काशी में गंगा के उस पार सनन्दन खड़े थे।
आचार्य ने उन्हें भाष्य पढ़ने के लिए पुकारा।
गंगा जी के उस इस पार आने के लिए नौका या पुल नहीं था।

गुरु आज्ञा प्राप्त होते ही वे गंगा की गम्भीरता पर बिना विचार किये शीघ्रता से गंगा पार करने लगे।

भगवती गंगा ने उनकी गुरुभक्ति देखकर जहां वे चरण रखते थे, वहां कमल पैदा कर देती थी।

कमलों पर पैर रखते हुए गंगा पार करके गुरुजी को प्रणाम किया।
उनकी गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर गुरुजी ने उनका नाम पद्मपादाचार्य रख दिया।


भगवान आध शंकराचार्य अौर उनकी माता का एक प्रसंग
संन्यासी को माता और पिता में से किसको प्रणाम करना चाहिए ?
इस सम्बंध में मनुजी कहते हैं ----

"संन्यस्ताखिल कर्मापि पितुर्वन्द्यो हि मस्करी।
सर्ववंद्येन यतिना प्रसूर्वन्द्या प्रयत्नतः।।"

'सम्पूर्ण कर्मो का त्याग किये हुए संन्यासी को पिता प्रणाम करे तथा सर्ववन्दनीय यति माता को यत्नपूर्वक प्रणाम करें।'

आचार्य शंकर को देखते ही माता का शारिरिक ताप उसी प्रकार से दूर हो गया, जैसे धूप से पीड़ित को शीतल जल मिलने से गर्मी का ताप दूर हो जाता है ।

माता ने कहा--- "हे पुत्र ! बुढापे से जीर्ण शरीर का बोझ अब मैं बहुत दिन नहीं ढो सकती ।
तुम मुझे पुण्यलोक की प्राप्ति का मार्गदर्शन कराओ ।"

माता की बात सुनकर पुत्र ने कहा---- "हे मात: ! जो माया से रहित निर्विशेष अप्रमेय ब्रह्म है ।
देह तथा देह के अंगों से रहित, जन्म-मृत्यु से रहित, आकाशवत् बाहर-भीतर व्याप्त है, उसका ध्यान करो ।"

माता ने कहा---- "ऐसा परमात्मा तो मेरी बुद्धि में नहीं बैठ पाता, मैं उनका ध्यान नहीं कर पाऊंगी ।"

तब आचार्य बोले---- " जिनके वरदान से आपने मुझे पाया है, ऐसे शिव का ध्यान करो ।"

ऐसा कहकर शिव-दर्शन कराने की इच्छा से उन्होंने शिव-स्तुति की ।
माता के दर्शनार्थ जब स्तुति करके मौन हुए, तब भगवान् शंकर गणों सहित प्रकट हुए ।
गणों को देखकर माता भयभीत हो गई ।

तब माता ने कहा--- "बाल्यावस्था में जो गोविंदाष्टक तुमने मुझे सुनाया था न !, भगवान ने माटी खाई थी, यशोदा उनको धमकाने लगी थी, मुख खोलने पर चौदहों लोकों का दर्शन कराया था, ऐसे परमानन्दस्वरूप गोविंद में मेरा मन विशेष रूप से लगता है ।"

तब आचार्यपाद ने गोविंदाष्टक तथा कृष्णाष्टक सुनाया ।

इसके पूर्ण होते ही यतिवर के सम्मुख भगवान् लक्ष्मी सहित प्रगट हो गए ।

माता ने शरीर छोड़कर योगीगम्य परमपद को प्राप्त किया ।
माता के संस्कार के लिए आचार्य ने अपने बन्धु-बांधवों से अग्नि मांगी, तो वे आचार्य का तिरस्कार करने लगे ।
दो-तीन ब्राह्मणों को छोड़कर सभी ने तिरस्कार किया।

तब आचार्य ने श्राप देते हुए कहा---- "इन तीन ब्राह्मण परिवार को छोड़कर तुमलोगों में विप्रत्व, बंधुत्व नहीं रहेगा ।

तुमलोग वेद तथा यतिभिक्षा के अधिकारी नहीं होवोगे । तुम्हारे घर के आगे ही श्मसान होंगे, जिसमे तुमलोगों को जलाया जायेगा ।"

ऐसा कहकर उन्होंने अपना दाहिना हाथ मंथन करके अग्नि प्रकट की एवं माता का अग्नि-संस्कार किया ।

आज से ९७ वर्ष पूर्व श्रृंगेरी शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्री सच्चिदानंद शिवाभिनव नरसिंह भारती जी महाराज ने आदि शंकर के जन्मभूमि की खोज की, जो पूर्णा नदी के तटपर विद्यमान है ।

वहां पर उन्होंने भगवती शारदा देवी तथा गणेश एवं अष्टमातृकाओं का मंदिर निर्माण किया तथा भगवत्पाद शंकर का भी मन्दिर निर्माण करवाया ।

उसी के प्रांगण में माता आर्याम्बा की समाधि है । समाधि स्थल पर तुलसी का वृक्ष है । वहां पर शिलालेख है तथा अखंड दीपक जलता है ।

ईस्वी सन १९१० के माघ शुक्ल द्वादशी को मन्दिर निर्माण हुआ था । शारदा भगवती के मंदिर में इस अभिप्राय को व्यक्त करते हुए कई श्लोक भी अंकित है------

"आज से लगभग २००० वर्ष पूर्व सदाशिव ने अधर्म द्वारा धर्म का ह्रास होता देखकर पृथिवी पर केरल, कालटी में धर्मरक्षा की प्रतिज्ञा पालनार्थ शंकराचार्य के रूप में अवतार लिया ।

अवतार लेकर सनातन धर्म की रक्षा की।

उनके चरित्र का वर्णन करने वाले ग्रन्थों को देखकर यहीं उनकी जन्मभूमि सिद्ध होती है ।

हम अकृतज्ञ न हो अतः जगद्गुरु की स्मृति, सर्व जगत् हितैषी "अभिनव शिव सच्चिदानंद नरसिंह भारती महास्वामी" ने, जो दक्षिण श्रृंगेरी के आचार्य है ,
उन्होंने जनता के कल्याण तथा कृतघ्नता की निवृत्ति के लिए पवित्र कालटी जन्मभूमि में पुत्र सहित माता की स्मृति में दोनों के मंदिर का निर्माण किया ।

गुरुओं की जन्मभूमि में सरस्वती की स्थापना वेदोक्त मंत्रों से विधिपूर्वक की । योगिराज भारती जी ने ब्राह्मणों से कुम्भाभिषेक करवाया ।" ---- यह मंदिर का लेख है ।

आद्य शंकराचार्य गुरुवर की लीलाभूमि जो पूर्णा नदी के तटपर आज भी जनता को बोध कराती है, ऐसी महा-महिमा वाली भूमि के दर्शन मात्र से ही पाप नष्ट होते हैं ।

इस स्थान पर जगद्गुरु अभिनव सच्चिदानंद नरसिंह भारती जी ने व्याख्यान् पीठ का निर्माण करके श्री शंकराचार्य के माता की स्मृति में इस शिलालेख की स्थापना की है, ऐसे जगद्गुरु हमे धर्मज्ञान की दिशा निर्देश करते हुए चिरकाल तक जनमानस में जीवित रहें ।



आचार्य मंडनमिश्र के साथ भगवान आदि शंकराचार्य का शास्त्रार्थ पुर्व कटाक्ष वार्तालाप
"मैं जानता हूँ कि सबकुछ छोड़कर लोग बाबाजी कब बनते हैं , या तो विवाह के लिये कोई सुन्दर कन्या मिली नहीं होगी या फिर स्वयं सोचा होगा कि घर-गृहस्थी का झंझट कौन पाले ! एक तो पत्नी का भरण-पोषण की जिम्मेदारी फिर उसकी रक्षा करना और जब बाल-बच्चे हो तो उनकी भी जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी ।

यही सब सोचकर आलस्य में आपने पुस्तकों का भार छाती पर लादकर खूब विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराया , कई राजाओं को प्रभावित करके अपना शिष्य बनाया और अपनी ब्रह्मनिष्ठता भी क्या खूब प्रमाणित की ।"

---- गर्व में भरकर मण्डन मिश्र ने आचार्य शंकर के सम्मुख यह बातें कही ।

आचार्य शंकर ने सहज भाव से कहा --- "मुझे आलसी क्यों कहते हो ? जबकि आलसी तो आप प्रतीत होते हो ।

गुरुकुल में समझ लिया कि गुरुदेव की आजीवन सेवा करने में ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरुजी के अनुशासन में रहना होगा ; सांसारिक सुख-भोगों से दूर रहकर गुरु की सेवा करनी होगी , तो अजितेन्द्रीय होकर आलस्य में आप गुरुकुल से निवृत्त होकर स्त्रियों की सेवा करते हुए सांसारिक सुखोपभोग के पदार्थों में मौज लूट रहे हो । मैंने भी आपकी कर्मनिष्ठता खूब जान ली ।"

मण्डन मिश्र जी को तो विश्वास ही नहीं हुआ कि इतनी जल्दी प्रत्युत्तर आयेगा , वे तुरन्त आपे से बाहर होकर बोले ----

"स्थितोऽसि योषितां गर्भे ताभिरेव विवर्धित:।
अहो कृतघ्नता मूर्ख कथं ता एव निन्दसि ।।"

अरे मूर्ख ! तुमने स्त्रियों के गर्भ में निवास किया है , उन्होंने ही तुम्हारा भरण-पोषण किया है , फिर भी उनकी निन्दा कर रहे हो ! सचमुच तुम बड़े कृतघ्न हो ।

आचार्य शंकर ने तुरन्त कहा ---- "मुझे मूर्ख कहने से ही मैं मूर्ख सिद्ध नहीं होता , पहले यह बताइये ----

"यासां स्तन्यं त्वया पीतं यासां जातोऽसि योनित:।
तासु मूर्खतम स्त्रीषु पशुवद्रसे कथम् ।।"

जिन स्त्रियों का तुमने दूध पिया और जिनके द्वारा ही तुम्हारी उत्पत्ति हुई , उन्ही स्त्रियों में मूर्खों जैसे तुम पशुवत् रमण क्यों करते हो ?"

अब तो आचार्य मण्डन मिश्र से कुछ कहते नहीं बना ।

व्यक्तिगत कटाक्ष करते हुए आचार्य शंकर को आलसी सिद्ध करना चाहा पर स्वयं आलसी सिद्ध हो रहे हैं , फिर मूर्ख सिद्ध करना चाहा तो स्वयं मूर्ख सिद्ध हो रहे हैं ।

फिर दोनों कटाक्ष छोड़कर विषय बदलकर सैद्धांतिक चर्चा करने लगे ।

हर हर महादेव


★★★★★महान तांत्रिक आचार्य तोटक★★★★★
★★★★★★★★तोटकाचार्य★★★★★★★★

आदिगुरू भगवान् शंकराचार्य के शिष्यों में पद्यपाद, सुरेश्वर आदि परम विद्वान् शिष्य थे। विद्वान् शिष्यों की इस मण्डली में एक मूढ़मति, बेपढ़ा- लिखा एक बालक भी था। यह बालक बिना पढ़ा-लिखा भले ही था, परन्तु उसका हृदय आचार्य के प्रति भक्ति से भरा था।
आचार्य उसके लिए सर्वस्व थे। आचार्य की सेवा ही उसका
जीवन था। इसके अलावा उसे और कुछ भी न आता था।
उसकी मूढ़ता पर कभी- कभी आचार्य के अन्य शिष्य
उपहास भी कर लेते थे। पर इससे उसे कोई फर्क न पड़ता था वह तो बस गुरूगत प्राण था। गुरूसेवा के अलावा उसे और कोई चाह न थी ।। फिर भी आचार्य न जाने क्यों उसे अपनी सायं कक्षा में बुलाना न भूलते थे।

~एक दिन आचार्य शंकर की नियमित कक्षा का समय हो गया था।
पद्यपादाचार्य, सुरेश्वराचार्य, हस्तामलकाचार्य आदि सभी
भगवान् शंकराचार्य के श्रीचरणों के समीप आ जुटे थे; किन्तु आचार्य का वह सेवक शिष्य दिखाई नहीं दे रहा था। आचार्य को उसी की प्रतीक्षा थी। वह रह-रहकर इधर- उधर देख लेते। कक्षा में विलम्ब हो रहा था। उपस्थित शिष्यों में से प्रत्येक को प्रतीक्षा असह्य हो रही थी। सभी को भारी उत्सुकता थी कि उनके गुरूदेव ने आज नया क्या लिखा है। यह उत्सुकता अपने चरम बिन्दु पर जा पहुँची, पर कोई कुछ कह नहीं पा रहा था। अन्त में आचार्य पद्यपाद ने साहस किया, पाठ प्रारम्भ करने की कृपा करें
भगवन् ।। वत्स ! मुझे अपने एक शिष्य की प्रतीक्षा है। आचार्य ने उत्तर दिया। पर वह तो निरा विमूढ़ है भगवन्! उसका आना न आना दोनों ही एक जैसे हैं। पद्यपाद के स्वरों में विनम्रता होते हुए भी एक खीझ थी।

आचार्य भगवत्पादशंकर से यह बात छुपी न रही। उन्होंने यह जान लिया कि उनके इन विद्वान् शिष्यों को अपनी विद्वता का कुछ अभिमान हो आया है। शिष्यों का गर्वहरण करने वाले आचार्य शंकर मुस्कराए और एक क्षण के लिए ध्यानस्थ हो गए।
उनका वह शिष्य , जिनकी उन्हें प्रतीक्षा थी, उन्हीं के वस्त्र धोने के लिए गया था। यह उसका नित्य का कार्य था; किन्तु आज अचानक उसके अन्तःकरण में समस्त विद्याएँ एक साथ प्रकाशित हो गयी। वह गुरूकृपा की इस अनुभूति पर कृतकृत्य हो गया। अपने कांधे पर गुरूदेव के धुले वस्त्रों को लिए हाथ जोड़े तोटक छन्दों में आचार्य की स्तुति करते हुए वह चला आ रहा था।

विदिताखिलशास्त्र सुधा जलधे,
महितोपनिषत्कथितार्थनिधे।
हृदये कमले विमलं चरणं, भवशंकरदेशिक मम शरणम्॥
करूणावरूणालय पालयमाम्, भवसागरदुःखविदून हृदम्।
रचयाखिल दर्शन तत्त्वविदं,भव शंकरदेशिकमम शरणं।

~तोटक छन्द में स्व स्फुरित इस गुरू वन्दना को सुनकर वहाँ उपस्थित सभी अवाक् रह गए। उन्हें भारी अचरज तो तब हुआ,
~जब उसे आचार्य ने आदेश दिया- वत्स! आज मेरे स्थान पर तुम इन्हें ब्रह्मसूत्र पर मेरे मन्तव्य को समझाओ। इतना ही नहीं तुम इनके सम्मुख उन सूत्रों की व्याख्या भी करो, जिन पर अभी मैंने भाष्य नहीं लिखा है।
महान तांत्रिक तोटकाचार्य- जो आज्ञा गुरूदेव! कहकर
आचार्य की आज्ञा का पालन कर दिखाया। तोटकाचार्य की अनायास उदित हुई प्रखर प्रतिभा को देखकर सभी को इस सत्य की अनुभूति हो गयी कि तोटकाचार्य पर गुरू -कृपा बरस गयी है।

त्राहिमाम गुरूदेव! कहते हुए सभी शिष्य आचार्य शंकर के चरणों में गिर पड़े। आचार्य ने उन्हें निराभिमानी बनने की सलाह दी। सभी अनुभव कर रहे थे कि गुरू- कृपा से सब कुछ सम्भव है।

श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नमः
।।हर हर महादेव।।


#भवान्यष्टक_श्रीशंकराचार्यजी_द्वारा_रचित_मां_भवानी_
(_शिवा_ दुर्गा_)_का _शरणागति_स्तोत्र है
भगवान आद्य शंकराचार्य निर्गुण-निराकार अद्वैत परब्रह्म के उपासक थे। एक बार वे काशी आए तो वहां उन्हें अतिसार (दस्त) हो गया जिसकी वजह से वे अत्यन्त दुर्बल हो गए। अत्यन्त कृशकाय होकर वे एक स्थान पर बैठे थे। उन पर कृपा करने के लिए भगवती अन्नपूर्णा एक गोपी का वेष बनाकर दही का एक बहुत बड़ा पात्र लिए वहां आकर बैठ गयीं। कुछ देर बाद उस गोपी ने कहा-'स्वामीजी! मेरे इस घड़े को उठवा दीजिए।'

स्वामीजी ने कहा-'मां! मुझमें शक्ति नहीं है, मैं इसे उठवाने में असमर्थ हूँ।' मां ने कहा-'तुमने शक्ति की उपासना की होती, तब शक्ति आती। शक्ति की उपासना के बिना भला शक्ति कैसे आ सकती है?' यह सुनकर शंकराचार्यजी की आंखें खुल गयीं।
उन्होंने शक्ति की उपासना के लिए अनेक स्तोत्रों की रचना की। भगवान शंकराचार्यजी द्वारा स्थापित चार पीठ हैं। चारों में ही चार शक्तिपीठ हैं।
भवान्यष्टक श्रीशंकराचार्यजी द्वारा रचित मां भवानी (शिवा, दुर्गा) का शरणागति स्तोत्र है। माँ भवानी शरणागतवत्सला होकर अपने भक्त को भोग, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करती हैं। देवी की शरण में आए हुए मनुष्यों पर विपत्ति तो आती ही नहीं बल्कि वे शरण देने वाले हो जाते हैं।

भवानी अष्टक

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥१॥

हे भवानि! पिता, माता, भाई, दाता, पुत्र, पुत्री, भृत्य, स्वामी, स्त्री, विद्या और वृत्ति-इनमें से कोई भी मेरा नहीं है, हे देवि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्ही मेरी गति हो।
भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः
पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः।
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥२॥

मैं अपार भवसागर में पड़ा हूँ, महान दु:खों से भयभीत हूँ, कामी, लोभी, मतवाला तथा घृणायोग्य संसार के बन्धनों में बँधा हुआ हूँ, हे भवानि! अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो।

न जानामि दानं न च ध्यानयोगं
न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम्।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगम्
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥३॥

हे देवि! मैं न तो दान देना जानता हूँ और न ध्यानमार्ग का ही मुझे पता है, तन्त्र और स्तोत्र-मन्त्रों का भी मुझे ज्ञान नहीं है, पूजा तथा न्यास आदि की क्रियाओं से तो मैं एकदम कोरा हूँ,
अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो।

न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥४॥
न पुण्य जानता हूँ, न तीर्थ, न मुक्ति का पता है न लय का। हे माता! भक्ति और व्रत भी मुझे ज्ञात नहीं है, हे भवानि! अब केवल तुम्हीं मेरा सहारा हो।

कुकर्मी कुसंगी कुबुद्धिः कुदासः
कुलाचारहीनः कदाचारलीनः।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहम्
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥५॥

मैं कुकर्मी, बुरी संगति में रहने वाला, दुर्बुद्धि, दुष्टदास, कुलोचित सदाचार से हीन, दुराचारपरायण, कुत्सित दृष्टि रखने वाला और सदा दुर्वचन बोलने वाला हूँ, हे भवानि! मुझ अधम की एकमात्र तुम्हीं गति हो।

प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं
दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥६॥

मैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्य किसी भी देवता को नहीं जानता, हे शरण देने वाली भवानि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो।

विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे
जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥७॥
हे शरण्ये! तुम विवाद, विषाद, प्रमाद, परदेश, जल, अनल, पर्वत, वन तथा शत्रुओं के मध्य में सदा ही मेरी रक्षा करो, हे भवानि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो।

अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो
महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥८॥

हे भवानि! मैं सदा से ही अनाथ, दरिद्र, जरा-जीर्ण, रोगी, अत्यन्त दुर्बल, दीन, गूंगा, विपदा से ग्रस्त और नष्ट हूँ, अब तुम्हीं एकमात्र मेरी गति हो।
इति श्रीमच्छड़्कराचार्यकृतं भवान्यष्टकं सम्पूर्णम
#श्रीश_सहाय_सत्य_सनातन_धर्म_एवम_भारतीय_संस्कृति_सेवक
#भवान्यष्टक_श्रीशंकराचार्यजी_द्वारा_रचित_मां_भवानी_(_शिवा_ दुर्गा_)_का _शरणागति_स्तोत्र



आदी शंकराचार्य लिखित साहित्य

अष्टोत्तरसहस्रनामावलिः
उपदेशसहस्री
चर्पटपंजरिकास्तोत्रम्‌
तत्त्वविवेकाख्यम्
दत्तात्रेयस्तोत्रम्‌
द्वादशपंजरिकास्तोत्रम्‌
पंचदशी कूटस्थदीप.
चित्रदीप
तत्त्वविवेक
तृप्तिदीप
द्वैतविवेक
ध्यानदीप
नाटक दीप
पञ्चकोशविवेक
पञ्चमहाभूतविवेक
पञ्चकोशविवेक
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्द
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्द
ब्रह्मानन्दे योगानन्द
महावाक्यविवेक
विद्यानन्द
विषयानन्द

परापूजास्तोत्रम्‌
प्रपंचसार
भवान्यष्टकम्‌
लघुवाक्यवृत्ती
विवेकचूडामणि
सर्व वेदान्त सिद्धान्त सार संग्रह
साधनपंचकम
भाष्ये अध्यात्म पटल भाष्य
ईशोपनिषद भाष्य
ऐतरोपनिषद भाष्य
कठोपनिषद भाष्य
केनोपनिषद भाष्य
छांदोग्योपनिषद भाष्य
तैत्तिरीयोपनिषद भाष्य
नृसिंह पूर्वतपन्युपनिषद भाष्य
प्रश्नोपनिषद भाष्य
बृहदारण्यकोपनिषद भाष्य
ब्रह्मसूत्र भाष्य
भगवद्गीता भाष्य
ललिता त्रिशती भाष्य
हस्तामलकीय भाष्य
मंडूकोपनिषद कारिका भाष्य
मुंडकोपनिषद भाष्य
विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र भाष्य
सनत्‌सुजातीय भाष्य

छोट्या तत्त्वज्ञानविषक रचना (कंसात श्लोकसंख्या/ओवीसंख्या)
अद्वैत अनुभूति (८४)
अद्वैत पंचकम्‌ (५)
अनात्मा श्रीविगर्हण (१८)
अपरोक्षानुभूति (१४४)
उपदेश पंचकम्‌ किंवा साधन पंचकम्‌ (५)
एकश्लोकी (१)
कौपीनपंचकम्‌ (५)
जीवनमुक्त आनंदलहरी (१७)
तत्त्वोपदेश(८७)
धन्याष्टकम्‌ (८)
निर्वाण मंजरी (१२)
निर्वाणशतकम्‌ (६)
पंचीकरणम्‌ (गद्य)
प्रबोध सुधाकर (२५७)
प्रश्नोत्तर रत्‍नमालिका (६७)
प्रौढ अनुभूति (१७)
यति पंचकम्‌ (५)
योग तरावली(?) (२९)
वाक्यवृत्ति (५३)
शतश्लोकी (१००)
सदाचार अनुसंधानम्‌ (५५)
साधन पंचकम्‌ किंवा उपदेश पंचकम्‌ (५)
स्वरूपानुसंधान अष्टकम्‌ (९)
स्वात्म निरूपणम्‌ (१५३)
स्वात्मप्रकाशिका (६८)
गणेश स्तुतिपरगणेश पंचरत्‍नम्‌ (५)
गणेश भुजांगम्‌ (९)
शिवस्तुतिपरकालभैरव अष्टकम्‌ (१०)
दशश्लोकी स्तुति (१०)
दक्षिणमूर्ति अष्टकम्‌ (१०)
दक्षिणमूर्ति स्तोत्रम्‌ (१९)
दक्षिणमूर्ति वर्णमाला स्तोत्रम्‌ (१३)
मृत्युंजय मानसिक पूजा (४६)
वेदसार शिव स्तोत्रम्‌ (११)
शिव अपराधक्षमापन स्तोत्रम्‌ (१७)
शिव आनंदलहरी (१००)
शिव केशादिपादान्तवर्णन स्तोत्रम्‌ (२९)
शिव नामावलि अष्टकम्‌ (९)
शिव पंचाक्षर स्तोत्रम्‌ (६)
शिव पंचाक्षरा नक्षत्रमालास्तोत्रम्‌ (२८)
शिव पादादिकेशान्तवर्णनस्तोत्रम्‌ (४१)
शिव भुजांगम्‌ (४)
शिव मानस पूजा(५)
सुवर्णमाला स्तुति (५०)
शक्तिस्तुतिपरअन्‍नपूर्णा अष्टकम्‌ (८)
आनंदलहरी
कनकधारा स्तोत्रम्‌ (१८)
कल्याण वृष्टिस्तव (१६)
गौरी दशकम्‌ (११)
त्रिपुरसुंदरी अष्टकम्‌ (८)
त्रिपुरसुंदरी मानस पूजा (१२७)
त्रिपुरसुंदरी वेद पाद स्तोत्रम्‌ (१०)
देवी चतु:षष्ठी उपचार पूजा स्तोत्रम्‌ (७२)
देवी भुजांगम्‌ (२८)
नवरत्‍न मालिका (१०)
भवानी भुजांगम्‌ (१७)
भ्रमरांबा अष्टकम्‌ (९)
मंत्रमातृका पुष्पमालास्तव (१७)
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम्‌
ललिता पंचरत्नम्‌ (६)
शारदा भुजंगप्रयात स्तोत्रम्‌ (८)
सौंदर्यलहरी (१००)
विष्णू आणि त्याच्या अवतारांच्या स्तुतिपरअच्युताष्टकम्‌ (९)
कृष्णाष्टकम्‌ (८)
गोविंदाष्टकम्‌ (९)
जगन्‍नाथाष्टकम्‌ (८)
पांडुरंगाष्टकम्‌ (९)
भगवन्‌ मानस पूजा (१०)
मोहमुद्‌गार (भज गोविंदम्‌) (३१)
राम भुजंगप्रयात स्तोत्रम्‌ (२९)
लक्ष्मीनृसिंह करावलंब (करुणरस) स्तोत्रम्‌ (१७)
लक्ष्मीनरसिंह पंचरत्‍नम्‌ (५)
विष्णुपादादिकेशान्त स्तोत्रम्‌ (५२)
विष्णु भुजंगप्रयात स्तोत्रम्‌ (१४)
षट्‌पदीस्तोत्रम्‌ (७)
इतर देवतांच्या आणि तीर्थांच्या स्तुतिपरअर्धनारीश्वरस्तोत्रम्‌ (९)
उमा महेश्वर स्तोत्रम्‌ (१३)
काशी पंचकम्‌ (५)
गंगाष्टकम्‌ (९)
गुरु अष्टकम्‌ (१०)
नर्मदाष्टकम्‌ ९)
निर्गुण मानस पूजा (३३)
मनकर्णिका अष्टकम्‌ (९)
यमुनाष्टकम्‌ (८)
यमुनाष्टकम्‌-२ (९)

अष्ट -शंकरुद्घोष -

(१) श्री आद्य शंकराचार्य इस कलिकाल में सनातन हिन्दू धर्म के सर्वोच्च तथा प्रामाणिक जगद्गुरु हैं - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(२) श्री आद्य शंकराचार्य ने जो कहा है उसी के अनुकूल किसी भी वर्त्तमान संन्यासी अथवा अन्य धर्मोपदेशक का कथन मान्य है तद्विपरीत नही - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(३) श्री आद्य शंकराचार्य का विरचित शांकर भाष्य ही सनातन धर्म का यथार्थ अभिप्राय व्यक्तकरता है , यह भाष्य सनातन वैदिक धर्म का प्रामाणिक सार -सर्वस्व है - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(४) श्री आद्य शंकराचार्य के विरचित साहित्य का एक -एक वाक्य सनातन हिन्दू धर्म का सम्पोषक अमृतरस है - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(५) श्री आद्य शंकराचार्य का ध्यान , उनकी धारणा , उन पर दृढ विश्वास , उनके दर्शाए मार्ग का अनुगमन - ये हमारा धर्म है - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(६) श्री आद्य शंकराचार्य ब्राह्मणत्व के आदर्श , हिन्दुत्व के गौरव तथा कैवल्य के नायक हैं - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(७) श्री आद्य शंकराचार्य के कथन के अनुकूल श्रुत्यर्थ उचित है तथा प्रतिकूल श्रुत्यर्थ अनुचित है - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(८) श्री आद्य शंकराचार्य के सन्देश का प्रवर्तन , प्रवर्धन अथवा प्रचार -प्रसार ये प्रत्येक ब्राह्मण का कर्त्तव्य है और इसका अनुशीलन वा समर्थन प्रत्येक हिन्दू का कर्त्तव्य है - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

- शिवः केवलोsहम् ।।

श्रीजगद्गुरुभ्यो नमः ।।
धर्म की जय हो !
अधर्म का नाश हो !
प्राणियों में सद्भावना हो !
विश्व का कल्याण हो !
गोहत्या बंद हो !
गोमाता की जय हो !
हर हर महादेव !

साभार : आचार्यश्री ।

।। जय श्री राम ।।




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