आद्य शंकराचार्य जीवन दर्शन
*#आद्य_शंकराचार्य_जीवन_दर्शन* ~~~~~
*#अवतरण* :
वर्तमान विक्रम संवत २०४३ से २४६४ वर्ष पूर्व उस समय प्रचलित युधिष्ठिर संवत शक २६३१ के वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को केरल प्रदेश के कालटी नामक ग्राम में स्वनामधन्य विद्याधिराज के पुत्र परमतपस्वी, ज्ञान में शिव एवं वचन में गुरू वृहस्पति के समान सम्पूण वेद-वेदाङ्ग में परमनिष्णात, यज्ञ-यागादि समस्त वैदिक क्रियाओं से सम्पन्न पण्डित 'शिवगुरू की नाम्नी धर्मपत्नी ने उसी प्रकार पुत्र उत्पन्न किया जिस प्रकार जगदम्बा पार्वती जी ने कुमार कातिकेय को जन्म दिया था। उस समय शुभ ग्रहों से युक्त शुभ लग्न थी, शुभरात्रि में देखें जाने पर सूर्य, मंगल और शनि उच्चस्थिति में अवस्थित थे तथा गुरू केन्द्र में स्थित थे।
'लग्ने शुभे शुभयुते सुषवे कुमारं श्री पार्वतीव सुखिनी शुभ वीक्षिते च।
जाया सती शिवगुरानिज तुङ्गसंस्थे सूर्य कुजे रविसुते च गुरौ च केंद्रे।
पिता 'शिवगुरू' जी ने इनका नामकरण किया 'शंकर' । ब्राह्मणदम्पत्ति ने घोर तपस्योपरान्त बालक को पाया था। स्वयं भगवान शंकर ने स्वप्न में प्रगट होकर पूछा था 'विप्र। सर्वगुण सम्पन्न सर्वज्ञ एक अल्पायु पुत्र चाहते हो अथवा विपरीत आचरण वाले अल्पगुण सम्पन्न अधिक आयु वाले अनेक पुत्र ?' शिवगुरू ने 'बहुगुण सम्पन्न प्रतापशाली सर्वज्ञ'-पुत्र की याचना की। 'तथास्तु' कहकर शिव चले गये और उसी दिन भोजन के लिए प्रस्तुत भात में भगवान शंकर का तेज प्रविष्ट हो गया।
तस्मिन् दिने शिव गुरोरुपभोक्ष्यमाणे भक्त प्रविष्टमभवत्किल शैवतेजः'-इस
प्रकार 'शंकर' के रूप में स्वयं भगवान शंकर अवतरित हुए।
#अध्ययन :
प्रथम वर्ष में ही समस्त वर्णमाला एवं मलयालम सीखली। द्वितीय वर्ष में सब कुछ पढ़ने लिखने लगे । तृतीय वर्ष में काव्य-पुराण आदि को बिना परिश्रम एवं मनन किये सहज भाव से स्वयं समझ लिया। चतुर्थ वर्ष में ही थे शंकर अभी कि पिताश्री शिवसायुज्य को प्राप्त हो गये। माता ने यधिष्ठिर शक संवत् २६३६ में पांच वर्ष की आयु में बटुक शंकर का यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न करा दिया। गुरूकूल में शंकर विद्यार्जन करने लगे। स्वल्प काल में ही सम्पूर्ण वेद-वेदाङ्गों का अध्ययन कर लिया तथा तदुपरान्त दो-तीन मास में ही सम्पूर्ण शास्त्रों आगमों आदि को भली प्रकार सीख लिया।
बटुक शंकर भिक्षा लेने एक कुटीर पर पहुँचे । 'भिक्षादेहिमाम्' कहने पर बृद्धा ब्राह्मणी बोली 'धन्य हैं वे जो आप जैसे महापुरुषों की सेवा करते हैं।'-'बेटा ! मैं तो अत्यन्त निर्धन है कुछ भी देने में समर्थ नहीं है। केवल यह एक आँवला पड़ा है मेरे पास तू यही ले ले'-यह कहते हुए अश्रपूर्ण नेत्रों से वृद्धा ने वह आँवला शंकर की छोटी सी हथेली पर रख दिया और अपनी विवशता पर अश्रुपात करते हुए उसने हाथ जोड़ दिये । शंकर पिघल गये तुरन्त मां लक्ष्मी की स्तुति की और उस सुखे आँवले के दान के पुण्य के फलस्वरूप लक्ष्मी ने ब्राह्मणी के घर में स्वर्ण के आँवलों की वर्षा की। इस महिमा से सर्वत्र सब आश्चर्यचकित थे।
इन दो वर्षों में शंकर ने वेद, वेदांग, दर्शन, इतिहास, पुराण, स्मृति, महाभारत आदि सम्पूर्ण बैदिक वाङ्गमय का गहन गम्भीर अध्ययन करके 'सर्वज्ञ' पद प्राप्त कर लिया।
*#मातृसेवा_अध्यापन_ऋषि_दर्शन* :
छह वर्षीय बालक शंकर सातवें वर्ष में ही विद्याध्ययन सम्पन्न करके घर लौट आये. घर पर ही मात-सुश्रुषा, वेदाध्ययन, अग्नि व सूर्य की आराधना में निरत रहते हुए अनेकों को विद्यादान करने लगे। एक दिन माता स्नान हेतु नदी पर न जा सकी, गर्मी के कारण मार्ग में ही मूर्छित गिर पड़ीं। जब शंकर ने देखा तो माता को घर उठा लाये और नदी की स्तुति की कि माता के लिये नदी की धारा घर के पास ही आ जाये-अगले दिन ब्रह्ममुहुर्त में ही नदी कटियार बह रही थी। माता प्रसन्न थीं।
केरल नरेश ने शंकर की ख्याति सुनकर अनेक भेंट लेकर मन्त्री को भेजा परन्तु शंकर विनम्रतापूर्वक वापिस लौटा दिया। स्वयं राजा ने उपस्थित होकर दशसहस्र सुवर्णमुद्राएँ भेंट और स्वरचित तीन संस्कृत नाटक शंकर को सुनाए । शंकर ने सन्तुष्ट होकर कहा 'वरंब्रूहि ।' राजा ने पुत्र की कामना की। शंकर ने मुद्राओं को अस्वीकार करते हुए पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया।
घर पर शंकर अध्ययन के साथ-साथ अध्यापन भी कर रहे थे। हितैषियों ने शंकर के लिये कन्या ढूंढनी प्रारम्भ कर दी। इसी समय शंकरावतार के दर्शन करने अन्य लोक-लोकान्तरों से विशेष विभूतियाँ शंकर के घर पधारी। उनमें
उपमन्यु, दधीचि, गौतम, त्रितल, अगस्त्य आदि ऋषिगण प्रमुख थे। माता 'सती' ने ऋषि-मुनियों की पूजा की और बालक की आयु कितनी है ? ऐसी जिज्ञासा व्यक्त की। महर्षि अगस्त्य ने बताया कि इनकी आयु आठ वर्ष की ही है: आठ वर्ष और होगी। परन्तु किसी अन्य कारण से इन्हें सोलहवर्ष की आयु और
प्राप्त होगी। कुल बत्तीस वर्ष की इनकी आयु होगी। इतना सुनकर माता खिन्न हो गयी । तब शंकर ने ज्ञानोपदेश देकर माता को सान्त्वना दी और स्वयं सन्यास लेकर मुक्ति प्राप्त करने की आज्ञा चाही। माँ ने रो रोकर शंकर से कहा 'बेटा ! तेरे बिना मैं अकेली वृद्धा क्या करूंगी?'-शंकर चुप थे।
*#सन्यास_एवं_गृहत्याग* :
शंकर के मन में वैराग्य हिलोरें ले रहा था माता उन्हें छोड़ती नहीं थी। एक दिन जब शंकर माता के साथ नदी पर स्नान कर रहे थे तब उनका पैर मगर ने पकड़ लिया। शंकर ने कहा 'माता यदि तुम मुझे सन्यास लेने की आज्ञा दे दो तो यह मगरमच्छ मुझे छोड़ देगा'। माँ ने सोचा अरे जीवित तो रहेगा सन्यासी रूप में ही सही बस तुरन्त आज्ञा दे दी। सातवर्षीय बटुक शंकर ने तुरन्त मानसिक सन्यास ले लिया और तत्क्षण मकर ने छोड़ दिया। माता को यह आश्वासन देकर कि 'जब भी आप मेरा ध्यान करोगी, स्मरण करोगी उसी समय मैं उपस्थित हो जाऊंगा और मत्य के पश्चात् सन्यासी होते हुए भी स्वयं तुम्हारा दाहसंस्कार करूंगा। '-शंकर ने माता को प्रणाम किया और युधिष्ठिर संवत २६३८ में घर त्याग कर चल दिये गुरु की खोज में ।
*#गुरुसेवा* :
कालटी (केरल) से चलकर शंकर नर्मदा तट पर आचार्य गोविन्द गुहा पर पहुचे औचे और गुहाद्वार से ही प्रार्थना की कि-'आप महर्षि वेदव्यास के पुत्र श्री शुकदेव जी के शिष्य आ गौड़पाद से वेदान्त तत्व की शिक्षाग्रहण करके अनन्तगणों से विभूषित हैं; मैं (शंकर) भक्ति पूर्वक आपके पास वेदान्त पढ़ने के लिए उपस्थित हुआ है-सुनते ही गोविन्दाचार्य जी ने पूछा जा ने पूछा 'तुम कौन हो' ? शंकर ने निज स्वरूप का परिचय दिया। सुनते ही आचार्य गोविन्दपाद ने कहा-'मने समाधि दृष्टि से जान लिया है कि तुम साक्षात शंकर हो'। शंकर ने गुरूचरणों में प्रणाम किया आर , उन्हें प्रसन्न किया।
*#चाण्डाल_संवाद* :
मध्याह्नकालीन सूर्य की प्रखर किरणों से काशी की विथिकाए सन्तप्त हो रही थीं। शंकर गंगातट की ओर बढ़े जा रहे थे कि गली में मार्ग अवरुद्ध किये भयानक कुत्तों के साथ चाण्डाल खड़ा था। शंकर ने कहा-'दूर हटो'। चाण्डाल बोला-'दूर हटो से तुम्हारा अभिप्राय शरीर से है या शरीरी से ! -'यह शरीर अन्नमय है क्या एक शरीर से दूसरा शरीर अन्नमय से भिन्न है ?-शरीर गत जीव हमारी क्रियाओं का दृष्टा रूप से साक्षी बना है, तब क्या एक साक्षी दूसरे साक्षी से पृथक है ? जिस प्रकार गंगाजल और मदिरा में पड़ने वाला सूर्य का प्रतिबिम्ब भले ही अलग अलग दीखता हो परन्तु दोनों में प्रतिबिम्बित सूर्य तो एक ही है । मैं पवित्र ब्राह्मण हूँ तुम श्वपच हो अतः दूर हटो यह आपका आग्रह मिथ्या है-आप अज्ञान द्वारा निजस्वरूप को भुलाकर इस नश्वर शरीर में अहं भाव क्यों कर रहे हो? मोक्ष विद्या प्राप्त करके भी ऐसी भावना क्यों जागृत हो रही है-आश्चर्य है कि आप जैसे महापुरूष भी उस मायावी के इन्द्रजाल में फंस रहे है। तत्त्व दृष्टि से ब्राह्मण और चाण्डाल के शरीरों में कोई भेद है ? 'एकमेवाद्वितीयम्'-इस ब्रह्मतत्त्व में तुम प्रतिष्ठित हो फिर भी मिथ्या अभिमान करते हो...........'यह कह कर वह चाण्डाल चुप हो गया। शंकर बोले-'आपने नितान्त सत्य कहा है, तुम आत्मज्ञानी हो, तुम्हारे वचन से अन्त्यज होने का संदेह मैं हटा रहा है। जिसकी दृष्टि में यह सम्पूर्ण विश्व नित्य आत्मरूप से प्रकाशित होता है, जो चैतन्य विष्णु शिव आदि देवों में स्फुरित होता है वही चैतन्य शुद्ध अन्यान्य जीवों में भी स्फुरित है-वह चैतन्य में है यह दृश्य जगत नहीं- ऐसी जिसकी दृढ़ बुद्धि है वह मेरा गुरु है। इस संसार में विषय के अनुभव के समय जहां जहां ज्ञान उत्पन्न होता है वहां वहां सर्वउपाधि रहित ज्ञानस्वरूप में ही हूँ, मुझसे भिन्न अन्य कोई पदार्थ नहीं ऐसी जिसकी निश्चयात्मिका दृढ़ बुद्धि है वह भले ही चाण्डाल हो मेरा गुरु है- ब्रह्म ज्ञानी शंकर के इतना कहते ही न वहाँ चाण्डाल था न कुत्ते अपितु चारों वेदों के साथ भगवान शंकर स्वयं बड़े मुसकरा रहे थे काशी के मणिकर्णिका घाट की उस गली में; उनके मस्तक पर द्वितीया का चन्द्रमा सुशोभित था। शंकर ने सहसा सम्भ्रम में पड़कर स्तुति की-
पदासस्तेऽहं देहदृष्ट्याऽस्मिशम्भो, जातस्तेऽशो जीव दृष्ट्या त्रिदृष्टे ।
सर्वस्याऽत्मन्नात्म दृष्ट्या त्वमेवेत्येवं में धीनिश्चिता सर्व शास्त्रः ॥"
शंकर ने अनेक विध भगवान शिव की स्तुति की। उनके उदार वचन सुनकर विश्वनाथ बोले-'तुमने हमारा स्वरूप प्राप्त कर लिया है । वेदव्यास ने एकत्र वैदिक मन्त्रों का विभाग करके ब्रह्मसूत्र' की रचना की है जिसमें कणाद, सांख्य, बौद्ध, जैन आदिक वेद विरुद्ध मतों का समूल खण्डन किया गया है। मूर्ख व्यक्तियों ने वेद के एक दो या तीन वचनों के प्रमाण से अपने कुत्सित भाष्यों की रचना की है, जिसे बहुत से विद्वानों ने दूषित भी कर दिया है। शंकर ! आप वेद के रहस्य को जानते हो, अतः इन दुष्ट मतों का खण्डन करके उस भाष्य की रचना करो जो श्रुति के द्वारा पुष्ट की गयी युक्तियों से युक्त हो । इस भाष्य का विशेष गौरव होगा । भास्कर, अभिनव-गुप्त, प्रभाकर, मण्डन जैसे विख्यात पण्डितों को जीतकर भारत में ब्रह्मतत्व की स्थापना करो। अपने शिष्यों को भिन्न भिन्न स्थानों में वेदान्तमार्ग के परिपालन के लिये रखकर पीछे कृतार्थ होकर मेरे पास चले आना'- इस प्रकार भूत भावन सदाशिव विश्वनाथ भगवान शंकर-यति शंकर को आदेश-निर्देश एवं आशीर्वाद देकर वेदों सहित अन्तर्धान हो गये-यति शंकर हाथ जोड़े खड़े थे।
*#भाष्य_रचना* :
भगवान विश्वनाथ से आशीर्वाद पाकर यतिशंकर बदरिकाश्रम पहुँचे । वहाँ समाधि में ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा शास्त्रार्थ का आलोचन किया। अन्य ब्रह्मर्षियों से वेदान्त विचार किया और फिर गम्भीर, मधुर भाष्य की रचना की । 'भव्यं गंभीर मधुरं भणतिस्म भाष्यम्'। इसी समय शंकर ने उपनिषदों पर भाष्य रचे । महाभारत एवं श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्याएं लिखी। सनत्सुजातीय और नृसिंह तापनीयोपनिषद पर भाष्य लिखे। उपदेश-सहस्री दशश्लोकी आदि अनेकों स्वतन्त्र ग्रन्थों की रचना की। विपक्षियों को शंकर का उद्भव सहन नहीं हुआ उन्होंने अपने अपने मतों को बड़े प्रबल तर्कों से शंकर के समक्ष रखा परन्तु शंकर ने बड़ी कुशलता से सबका खण्डन कर डाला। पाशुपतमताबलम्बी पराभूत हो गये । शून्यबादी बौद्ध लोग आत्मा की ही हत्या करने उसके पीछे भागते थे । कणाद से आत्मा ने अपनी सत्ता प्राप्त की। कुमारिल ने आत्मा को गन्तव्य पर पहुँचने का मार्ग भर दिखलाया और बस । सांख्य ने केवल दुःख निवारण भर किया । योगियों ने प्राणायाम द्वारा उसकी पूज्यता स्थापित की। चार्वाक ने आत्मा का ही तिरस्कार किया। वैशेषिक ने आत्मा को कर्ता मानकर उसे सुख-दुःख-ज्ञान आदि का कर्ता ही बना डाला । कुमारिलमतावलम्बियों
ने पंच भूतों से अलग यज्ञादिविधि के अनुष्ठान में उसे अनुरक्त बना डाला। सांख्य ने उसके मत को हटाकर प्रकृति के पराधीन कर दिया इस प्रकार सबने अपनी अपनी अलग धारणा बना कर भारतीय वैदिक विचार दर्शन को बिखराव की स्थिति में पहुँचा दिया। इसके अतिरिक्त वाममार्गी आदि मत इस पवित्र राष्ट्र में पनप रहे थे जो सर्वथा वेद विरुद्ध थे। ऐसे भीषण काल में शंकर ने आकर उस सर्वव्यापी आत्मा को परमात्मा बना दिया; उसे सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान, सर्वाधिष्ठान बनाकर पुनः इस पुरातन-सनातन देश में प्रतिष्ठित कर दिया। उनको इस वैचारिक क्रान्ति में सहयोग प्रदान करने के लिये जो महान-दिव्यात्माएं पधारी थीं उनके नाम का संकेत पूर्व पृष्ठ में किया जा चुका है।
हिमालय प्रवास एवं इस यात्राकाल में भी शंकर ने अनेक महत्वपूर्ण आश्चर्यजनक एवं ऐतिहासिक कार्य सम्पन्न कर वैदिक धर्म की रक्षा की। ऋषिकेश में गंगा में से विष्णुमूर्ति निकालकर प्रतिष्ठा की । नरबलि की कुप्रथा का निवारण किया। नारदकुण्ड से भगवान बद्रीनाथ की मूर्ति निकालकर पुनः स्थापना की। बद्रीनाथ मन्दिर का पुननिर्माण कराया। ब्रह्मज्योति के दर्शन किये और ज्योतिर्मठ की स्थापना युधिष्ठिर संवत २६४२-४३ में की। केदारनाथ में शीतनिवारण हेतु तप्तकुण्ड अनुसन्धान पूर्वक शिष्यों को शीत मुक्ति दिलायो। इस समय भाष्यकार शंकर की आयु बारह वर्ष थी।
*#शंकर_व्यास_शास्त्रार्थ* :
शंकर अपनी शिष्य मण्डली सहित वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार करते हुए अवैदिक पाखण्डी मत-मतान्तरों का मौलिक खण्डन करते हुए पुनः काशी पधारे । एक दिन वे अपने शिष्यों को शारीरिक भाष्य पढ़ा रहे थे कि एक ब्राह्मण ने आकर आचार्य से प्रश्न किया-'तुम कौन हो, क्या पढ़ा रहे हो !'-आचार्य के स्थान पर एक विद्यार्थी ने ही उत्तर दिया कि 'सम्पूर्ण उपनिषदों में स्वतन्त्र ये हमारे गुरू हैं, इन्होंने द्वैतवाद को दूर करने वाला ब्रह्मसूत्रों पर भाष्य लिखा है।'-ब्राह्मण बोले-'यदि महर्षि वेदव्यास प्रणीत सूत्रों का तुम अर्थ जानते हो तो एक सूत्र की व्याख्या करो।' 'मैं सूत्रों के अर्थ जानने का कभी अहंकार नहीं करता, सूत्रार्थ वेत्ता गुरूजनों को मैं नमस्कार करता हूँ। जो आप पूछेगे उसका उत्तर दूंगा?'शंकराचार्य ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया।
ब्राह्मण ने सूत्र बोला-'तदन्तर प्रतिपत्तौरहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम्' (३.१.) और कहा कि इसका अर्थ कहो । शंकर ने तत्क्षण उत्तर दिया कि-'इन्द्रियों के अवसन्न होने पर अर्थात् मरण के समय अन्य शरीर प्राप्ति के लिये जीव पंचभूतों के सूक्ष्म अवयवों से संयुक्त होकर दूसरे स्थान में जाता है । इस विषय का निरूपण 'ताण्डिश्रुति' में गौतम तथा जाबालि के प्रश्नोत्तर में किया गया है।
ब्राह्मण ने इस उत्तर को सुनकर उस पर अनेकार्थक विकल्प उपस्थित कर दिये और शंकर द्वारा प्रस्तुत अर्थ का खण्डन कर दिया। आचार्य शंकर ने भी उन ब्राह्मण द्वारा उपस्थापित सैकड़ों वचनों का सैंकड़ों प्रकार के प्रबल एवं पुष्ट तर्कों द्वारा पुनः खण्डन कर दिया तथा अपने पूर्वोक्त उत्तर का समारोहपूर्वक मण्डन कर दिया। यह विवाद निरन्तर आठ दिन तक चला। सब शिष्यमण्डली आश्चर्यचकित थी कि यह विद्वान् ब्राह्मण कौन हैं-तब पद्मपाद ने योग दृष्टि से देखा तो पाया कि वह महापुरुष और कोई नहीं स्वयं महर्षि वेदव्यास जी ही हैं। अपने गुरू से बोले-'हे आचार्य शंकर ! आप साक्षात् शंकर हो तथा व्यास स्वयं नारायण हैं-इन दोनों में विवाद होने पर मैं आपका दास क्या करूं?'।
"त्वं शंकरः शंकर एव साक्षाद् व्यासस्तु नारायण एव नूनम् ।
तयोर्विवादे सततं प्रसक्ते किं किंकरोऽहं करवाणि सद्यः ॥"
शिष्य के उक्त रहस्यमय बचन सुनकर आचार्य शंकर ने ब्रह्मसूत्र के रचयिता भगवान वेदव्यास के दर्शन लालसा से करबद्ध होकर प्रणाम किया तथा स्तुति की। सूत्रकार वेदव्यास जी ने सूत्रों पर भाष्य रचना करने वाले भाष्यकार आचार्य शंकर से कहा कि-'तुम्हारे अखण्ड पाण्डित्य को हमने जान लिया है । तुम शुकदेव की तरह मुझे प्रिय हो'-शंकर ने अत्यन्त विनम्रतापूर्वक निवेदन किया कि- 'पूज्य ऋषिगण जिनके शिष्य हैं वहाँ तिनके से भी लघुतर मैं किस गिनती में है; आपके सूत्ररूपी सूर्य की अपने भाष्यरूपी दीपक से आरती उतार कर मैं धृष्टता से लज्जित नहीं हो रहा हूँ।'-अब व्यास जी ने भाष्य को भली प्रकार पढ़कर कहा-'तुम मीमांसकों में भी मुख्य हो, सम्पूर्ण व्याकरण के ज्ञाता हो, तुम्हारे मुख से अशुद्ध शब्द कैसे निकल सकते हैं? मेरे भाव के अनुसार भाष्य रचना में अन्य कोई समर्थ नहीं है । तुम साक्षात् शंकर के अवतार हो। वेदान्त विद्या पर ग्रन्थ लिखो और भेदवादी विद्वानों को जीतकर वेदान्त मत का प्रचार करो-मैं इच्छानुसार जा रहा हूँ।' शंकर बोले-'मैंने भाष्यों की रचना की, शिष्यों को पढ़ाया, दुष्टमतों का खण्डन कर दिया। अब क्या कर्तव्य है ? आप कुछ क्षण यहाँ मणिकर्णिका घाट पर ठहरें। मेरी आयु समाप्ति पर है अतएव मैं इस शरीर को आपके सम्मुख ही त्याग दूं।"-'नहीं वत्स ! ऐसा न करो। अभी अनेकों विद्वानों को जीतना शेष है। मैं तुम्हें, और सोलह वर्ष की आयु प्रदान करता हूँ। अभी विपक्षियों को जीतने के लिये और सोलह वर्ष पृथ्वी पर रहो'-यह कहकर महर्षि वेदव्यास जी अन्तर्धान हो गये। इस प्रकार युधिष्ठिर संवत २६४७ में गुरू आज्ञा से शंकराचार्य ने दिग्विजय करने का संकल्प लिया।
*#कुमारिल_भट्टपाद_से_भेंट*
षोडश वर्षीय किशोर सन्यासी अब शिष्य मण्डली सहित काशी से प्रयाग पहुंचे वहां मीमांसकाचार्य कुमारिल भट्ट अपने बौद्ध गुरू के सिद्धान्तों के खण्डन जनित दोष का प्रायश्चित करने के लिये तुषानल में बैठकर शरीर त्यागने की दीक्षा लिये त्रिवेणीतट पर विराज रहे थे। आचार्य तुरन्त कुमारिल भट्ट के पास पहुँचे । भट्ट जी चारों ओर से अनेक शिष्यों से घिरे हुए थे जो उनकी स्तुति कर रहे थे और कुमारिल जिनका आधा शरीर जल चुका था शान्त भाव से तुषाग्नि के मध्य विराज रहे थे। उन्होंने आचार्य शंकर का सांगोपांग पूजन कराया । आचार्य ने स्वरचित भाष्य कुमारिल को दिखलाया। भाष्यावलोकन कर वे बोले-'यदि मैं प्रायश्चित स्वरूप शरीर त्याग रूपी व्रत की दीक्षा न लिये होता तो आपके इस अद्भुत भाष्य पर ग्रन्थ लिखता । केवल अध्यास पर ही आठ हजार वार्तिक बन सकते थे। आपके दर्शन की चिरआकांक्षा थी अन्तिम समय में दर्शन कर मैं कृतार्थ हो गया। सारा संसार अवैदिक बौद्धों से आक्रान्त हो गया था, वेदमार्ग की रक्षार्थ बौद्ध विद्यार्थी बन कर मैंने बौद्ध गुरू से उनके सिद्धान्तों का अध्ययन किया फिर उन्हीं गुरू को शास्त्रार्थ में पराजित किया। इस प्रकार विद्यागुरू का तिरस्कार एवं जैमिनी मुनि जी द्वारा प्रदर्शित शास्त्र में अभिनिवेश रखकर परमात्मा का निराकरण किया-इन दोनों महान दोषों का निवारण करने हेतु मैंने विधिवत् दीक्षा लेकर इस तुषानल में शनैः शनैः जलकर इस देह को भस्म करने का व्रत लिया है- आचार्य शंकर ने तुरन्त कहा-'अरे ! आपके चरित्र में दोष एवं पातक को स्थान ही नहीं है, यह व्रत तो सज्जनों की शिक्षा के लिये कर रहे हैं। मैं अभी अपने हाथ से जल छिड़ककर आपको पूर्ववत् स्वस्थ किये देता हूँ आप मेरे भाष्य पर वार्तिक अवश्य लिखें-'-'नहीं ! मैं व्रत त्याग रूप, लोक विरुद्ध कार्य नहीं कर सकता । आपमें तो मुझे पूनः जीवित-स्वस्थ करने की शक्तिसामर्थ्य है-यह भी मैं जानता हूं, परन्तु मैं इसे त्याग नहीं सकता-आप मुझे तारक मन्त्र का उपदेश करें। मेरे पट्टशिष्य मण्डनमिश्र को जीतें वह सर्वशास्त्र निष्णात है, मुझसे भी योग्य है वही भाष्य पर वार्तिक लिखेगा-चावल की भूसी में शरीर को जलाते हुए अविचलित बैठे हुए उन धर्मनिष्ठ वेदज्ञ बाहमण भट्टपाद कुमारिल ने सहज भाव से निवेदन किया।
आचार्य शङ्कर ने सुख-स्वरूप ब्रह्म का उपदेश उन महा पण्डित कुमारिल भट्ट को दिया और इस प्रकार इस आदर्श ब्राह्मण ने अपना व्रत पूरा किया।
#मण्डनमिश्र से शास्त्रार्थ :
प्रयाग से माहिष्मती नगरी के लिये आचार्य श्री ने तुरन्त आकाशमार्ग से गमन किया और निज योग बल से वे मण्डनमिश्र के घर पहुँच गये। उनके विशाल भव्य भवन के पट बन्द थे। परन्तु योगबल से आचार्य मिश्र जी के आंगन में जा पहुँचे। उनके यहां श्राद्ध था अपने तपोबल से उन्होंने महर्षि वेदव्यास और आचार्य जैमिनि को बूला रखा था। मिश्रजी उनके चरण धो रहे थे। शिखा-सूत्र-विहीन गैरिक वस्त्रधारी सन्यासी शङ्कर को देखते ही मिश्रजी क्रोधित हो गये क्योकि श्राद्ध में सन्यासी वजित है, तुरन्त बोल उठे-'कुतोमुण्डी'-मुण्डी कहाँ से ? .
'आगलान्मुण्डी'-मैं गले तक मुण्डी है-शङ्कर का उत्तर था।
'पन्थास्ते पृच्छ्य तेमया'-मैं आपके रास्ते को पूछता है कि आप कहाँ से आये हैं ? -मिश्रजी बोले ।
'किमाहपन्थाः'-मार्ग से पूछने पर उसने क्या उत्तर दिया ?' -शंकर बोले।
'त्वन्मातामुण्डेत्याह यथैवहि'-'मार्ग ने मुझे उत्तर दिया कि तुम्हारी माता मुण्डा है-' मिश्रजी ने क्रोधित होकर कहा।
'पन्थानं त्वमपृच्छस्त्वां पन्थाः प्रत्याह मण्डन । त्वन्मातेत्यत्रं शब्दोऽयं न मा ब्रू याद-पृच्छकम्'-तुरन्त शङ्कर ने उत्तर दिया कि 'तुमने ही मार्ग से पूछा अतः उसका उत्तर तुम्हारे लिये है। मैंने तो मार्ग से कुछ पूछा नहीं है अतः उसका उत्तर मेरे विषय में नहीं है।
अहो पीताकिमु सुरा'-'क्या सुरा पी ली है-मण्डन मिश्र ने कहा ।
'नव श्वेता यतः स्मर'-'सुरा श्वेत होती है पीली नहीं'-शङ्कर ने पीता का अर्थ पीना के स्थान पर पीला लगाकर उत्तर दिया।
'कि त्वं जानाहि तद्वर्ण-वाह तुम तो उसके रंग को जानते हो? मिश्रजी बोले । 'अहं वर्णं भवान् रसम्'-मैं तो रंग जानता हूँ पर आप उसका रस-शङ्कर का उत्तर
'मत्तो जातः कलजाशी विपरीतानि भाषसे'-विषले बाण से मारे गये मृगमांस भक्षण से तुम पागल तो नहीं हो गये हो जो उल्टी सीधी बोल रहे हो-मिश्रजी ने क्रुद्ध होकर कहा।
सत्यं ब्रवीति पित्तृवत्त्वत्तो जातः कलञ्जभुक्'-आप ठीक कह रहे हैं, पिता के समान ही आपसे उत्पन्न पुत्र कलंजभक्षी है-शङ्कर ने मतोजातः का अर्थ मुझसे उत्पन्न (पुत्र) लगाकर व्याकरण का पाण्डित्य प्रदर्शित करते हुए उत्तर दिया ।
इसी प्रकार मिश्रजी और शङ्कर मैं अनेक प्रश्नोत्तर हुए । शङ्कर संस्कृत शब्दों का अन्यथा अर्थ करके सहज ही अपने पाडित्य का प्रदर्शन कर रहे थे उधर मण्डन मिश्र प्रत्येक प्रश्न पर अत्यन्त उत्तेजित होकर क्रोधावेश में आकर कटुतम वाक्यों का प्रयोग करने लगे । अन्त में मण्डन मिश्र ने कहा कि-'कर्मकाले न सम्भाष्य अहं मुर्खेण संप्रति'-'मैं श्राद्ध कर्म के समय मूर्ख से भाषण करना नहीं चाहता।' आचार्य शङ्कर ने तुरन्त व्याकरण की दृष्टि से उक्त वाक्य में त्रुटि पकड़कर कहा'अहो प्रकटितं ज्ञान यति भंगेन भाषिणा'-आश्चर्य है। सम्भाष्य+अहम् में सन्धि के अनुसार 'सम्भाष्योऽहम्' होना चाहिये, आपने मनमानी सन्धि करके विसर्ग का लोप करके यतिभंग किया है मूर्खता मेरी है कि आपकी ?'-हतप्रभ होते हए मण्डन बोले-'अरे! मैं यति (सन्यासी) के भंग करने में लगा हूँ, मेरे लिये व्याकरण द्ष्ट्या यतिभंग से कोई दोष नहीं होगा।'
यति भंगे शब्द में पंचमी समास है, जिसका अर्थ होता है यति (सन्यासी) से भंग (पराजय) शङ्कर ने व्याकरण से यह अर्थ बताते हुए कहा कि 'आप मुझे क्या पराजित करेंगे आपका ही पराजय होगा मेरे द्वारा।' -उक्त संवाद को जैमिनि मुस्कराते हुए देख-सुन रहे थे । व्यासजी बोले'बेटा! यह सन्यासी आत्मतत्त्व के जानने वाले हैं। इन्होंने अपने ज्ञान से लोकेषणा, पुत्रेषणा, वित्तेषणा तीनों का निराकरण कर दिया है। इनके प्रति तुम्हारा यह आचरण क्या अनुरूप कहा जा सकता है । आज के अतिथि तो स्वयं विष्णु भगवान हैं-इन्हें आप शीघ्र निमन्त्रण दें ।' मिश्रजी ने शान्त होकर भिक्षा के लिये निमन्त्रण दिया तो आचार्य शङ्कर ने कहा कि-'मुझे साधारण अन्न की भिक्षा में कोई आदर नहीं है । मैं विवाद (शास्त्रार्थ) की भिक्षा मांगने आपके पास आया हूँ। इसमें शर्त यह रहेगी कि जो भी पराजित होगा उसे दूसरे का शिष्य बनना पड़ेगा।' मण्डन मिश्र ने सहर्ष शास्त्रार्थ की भिक्षा स्वीकार करते हुए कहा कि-'आज मेरा जीवन धन्य है, कल से शास्त्रार्थ प्रारंभ होगा । मैं साधारण व्यक्ति नहीं हूँ यमराज के भी विनाशक ईश्वर का खण्डन करने वाला हूँ, वेदान्ती लोग ईश्वर को कर्मफलदाता मानते हैं, किन्तु मैंने सिद्ध कर दिया है कि फल का दाता स्वयं कर्म ही है, ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है। मध्यस्थ और प्रतिज्ञाएं क्या होंगी? कौन प्रमाण आपको स्वीकार्य है और इस विषय में आपका क्या अभिप्राय है-यह निश्चय करें।' आचार्य शङ्कर ने सहर्ष स्वीकार कर लिया कि कल से शास्त्रार्थ हो । व्यास जैमिनि से मध्यस्थता करने का आग्रह करने पर उन्होंने मिण्डन मश्र की पत्नि सरस्वती की मध्यस्थता में शास्त्रार्थ करने का परामर्श दिया जिसे दोनोंने स्वीकार कर लिया। अगले दिन मण्डन मिश्र की धर्मपत्नि शारदा-उभय भारती की मध्यस्थता में विशाल सभा लगी। दूर-दूर के विद्वानों की मण्डली जम गयी । बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी अदृश्य होकर सूक्ष्मचिन्मय शरीरों से शास्त्रार्थ सुनने के लिये आ उपस्थित हुए। शङ्कराचार्य ने प्रथम प्रतिज्ञा की
'ब्रह्म एक, सत चित निर्मल तथा परमार्थ है, जिस प्रकार शुक्ति रजत का रूप धारण कर भासित होती है, उसी प्रकार यह ब्रह्म स्वयं प्रपंच रूप भासित होता है । उस ब्रह्म के ज्ञान से इस प्रपंच का नाश हो जाता है और बाह्य पदार्थों से हटकर जीव अपने शुद्ध स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है-यही हमारा सिद्धान्त है और इसमें स्वयं उपनिषद प्रमाण हैं यदि मैं पराजित हो जाऊंगा तो सन्यासी के कषाय वस्त्र त्याग कर गृहस्थ के श्वेत वस्त्र पहन लूंगा।' फिर मण्डन मिश्र ने प्रतिज्ञा की:
'चैतन्य रूप ब्रह्म के प्रतिपादन करने में वेदान्त प्रमाण नहीं है, क्योंकि सिद्धवस्तु के प्रतिपादन में उपनिषद का तात्पर्य नहीं है। वेद का कर्मकाण्ड भाग वाक्य के द्वारा प्रकटित किये जान वाले सम्पूर्ण को प्रकट करता है-अतएव वही प्रमाण है । शब्दों की शक्ति कार्य मात्र को प्रकट करने में है। कर्मों से ही मुक्ति प्राप्त होती है। कर्म का अनुष्ठान प्रत्येक मनुष्य को जीवन भर करना चाहिये ।'-'यदि मैं पराजित हो जाऊंगा तो गृहस्थ धर्म का त्याग कर सन्यास धारण कर लूंगा।'
दोनों विद्वानों में बड़े विद्वतापूर्ण ढंग से शास्त्रार्थ प्रारम्भ हो गया, छह दिन के उपरान्त मण्डन मिश्र का पक्ष दुर्बल पड़ गया, उनका सिद्धान्त खण्डित हो गया फिर उन्होंने कई दिन तक आक्षेप करने आरम्भ किये । परन्तु अन्त में मण्डन मौन हो गये। उभय भारती ने पति को पराजित घोषित कर दिया।
उभय भारती ने पति को पराजित घोषित करने के बाद स्वयं अद्धांगिनी होने के कारण शास्त्रार्थ की इच्छा व्यक्त की । आचार्य शंकर इसके लिए तैयार हो गए मण्डन मिश्र की धर्मपलि उभय भारती से सत्रह दिन तक शास्त्रार्थ चला, वे पराजित हो रही थीं कि उन्होंने कामकला विषयक प्रश्न कर डाले । शङ्कर ने सन्यास धर्म की मर्यादा रक्षण हेतु एक मास का समय मांग लिया। तदनन्तर आकाशगमन द्वारा उन्होंने देखा कि एक स्थान पर मृतक शरीर पड़ा है वह राजा अमरूक का शव था। शङ्कर ने योगबल से राजा अमरूक के शरीर में सूक्ष्म रूप से प्रवेश करके-वात्स्यायन-कामसूत्र का अध्ययन किया और पूनः आकाश मार्ग से ही मण्डनमिश्र के घर पहुँचे । उभय भारती ने प्रणाम किया और कहा कि-'भगवन् ! आप सर्वज्ञ हैं सभा मैं मुझे न जीतकर कामशास्त्र में कथित कामकलाओं को जानने के लिये आपने जो प्रयत्न किया वह मानव चरित्र का अनुकरण मात्र है; अन्यथा संसार की कोई विद्या नहीं जो आपसे अपरिचित हो। आपसे हम दोनों पति-पत्नि पराजित हैं, जैसे सूर्य द्वारा किया गया पराभव चन्द्रमा की अपकीर्ति नहीं फैलाता, उसी प्रकार आपसे पराजित होने पर भी किसी प्रकार हम लज्जित नहीं हैं अब मैं ब्रह्म लोक में जाना चाहती हूँ।'
शङ्कर बोले-'देवी! तुम ब्रह्मा की भार्या हो, वाणी की आद्या देवता, चिन्मयी हो। ऋष्यशृंगादि क्षेत्रों में मेरे द्वारा बनाये गये मन्दिरों में शारदा नाम से पूजा प्राप्त करो, और अभिलाषित वस्तुओं को देती हुई सज्जनों के पास निवास करो।'-शङ्कर की प्रार्थना पर शारदा ने स्वीकृति दे दी। मण्डनमिश्रजी भी यज्ञानुष्ठान करके समस्त धन आदि का दान करके, शिखा-सूत्र त्यागकर सन्यासी बन गये। शङ्कर ने मण्डन को वेदान्त, तत्वोपदेश दिया, उन्हें तत्व साक्षात्कार हआ और मण्डन बोले-'भगवन्! आज मैं धन्य हो गया । आपके करूणाकटाक्ष ने मेरे अन्धकार को दूर कर दिया।' अब मण्डनमिश्र 'सुरेश्वर' बन गये।
#भारतभ्रमण धर्मयात्राए':
शङ्कराचार्य जी ने अब दक्षिण की ओर प्रस्थान किया। वहाँ फैले पाशुपत, वष्णव, वीर शैव आदि अनेक मताभासों के खण्डन का कार्य 'श्री सुरेश्वर' द्वारा सम्पन्न कराया और अद्वैतमत की स्थापना की। वहीं पर एक दिन उग्र भैरव नामक कापालिक ने आकर शङ्कर से याचना की हे यतिश्रेष्ठ ! आप अनेक गुण सम्पन्न हैं, देहाभिमान शून्य हैं, परोपकार निरत है, मैं आज भगवान् भैरव की आपके शिर से हवन करके पूजन करना चाहता हूँ, जिससे मुझे इसी देह से कैलाश प्राप्ति हो सकेगी ; आप मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार कर मुझे कृतार्थ करें'..."आदि । शङ्कर बोले-'ठीक है यह शरीर तो नाशवान है ही, अच्छा है किसी के काम आ जाय । परन्तु मेरे शिष्य तुम्हें ऐसा नहीं करने देंगे। अतएव जब वे कहीं अन्यत्र गये हुए हों तब आकर मेरा शिर काट कर ले जाना और अपने अभीष्ट सिद्ध कर लेना।' जब उग्र भैरव मदिरा की मस्ती में झूमता हुआ हाथ में तीक्ष्ण-धारयुक्त त्रिशूल और तलवार लेकर आचार्य के निकट शिरछेदन हेतु उपस्थित हुआ तो, आचार्य ने शरीर त्यागने का विचार करके प्रणव का जाप प्रारम्भ कर दिया और समाधि लगा ली। जैसे ही कापालिक ने शिर काटने के विचार से तलवार उठवायी तुरन्त उनके शिष्य पद्मपाद ने ध्यान में सब कुछ देख लिया वह तुरन्त नृसिंह रूप धारण करके उग्रभैरव कापालिक पर कूद पड़े और त्रिशूल से उसका वक्ष विदीर्ण कर डाला । सब शिष्य मण्डली भी आ गयी परन्तु आचार्य शङ्कर शान्त, निर्विकार, नित भाव से बैठे थे, कापालिक का शिर शरीर रक्त से लथपथ पड़ा था।
दक्षिण यात्रा करते हए आचार्य श्री श्रीशैल पर्वत से चलकर गोकर्ण तीर्थ पहुँचे। वहां पुत्र के मरने पर एक ब्राह्मण-दम्पत्ति को विलाप करते देखा तो दयार्द्र शङ्कर ने निजयोग बल से उस मृतक बालक को जीवित कर दिया। शंकर की यात्रा के साथ-साथ उनके योगबल, सिद्धि, प्रखर पाण्डित्य अगाध ज्ञान की यशपताका चर्दिक फहराती चल रही थी।
वहीं पर अग्रहार ब्राह्मणों के 'श्री बलि' नामक ग्राम में एक सुसम्पन्न, प्रतिष्ठित ब्राह्मण प्रभाकर के एक ही पागल पुत्र था। गुंगा, बहरा, प्रमादी, जड़वत् रहता था वह । वैसे रूपवान, तेज. वान्, क्षमावान् था बड़ा स्वस्थ था। परन्तु पढ़ने-लिखने में निरा जड़ था-पिता ने लाकर आचार्य के श्री चरणों में बलात् डाल दिया और बोले-'तेरह वर्ष का हो गया है उपनयन भी करा दिया है, परन्तु गायत्री मन्त्र तक इसे नहीं आया। निरा मूर्ख है ! मारने पर, छेड़ने पर भी बालकों को कुछ नहीं कहता । भोजन भी किया कभी नहीं किया, कहना मानता नहीं; मस्ती में आलसी की भांति पडा रहता है।, -शंकर ने बालक से पूछा-'तुम कौन हो ? जड़वत् क्यों आचरण करते हो?- शंकर से नेत्र मिलते ही उनकी कृपा होते ही दृष्टि पड़ते ही वह बालक बोल उठा-'मैं जड़ नहीं है। मेरे सामीप्य से जड़ तो प्रवर्तित हो जाते हैं । मैं आनन्दरूप, देह, इन्द्रियाँ आदि से रहित, 'तत्' पद के द्वारा बोध्य चैतन्य रूप हूँ। षट् उमियों और षट विकारों से रहित हूँ।' -हथेली पर रखे आँवले की भांति परमात्मतत्त्व को प्रकाशित करने वाले बारह श्लोकों में उस बालक ने अपने स्वरूप का परिचय दिया। शङ्कर ने इसका नामकरण किया-'हस्तामलक' के नाम से ख्यापित हुए!
वहाँ से आचार्य शङ्कर ने श्रृंगेरी की ओर यात्रा की तथा वहाँ शारदाम्बा की स्थापना की। तोटक' सदा आचार्य सेवा में निरत रहते थे। एक दिन जब तोटक गूरूजी की कोपीन आदि धोने नदी तट पर था तब शान्ति पाठ का समय उपस्थित होने पर आचार्य ने अन्य विद्यार्थियों से कहा कि अभी ठहरो पल भर में गिरि भी आ जायगा तब शान्तिपाठ प्रारम्भ करना'-इस पर पद्म पाद ने जड़ दीवार की ओर संकेत किया और मन में विचार किया कि आचार्य उस मन्दबुद्धि शास्त्र के अनधिकारी जड़ शिष्य तोटक के लिये प्रतीक्षा क्यों कर रहे हैं।' -आचार्य ने पद्मपाद के मनोभावों को समझकर तुरन्त सम्पूर्ण चौदहों विद्याओं का उपदेश गिरि को कर दिया, शिष्य ने गुरू कृपा से तत्क्षण समस्त विद्याओं को प्राप्त कर लिया और तुरन्त उनके मुख से ब्रह्मतत्त्वसूचक ला तोटक-छन्द में गुरु की स्तुति फूट पड़ी। उस तोटक छन्द के कारण उनका नाम पड़ा-तोटकाचार्य जो सुप्रसिद्ध ज्योतिष्पीठ के सर्वप्रथम शङ्कराचार्य पद पर अभिषिक्त किये गये स्वयं आद्य' शङ्कराचार्य जी द्वारा। इस प्रकार अब आचार्य शङ्कर के साथ सहस्रों की संख्या में शिष्य मण्डली थी जिनमें चार शिष्य जो आचार्य पद से विभूषित थे और यही चारों पीठों पर प्रथम आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित किये गये।
#साहित्य सृजन :
"आचार्य विचार क्रान्ति का शंखनाद फेंक रहे थे, सिद्धांत की लड़ाई लड़ रहे थे विभिन्न वैदिकों द्वारा अर्थ का अनर्थ करके विपुल साहित्य की सम्पूर्ण राष्ट्र में रचना हो चुकी थी, उसी का प्रचार-प्रसार हो रहा था । सम्पूर्ण वातावरण को वेद विरूद्ध बनाकर विषाक्त बना दिया गया था। अतएव शङ्कर ने जहाँ एक ओर दिग्विजय द्वाराशास्त्रार्थों की पद्धति अपनायी, वहीं विपुल साहित्य की रचना करके वैदिक क्रान्ति का सूत्रपात किया। उन्होंने स्वयं तो भाष्य आदि की रचना की ही साथ ही अपने शिष्यों द्वारा भी सह-ग्रन्थों का प्रणयन कराया। 'सुरेश्वराचार्य जी द्वारा-'नषकम्येसिद्धि' 'बृहदारण्यकोपनिषद एवं तैत्तिरीयोपनिषद के भाष्यों पर वार्तिक ग्रन्थ लिखे गये। पद्मपादाचार्य' ने शारीरिक भाष्य पर सुन्दर टीका लिखी जिसके पूर्व भाग का नाम 'पंचपादिका' एवं उत्तर भाग का नाम 'वृत्ति' हुआ। अपनी दक्षिण यात्रा के समय वह अपने पूर्वाश्रम के मामा के घर उक्त ग्रन्थ को रखकर आगे चले गये। मामा थे मीमांसक । ग्रन्थ पढ़कर वे अवाक रह गये । ग्रन्थ में प्रतिपादित सिद्धान्तों का खण्डन करने का उनका सामर्थ्य नहीं था। अत: पद्मपाद के रामेश्वरम् यात्रा पर जाने पर घर में अग्नि लगाकर उक्त ग्रन्थ को भस्म कर दिया मामा ने। इस समय पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण भारत की चारों दिशाओं में एक छोर से दूसरे छोर तक 'शङ्कर साहित्य' ने विद्वत् समाज में क्रान्ति मचा दी। सर्वत्र वेदान्त सिद्धान्त का पतिपादन हो रहा था। आचार्य शङ्कर अब केरल प्रदेश की यात्रा की ओर उन्मुख हुए।
#माता का अंत्येष्टि संस्कार :
अपनी इस यात्राकाल में ही आचार्य शङ्कर ने निज योग बल से देखा कि माता अत्यन्त रुग्ण हो रही हैं और वे मन ही मन शङ्कर का स्मरण कर रही हैं; वह तुरन्त माता के पास पहुँच गये और उनके श्री चरणों में प्रणाम् कर बोले--'मैं तुम्हारा पुत्र शंकर आ गया माँ । शोक का परित्याग कर मुझे आज्ञा दें कि मुझे क्या करना है? -बेटा ! अब इस वृद्ध शरीर को ढोने में असमर्थ है। अतः शास्त्रानुसार मेरा संस्कार करके स्वर्ग पहुँचाओ। माता ने निर्देशित किया । शंकर ने निर्गुण, निराकार ब्रह्म का उपदेश दिया तो माता बोली-'बेटा मुझे निर्गुण के स्थान पर सगुण ईश्वर का उपदेश करो उसी में मेरा मन रमण करता है।' -तब शंकर ने देवाधिदेव महादेव शंकर की स्तुति की प्रसन्न होकर शंकर ने अपने गणों को भेजा । शंकर के त्रिशूलधारी दूतों को देखकर माँ बोली'बेटा ! मैं इनके साथ नहीं जाऊँगी' -तब शंकर ने विष्णु
भगवान की स्तुति की-'चन्द्रमा के समान कान्तिवाले शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी सुन्दर दूत दिव्यविमान लेकर आ गये और उस विमान पर बैठकर 'मातुश्री' विष्णुलोक प्रयाण कर गयीं । शंकर ने सन्यासी होते हुए भी स्वयं माता का विधिवत् दाह संस्कार किया। यहीं आकर पद्मपाद ने 'पञ्चपादिका' ग्रन्थ के जल जाने की सूचना दी तो आचार्य ने तुरन्त शब्दशः लिखवा डाली। केरल नरेश ने जो तीन संस्कृत नाटक उन्हें सात वर्ष की आयु में घर पर सुनाये थे वह भी जल गये थे; अतः राजा बड़े दुःखी थे। राजा द्वारा बताने पर आचार्य ने उन्हें भी यथावत् लिखवा दिया-ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे आचार्य जिनकी स्मरण शक्ति आश्चर्यजनक थी।
#दिग्विजय यात्रा:
आचार्य शंकर केरल निवासी थे वहाँ से काशी, प्रयाग, ऋषिकेश, बदरीनाथ, केदारनाथ आदि स्थानों पर विशेषतः एवं साधारणतः सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करके साधना, तपस्या, विद्वत्ता एवं योगसिद्धियों के चमत्कार का प्रकाश विकीर्ण कर चुके थे; सम्पूर्ण भारत में फैले विभिन्न अवैदिक मतावलम्बियों में खलबली मच गयी थी; शंकरसिद्धान्त रूपी प्रखर सूर्य के सामने सभी तथाकथित मतावलम्बी खद्योतवत टिमटिमा रहे थे। आचार्य शंकर ने बिना तीर, तलवार, तोप, बन्दूक का प्रयोग किये ऐसी विलक्षण विचारक्रान्ति का सूत्रपात किया कि बड़े-बड़े दिग्गज भी हिल उठे। विश्व इतिहास में केवल सिद्धान्तों के आधार पर बद्धि एवं ज्ञान के बल पर आचार्य शंकर ने इस पवित्र राष्ट्र में एक छोर से दूसरे छोर तक वैदिक सनातन शाश्वत सिद्धान्तों की पुर्नस्थापना कर दी। परन्तु उन्हें स्थायी रूप देने का कार्य अभी शेष था। भगवान वेद व्यासजी के निर्देशानुसार सोलह वर्ष की आयु प्राप्त करके आचार्य ने पूनः सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं सैद्धान्तिक-दार्शनिक दिग्विजय यात्रा करने का दृढ़ निश्चय लिया ।
आगे-आगे दण्ड कमण्डल कोपीनधारी. षोडशवर्षीय यति-शंकर, साथ में कई सारे शिष्यों का समुदाय, राजा सुधन्वा एवं उनका परिवार चलता था जिधर को भी पग उठ जाते आचार्य के उसी दिशा में पाखण्ड, अज्ञान, अधर्म का टिमटिमाता दीप, अद्वैत सिद्धान्त रुपी सूर्य के समक्ष एकदम बुझ जाता शान्त हो जाता है। धुर दक्षिण में सेतुबन्ध रामेश्वर क्षेत्र में देवी पूजन के नाम पर मदिरापान ने ही परमधर्म का रूप ले लिया था, उन्हें परास्त कर चोल, द्रविड़ प्रदेशों को जीतकर विदर्भ प्रान्त में अद्वैत मत का का डंका बजाया। कर्णाटक प्रदेश में वाममार्गियो द्वारा वामाचार का प्रचार-प्रसार था वहाँ कापालिकों का आधिपत्य था जो मनुष्य की खोपड़ी से भैरव का पूजन कर मदिरा पीकर अधर्म-पाखण्ड निरत थे। मीन, मुद्रा, मैथुन, मांस, मदिरा को मानव जीवन का चरम और परम लक्ष्य मान रहे थे। उन उन्मत्त कापालिकों ने वेदज्ञ-ब्राह्मणों को मारकर नरमुण्डों से भैरव पूजन हेतु आक्रमण कर दिया। ब्राह्मण भयभीत होकर शंकर के पास गये अपना दुःख बताया। आचार्य श्री ने अपनी हुँकार से अग्नि की ज्वाला प्रकट कर दी और कापालिक उसमें भस्म हो गये।
दक्षिणी प्रदेशों में अद्वैतमत की पुर्नस्थापना करके शंकर ने पश्चिमी क्षेत्रों में दिग्विजय आरम्भ की। वहाँ द्वारका आदि प्रदेशों में पांचरात्रों का आधिपत्य था, शंकर ने उन्हें परास्त कर दिया। मध्यदेश में वैष्णव, शैव, शाक्त, सौर आदि मतावलम्बियों ने धर्म के नाम पर जो पाखण्ड ढोंग उस समय फैला रखा था-शंकर ने वहाँ जाकर उन सबको परास्त किया। आचार्य शंकर का तप, तेज, ज्ञान वैदुष्य इतना प्रचण्ड था कि जहां उनके चरण पड़े वहाँ के अवैदिक मतों की दीवार भरभराकर ढह जाती, धराशायी हो जाती और आचार्य शंकर का वैदिक मत का किला वहाँ खड़ा हो जाता। सारा विपरीत वातावरण परिवर्तित हो जाता। इस प्रकार आचार्य ने उत्तर से दक्षिण तक एवं पूर्व से पश्चिम तक सदलबल घूम-घूम कर वेद विरुद्ध सभी मत-मतान्तरों-वादों का मौलिक खण्डन कर दिया। क्या बौद्ध, क्या जैन, क्या चार्वाक और क्या अन्य वाममार्गी आदि-सब अस्त हो गये। तत्कालीन विद्वानों ने एक स्वर से आचार्य शंकर से सैद्धान्तिक पराजय स्वीकार कर ली। उनके शिष्य बनकर वैदिक पताका के वाहक बन गये।
#संगठन:
अभिनवगुप्त सरीखे विद्वानों ने शिष्यता स्वीकार कर ली। देश की चारों दिशाओं में चारो वेदों का आधार मानकर धार्मिक दृष्टि से चारों क्षेत्रों में परिसीमित करके चार मठों की स्थापना की जिन पर अपने चारों प्रमुख शिष्यों को प्रथमाचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया । उत्तर में ज्योतिर्मठ पर तोटकाचार्य को आसीन किया तो दक्षिण के शृंगेरीमठ पर हस्तामलक को बिठाया। पूरब के गोवर्धनमठ के प्रथमाचार्य बनाये गये पाद पद्माचार्य तो पश्चिम के द्वारका-शारदामठ पर उन्होंने सुरेश्वराचार्य (मण्डन मित्र) को अभिषिक्त किया-इन सबको उन्होंने शंकराचार्य नाम दिया। और निर्धारित किया कि इन पीठों पर बैठने वाले, अभिषिक्त किये जाने वाले सभी आचार्यों को 'जगद्गुरूशंकराचार्य' पदनाम से सम्बोधित किया जाय । आचार्य शंकर की योग्यता, संगठनशक्ति, दूरदर्शिता का यह ज्वलन्त प्रमाण है कि ढाई हजार वर्षों से यह परम्परा आज भी समय के थपेड़े खाने पर भी यथावत् अक्षुष्ण चली आ रही है। विश्व के इतिहास में संगठन की इस कार्य पद्धति का कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आचार्य श्री ने इनके संचालन के लिये संविधान बनाया। जिसमें इन पीठों पर बैठने वाले आचार्यों के लिये कुछ योग्यताएं निर्धारित की गयी हैं तथा बड़े सुन्दर नियम बनाये हैं-इन पवित्र धर्मपीठों पर अभिषिक्त होने वाले धर्माचार्यों के लिये जो अर्हताएँ इसमें निर्धारित की गयी है वह अनुपम हैं। वास्तव में यह उच्चकोटि की पावन परम्परा को अक्षुष्ण बनाये रखने के प्रयोजन से निर्मित एक परम पवित्र आचार संहिता है, जिसे महानुशासन का नाम दिया है आचार्य शंकर ने । पदासीन आचार्यों के कर्तव्यों का निर्धारण करते हुए इसमें निर्देशित किया गया है कि-'वह पृथिवीतल पर सदा भ्रमण करते रहे ; अपने धर्म का विधिवत् पालन करें। किसी प्रकार अपने धर्म का निषेध न करें। लोग वेद विरुद्ध धर्म का कितना आचरण कर रहे है, इस बात की जानकारी हेतु निर्दिष्ट क्षेत्र में सदा घूमते रहे। राष्ट्र की प्रतिष्ठा करने के लिये भली प्रकार भ्रमण करे। मठ में नियत रूप से कभी निवास न करे। हम लोगों ने वर्णाश्रम धर्म के जिन सदाचारों को शास्त्र द्वारा उचित रीति से सिद्ध कर दिया है, उनकी रक्षा अपने अपने भाग में विधि पूर्वक करे। .........।' योग्यता का निर्देश करते हुए आचार्य शंकर ने अपने महान् शासन में कहा है कि-'पवित्र जितेन्द्रिय वेद-वेदाङ्ग का विद्वान योग्य तथा समस्त शास्त्रों का ज्ञाता व्यक्ति ही मेरे स्थान (शंकराचार्य पद) को प्राप्त करे, इन गुणों से युक्त व्यक्ति ही मेरे पीठ का अधिकारी हो सकता है, यदि इन गुणों से विहीन हो और वह पीठ पर आरूढ़ हो गया हो तो भी विद्वानों को चाहिये कि उसका निग्रह करें।' इसी प्रकार कर्तव्यों एवं योग्यताओं का भली प्रकार निर्धारण करके आर्चायशंकर ने आचार्य पद पर अभिषिक्त होने वाले पीठाधीशों के लिये छत्र, चामर, सिंहासनादि का विधान करते हुए स्पष्ट निर्दिष्ट किया है कि वे जल में कमल के समान सदा इनसे निलिप्त रहे । कहना नहीं होगा कि उनकी इस दूरदर्शितापूर्ण वसीयत (महानुशासन) में वर्णित निर्देशों के अनुपालन का ही यह सुपरिणाम है कि अनेक राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं सामाजिक प्रहारों के सतत आघातों को सहन करके भी वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था इस पुरातन-सनातन देश भारत में अविच्छिन्न चली आ रही है।
#सर्वज्ञ पद प्राप्ति :
उस समय सम्पूर्ण देश में विद्या का प्रचार-प्रसार था जो भी प्रमुख विद्याकेन्द्र थे, देश के उत्तर, पूर्व, पश्चिम, दक्षिण में, सब पर शङ्कर के अद्वैत सिद्धान्त ने वैदिक धर्म की पताका फहरा दी थी; परन्तु राष्ट्र का कुटमणि काश्मीर अभी भी शेष था। वहाँ एक से एक बढ़कर विद्वान भरे पडे थे। संस्कृत, विद्या, ज्ञान, एवं विद्वता का तो वह केन्द्र था। वहाँ स्वयं वाणी की अधिष्ठात्री देवी मां शारदा निवास करती थीं। शारदा मन्दिर के चार द्वार थे मध्य में पीठ स्थापित थी। पण्डित समाज के बीच जो सर्वज्ञ प्रमाणित हो जाय, सिद्ध हो जाय, सर्व मान्य हो जाय वही उस पीठ पर आरूढ़ हो सकता था। आचार्य शंकर काश्मीर पहुँचे: वहाँ देखा शारदा मन्दिर के पूर्व, पश्चिम. उत्तर के द्वार तो प्रवेश हेतु खुलते हैं परन्तु दक्षिण द्वार बन्द है। आचार्य दक्षिण देश के थे। अतः शारदा मन्दिर के दक्षिण द्वार को जैसे ही आचार्य ने खोलकर प्रवेश करना चाहा तो वादी लोगों ने रोक दिया। आचार्य ने कहा कि-'मेरी परीक्षा के लिये जिसकी इच्छा हो वह आगे आये। मैं सब वस्तुओं को जानता हूँ; अणुमात्र भी ऐसा नहीं जिसे मैं नहीं जानता।' -तदनन्तर वैशेषिक, नैयायिक, सांख्यवादी मीमांसक, सौत्रान्त्रिक, विज्ञानवादी-बौद्ध तथा जैन मतावलम्बियों ने क्रमशः आचार्य से मौलिक एवं सैद्धान्तिक गूढ़ प्रश्न किये जिनका आचार्य शंकर ने तुरन्त सटीक उत्तर देकर उन्हें निरुत्तर कर दिया। इस प्रकार सभी दार्शनिकों को शंकर ने सन्तुष्ट कर वेदान्तमत की वहां प्रतिष्ठा की। वह सब द्वार से हट गये आचार्य ने दक्षिण द्वार से प्रवेश करके जैसे ही मां सरस्वती की सर्वज्ञ पीठ पर बैठना चाहा । तुरन्त सरस्वती ने शरीर रहित वाणी से कहा-'आपकी सर्वज्ञता तो प्रमाणित हो चुकी है। परन्तु सर्वज्ञता के साथ-साथ इस पीठ पर आरूढ़ होने के लिये शुद्धि की भी अनिवार्यता है । तुमने सन्यासी होते हुए भी स्त्रियों का उपभोग कर कामकला के रहस्यों का अध्ययन किया। क्या यह उचित है ? शंकर ने तुरन्त उत्तर दिया कि मैंने इस सन्यासी शरीर से जन्म से आज तक कोई पातक नहीं किया; कामकला रहस्य अध्ययन भी मैंने अन्य शरीर से किया सन्यासी शरीर से नहीं ! अन्य शरीर से किये गये कर्म के लिये यह शरीर लिप्त हो सकता है क्या?' माँ सरस्वती शंकर के इस सटीक उत्तर से सन्तुष्ट हो गयी और आचार्य शंकर का सभी विद्वत समाज, पण्डितों एवं माँ सरस्वती ने बड़ा सम्मान तथा आदर किया और उन्हें सर्वज्ञ पीठ पर आरूढ़ कर दिया। आचार्य श्री ने यह अद्वैत मत की प्रतिष्ठा के लिये किया था।
अब समस्त देश में एक छोर से दूसरे छोर तक सनातन वर्णाश्रम वैदिक धर्म की दुन्दुभि बज रही थी। सभी दुर्बल एवं नास्तिक मतों का खण्डन हो चुका था; पाखण्ड धूलि धूसरित हो चुका था। जनता सदाचार परायण होकर स्वधर्म में निरत थी। आचार्य अपने बत्तीसवें वर्ष में थे। तब वे कुछ शिष्यों के साथ बदरीनारायण गये। वहाँ विद्वानों को शारीरिक भाष्य पढ़ाया। तत्पश्चात् केदार नाथ धाम पहुँचे । वहाँ सब ऋषि-मुनि समुदाय, देवमण्डली एकत्र हो गयी। सबने मिलकर शंकराचार्य की स्तुति की। युधिष्ठिर संवत् २६६२ में शंकर ने परमायु पूर्ण होने के कारण लीलासंवरण की इच्छा प्रगट की। उसी समय उनके संकल्पानुसार प्रमथगणों के साथ सुसज्जित नन्दी शंकर के समक्ष उपस्थित हो गया। इस प्रकार सबके देखते-देखते वे अपने वाहन नन्दी पर बैठकर कैलाश चले गये। सभी ऋषि-मुनि -देवगण आदि पुष्प वर्षण एवं भगवान शंकर की जय-जयकार कर रहे थे।
अस्तु
- अभिनव शंकर श्री करपात्रीजी महाराज पुस्तक से
संकलन - प्रतिलिपि
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