आद्य शंकराचार्य जीवन दर्शन
*#आद्य_शंकराचार्य_जीवन_दर्शन* ~~~~~ *#अवतरण* : वर्तमान विक्रम संवत २०४३ से २४६४ वर्ष पूर्व उस समय प्रचलित युधिष्ठिर संवत शक २६३१ के वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को केरल प्रदेश के कालटी नामक ग्राम में स्वनामधन्य विद्याधिराज के पुत्र परमतपस्वी, ज्ञान में शिव एवं वचन में गुरू वृहस्पति के समान सम्पूण वेद-वेदाङ्ग में परमनिष्णात, यज्ञ-यागादि समस्त वैदिक क्रियाओं से सम्पन्न पण्डित 'शिवगुरू की नाम्नी धर्मपत्नी ने उसी प्रकार पुत्र उत्पन्न किया जिस प्रकार जगदम्बा पार्वती जी ने कुमार कातिकेय को जन्म दिया था। उस समय शुभ ग्रहों से युक्त शुभ लग्न थी, शुभरात्रि में देखें जाने पर सूर्य, मंगल और शनि उच्चस्थिति में अवस्थित थे तथा गुरू केन्द्र में स्थित थे। 'लग्ने शुभे शुभयुते सुषवे कुमारं श्री पार्वतीव सुखिनी शुभ वीक्षिते च। जाया सती शिवगुरानिज तुङ्गसंस्थे सूर्य कुजे रविसुते च गुरौ च केंद्रे। पिता 'शिवगुरू' जी ने इनका नामकरण किया 'शंकर' । ब्राह्मणदम्पत्ति ने घोर तपस्योपरान्त बालक को पाया था। स्वयं भगवान शंकर ने स्वप्न में प्रगट होकर पूछा था 'विप्र। स...