संदेश

जनवरी, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

यज्ञ अधिकार विमर्श

🔥यज्ञ करने के अधिकारी 🔥 " वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनाद्धीत् , ग्रीष्मे राजन्यो वर्षासु वैश्यः। " ( शतपथब्राह्मण २|१|३|५ ) " वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत , ग्रीष्मे राजन्यम् , शरदि वैश्यम्। " ( आपस्तम्भधर्मसूत्र १|१|१|१९ ) उपर्युक्त श्रुतियों के द्वारा ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य इन तीन वर्णो को ही आधान ( अग्निहोत्र ) तथा उपनयन का अधिकार है -- अतः उपनीत ( यज्ञोपवीतधारी ) ही ' वेदस्वाध्याय ' का अधिकारी होता है और अधीत वेद - पुरूष ही याज्ञादि का अधिकारी होता है । " असतो वा एष सम्भूतः यच्छ्रूद्रः ।" ( तैत्तिरीयब्राह्मण ३|२|३|९ ) उपर्युक्त प्रमाणों से स्पष्ट है कि शूद्र द्विजाति धर्मों से बहिष्कृत है - उन्हें श्रौतयज्ञ करने का अधिकार नहीं है -- श्रौतयज्ञ करने का अधिकार केवल द्विजाति को ही है -- द्विजाति को भी प्रत्येक श्रौतयज्ञ करने का अधिकार नहीं है -- अधिकार की दृष्टि से द्विजाति के लिये भी पृथक् - पृथक् यज्ञ करने का निर्देश किया ग...

एकलव्य भ्रमभंजन

■●> एकलव्य :-- एक शास्त्रीय दृष्टिकोण महाभारत को काल्पनिक कहने वाले पाश्चात्यविद् तथा वामपन्थी इतिहासकार एकलब्य बिषय को बार बार उठाकर जनमानस में वैमनस्यता का बीज बोता है इन तथाकथित इतिहासकारों के अनुसार विश्वविख्यात अयाख्यान महाभारत जब काल्पनिक ही है तो उसमें आये हुए कथानक वास्तविका कैसे ?? उन धूर्त तथाकथित इतिहासकारों के सामने प्रथम यही प्रश्न रखना चाहिए फिर देखिए क्या होता है । अस्तु यह एक ऐसा बिषय है जिसकी भ्रांति जनमानस में ऐसा व्याप्त है बड़े से बड़ा विद्वान भी इस बिषय को लेकर यह तक कह डालते है कि एकलव्य के साथ जो हुआ वह न्याय नही है ___________________________________________________ सनातन धर्म मे जितनी महता एक श्रोतीय ब्राह्मण की है उतनी ही महता एक स्वधर्मप्रायण शुद्र की है ■● अपि शुद्रं च धर्मज्ञं सद् वृत्तमभिपूजयेत् (महाभारत अनुशाशन पर्व ४८/४८) स्व स्व धर्मानुरक्त धर्मानुरागी का सम्मान तो स्वयं ईश्वर भी करता है इस लिए शूद्रकुल में उतपन्न हुए विदुर को भी साक्षात् धर्म का अंश माना गया ,निषादराज गुह्य तो हमारे इष्टदेव श्रीरामचन्द्र के सखा तक हुए फिर निषादराज ह...