क्या हनुमान वानर नही थे ???
वामपंथी आर्य समाज द्धारा फैलाया गया झूठ
*हनुमान जी सुग्रीव बाली आदि पुंछ वाले कपि(बंदर) नही थे*
*उसका खंडन*
सभी सनातनी तक यह बात फैलावे अपने बच्चो सत्य समजावे।
अंग्रजो का गुप्त षडयंत्र वामपंथी आर्य समाज प्रारम्भ से ही अपनी मनमानी और कुत्सित मानसिकता का परिचय देता रहा है। *जो बातें इनके मत को पुष्ट करती हैं, मात्र उन्हें ही प्रामाणिक मानते हैं और शेष जो बातें इनके मस्तिष्क की क्षमता के बाहर होती हैं, उन्हें ये मिलावटी कहते हैं।*
दयानन्द सरस्वती से पूर्व इस देश में ग्रंथों के *प्रक्षिप्त होने या अप्रामाणिक* होने का कोई प्रसङ्ग नहीं दिखता है।
*इसीलिए जर्मन, रूसियों एवं अंग्रेजों ने थियिसोफिकल सोसाइटी के माध्यम से आर्य समाज की स्थापना और विस्तार करवा कर इस नए भ्रम को प्रोत्साहित किया।*
अंग्रेज़ों का षड्यंत्र था की भारत अपने धर्म शास्त्र अौर परंपरा गत धर्मगुरु शंकराचार्यो वैष्णवाचार्यो से दुर हो।ईसलिए शास्त्र मे मिलावट है ऐसा झुठ फैलाने गुप्तरुप से यह संस्था की स्थापना
करवायी अौर हमारी सनातन गुरकुल शिक्षा नष्ट करवायी।
उस समय के तात्कालिक विद्वानों ने बिना किसी विशेष परिश्रम के आर्य समाज का खंडन कर दिया किन्तु बार बार खंडित होने पर भी ये एक ही कुतर्क को दुहराते रहते हैं, फलतः शास्त्रज्ञान से अनभिज्ञ सामान्य जनता भ्रमित होती रहती है। हद तो तब हो जाती है जब *वामपंथी आर्य समाजी* एक ही ग्रंथ की एक बात को प्रामाणिक मानते हैं और जब वही ग्रंथ उस विषय में कोई ऐसी बात कहता है *जो इनकी लौकिक समझ से परे है, तो ये उसे मिलावटी घोषित कर देते हैं।*
इसी क्रम में
*हनुमानजी के बंदर शरीर में होने के विषय में ये लोग पर्याप्त विवाद उत्पन्न कर चुके हैं।*
आज ऐसे ही एक भ्रामक लेख का खंडन प्रस्तुत कर रहा हूँ, जो डॉ विवेक आर्य नामक वामपंथी आर्य समाजी के द्वारा प्रसारित है। नीचे कुतर्कपूर्ण लेख और साथ ही क्रमशः उसका निवारण उपलब्ध है :-
*कुतर्क १) पहले वानर शब्द पर विचार करते हैं। सामान्य रूप से हम “वानर” शब्द से यह अभिप्रेत कर लेते हैं कि वानर का अर्थ होता है "बन्दर", परन्तु अगर इस शब्द का विश्लेषण करें तो वानर शब्द का अर्थ होता है वन में उत्पन्न होने वाले अन्न को ग्रहण करने वाला। जैसे पर्वत अर्थात् गिरि में रहने वाले और वहाँ का अन्न ग्रहण करने वाले को गिरिजन कहते हैं। उसी प्रकार वन में रहने वाले को वानर कहते है। वानर शब्द से किसी योनि विशेष, जाति , प्रजाति अथवा उपजाति का बोध नहीं होता।*
*खंडन १)*
सर्वप्रथम यह बताएं कि इस धारणा का औचित्य क्या है ? वन में रहने वाला और वहां के अन्न को ग्रहण करने वाला वानर ही क्यों कहायेगा ? हालांकि शब्दकल्पद्रुम का वचन है, यद्बा वानं वने भवं फलादिकं रातीति, इस व्याख्या से वन्य फलों का भक्षण करने वाला वानर कहलाता है। किंतु इससे यह कहाँ सिद्ध होता है कि वन में रहकर वन्य फल को ग्रहण करने वाले "मनुष्य" के लिए ही वानर शब्द आया है ? फिर यही शब्द हाथी, हिरण, ऋषि मुनि, वनवासी भील आदि के लिए कभी प्रयुक्त क्यों नहीं हुआ ? वानरश्रेष्ठ वाल्मीकि, या वानरराज अगत्स्य का कभी नाम सुना आपने ?
आपने गिरिजन शब्द से इसे पुष्ट करने का प्रयास किया तो फिर हमें यह बताएं कि गिरिजन की भांति हम वनजन या वनवासी क्यों नहीं कह सकते ? "वानर" ही क्यों कहें ? ये शब्द बन कैसे गया ? यदि गिरि में उत्पन्न अन्न को ग्रहण करने वाले के लिए जो शब्द गिरिजन है, उसमें प्रथम स्थान का नाम है, और दूसरे जन शब्द लगा है। तो फिर वन के अन्न को ग्रहण करने वाले में "वानर" शब्द कहाँ से आ गया ? उसे तो वनजन होना चाहिए था। यदि जन शब्द से अन्न ग्रहण करने वाले का अर्थ निकलता है (हालांकि इसका कौन सा वैयाकरणीय आधार लगा रहे हैं, ये स्पष्ट नहीं) तो फिर हरिजन, पुरजन, सज्जन, दुर्जन आदि शब्दो का अर्थ कहाँ के अन्न को ग्रहण करने वाले से लगाएंगे ?
वानर शब्द से यदि किसी विशेष जाति, प्रजाति आदि का बोध यदि नहीं होता तो दो हज़ार वर्ष पूर्व के लिखे गए अमरकोष में कपि, प्लवङ्ग, प्लवग, शाखामृग, वलीमुख, मर्कट, कीश, वनौका आदि शब्द वानर के पर्यायवाची के रूप में क्यों आये हैं ? ऐसे ही जटाधर कोष एवं शब्दरत्नावली में मर्क, प्लव, प्रवङ्ग, प्रवग, प्लवङ्गम, प्रवङ्गम, गोलाङ्गूल, कपित्थास्य, दधिशोण, हरि, तरुमृग, नगाटन, झम्पी, झम्पारु, कलिप्रिय, किखि, शालावृक आदि शब्द भी वर्णित हैं। इन सबों में कहीं भी इनके वनवासी मनुष्य होने का कोई संकेत नहीं है। ऊपर से, ग्यारहवें अध्याय के पक्षी एवं पशुहत्या के प्रायश्चित्त प्रसङ्ग में मनुस्मृति कहती है,
हत्वा हंसं वलाकाञ्च वकं बर्हिणमेव ।
वानरं श्येनभासौ च स्पर्शयेत् ब्राह्मणाय गाम् ॥
यहां भी यह शब्द बन्दर के अर्थ में ही आया है। कहीं भी "वनवासी मनुष्य" के लिए वानर शब्द नहीं आया है। वन के अन्न को भक्षण करने का कार्य तो बन्दर भी करते ही हैं, तो उनके वानर कहाने में क्या आपत्ति हो रही है ?
जाम्बवान् जी समुद्र लंघन से पूर्व प्रबोधित करते हुए हनुमानजी को कहते हैं, कि आप कपियों के राजा के समान हैं -
दाक्ष्य विक्रमसंपन्नः कपिराज इवापरः।
(वाल्मीकीय रामायण ४-६६-३१)
इसी अध्याय में अनेकों स्थान पर महाकपि आदि सम्बोधन भी आया है। इन्द्र ने वज्रप्रहार करके आंजनेय महाप्रभु की मुखाकृति विकृत कर दी थी इसीलिए हनुमान् नाम पड़ा। वाल्मीकीय रामायण में ही इन्द्र का वचन है,
मत्करोत्सृष्टवज्रेण हनुरस्य यथा हतः।
नाम्ना वै कपिशार्दूलो भविता हनुमानिति॥
यहां स्पष्ट कपिशार्दूल शब्द आया है, यानी बंदरों में सिंह के समान श्रेष्ठ। कपि शब्द का अर्थ तो वन का अन्न ग्रहण करने वाला नहीं लगा सकते न।
*कुतर्क २) सुग्रीव, बालि आदि का जो चित्र हम देखते हैं उसमें उनकी पूंछ लगी हुई दिखाई देती हैं। परन्तु उनकी स्त्रियों के कोई पूंछ नहीं होती ? नर-मादा का ऐसा भेद संसार में किसी भी वर्ग में देखने को नहीं मिलता। इसलिए यह स्पष्ट होता है कि हनुमान आदि के पूंछ होना केवल एक चित्रकार की कल्पना मात्र है।*
*खंडन २)* यह चित्रकार की कल्पना नहीं है, अपितु उसका शास्त्रीय दृष्टिकोण है। सिंह के अयाल (गर्दन के बाल) होते हैं, सिंहनी के नहीं। क्या नर मादा का ऐसा भेद संसार में व्यापकता से दिखता है ? मोर और मोरनी, मुर्गा और मुर्गी आदि में भी व्यापक भेद देखने को मिलता है। ऐसे ही किंपुरुष योनि के योनियों के भी ऐसे ही भेद होते हैं। अब किंपुरुष किसे कहते हैं ? जिसे देखकर उसके व्यवहार से उसके पुरुष होने का भ्रम हो किन्तु शरीर से वह भिन्न योनि का हो, वह किंपुरुष है। हालांकि कुत्सित पुरुष या किन्नर को भी किंपुरुष कहते हैं। किन्तु यहां किंपुरुष का अर्थ दिव्य योनि विशेष से है जो बंदर, भालू, पक्षी आदि के समान दिखने पर भी गुणों में दिव्य हों।
विभिन्न योनियों का नाम गिनाते हुए भगवान् श्रीकृष्ण उद्धवगीता में कहते हैं -
तेभ्यः पितृभ्यस्तत् पुत्राः देवदानवगुह्यकाः।
मनुष्याः सिद्धगन्धर्वाः सविद्याधरचारणाः॥
किन्देवाः किन्नराः नागाः रक्षः किंपुरुषादयः।
बह्व्यः तेषां प्रकृतयः रजःसत्त्वतमोभुव:॥
साथ ही बताते हैं किंपुरुष वर्ग में सर्वश्रेष्ठ हनुमान् जी हैं एवं विद्याधर वर्ग में सर्वश्रेष्ठ सुदर्शन जी हैं। किंपुरुष एवं विद्याधर, दोनों देवयोनियां हैं।
किंपुरुषाणां हनुमान् विद्याध्राणां सुदर्शनः॥
लेखक ने सम्भवतः किंपुरुष शब्द का नाम सुना भी न हो, इसीलिए भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं। किंपुरुष वर्ग के सदस्यों के लिए एक अलग से किंपुरुषवर्ष नाम का दिव्य देश भी शास्त्रों में वर्णित है, जिसका अधिपति हनुमानजी को ही बताया गया है और वे श्रीराम जी की उपासना में लीन रहते हैं।
किम्पुरुषे वर्षे भगवन्तमादिपुरुषं लक्ष्मणाग्रजं सीताभिरामं रामं तच्चरणसन्निकर्षाभिरतः परमभागवतो हनुमान्सह किम्पुरुषैरविरत-भक्तिरुपास्ते।
साथ ही,
हनुमत्पूजितो रामः नाथः किंपुरुषस्य तु ।
भद्राश्वाद्दक्षिणे वर्षे भारताख्यो गुणाधिकः॥
(प्रकाश संहिता)
आर्यसमाज आचार्य पतंजलि कृत योगदर्शन को तो मानता ही है। उसमें व्यासभाष्य - तत्ववैशारदी योगवार्तिककार भी किंपुरुष नामक देवयोनि एवं उनके रहने लिए स्थायी निवास किंपुरुषवर्ष का नाम गिनाते हैं।
...तत्र पाताले जलधौ पर्वतेष्वेतेषु देव-निकाया असुर-गन्धर्व-किन्नर-किम्पुरुष-यक्ष-राक्षस-भूत-प्रेत-पिशाचापस्मारकाप्सरो-ब्रह्म-राक्षस-कूष्माण्ड-विनायकाः...
...तदन्तरेषु त्रीणि वर्षाणि नव-नव-योजन-साहस्राणि हरिवर्षं किम्पुरुषं भारतम्...
वेदोक्त कल्पग्रंथ में भी इनका वर्णन है -
गौरो गवयः शरभ उष्ट्रो मायुः किंपुरुष इत्यनुस्तरणाः
(शांखायन श्रौतसूत्रम्)
सुप्रसिद्ध संस्कृत कोष वाचस्पत्यम् का वचन है कि देवताओं की ऐसी योनियां जो पशु के समान दिखें, किंपुरुष हैं - किम्पुरुषे देवयोनिभेदे अश्ववदनहयमुखादयोऽप्यत्र।
यहां इस महत्वपूर्ण तथ्य को भूलना नहीं चाहिए कि जहां लेखक हनुमानजी आदि को सामान्य बंदर स्वीकार नहीं कर रहे हैं और मनुष्य सिद्ध करना चाह रहे हैं वहीं वे न मनुष्य हैं, न बंदर। वे किंपुरुष हैं जो बन्दर की आकृति में है। किंपुरुष बंदर, भालू, पक्षी, सर्प, घोड़ा आदि किसी भी योनि के जैसे दिख सकते हैं। इसीलिए नर मादा आदि का दैहिक भेद भी दिखता है। अब सन्देह है कि भेद दिखता ही क्यों है ? चूंकि किंपुरुष एक देवयोनि है, इसीलिए वह दिव्य सिद्धियों से युक्त है। दिव्य सिद्धि वाले लोग इच्छानुसार रूप धारण करने में सक्षम होते हैं।
वाल्मीकीय रामायण में ही यह प्रसङ्ग देखा जाए, जहां हनुमानजी की माता अंजना का वर्णन है। वे पहले पुंजिकस्थला नाम की अप्सरा थीं जो श्रापवश कपिभाव को प्राप्त हो गयी थीं, वानरराज कुंजर की पुत्री होकर कपिराज केसरी से विवाह हुआ, किन्तु दिव्य गुणों से युक्त होने के कारण वे मनुष्य का रूप धारण करके ही रहती थीं।
अप्सराप्सरसाम् श्रेष्ठा विख्याता पुंजिकस्थला ।
अंजनेति परिख्याता पत्नी केसरिणो हरेः ॥
विख्याता त्रिषु लोकेषु रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
अभिशापादभूत्तात कपित्वे कामरूपिणी ॥
दुहिता वानरेन्द्रस्य कुंजरस्य महात्मनः ।
मानुषं विग्रहं कृत्वा रूपयौवनशालिनी ॥
(वाल्मीकीय रामायण - ४-६६-८×१०)
यहां ध्यान दें, प्रथम श्लोक में उनके पति केसरी के लिए हरि शब्द आया है जो अमरकोष आदि के अनुसार वानर शब्द का पर्यायवाची है। दूसरे श्लोक में कपि शब्द भी आया है और यह भी वानर शब्द का ही पर्यायवाची है। तीसरे श्लोक में वर्णन है कि वे रूप और यौवन से युक्त मनुष्य की आकृति बना कर रहती थीं। क्या कपि और हरि शब्द का प्रयोग किसी वनवासी मनुष्य के लिए कहीं प्रयुक्त होता है ? फिर क्या आवश्यकता थी ग्रंथकार को कि केवल एक विशेष समुदाय या परिवार के लिए ही ये सब शब्द लगाए ? एक बार भी कहीं मनुष्य, मानव, नर, आदि मानवीय शब्द क्यों नहीं लगाए ? साथ ही अन्य वनवासी मनुष्यों के लिए कपि, हरि, वानर आदि शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया ? यदि अंजना और साथ ही शेष वानर, मनुष्य ही थे तो हरि और कपि शब्द क्यों आया ? अंजना को अलग से मनुष्य जैसा दिखने के लिए वेष क्यों बनाना पड़ा ? लेखक यदि थोड़ा "विवेक" लगाएं तो भ्रम का निवारण हो जाएगा।
*कुतर्क ३)*
*किष्किन्धाकांड (३/२८-३२) में जब श्रीरामचंद्र जी महाराज की पहली बार ऋष्यमूक पर्वत पर हनुमान् से भेंट हुई तब दोनों में परस्पर बातचीत के पश्चात रामचंद्र जी लक्ष्मण से बोले-*
नानृग्वेद विनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः ।
नासाम वेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितुम् ॥
ऋग्वेद के अध्ययन से अनभिज्ञ और यजुर्वेद का जिसको बोध नहीं है तथा जिसने सामवेद का अध्ययन नहीं किया है, वह व्यक्ति इस प्रकार परिष्कृत बातें नहीं कर सकता। निश्चय ही इन्होंने सम्पूर्ण व्याकरण का अनेक बार अभ्यास किया है, क्योंकि इतने समय तक बोलने में इन्होंने किसी भी अशुद्ध शब्द का उच्चारण नहीं किया है। संस्कारसंपन्न, शास्त्रीय पद्धति से उच्चारण की हुई इनकी वाणी ह्रदय को हर्षित कर देती है।
*समाधान ३)*
निश्चित ही यह सम्भव है, चूंकि मैं पूर्व में ही हनुमानजी को किंपुरुष बता चुका हूँ, साथ ही ग्रंथों में उनके सूर्यदेव के पास विधिवत् शिक्षा ग्रहण करने का वर्णन है तो यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है। सामान्य लौकिक बन्दर ऐसा नहीं कर सकता, न ही कोई सामान्य वनवासी मनुष्य, अपितु यह कोई श्रेष्ठ तत्व हैं, ऐसा ही श्रीराम जी का भाव है। इससे भी हनुमानजी के बन्दर देह में होने का कोई विरोधाभास नहीं होता क्योंकि वे किंपुरुष हैं।
*कुतर्क ४)*
सुंदरकांड (३०/१८-२०) में अशोक वाटिका में राक्षसियों के बीच में बैठी हुई सीता को अपना परिचय देने से पहले हनुमान जी सोचते हैं -
"यदि द्विजाति (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य) के समान परिमार्जित संस्कृत भाषा का प्रयोग करूँगा तो सीता मुझे रावण समझकर भय से संत्रस्त हो जाएगी। मेरे इस वनवासी रूप को देखकर तथा नागरिक संस्कृत को सुनकर पहले ही राक्षसों से डरी हुई यह सीता और भयभीत हो जाएगी। मुझको कामरूपी रावण समझकर भयातुर विशालाक्षी सीता कोलाहल आरंभ कर देगी। इसलिए मैं सामान्य नागरिक के समान परिमार्जित भाषा का प्रयोग करूँगा।”
इस प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि हनुमान जी चारों वेद ,व्याकरण और संस्कृत सहित अनेक भाषाओं के ज्ञाता भी थे।
*समाधान ४)*
ये बात बिल्कुल सत्य है कि हनुमानजी ने ऐसा ही सोचा और व्यवहार किया था। किन्तु समझ में नहीं आता कि संस्कृत प्रमाण देने वाले लेखक ने यहां श्लोक क्यों नहीं लिखे ? क्यों केवल श्लोक संख्या लिखकर छोड़ दिया ? उन्हें अपनी पोल खुलने का भय था क्या ? या वे इस बात से आश्वस्त थे कि हिन्दू समाज तो ग्रंथ खोलकर जांच करने से रहा इसीलिए कुछ भी हिंदी अर्थ लिख दो। ठीक है, हम ही श्लोक और अर्थ लिख देते हैं।
अहं त्वति तनुश्चैव वानरश्च विशेषतः।
वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम्॥
यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् ।
रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति ।
वानरस्य विशेषेण कथं स्यादभिभाषणम्॥
अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत्।
मया सान्त्वयितुं शक्या नान्यथेयमनिन्दिता॥
(वाल्मीकीय रामायण, सुंदरकांड,३०/१७-२०)
(इन श्लोकों का अर्थ है कि श्रीहनुमानजी सोचते हैं) - विशेषकर के इस समय मैं वानर के शरीर में हूँ। इसीलिए मैं सामान्य मनुष्यों के समान सामान्य संस्कृत में बोलूंगा। यदि मैं द्विजाति (जिन्हें वेदाधिकार है) कि समान (वैदिक) संस्कृत में बोलूंगा तो मुझे रावण समझ कर सीताजी डर जाएंगी कि यह वानर होकर ऐसी संस्कृत कैसे बोल रहा है ? अतएव मैं सामान्य मनुष्यों की भांति ही अर्थयुक्त वाक्यों का प्रयोग करूँगा। मुझे इस समय इन्हें सांत्वना देने के अतिरिक्त कोई कार्य नहीं करना चाहिए।
यह उपर्युक्त श्लोकों का वास्तविक अर्थ है, किन्तु लेखक ने यहां हिंदी अनुवाद में कैसा कुतर्क घुसाया है, उसे देखें। यदि हनुमानजी बन्दर नहीं, मनुष्य ही हैं तो पहले से ही मनुष्य होने से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। लेखक तो वानर शब्द का अर्थ वनवासी मनुष्य लगाया करता है और सीताजी ने तो कई वर्ष तक विशुद्ध संस्कृत बोलने वाले वनवासी ऋषियों तथा लौकिक भाषा बोलने वाले भील-किरात वनवासियों के मध्य ही समय बिताए हैं तो फिर हनुमानजी चिंता किस बात की कर रहे हैं ? वे विशुद्ध बोलें या सामान्य, लेखक के अनुसार शरीर से तो मनुष्य ही थे, फिर चिंता क्यों ? ऊपर से लेखक ने अपने हिंदी अनुवाद में कहा कि "नागरिक संस्कृत"... ये नागरिक शब्द किस संस्कृत शब्द का अनुवाद है ? नागरिक और वनवासी की तो बात ही नहीं आयी श्लोक में। केवल मानवी वाणी की बात है, फिर ये बुद्धि कहाँ से उत्पन्न हो गयी। ऊपर से हनुमानजी ने स्वयं कहा कि मैं वानर शरीर में हूँ और मनुष्य के समान बोलूंगा तो समस्या हो जाएगी। अब प्रश्न यह है कि यदि लेखक के अनुसार वानर शब्द का अर्थ वनवासी मनुष्य लगा लें तो भी मनुष्य वनवासी हो या नगर का हो, उसके मानवी वाणी बोलने में कोई क्यों भयभीत होगा ? सीता जी तो तेरह वर्षों से वनवासियों के बीच ही रह रही थीं। समाधान यह है कि हनुमानजी वानर यानी बन्दर के रूप में ही थे और इसीलिए विशुद्ध संस्कृत बोलने से झिझक रहे थे।
उनके शास्त्रज्ञ होने की बात भी प्रमाणित है और किंपुरुष देव होने की बात भी। किन्तु उनके ज्ञानी होने से यह सिद्ध नहीं होता कि उनका शरीर मनुष्य का था। लेखक को पूर्वापर प्रसङ्ग में ही इसका प्रमाण मिल जाएगा। जब हनुमानजी सीता जी को खोज रहे थे, तब के कुछ श्लोक देखें -
वृतः परमनारीभिस्ताराभिरिव चन्द्रमा।
तं ददर्श महातेजास्तेजोवन्तं महाकपिः॥
(वाल्मीकीय रामायण ५-१८-२९)
अवेक्षमाणस्तु ततो ददर्श कपिकुञ्जरः।
रूपयौवनसंपन्ना रावणस्य वरस्त्रियः॥
(वाल्मीकीय रामायण ५-१८-२६)
ततः काञ्चीनिनादं च नूपुराणाम् च निस्वनम्।
शुश्राव परमस्त्रीणां स कपिर्मारुतात्मजः॥
तं चाप्रतिमकर्माणमचिन्त्यबलपौरुषम्।
द्वारदेशमनुप्राप्तं ददर्श हनुमान् कपिः॥
वाल्मीकीय रामायण (५-१८-२०+२१)
उपर्युक्त सभी श्लोकों में कपि शब्द हनुमानजी को बन्दर के देह वाला ही सिद्ध कर रहा है। ऐसे हज़ारों श्लोक वाल्मीकीय रामायण में ही मिल जाएंगे। लेखक उनका उल्लेख क्यों नहीं करता है ?
सीता जी से वार्तालाप प्रारम्भ करने से ठीक पहले का श्लोक देखें, यहां भी महाकपि शब्द आया है -
एवं बहुविधां चिन्तां चिन्तयित्वा महाकपिः ।
संश्रवे मधुरं वाक्यं वैदेह्या व्याजहार ह॥
(वाल्मीकीय रामायण ५-३१-०१)
इसी प्रसङ्ग के ठीक बाद जब उन्होंने सीताजी के समक्ष अपना वास्तविक रूप प्रदर्शित किया है, उसमें मनुष्य की आकृति न होकर बन्दर की आकृति ही स्पष्ट है, वाल्मीकीय रामायण के सुंदरकांड का अध्याय ३२ का अवलोकन करें -
जब सीता जी के सामने हनुमानजी आये तो हरिरूप से आये। शास्त्रों में कहीं किसी वनवासी मनुष्य के लिए हरि शब्द नहीं आया है, किन्तु बन्दर के पर्यायवाची के रूप में आया है -
सा तं दृष्ट्वा हरिश्रेष्ठं विनीतवदुपस्थितम्॥
इसके बाद देखें -
सा वीक्षमाणा पृथुभग्नवक्त्रं शाखामृगेन्द्रस्य यथोक्तकारम् ।
ददर्श पिङ्गाधिपतेरमात्यं वातात्मजं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ॥
यहां हनुमानजी के लिए पांच विशेषण हैं -
पृथुभग्नवक्त्र - जिसका चेहरा ठुड्डी के पास टूटा हुआ हो।
शाखामृगेन्द्र - शाखामृग का राजा (ऊपर प्रथम प्रश्न में बता चुका हूँ कि शाखामृग बन्दर का संस्कृत पर्यायवाची शब्द है)
पिङ्गाधिपतेरमात्य - पिङ्ग के राजा के मंत्री (पीला-भूरा रंग को पिङ्ग कहते हैं, यह बन्दर का पर्यायवाची है)
वातात्मज - वायुपुत्र
बुद्धिमतां वरिष्ठ - बुद्धिमानों में श्रेष्ठ।
ये सभी विशेषण हनुमानजी के देवपुत्र यानि दिव्ययोनि के ऐसे बन्दर के रूप में होने के प्रमाण हैं जो बहुत अधिक बुद्धिमान् है।
अब उसी अध्याय और प्रसङ्ग में आगे देखिए -
अनेन चोक्तं यदिदं ममाग्रतो वनौकसा तच्च तथा ऽस्तु नान्यथा।
इस वनौका के द्वारा जो कहा गया वह सत्य हो ...
वनौका भी बन्दर को ही कहते हैं, ऊपर प्रथम प्रश्न में शब्दकल्पद्रुम का प्रमाण दिया है। हालांकि श्रीमद्भागवत में वनवासी मनुष्य या ऋषियों के लिए वनौका शब्द भी आया है, उदाहरण -
धर्म्मोऽग्निः कश्यपः शक्रो मुनयो ये वनौकसः ।
चरन्ति दक्षिणीकृत्य भ्रमन्तो यत् सतारकाः॥
किन्तु स्मरण रहे, ऊपर के प्रसङ्ग में शाखामृग, कपि, हरि ये सब शब्द भी हैं तो यहां वनौका का अर्थ बन्दर ही होगा, क्योंकि वनवासी ऋषियों के लिए शाखामृग, कपि आदि शब्द कहीं नहीं आये हैं। हनुमानजी यदि वनवासी मनुष्य थे तो फिर उनके लिए एक स्थान पर भी मानव का सामान्य पर्यायवाची क्यों नहीं आया, सर्वत्र बन्दर के ही पर्यायवाची ही क्यों आये ?
अब वाल्मीकीय रामायण के सुंदरकांड का इसीलिए प्रसङ्ग के अध्याय ३४ का अवलोकन करें। यहाँ प्रथम एवं अष्टम श्लोक में निम्न वाक्य है जहां हनुमानजी को हरियूथप कहा गया है, इसका अर्थ है हरि के समुदाय का नायक। हरि का अर्थ बन्दर भी होता है, पूर्व में बता चुका हूँ -
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा हनुमान् हरियूथपः।
आगे हनुमानजी बताते हैं कि कैसे हरीश्वर (हरि के समुदाय के स्वामी) एवं नरेश्वर (मनुष्यों के समुदाय के स्वामी) में मित्रता हुई, क्योंकि सीता जी विश्वास नहीं कर रही थीं। क्यों विश्वास नहीं कर रही थीं भला ? यदि वानर का अर्थ वनवासी मनुष्य है तो समस्या क्या थी ? पहले भी वन में रहने वाले निषादराज गुह आदि राजाओं से राम जी की मित्रता थी ही, फिर कैसे सन्देह की बात ? सन्देह इसीलिए क्योंकि वानर का अर्थ यहां बन्दर ही है और बन्दर का पर्यायवाची हरि है। इसीलिए यहां अलग से हरीश्वर और नरेश्वर शब्द का वर्णन करना पड़ा, इसीलिए सन्देह भी हुआ कि मनुष्य और बन्दर में कैसे मित्रता हुई और इसीलिए हनुमानजी को पूरी कथा सुनानी पड़ी।
ततस्तौ प्रीतिसम्पन्नौ हरीश्वरनरेश्वरौ।
परस्परकृताश्वासौ कथया पूर्ववृत्तया॥
आगे सर्ग ३७ में सीता जी हनुमानजी से कहती हैं, जिसमें कुछ विशेष सम्बोधन हैं -
विधिर्नूनमसंहार्थः प्राणिनां प्लवगोत्तम।
साथ ही,
वर्तते दशमो मासो द्वौ तु शेषौ प्लवङ्गम।
एवं
शरजालांशुमाञ्छूरः कपे रामदिवाकरः।
अन्यच्च,
तदेव खलु ते मन्ये कपित्वं हरियूथप।
इसमें प्लवगोत्तम, प्लवंगम, कपि, हरियूथप आदि शब्द आये हैं जो सब के सब एक स्वर में कहते हैं कि हम वानर यानी बन्दर के पर्यायवाची ही हैं। सीताजी कहती भी हैं कि तुम मेरे कष्ट के निवारण के लिए बिना युद्ध के अभी ही मुझे पीठ और बैठाकर श्रीरामजी के पास ले जाना चाहते हो इसे मैं तुम्हारे कपि (बन्दर) होने के कारण हुई चंचलता समझती हूँ। फिर हनुमानजी ने उन्हें जब अपना विराट रूप दिखाया तो वहां भी उनके लिए कुछ विशेषण आये हैं,
इति सञ्चिन्त्य हनुमांस्तदा प्लवगसत्तमः।
एवं
स तस्मात् पादपाद्धीमानाप्लुत्य प्लवगर्षभः।
यहाँ प्लवगसत्तम एवं प्लवगर्षभ शब्द भी बन्दर के ही पर्यायवाची हैं। हनुमानजी का रूपदर्शन करें -
हरिः पर्वतसङ्काशस्ताम्रवक्त्रो महाबलः ।
वज्रदंष्ट्रनखो भीमो...
हरि (बन्दर), पर्वत के समान विशाल, तांबे के समान लाल मुंह वाले, महाबली, वज्र के समान कठोर और तीखे नाखून एवं दांत वाले, भयानक ....
ये सब कौन से वनवासी मनुष्य के स्वरूप हैं ? न शब्द का अर्थ मनुष्य बता रहा है, न स्वरूप का विवरण ...
*कुतर्क ५) हनुमान् जी के अतिरिक्त अन्य वानर जैसे कि बालि पुत्र अंगद का भी वर्णन वाल्मीकि रामायण में संसार के श्रेष्ठ महापुरुष के रूप में किष्किन्धा कांड ५४/२ में हुआ है। हनुमान् बालि पुत्र अंगद को अष्टांग बुद्धि से सम्पन्न, चार प्रकार के बल से युक्त और राजनीति के चौदह गुणों से युक्त मानते थे।*
बुद्धि के यह आठ अंग हैं- सुनने की इच्छा, सुनना, सुनकर धारण करना, ऊहापोह करना, अर्थ या तात्पर्य को ठीक ठीक समझना, विज्ञान व तत्वज्ञान।
चार प्रकार के बल हैं- साम , दाम, दंड और भेद।
राजनीति के चौदह गुण हैं- देशकाल का ज्ञान, दृढ़ता, कष्टसहिष्णुता, सर्वविज्ञानता, दक्षता, उत्साह, मंत्रगुप्ति, एकवाक्यता, शूरता, भक्तिज्ञान, कृतज्ञता, शरणागत वत्सलता, अधर्म के प्रति क्रोध और गंभीरता।
भला इतने गुणों से सुशोभित अंगद बन्दर कहाँ से हो सकते हैं ?
*कुतर्क ६) वेदज्ञ और राजमन्त्री हनुमान जी :-*
सचिवोऽयं कपीन्द्रस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ।
तमेव कांक्षमाणस्य ममान्तिकमिहागतः॥
नाऋग्वेद विनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः ।
नासामवेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितम्॥
(वाल्मिकीय रामायण, किष्किन्धा काण्ड सर्ग -३ )
अर्थात् :- हे लक्ष्मण ! यह ( हनुमान जी ) सुग्रीव के मन्त्री हैं और उनकी इच्छा से यह मेरे पास आये हैं । जिस व्यक्ति ने ऋग्वेद को नहीं पढ़ा है, जिसने यजुर्वेद को धारण नहीं किया है, जो सामवेद का पण्डित नहीं है, वह व्यक्ति, जैसी वाणी यह बोल रहे हैं वैसी नहीं बोल सकता है ।
शब्दशास्त्र, व्याकरण के पण्डित हनुमान जी :-
नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् ।
बहुव्याहरतानेन न किञ्चिदपशब्दितम्॥
( वाल्मिकीय रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग -३ )
अर्थात् :- इन्होंने निश्चित ही सम्पूर्ण व्याकरण पढ़ा है क्योंकि इन्होंने अपने सम्पूर्ण वार्तालाप में एक भी अशुद्ध शब्द का उच्चारण नहीं किया है ।
श्रीरामो लक्ष्मणं प्राह पश्यैनं बटुरूपिणम्।
शब्दशास्त्रमशेण श्रुतं नूनमनेकधा॥
अनेकभाषितं कृत्स्नं न किञ्चिदपशब्दितम् ।
ततः प्राह हनुमन्तं राघवो ज्ञानविग्रहः॥
( वल्मिकी रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग-१ )
अर्थात् :- राम ने कहा "हे लक्षमण ! इस ब्रह्मचारी को देखो । अवश्य ही इसने सम्पूर्ण व्याकरण कई बार भली प्रकार से पढ़ा है । देखो ! इतनी बातें कहीं किन्तु इसके बोलने में कहीं कोई एक भी अशुद्धि नहीं हुई ।
*समाधान ५-६)* अंगद जी स्वयं भी हनुमानजी के समान ही किंपुरुष हैं, उनके पिता बालि भी इंद्रपुत्र होने से किंपुरुष देवयोनि के हैं, माता तारा भी कामरूपिणी हैं तो उनका दिव्य गुणों से सम्पन्न होने में कैसा आश्चर्य ?
कुतर्क षष्ठ के अंतिम श्लोक प्रमाण में उक्त श्लोक मुझे वाल्मीकीय रामायण के किष्किंधाकांड के सर्ग १ में कहीं नहीं मिले। वैसे कुतर्क षष्ठ का समाधान वैसे तो तीसरे कुतर्क में कर ही चुका हूँ, फिर भी कुछ बातें हैं जो अतिरिक्त में जोड़ देना चाहूंगा। हनुमानजी ने अपने कपि रूप को त्याग कर भिक्षु रूप बनाया था, ऐसा वर्णन उसी प्रसङ्ग में स्पष्ट है। कपि का कोई अर्थ वनवासी मनुष्य से नहीं लगाया जा सकता।
कपिरूपं परित्यज्य हनुमान् मारुतात्मजः ।
भिक्षुरूपं ततो भेजे शठबुद्धितया कपिः॥
(वाल्मीकीय रामायण, किष्किंधाकांड, ०३-०२)
अब समस्या यह है जो पहले से मनुष्य है वो कपि रूप क्यों छोड़ेगा ? सीधे लिखते कि भिक्षु का रूप बनाकर गए। रूप बदलने से पहले कपि रूप को छोड़ा, ऐसा क्यों लिखा ? मतलब हनुमानजी मनुष्यरूप में नहीं थे। अब यदि कहें कि सुग्रीव आदि के साथ छिप कर रहते थे इसीलिए नकली बन्दर का रूप बनाया रहा, उसे ही छोड़ दिया तो ध्यान रखें कि नकली रूप बनाने का उद्देश्य बालि से बचना ही होता। और जहां दो अपरिचित धनुर्धरों के बालिपक्षीय होने का सन्देह हो वहां नकली रूप को छोड़ना कौन सी बुद्धिमत्ता है ? और यदि कहें कि बन्दर का एक नकली रूप छोड़ा तो भिक्षु का दूसरा नकली रूप बनाया भी तो, फिर भी यह बात संगत नहीं, क्योंकि श्लोक के अंत में हनुमानजी के लिए पुनः कपि शब्द आया है। यदि मनुष्य होते तो कहते कि मनुष्य थे, कपि (बन्दर) बन कर रह रहे थे, जसे छोड़कर भिक्षु का वेश बनाया। किन्तु ऐसा नहीं लिखा श्लोक में, अपितु लिखा कि कपि ने कपि रूप छोड़कर भिक्षु रूप धारण किया।
आगे हनुमानजी का भिक्षु रूप छोड़कर वापस वानर/कपि (बन्दर) रूप धारण करने का वर्णन भी है। श्लोक में वानर और कपिकुंजर दोनों शब्द है, अर्थ बन्दर ही है।
भिक्षुरूपं परित्यज्य वानरं रूपमास्थितः ।
पृष्ठमारोप्य तौ वीरौ जगाम कपिकुङ्जरः॥
(वाल्मीकीय रामायण, ४-४-३४)
*कुतर्क ०७) अंगद की माता तारा के विषय में मरते समय किष्किन्धा कांड १६/१२ में बालि ने कहा था कि-*
"सुषेण की पुत्री यह तारा सूक्ष्म विषयों के निर्णय करने तथा नाना प्रकार के उत्पातों के चिह्नों को समझने में सर्वथा निपुण है। जिस कार्य को यह अच्छा बताए, उसे नि:शंक होकर करना। तारा की किसी सम्मति का परिणाम अन्यथा नहीं होता।”
ऐसे गुण विशेष मनुष्यों में ही संभव है।
*समाधान ७)* यहां भी लेखक महोदय ने मूल श्लोक न देकर केवल हिंदी अनुवाद और श्लोक संख्या दी है। किंतु उपर्युक्त सन्दर्भ में ऐसे भाव वाला कोई श्लोक मुझे नहीं मिला। अपितु उस अध्याय में या उसके आगे पीछे के दो तीन अध्यायों तक भी बालि के ऐसा कहने का कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। केवल युद्ध का वर्णन है।
हां, मैं सहमत हूँ कि बाली ने तारा की नीतिनिपुणता की प्रशंसा की है और लेखक का हिंदी अनुवादित भाव निम्न श्लोकों का है,
सुषेणदुहिता चेयमर्थसूक्ष्मविनिश्चये ।
औत्पातिके च विविधे सर्वतः परिनिष्ठिता॥
यद्येषा साध्विति ब्रूयात् कार्यं तन्मुक्तसंशयम् ।
न हि तारामतं किंचिदन्यथा परिवर्तते॥
(वाल्मीकीय रामायण ४-२२-१३+१४)
यहां ध्यातव्य है कि निश्चय ही ये गुण किसी सामान्य बन्दर के नहीं हो सकते किन्तु मैं सिद्ध कर चुका हूँ कि ये लोग सामान्य पशुयोनि के बन्दर न होकर दिव्य किंपुरुष योनि के वानराकृति देवता थे। अतएव ये गुण उनमें होने का कोई संशय नहीं है। इतना ही नहीं, इन प्रसंगों में भी,
हते तु वीरे प्लवगाधिपे तदा
प्लवंगमाः तत्र न शर्म लेभिरे ।
वने चराः सिंह युते महावने
यथा हि गावो निहते गवां पतौ॥
इस जैसे अनेकों श्लोकों में आये प्लवगाधिप और प्लवंगम शब्द बन्दर के ही पर्यायवाची हैं।
*कुतर्क ८) किष्किन्धाकांड (२५/३०) में बालि के अंतिम संस्कार के समय सुग्रीव ने आज्ञा दी – मेरे ज्येष्ठ बन्धु आर्य का संस्कार राजकीय नियम के अनुसार शास्त्र अनुकूल किया जाये। किष्किन्धा कांड (२६/१०) में सुग्रीव का राजतिलक हवन और मन्त्रादि के साथ विद्वानों ने किया। क्या बंदरों में शास्त्रीय विधि से संस्कार होता है ?*
*समाधान ८)* यहां भी लेखक ने मूल श्लोक नहीं दिए हैं। दिए होते और बात अधिक स्पष्ट होती। अस्तु, मैं ही श्लोक दे रहा हूँ -
आज्ञापयत्तदा राजा सुग्रीवः प्लवगेश्वरः ।
और्ध्वदैहिकमार्यस्य क्रियतामनुरूपतः॥
यहां सुग्रीव ने जो आज्ञा दी है, उसने सुग्रीव का वर्णन प्लवगेश्वर के विशेषण के साथ आया है, अर्थात् बंदरों के स्वामी। यहाँ मूल श्लोक देने से लेखक की पोल खुल जाती इसीलिए चतुराई से केवल हिंदी अर्थ दिया।
अब आगे आते हैं राज्याभिषेक की बात पर। यहां भी मूल श्लोक लेखक ने नहीं दिया है इसीलिए मैं ही दे रहा हूँ,
ततः कुशपरिस्तीर्णं समिद्धं जातवेदसम्।
मंत्रपूतेन हविषा हुत्वा मंत्रविदो जनाः॥
किन्तु इससे भी पहले इसी अध्याय के प्रथम श्लोक पर चर्चा करते हैं ताकि समाधान हो सके ,
ततः शोकाभिसंतप्तं सुग्रीवं क्लिन्नवासनम् ।
शाखामृगमहामात्राः परिवार्योपतस्थिरे॥
भातृवध से ग्लानिग्रस्त सुग्रीव को महान् शाखामृग मन्त्रीगण घेर कर खड़े हो गए।
यहां शाखामृग शब्द से बन्दर का ही संकेत है। बन्दर के लिए ही संस्कृत वांग्मय में शाखामृग शब्द प्रयुक्त होता है, किसी वनवासी मनुष्य के लिए नहीं। अब रही बात शास्त्रीय विधि से संस्कार की, तो बता चुका हूँ कि ये मूढ़बुद्धि, जंगली पशु नहीं थे, किंपुरुष देवयोनि के थे, वेदज्ञानसम्पन्न थे इसीलिए इनका संस्कार शास्त्रीय विधि से होता था। देवताओं ने ही किंपुरुष योनि का आश्रय लेकर बन्दर भालू इत्यादि के रूप में अवतार लिया था -
ब्रह्माजी ने रामावतार से पूर्व भगवान् विष्णु से कहा -
अहं तव सहायार्थमृक्षयोनौनिजान्शतः।
सम्भूतोऽस्मि पुरा देव महाबलपराक्रमः॥
(महाभागवत, ३७-१२)
मैं आपकी सहायता के लिए ऋक्षयोनि में अत्यंत पराक्रमी अवतार ले चुका हूँ।
ऐसे ही शिव जी ने भी कहा,
अहं वानररूपेण सम्भूय पवनात्मज:।
साहाय्यं ते करिष्यामि यथोचितमरिन्दम॥
(महाभागवत, ३७-०५)
हे शत्रुओं का नाश करने वाले विष्णो ! मैं वानर का रूप धारण करके पवनपुत्र बनकर आपकी यथोचित सहायता करूँगा।
ऐसे ही अन्य सभी देवता बन्दर भालू के स्वरूप का आश्रय लेकर भगवान की लीला में सहायता करने हेतु वन में उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे -
तथैवान्ये च त्रिदशा ऋक्षवानररूपतः।
संस्थिता कानने विष्णुं प्रतीक्षन्तो महामते॥
(महाभागवत, ३७-२४)
अतएव स्वरूप से सभी बन्दर भालू होने पर भी तात्विक रूप से देवता थे इसीलिए वैसे ही व्यवहार भी करते थे।
*कुतर्क ९) जहाँ तक जटायु का प्रश्न है, वह गिद्ध नामक पक्षी नहीं था। जिस समय रावण सीता का अपहरण कर उसे ले जा रहा था। तब जटायु को देख कर सीता ने कहा –*
जटायो पश्य मामार्य ह्रियमाणामनाथवत्।
अनेन राक्षसेद्रेण करुणं पाप कर्मणा॥
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ४९-३८)
हे आर्य जटायु ! यह पापी राक्षसपति रावण मुझे अनाथ की भांति उठाये ले जा रहा है।
कथं तत् चन्द्रसंकाशं मुखमासीत् मनोहरम्।
सीतया कानि चोक्तानि तस्मिन् काले द्विजोत्तम॥
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ६८-०६)
यहाँ जटायु को आर्य और द्विज कहा गया है। यह शब्द किसी पशु-पक्षी के सम्बोधन में नहीं कहे जाते।
रावण को अपना परिचय देते हुए जटायु ने कहा -
जटायुः नाम नाम्नाहम् गृध्रराजो महाबलः।
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड ५०-०४)
अर्थात्- मैं गृधकूट का भूतपूर्व राजा हूँ और मेरा नाम जटायु है।
यह भी निश्चित है कि पशु-पक्षी किसी राज्य का राजा नहीं हो सकते। इन सभी प्रमाणों से यह सिद्ध होता हैं कि जटायु पक्षी नहीं था, अपितु एक मनुष्य था। जो अपनी वृद्धावस्था में जंगल में वास कर रहा था।
*खंडन ९)* इस कुतर्क में लेखक की पूर्ण मूर्खता और अंधत्व का संकेत मिलता है। आर्य कोई व्यक्ति या समुदाय या जाति का नाम नहीं होता, श्रेष्ठ आचरण करने वाले को आर्य कहते हैं और ये बात तो आर्य समाजियों की समझ में आने से रही। जटायु अत्यंत धर्मात्मा, नीतिनिपुण थे एवं राजा दशरथ के मित्र भी थे इसीलिए सीता जी ने उन्हें पितातुल्य जानकर ही आर्य कहा। स्वयं श्रीराम जी भी राजा दशरथ और जटायु को समान समझ कर सम्मानित व्यवहार करते थे -
राजा दशरथः श्रीमान् यथा मम मया यशाः।
पूजनीयश्च मान्यश्च तथायं पतगेश्वरः॥
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ६८-२६)
यहां जटायु जी के लिए राम जी ने पतगेश्वर शब्द का प्रयोग किया है। पतगेश्वर का अर्थ है उड़ने वालों का राजा, और सभी जानते हैं कि मनुष्य नहीं उड़ते, पक्षी ही उड़ते हैं।
अब आते हैं द्विज शब्द पर। लेखक स्वयं महामूर्ख है जो उसे अनेकार्थ शब्दों का ज्ञान नहीं। द्विज कहते किसे हैं ? जिसका दो बार जन्म हो। ब्राह्मण आदि द्विजाति का यज्ञोपवीत ही दूसरा जन्म है, इसीलिए उन्हें द्विज कहते हैं। किंतु केवल उन्हें ही द्विज नहीं कहते, पक्षियों को भी द्विज कहते हैं, क्योंकि उनका पहला जन्म अंडे के रूप में होता है और दूसरा जन्म अंडे के बाहर निकलने ओर होता है। दो बार जन्म लेने से दांतों को भी द्विज कहते हैं। अमरकोष में मछली, सर्प, पक्षी आदि अंडे से उत्पन्न जीवों को भी द्विज बताया गया है - अण्डजः । स पक्षिसर्पमत्स्यादिः (अमरकोष, ३-३-३०) इसीलिए यहां द्विज का अर्थ मनुष्य नहीं, पक्षी ही है। और निःसन्देह द्विज शब्द पक्षियों के सम्बोधन में भी कहा जाता है।
अब तीसरे प्रमाण पर आते हैं जो लेखक ने दिया है। दिए गए श्लोक या उसके पूर्वापर प्रसङ्ग से भी कहीं यह स्पष्ट नहीं होता है कि "मैं गृध्रकूट का भूतपूर्व राजा हूँ" गृध्रकूट शब्द कहाँ से ले आये ? और भूतपूर्व राजा, यह शब्द किस संस्कृत पद का अनुवाद है ? लेखक मनमाना अनुवाद करके भ्रमित कर रहा है। सीधा अर्थ है, मैं जटायु नाम का महाबली गृध्रराज हूँ। और हां, जटायु कोई मनुष्य नहीं थे जो अपनी वृद्धावस्था में जंगल में वास कर रहे थे। वृद्ध थे, जंगल में थे किंतु वे तब भी निरंतर राज्य कर रहे थे, ऐसा उन्होंने स्वयं रावण से कहा है कि पूर्वजों के दिये गए राज्य का वे पिछले साठ हजार वर्षों से निरंतर पालन करते आ रहे हैं -
षष्टिवर्षसहस्राणि जातस्य मम रावण।
पितृपैतामहं राज्यहं यथावदनुतिष्ठतः॥
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ५०-२०)
लेखक का तर्क है कि पशु पक्षी किसी राज्य के राजा नहीं होते। पहले यह स्पष्ट करें कि राज्य की क्या परिभाषा है ? क्या केवल मनुष्यों के द्वारा अपने समाज के आधार पर बनाया गया शासकीय विभाजन ही राज्य है ? नहीं। अपितु प्रत्येक प्राणी के लिए उसका अपना अलग राज्य होता है। मधुमक्खियों का भी अपना झुंड होता है जिसकी एक रानी होती है। यही बात मछली और चींटियों पर भी लागू होती है। उनके लिए उनका भी एक राज्य है, एक व्यवस्था है, उसके नियम और अनुशासन हैं और साथ ही एक शासक भी है। बड़े जीवों में बगुला, गीध, भेड़िया, बन्दर, हिरण, हाथी, सिंह आदि के भी झुंड एक नायक के नीचे चलते हैं। मनुष्यों के बनाये राज्य ही प्रकृति में नहीं हैं, अन्य भी हैं जो मनुष्यों की दृष्टि से समझे नहीं जा सकते। वैसे ही पक्षियों के राज्य के राजा जटायु थे और वे स्वयं गीध की योनि का आश्रय लेकर रहते थे। इस बात को पुष्ट करने के लिए कुछ श्लोक देता हूँ -
रक्षसां नीयमानां तां जटायु: पक्षिपुंगवः।
(महाभागवत, ३८-५२)
यहां जटायु को पक्षियों में श्रेष्ठ बताया गया है।
तद्बभूवाद्भुतं युद्धं गृध्रराक्षसयोस्तदा।
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ५१-०३)
तब उन गीध (जटायु) और राक्षस (रावण) के मध्य अद्भुत युद्ध हुआ।
स तानि शरजालानि गृध्रः पत्ररथेश्वरः।
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ५१-०५)
यहां पत्ररथ का अर्थ पक्षी है, क्योंकि वे पंखों से ही भ्रमण करते हैं। उनके स्वामी गृद्ध, ऐसा विशेषण जटायु जी के लिए आया है।
उसी सर्ग में आगे युद्ध के वर्णन में आया है कि कैसे जटायु ने अपने पंखों से रावण को मारा, युद्ध में नाखून, मुख (चोंच) और पंजों का प्रयोग किया। कैसे रावण ने उनके पैर, पंख आदि काट डाले, और साथ ही जटायु जी के लिए सर्वत्र पतगेश्वर, गृद्ध, पक्षियों में प्रवर (श्रेष्ठ) आदि शब्द भी आये ही हैं, यथा -
स तानि शरजालानि पक्षाभ्यां तु विधूय ह।
और,
केशाञ्चोत्पाटयामास नखपक्षमुखायुधः।
एवं,
राक्षसानां च मुख्यस्य पक्षिणां प्रवरस्य च।
साथ ही,
पक्षौ पादौ च पार्श्वौ च खड्गमुद्धृत्य सोऽच्छिनत्।
स छिन्नपक्षः सहसा रक्षसा रौद्र
कर्मणा।
निपपात महागृध्रो धरण्यामल्पजीवितः॥
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, सर्ग - ५१)
राम जी ने बाद में जटायु का दाह संस्कार एवं श्राद्ध भी किया है, हालांकि ये बात आर्य समाजियों की क्षुद्र बुद्धि में नहीं आएगी क्योंकि उन्हें तो श्राद्ध पाखण्ड ही लगता है। इसीलिए हम आर्य समाजियों का अनुसरण न करते हुए श्राद्ध का समर्थन करेंगे क्योंकि ये स्वयं श्रीराम जी के द्वारा आचरित है। वहां दाह संस्कार से पूर्व राम जी ने कहा है कि इस घोर राक्षसों से घिरे वन में भी आजतक हमलोग इन पितातुल्य गृद्धराज जटायु के कारण ही निर्भय होकर रहते थे।
बहूनि रक्षसां वासे वर्षाणि वसता सुखम्।
अनेन दण्डकारण्ये विशीर्णमिह पक्षिणा॥
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ६८-२०)
इसी सर्ग में आगे श्लोक २५ देखें, श्रीराम जी कहते हैं कि मुझे सीताहरण का उतना कष्ट नहीं है जितना इस गृद्ध के मेरी सहायता हेतु मरने का हो रहा है।
सीता हरणजं दुःखं न मे सौम्य तथा गतम् ।
यथा विनाशो गृध्रस्य मत्कृते च परंतप॥
इतना ही नहीं, राम जी ने उनका श्राद्ध भी किया। श्राद्ध में परिजन भी भोजन करते हैं, गृद्ध के परिजन, अन्य पक्षी भी आये। अब गीध के परिजन अन्य पक्षी और गीध शाकाहारी तो होंगे नहीं, इसीलिए उनके प्रजातिगत स्वभाव को देखते हुए राम जी ने रोहू मछली से उन्हें तृप्त किया।
रोहिमांसानि चोद्धृत्य पेशी कृत्वा महायशाः ।
शकुनाय ददौ रामो रम्ये हरितशाद्वले॥
यहां पक्षियों के लिए शकुन शब्द आया है जो उनका संस्कृत पर्यायवाची है। आपको स्मरण होगा, दुष्यंत शकुन्तला का प्रसङ्ग, शकुन यानी पक्षियों के द्वारा पालित होने से ही मेनकापुत्री का नाम शकुंतला पड़ा था।
राम जी ने जटायु के लिए जो तर्पण किया है, उस श्लोक में उनके लिए पक्षिराज और गृद्ध अर्थ वाले सम्बोधन स्पष्ट हैं, उसी सर्ग (६८) के अंतिम श्लोकों को देखें -
ततो गोदावतीं गत्वा नदीं नरवरात्मजौ ।
उदकं चक्रतुस्तस्मै गृध्रराजाय तावुभौ॥
शास्त्रदृष्टेन विधिना जले गृध्राय राघवौ।
स्नात्वा तौ गृध्रराजाय उदकं चक्रतुस्तदा॥
स गृध्रराजः कृतवान् यशस्करम्,
सुदुष्करम् कर्म रणे निपातितः ।
महर्षिकल्पेन च संस्कृतः तदा
जगाम पुण्यां गतिमात्मनः शुभाम् ॥
और भी सैकड़ों श्लोकों में ऐसे शब्द यह सिद्ध करते हैं कि जटायु कश्यपवंशी गृद्धराज ही थे।
१०) जहाँ तक जाम्बवान् के रीछ होने का प्रश्न है। यह भी एक भ्रान्ति है। रामायण में वर्णन मिलता है कि जब युद्ध में राम-लक्ष्मण मेघनाद के ब्रह्मास्त्र से घायल हो गए थे, तब किसी को भी उस संकट से बाहर निकलने का उपाय नहीं सूझ रहा था। तब विभीषण और हनुमान् जाम्बवान् के पास परामर्श लेने गये। तब जाम्बवान् ने हनुमान् को हिमालय जाकर ऋषभ नामक पर्वत और कैलाश नामक पर्वत से संजीवनी नामक औषधि लाने को कहा था।
इसका सन्दर्भ रामायण के युद्ध कांड सर्ग ७४/३१-३४ में मिलता है। आप्त काल में बुद्धिमान और विद्वान जनों से संकट का हल पूछा जाता है। जैसे युद्धकाल में ऐसा निर्णय किसी अत्यंत बुद्धिवान और विचारवान व्यक्ति से पूछा जाता है। पशु-पक्षी आदि से ऐसे संकट काल में उपाय पूछना सर्वप्रथम तो संभव ही नहीं हैं। दूसरे बुद्धि से परे की बात है। इसलिए स्वीकार्य नहीं है।
इसलिए जाम्बवान का रीछ जैसा पशु नहीं अपितु महाविद्वान् होना ही संभव है।
इन सब वर्णन और विवरणों को बुद्धिपूर्वक पढ़ने से यह सिद्ध होता है कि हनुमान, बालि, सुग्रीव आदि विद्वान एवं बुद्धिमान् मनुष्य थे। उन्हें बन्दर आदि मानना केवल मात्र एक कल्पना है और अपने श्रेष्ठ महापुरुषों के विषय में असत्य कथन है।
*समाधान १०)*
कुतर्की लेखक के बुद्धि से परे की बात है तो सनातन इतिहास क्या करे ? उलूक को भी सूर्य का अस्तित्व स्वीकार्य नहीं होता, बाकी कोई भ्रांति नहीं है। भ्रांति तो आर्य समाज फैला रहा है। यह बात सत्य है कि जाम्बवान् अत्यंत बुद्धिमान्, एवं पराक्रमी थे। किंतु वे मनुष्य योनि में नहीं थे। वे भी किंपुरुष ही थे साथ ही ब्रह्मदेव के अवतार थे, इसका श्लोक सहित प्रमाण पहले ही दे चुका हूँ। निःसन्देह किसी पशु पक्षी से आपत्ति का समाधान नहीं मांगा जाता किन्तु जाम्बवान् कोई पशु पक्षी नहीं थे, वे ब्रह्मदेव के अवतार, किंपुरुष ऋक्षयोनि के स्वामी थे। उनके लिए सर्वत्र ऋक्षराज शब्द ही आया है। अब ये मत कहना कि वन में रहने वाले को ऋक्ष भी कहते हैं। मतलब वन में रहने वाले मनुष्य को ऋक्ष वानर छोड़कर कुछ और नहीं लिख सकते थे ऋषिगण ? साथ ही अन्य लोग, जिनका मनुष्य होना प्रमाणित है, उनके लिए कहीं ऋक्ष या वानर नहीं लिख सकते थे ? राम जी की अयोध्या वापसी में उनके साथ असंख्य देवता, राक्षस, वानर और भालू, ये सब भी थे -*
पुष्पकं रथमारुह्य वानरेश्वरसंयुतः।
सहितो वानरै: सर्वै: राक्षसेशसमन्वित:॥
वेष्टितैस्त्रिदशैश्चापि भल्लूकै: कोटिकोटिशः।
(महाभागवत, ४८-९+१०)
लेखक ने जिस प्रसंग का उल्लेख किया है, उससे भी, उसी सर्ग के श्लोकों में भालू यानी ऋक्ष होने का प्रमाण मिलता है, जाम्बवान् जी को ऋक्षपुंगव कहा गया है,
विभीषणवचः श्रुत्वा जाम्बवानृक्षपुङ्गवः।
एवं
ऋक्षवानरवीराणामनीकानि प्रहर्षय ।
साथ ही अन्य स्थानों पर भी देखें,
वाल्मीकीय रामायण के युद्धकाण्ड (लंकाकांड) के सर्ग ३७ में व्यूहरचना के समय भगवान् अपने योद्धाओं को निम्न निर्देश देते हैं,
वानरेन्द्रश्च बलवानृक्षराजश्च जाम्बवान्।
राक्षसेन्द्रानुजश्चैव गुल्मे भवतु मध्यमे॥
न चैव मानुषं रूपं कार्यं हरिभिराहवे।
एषा भवतु नः संज्ञा युद्धेऽस्मिन्वानरे बले॥
वानरा एव नश्चिह्नं स्वजनेऽस्मिन्भविष्यति।
वयं तु मानुषेणैव सप्त योत्स्यामहे परान्॥
अहमेव सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन महौजसा।
आत्मना पञ्चमश्चायं सखा मम विभीषणः॥
अर्थात्,
बलवान् वानरराज एवं ऋक्षराज, तथा राक्षसराज विभीषण बीच में रहेंगे। इस युद्ध में किसी भी हरि (बन्दर/भालू) के द्वारा मनुष्य का रूप धारण नहीं किया जाएगा, क्योंकि युद्ध में यही हमारी पहचान होगी। युद्ध में केवल मैं, लक्ष्मण, विभीषण और उनके चार मंत्री, यही सात लोग मनुष्य रूप धारण करके लड़ेंगे।
उपर्युक्त निर्देश देने का उद्देश्य यही था कि भगवान् जानते ही थे कि ये सभी वानर भालू वास्तव में दिव्ययोनि के देवता हैं, इसीलिए इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हैं, अतएव उन्होंने यह विशेष निर्देश दिया है।
हनुमान् सुग्रीव, जाम्बवान् आदि विद्वान् तो थे किंतु मनुष्य नहीं थे, अपितु मनुष्यों से कई गुणा श्रेष्ठ दिव्य *किंपुरुष योनि* के थे। उन्हें बन्दर भालू कहना कल्पना नहीं है, अपितु उनके लौकिक दृष्टि से दिखने वाले स्वरूप का वैसा ही वर्णन करना है, जैसा कि ग्रंथकार ऋषियों ने बताया है।
*महाभारत आदि में भी हनुमानजी के भीम से भेंट और भीम के द्वारा पूंछ उठाने का प्रयास द्रष्टव्य है।*
*वामपंथी आर्य समाजियों को जो बात समझ में नहीं आती, उसे या तो मिलावटी कह देते हैं या फिर उनका अलग ही कुतर्कपूर्ण अर्थ कर बैठते हैं।*
मूल लेखक के लेख में दिए गए कुतर्क एवं श्लोकों में इतनी अधिक अशुद्धियां थीं कि मुझे शुद्ध करने में अतिरिक्त परिश्रम करना पड़ा। जो व्यक्ति शुद्ध संस्कृत लिख नहीं सकता, केवल कॉपी पेस्ट जानता हो, उससे क्या आशा की जा सकती है ? जो आर्य समाज श्रीराम को भगवान् का अवतार ही न माने उससे क्या आशा करें हम ? ये लोग केनोपनिषत् में वर्णित ब्रह्म के यक्षरूपी साकार सगुण अवतरण पर मौन क्यों रहते हैं ? ये लोग छान्दोग्योपनिषत् में वर्णित विद्याओं की गणना में पुराण का नाम आने पर मौन क्यों रहते हैं ? 33 प्रकार के देवताओं पर अटकने वाले अनन्ता वै देवाः एवं अग्निर्देवता मन्त्र में क्यों चुप हो जाते हैं ? वस्तुतः संसार भर की जड़ता का मूल आर्य समाज ही है जो अपनी बुद्धि को विकसित करने के स्थान पर अनंत ज्ञान को ही दबा कर जैसे तैसे अपनी क्षुद्र बुद्धि में घुसाना चाहता है और इसमें असफल रहने पर उन बातों को ही मिलावटी कह देता है।
अंत में यही कहूंगा, लेखक का नाम भले "विवेक" हो किन्तु उसने ये लेख लिखकर अविवेक का ही प्रदर्शन किया है।
सद्भावो नास्ति वेश्यानां स्थिरता नास्ति सम्पदाम् ।
विवेको नास्ति मूर्खाणां विनाशो नास्ति कर्म्मणाम्॥
वेश्याओं में सद्भावना नहीं होती, सम्पत्ति में स्थिरता नहीं होती, मूर्खों में "विवेक" नहीं होता एवं कर्मयोगियों का विनाश नहीं होता।
साभार श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु
*वैदिक ब्राह्मण ग्रुप गुजरात*
*हनुमान जी सुग्रीव बाली आदि पुंछ वाले कपि(बंदर) नही थे*
*उसका खंडन*
सभी सनातनी तक यह बात फैलावे अपने बच्चो सत्य समजावे।
अंग्रजो का गुप्त षडयंत्र वामपंथी आर्य समाज प्रारम्भ से ही अपनी मनमानी और कुत्सित मानसिकता का परिचय देता रहा है। *जो बातें इनके मत को पुष्ट करती हैं, मात्र उन्हें ही प्रामाणिक मानते हैं और शेष जो बातें इनके मस्तिष्क की क्षमता के बाहर होती हैं, उन्हें ये मिलावटी कहते हैं।*
दयानन्द सरस्वती से पूर्व इस देश में ग्रंथों के *प्रक्षिप्त होने या अप्रामाणिक* होने का कोई प्रसङ्ग नहीं दिखता है।
*इसीलिए जर्मन, रूसियों एवं अंग्रेजों ने थियिसोफिकल सोसाइटी के माध्यम से आर्य समाज की स्थापना और विस्तार करवा कर इस नए भ्रम को प्रोत्साहित किया।*
अंग्रेज़ों का षड्यंत्र था की भारत अपने धर्म शास्त्र अौर परंपरा गत धर्मगुरु शंकराचार्यो वैष्णवाचार्यो से दुर हो।ईसलिए शास्त्र मे मिलावट है ऐसा झुठ फैलाने गुप्तरुप से यह संस्था की स्थापना
करवायी अौर हमारी सनातन गुरकुल शिक्षा नष्ट करवायी।
उस समय के तात्कालिक विद्वानों ने बिना किसी विशेष परिश्रम के आर्य समाज का खंडन कर दिया किन्तु बार बार खंडित होने पर भी ये एक ही कुतर्क को दुहराते रहते हैं, फलतः शास्त्रज्ञान से अनभिज्ञ सामान्य जनता भ्रमित होती रहती है। हद तो तब हो जाती है जब *वामपंथी आर्य समाजी* एक ही ग्रंथ की एक बात को प्रामाणिक मानते हैं और जब वही ग्रंथ उस विषय में कोई ऐसी बात कहता है *जो इनकी लौकिक समझ से परे है, तो ये उसे मिलावटी घोषित कर देते हैं।*
इसी क्रम में
*हनुमानजी के बंदर शरीर में होने के विषय में ये लोग पर्याप्त विवाद उत्पन्न कर चुके हैं।*
आज ऐसे ही एक भ्रामक लेख का खंडन प्रस्तुत कर रहा हूँ, जो डॉ विवेक आर्य नामक वामपंथी आर्य समाजी के द्वारा प्रसारित है। नीचे कुतर्कपूर्ण लेख और साथ ही क्रमशः उसका निवारण उपलब्ध है :-
*कुतर्क १) पहले वानर शब्द पर विचार करते हैं। सामान्य रूप से हम “वानर” शब्द से यह अभिप्रेत कर लेते हैं कि वानर का अर्थ होता है "बन्दर", परन्तु अगर इस शब्द का विश्लेषण करें तो वानर शब्द का अर्थ होता है वन में उत्पन्न होने वाले अन्न को ग्रहण करने वाला। जैसे पर्वत अर्थात् गिरि में रहने वाले और वहाँ का अन्न ग्रहण करने वाले को गिरिजन कहते हैं। उसी प्रकार वन में रहने वाले को वानर कहते है। वानर शब्द से किसी योनि विशेष, जाति , प्रजाति अथवा उपजाति का बोध नहीं होता।*
*खंडन १)*
सर्वप्रथम यह बताएं कि इस धारणा का औचित्य क्या है ? वन में रहने वाला और वहां के अन्न को ग्रहण करने वाला वानर ही क्यों कहायेगा ? हालांकि शब्दकल्पद्रुम का वचन है, यद्बा वानं वने भवं फलादिकं रातीति, इस व्याख्या से वन्य फलों का भक्षण करने वाला वानर कहलाता है। किंतु इससे यह कहाँ सिद्ध होता है कि वन में रहकर वन्य फल को ग्रहण करने वाले "मनुष्य" के लिए ही वानर शब्द आया है ? फिर यही शब्द हाथी, हिरण, ऋषि मुनि, वनवासी भील आदि के लिए कभी प्रयुक्त क्यों नहीं हुआ ? वानरश्रेष्ठ वाल्मीकि, या वानरराज अगत्स्य का कभी नाम सुना आपने ?
आपने गिरिजन शब्द से इसे पुष्ट करने का प्रयास किया तो फिर हमें यह बताएं कि गिरिजन की भांति हम वनजन या वनवासी क्यों नहीं कह सकते ? "वानर" ही क्यों कहें ? ये शब्द बन कैसे गया ? यदि गिरि में उत्पन्न अन्न को ग्रहण करने वाले के लिए जो शब्द गिरिजन है, उसमें प्रथम स्थान का नाम है, और दूसरे जन शब्द लगा है। तो फिर वन के अन्न को ग्रहण करने वाले में "वानर" शब्द कहाँ से आ गया ? उसे तो वनजन होना चाहिए था। यदि जन शब्द से अन्न ग्रहण करने वाले का अर्थ निकलता है (हालांकि इसका कौन सा वैयाकरणीय आधार लगा रहे हैं, ये स्पष्ट नहीं) तो फिर हरिजन, पुरजन, सज्जन, दुर्जन आदि शब्दो का अर्थ कहाँ के अन्न को ग्रहण करने वाले से लगाएंगे ?
वानर शब्द से यदि किसी विशेष जाति, प्रजाति आदि का बोध यदि नहीं होता तो दो हज़ार वर्ष पूर्व के लिखे गए अमरकोष में कपि, प्लवङ्ग, प्लवग, शाखामृग, वलीमुख, मर्कट, कीश, वनौका आदि शब्द वानर के पर्यायवाची के रूप में क्यों आये हैं ? ऐसे ही जटाधर कोष एवं शब्दरत्नावली में मर्क, प्लव, प्रवङ्ग, प्रवग, प्लवङ्गम, प्रवङ्गम, गोलाङ्गूल, कपित्थास्य, दधिशोण, हरि, तरुमृग, नगाटन, झम्पी, झम्पारु, कलिप्रिय, किखि, शालावृक आदि शब्द भी वर्णित हैं। इन सबों में कहीं भी इनके वनवासी मनुष्य होने का कोई संकेत नहीं है। ऊपर से, ग्यारहवें अध्याय के पक्षी एवं पशुहत्या के प्रायश्चित्त प्रसङ्ग में मनुस्मृति कहती है,
हत्वा हंसं वलाकाञ्च वकं बर्हिणमेव ।
वानरं श्येनभासौ च स्पर्शयेत् ब्राह्मणाय गाम् ॥
यहां भी यह शब्द बन्दर के अर्थ में ही आया है। कहीं भी "वनवासी मनुष्य" के लिए वानर शब्द नहीं आया है। वन के अन्न को भक्षण करने का कार्य तो बन्दर भी करते ही हैं, तो उनके वानर कहाने में क्या आपत्ति हो रही है ?
जाम्बवान् जी समुद्र लंघन से पूर्व प्रबोधित करते हुए हनुमानजी को कहते हैं, कि आप कपियों के राजा के समान हैं -
दाक्ष्य विक्रमसंपन्नः कपिराज इवापरः।
(वाल्मीकीय रामायण ४-६६-३१)
इसी अध्याय में अनेकों स्थान पर महाकपि आदि सम्बोधन भी आया है। इन्द्र ने वज्रप्रहार करके आंजनेय महाप्रभु की मुखाकृति विकृत कर दी थी इसीलिए हनुमान् नाम पड़ा। वाल्मीकीय रामायण में ही इन्द्र का वचन है,
मत्करोत्सृष्टवज्रेण हनुरस्य यथा हतः।
नाम्ना वै कपिशार्दूलो भविता हनुमानिति॥
यहां स्पष्ट कपिशार्दूल शब्द आया है, यानी बंदरों में सिंह के समान श्रेष्ठ। कपि शब्द का अर्थ तो वन का अन्न ग्रहण करने वाला नहीं लगा सकते न।
*कुतर्क २) सुग्रीव, बालि आदि का जो चित्र हम देखते हैं उसमें उनकी पूंछ लगी हुई दिखाई देती हैं। परन्तु उनकी स्त्रियों के कोई पूंछ नहीं होती ? नर-मादा का ऐसा भेद संसार में किसी भी वर्ग में देखने को नहीं मिलता। इसलिए यह स्पष्ट होता है कि हनुमान आदि के पूंछ होना केवल एक चित्रकार की कल्पना मात्र है।*
*खंडन २)* यह चित्रकार की कल्पना नहीं है, अपितु उसका शास्त्रीय दृष्टिकोण है। सिंह के अयाल (गर्दन के बाल) होते हैं, सिंहनी के नहीं। क्या नर मादा का ऐसा भेद संसार में व्यापकता से दिखता है ? मोर और मोरनी, मुर्गा और मुर्गी आदि में भी व्यापक भेद देखने को मिलता है। ऐसे ही किंपुरुष योनि के योनियों के भी ऐसे ही भेद होते हैं। अब किंपुरुष किसे कहते हैं ? जिसे देखकर उसके व्यवहार से उसके पुरुष होने का भ्रम हो किन्तु शरीर से वह भिन्न योनि का हो, वह किंपुरुष है। हालांकि कुत्सित पुरुष या किन्नर को भी किंपुरुष कहते हैं। किन्तु यहां किंपुरुष का अर्थ दिव्य योनि विशेष से है जो बंदर, भालू, पक्षी आदि के समान दिखने पर भी गुणों में दिव्य हों।
विभिन्न योनियों का नाम गिनाते हुए भगवान् श्रीकृष्ण उद्धवगीता में कहते हैं -
तेभ्यः पितृभ्यस्तत् पुत्राः देवदानवगुह्यकाः।
मनुष्याः सिद्धगन्धर्वाः सविद्याधरचारणाः॥
किन्देवाः किन्नराः नागाः रक्षः किंपुरुषादयः।
बह्व्यः तेषां प्रकृतयः रजःसत्त्वतमोभुव:॥
साथ ही बताते हैं किंपुरुष वर्ग में सर्वश्रेष्ठ हनुमान् जी हैं एवं विद्याधर वर्ग में सर्वश्रेष्ठ सुदर्शन जी हैं। किंपुरुष एवं विद्याधर, दोनों देवयोनियां हैं।
किंपुरुषाणां हनुमान् विद्याध्राणां सुदर्शनः॥
लेखक ने सम्भवतः किंपुरुष शब्द का नाम सुना भी न हो, इसीलिए भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं। किंपुरुष वर्ग के सदस्यों के लिए एक अलग से किंपुरुषवर्ष नाम का दिव्य देश भी शास्त्रों में वर्णित है, जिसका अधिपति हनुमानजी को ही बताया गया है और वे श्रीराम जी की उपासना में लीन रहते हैं।
किम्पुरुषे वर्षे भगवन्तमादिपुरुषं लक्ष्मणाग्रजं सीताभिरामं रामं तच्चरणसन्निकर्षाभिरतः परमभागवतो हनुमान्सह किम्पुरुषैरविरत-भक्तिरुपास्ते।
साथ ही,
हनुमत्पूजितो रामः नाथः किंपुरुषस्य तु ।
भद्राश्वाद्दक्षिणे वर्षे भारताख्यो गुणाधिकः॥
(प्रकाश संहिता)
आर्यसमाज आचार्य पतंजलि कृत योगदर्शन को तो मानता ही है। उसमें व्यासभाष्य - तत्ववैशारदी योगवार्तिककार भी किंपुरुष नामक देवयोनि एवं उनके रहने लिए स्थायी निवास किंपुरुषवर्ष का नाम गिनाते हैं।
...तत्र पाताले जलधौ पर्वतेष्वेतेषु देव-निकाया असुर-गन्धर्व-किन्नर-किम्पुरुष-यक्ष-राक्षस-भूत-प्रेत-पिशाचापस्मारकाप्सरो-ब्रह्म-राक्षस-कूष्माण्ड-विनायकाः...
...तदन्तरेषु त्रीणि वर्षाणि नव-नव-योजन-साहस्राणि हरिवर्षं किम्पुरुषं भारतम्...
वेदोक्त कल्पग्रंथ में भी इनका वर्णन है -
गौरो गवयः शरभ उष्ट्रो मायुः किंपुरुष इत्यनुस्तरणाः
(शांखायन श्रौतसूत्रम्)
सुप्रसिद्ध संस्कृत कोष वाचस्पत्यम् का वचन है कि देवताओं की ऐसी योनियां जो पशु के समान दिखें, किंपुरुष हैं - किम्पुरुषे देवयोनिभेदे अश्ववदनहयमुखादयोऽप्यत्र।
यहां इस महत्वपूर्ण तथ्य को भूलना नहीं चाहिए कि जहां लेखक हनुमानजी आदि को सामान्य बंदर स्वीकार नहीं कर रहे हैं और मनुष्य सिद्ध करना चाह रहे हैं वहीं वे न मनुष्य हैं, न बंदर। वे किंपुरुष हैं जो बन्दर की आकृति में है। किंपुरुष बंदर, भालू, पक्षी, सर्प, घोड़ा आदि किसी भी योनि के जैसे दिख सकते हैं। इसीलिए नर मादा आदि का दैहिक भेद भी दिखता है। अब सन्देह है कि भेद दिखता ही क्यों है ? चूंकि किंपुरुष एक देवयोनि है, इसीलिए वह दिव्य सिद्धियों से युक्त है। दिव्य सिद्धि वाले लोग इच्छानुसार रूप धारण करने में सक्षम होते हैं।
वाल्मीकीय रामायण में ही यह प्रसङ्ग देखा जाए, जहां हनुमानजी की माता अंजना का वर्णन है। वे पहले पुंजिकस्थला नाम की अप्सरा थीं जो श्रापवश कपिभाव को प्राप्त हो गयी थीं, वानरराज कुंजर की पुत्री होकर कपिराज केसरी से विवाह हुआ, किन्तु दिव्य गुणों से युक्त होने के कारण वे मनुष्य का रूप धारण करके ही रहती थीं।
अप्सराप्सरसाम् श्रेष्ठा विख्याता पुंजिकस्थला ।
अंजनेति परिख्याता पत्नी केसरिणो हरेः ॥
विख्याता त्रिषु लोकेषु रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
अभिशापादभूत्तात कपित्वे कामरूपिणी ॥
दुहिता वानरेन्द्रस्य कुंजरस्य महात्मनः ।
मानुषं विग्रहं कृत्वा रूपयौवनशालिनी ॥
(वाल्मीकीय रामायण - ४-६६-८×१०)
यहां ध्यान दें, प्रथम श्लोक में उनके पति केसरी के लिए हरि शब्द आया है जो अमरकोष आदि के अनुसार वानर शब्द का पर्यायवाची है। दूसरे श्लोक में कपि शब्द भी आया है और यह भी वानर शब्द का ही पर्यायवाची है। तीसरे श्लोक में वर्णन है कि वे रूप और यौवन से युक्त मनुष्य की आकृति बना कर रहती थीं। क्या कपि और हरि शब्द का प्रयोग किसी वनवासी मनुष्य के लिए कहीं प्रयुक्त होता है ? फिर क्या आवश्यकता थी ग्रंथकार को कि केवल एक विशेष समुदाय या परिवार के लिए ही ये सब शब्द लगाए ? एक बार भी कहीं मनुष्य, मानव, नर, आदि मानवीय शब्द क्यों नहीं लगाए ? साथ ही अन्य वनवासी मनुष्यों के लिए कपि, हरि, वानर आदि शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया ? यदि अंजना और साथ ही शेष वानर, मनुष्य ही थे तो हरि और कपि शब्द क्यों आया ? अंजना को अलग से मनुष्य जैसा दिखने के लिए वेष क्यों बनाना पड़ा ? लेखक यदि थोड़ा "विवेक" लगाएं तो भ्रम का निवारण हो जाएगा।
*कुतर्क ३)*
*किष्किन्धाकांड (३/२८-३२) में जब श्रीरामचंद्र जी महाराज की पहली बार ऋष्यमूक पर्वत पर हनुमान् से भेंट हुई तब दोनों में परस्पर बातचीत के पश्चात रामचंद्र जी लक्ष्मण से बोले-*
नानृग्वेद विनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः ।
नासाम वेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितुम् ॥
ऋग्वेद के अध्ययन से अनभिज्ञ और यजुर्वेद का जिसको बोध नहीं है तथा जिसने सामवेद का अध्ययन नहीं किया है, वह व्यक्ति इस प्रकार परिष्कृत बातें नहीं कर सकता। निश्चय ही इन्होंने सम्पूर्ण व्याकरण का अनेक बार अभ्यास किया है, क्योंकि इतने समय तक बोलने में इन्होंने किसी भी अशुद्ध शब्द का उच्चारण नहीं किया है। संस्कारसंपन्न, शास्त्रीय पद्धति से उच्चारण की हुई इनकी वाणी ह्रदय को हर्षित कर देती है।
*समाधान ३)*
निश्चित ही यह सम्भव है, चूंकि मैं पूर्व में ही हनुमानजी को किंपुरुष बता चुका हूँ, साथ ही ग्रंथों में उनके सूर्यदेव के पास विधिवत् शिक्षा ग्रहण करने का वर्णन है तो यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है। सामान्य लौकिक बन्दर ऐसा नहीं कर सकता, न ही कोई सामान्य वनवासी मनुष्य, अपितु यह कोई श्रेष्ठ तत्व हैं, ऐसा ही श्रीराम जी का भाव है। इससे भी हनुमानजी के बन्दर देह में होने का कोई विरोधाभास नहीं होता क्योंकि वे किंपुरुष हैं।
*कुतर्क ४)*
सुंदरकांड (३०/१८-२०) में अशोक वाटिका में राक्षसियों के बीच में बैठी हुई सीता को अपना परिचय देने से पहले हनुमान जी सोचते हैं -
"यदि द्विजाति (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य) के समान परिमार्जित संस्कृत भाषा का प्रयोग करूँगा तो सीता मुझे रावण समझकर भय से संत्रस्त हो जाएगी। मेरे इस वनवासी रूप को देखकर तथा नागरिक संस्कृत को सुनकर पहले ही राक्षसों से डरी हुई यह सीता और भयभीत हो जाएगी। मुझको कामरूपी रावण समझकर भयातुर विशालाक्षी सीता कोलाहल आरंभ कर देगी। इसलिए मैं सामान्य नागरिक के समान परिमार्जित भाषा का प्रयोग करूँगा।”
इस प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि हनुमान जी चारों वेद ,व्याकरण और संस्कृत सहित अनेक भाषाओं के ज्ञाता भी थे।
*समाधान ४)*
ये बात बिल्कुल सत्य है कि हनुमानजी ने ऐसा ही सोचा और व्यवहार किया था। किन्तु समझ में नहीं आता कि संस्कृत प्रमाण देने वाले लेखक ने यहां श्लोक क्यों नहीं लिखे ? क्यों केवल श्लोक संख्या लिखकर छोड़ दिया ? उन्हें अपनी पोल खुलने का भय था क्या ? या वे इस बात से आश्वस्त थे कि हिन्दू समाज तो ग्रंथ खोलकर जांच करने से रहा इसीलिए कुछ भी हिंदी अर्थ लिख दो। ठीक है, हम ही श्लोक और अर्थ लिख देते हैं।
अहं त्वति तनुश्चैव वानरश्च विशेषतः।
वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम्॥
यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् ।
रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति ।
वानरस्य विशेषेण कथं स्यादभिभाषणम्॥
अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत्।
मया सान्त्वयितुं शक्या नान्यथेयमनिन्दिता॥
(वाल्मीकीय रामायण, सुंदरकांड,३०/१७-२०)
(इन श्लोकों का अर्थ है कि श्रीहनुमानजी सोचते हैं) - विशेषकर के इस समय मैं वानर के शरीर में हूँ। इसीलिए मैं सामान्य मनुष्यों के समान सामान्य संस्कृत में बोलूंगा। यदि मैं द्विजाति (जिन्हें वेदाधिकार है) कि समान (वैदिक) संस्कृत में बोलूंगा तो मुझे रावण समझ कर सीताजी डर जाएंगी कि यह वानर होकर ऐसी संस्कृत कैसे बोल रहा है ? अतएव मैं सामान्य मनुष्यों की भांति ही अर्थयुक्त वाक्यों का प्रयोग करूँगा। मुझे इस समय इन्हें सांत्वना देने के अतिरिक्त कोई कार्य नहीं करना चाहिए।
यह उपर्युक्त श्लोकों का वास्तविक अर्थ है, किन्तु लेखक ने यहां हिंदी अनुवाद में कैसा कुतर्क घुसाया है, उसे देखें। यदि हनुमानजी बन्दर नहीं, मनुष्य ही हैं तो पहले से ही मनुष्य होने से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। लेखक तो वानर शब्द का अर्थ वनवासी मनुष्य लगाया करता है और सीताजी ने तो कई वर्ष तक विशुद्ध संस्कृत बोलने वाले वनवासी ऋषियों तथा लौकिक भाषा बोलने वाले भील-किरात वनवासियों के मध्य ही समय बिताए हैं तो फिर हनुमानजी चिंता किस बात की कर रहे हैं ? वे विशुद्ध बोलें या सामान्य, लेखक के अनुसार शरीर से तो मनुष्य ही थे, फिर चिंता क्यों ? ऊपर से लेखक ने अपने हिंदी अनुवाद में कहा कि "नागरिक संस्कृत"... ये नागरिक शब्द किस संस्कृत शब्द का अनुवाद है ? नागरिक और वनवासी की तो बात ही नहीं आयी श्लोक में। केवल मानवी वाणी की बात है, फिर ये बुद्धि कहाँ से उत्पन्न हो गयी। ऊपर से हनुमानजी ने स्वयं कहा कि मैं वानर शरीर में हूँ और मनुष्य के समान बोलूंगा तो समस्या हो जाएगी। अब प्रश्न यह है कि यदि लेखक के अनुसार वानर शब्द का अर्थ वनवासी मनुष्य लगा लें तो भी मनुष्य वनवासी हो या नगर का हो, उसके मानवी वाणी बोलने में कोई क्यों भयभीत होगा ? सीता जी तो तेरह वर्षों से वनवासियों के बीच ही रह रही थीं। समाधान यह है कि हनुमानजी वानर यानी बन्दर के रूप में ही थे और इसीलिए विशुद्ध संस्कृत बोलने से झिझक रहे थे।
उनके शास्त्रज्ञ होने की बात भी प्रमाणित है और किंपुरुष देव होने की बात भी। किन्तु उनके ज्ञानी होने से यह सिद्ध नहीं होता कि उनका शरीर मनुष्य का था। लेखक को पूर्वापर प्रसङ्ग में ही इसका प्रमाण मिल जाएगा। जब हनुमानजी सीता जी को खोज रहे थे, तब के कुछ श्लोक देखें -
वृतः परमनारीभिस्ताराभिरिव चन्द्रमा।
तं ददर्श महातेजास्तेजोवन्तं महाकपिः॥
(वाल्मीकीय रामायण ५-१८-२९)
अवेक्षमाणस्तु ततो ददर्श कपिकुञ्जरः।
रूपयौवनसंपन्ना रावणस्य वरस्त्रियः॥
(वाल्मीकीय रामायण ५-१८-२६)
ततः काञ्चीनिनादं च नूपुराणाम् च निस्वनम्।
शुश्राव परमस्त्रीणां स कपिर्मारुतात्मजः॥
तं चाप्रतिमकर्माणमचिन्त्यबलपौरुषम्।
द्वारदेशमनुप्राप्तं ददर्श हनुमान् कपिः॥
वाल्मीकीय रामायण (५-१८-२०+२१)
उपर्युक्त सभी श्लोकों में कपि शब्द हनुमानजी को बन्दर के देह वाला ही सिद्ध कर रहा है। ऐसे हज़ारों श्लोक वाल्मीकीय रामायण में ही मिल जाएंगे। लेखक उनका उल्लेख क्यों नहीं करता है ?
सीता जी से वार्तालाप प्रारम्भ करने से ठीक पहले का श्लोक देखें, यहां भी महाकपि शब्द आया है -
एवं बहुविधां चिन्तां चिन्तयित्वा महाकपिः ।
संश्रवे मधुरं वाक्यं वैदेह्या व्याजहार ह॥
(वाल्मीकीय रामायण ५-३१-०१)
इसी प्रसङ्ग के ठीक बाद जब उन्होंने सीताजी के समक्ष अपना वास्तविक रूप प्रदर्शित किया है, उसमें मनुष्य की आकृति न होकर बन्दर की आकृति ही स्पष्ट है, वाल्मीकीय रामायण के सुंदरकांड का अध्याय ३२ का अवलोकन करें -
जब सीता जी के सामने हनुमानजी आये तो हरिरूप से आये। शास्त्रों में कहीं किसी वनवासी मनुष्य के लिए हरि शब्द नहीं आया है, किन्तु बन्दर के पर्यायवाची के रूप में आया है -
सा तं दृष्ट्वा हरिश्रेष्ठं विनीतवदुपस्थितम्॥
इसके बाद देखें -
सा वीक्षमाणा पृथुभग्नवक्त्रं शाखामृगेन्द्रस्य यथोक्तकारम् ।
ददर्श पिङ्गाधिपतेरमात्यं वातात्मजं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ॥
यहां हनुमानजी के लिए पांच विशेषण हैं -
पृथुभग्नवक्त्र - जिसका चेहरा ठुड्डी के पास टूटा हुआ हो।
शाखामृगेन्द्र - शाखामृग का राजा (ऊपर प्रथम प्रश्न में बता चुका हूँ कि शाखामृग बन्दर का संस्कृत पर्यायवाची शब्द है)
पिङ्गाधिपतेरमात्य - पिङ्ग के राजा के मंत्री (पीला-भूरा रंग को पिङ्ग कहते हैं, यह बन्दर का पर्यायवाची है)
वातात्मज - वायुपुत्र
बुद्धिमतां वरिष्ठ - बुद्धिमानों में श्रेष्ठ।
ये सभी विशेषण हनुमानजी के देवपुत्र यानि दिव्ययोनि के ऐसे बन्दर के रूप में होने के प्रमाण हैं जो बहुत अधिक बुद्धिमान् है।
अब उसी अध्याय और प्रसङ्ग में आगे देखिए -
अनेन चोक्तं यदिदं ममाग्रतो वनौकसा तच्च तथा ऽस्तु नान्यथा।
इस वनौका के द्वारा जो कहा गया वह सत्य हो ...
वनौका भी बन्दर को ही कहते हैं, ऊपर प्रथम प्रश्न में शब्दकल्पद्रुम का प्रमाण दिया है। हालांकि श्रीमद्भागवत में वनवासी मनुष्य या ऋषियों के लिए वनौका शब्द भी आया है, उदाहरण -
धर्म्मोऽग्निः कश्यपः शक्रो मुनयो ये वनौकसः ।
चरन्ति दक्षिणीकृत्य भ्रमन्तो यत् सतारकाः॥
किन्तु स्मरण रहे, ऊपर के प्रसङ्ग में शाखामृग, कपि, हरि ये सब शब्द भी हैं तो यहां वनौका का अर्थ बन्दर ही होगा, क्योंकि वनवासी ऋषियों के लिए शाखामृग, कपि आदि शब्द कहीं नहीं आये हैं। हनुमानजी यदि वनवासी मनुष्य थे तो फिर उनके लिए एक स्थान पर भी मानव का सामान्य पर्यायवाची क्यों नहीं आया, सर्वत्र बन्दर के ही पर्यायवाची ही क्यों आये ?
अब वाल्मीकीय रामायण के सुंदरकांड का इसीलिए प्रसङ्ग के अध्याय ३४ का अवलोकन करें। यहाँ प्रथम एवं अष्टम श्लोक में निम्न वाक्य है जहां हनुमानजी को हरियूथप कहा गया है, इसका अर्थ है हरि के समुदाय का नायक। हरि का अर्थ बन्दर भी होता है, पूर्व में बता चुका हूँ -
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा हनुमान् हरियूथपः।
आगे हनुमानजी बताते हैं कि कैसे हरीश्वर (हरि के समुदाय के स्वामी) एवं नरेश्वर (मनुष्यों के समुदाय के स्वामी) में मित्रता हुई, क्योंकि सीता जी विश्वास नहीं कर रही थीं। क्यों विश्वास नहीं कर रही थीं भला ? यदि वानर का अर्थ वनवासी मनुष्य है तो समस्या क्या थी ? पहले भी वन में रहने वाले निषादराज गुह आदि राजाओं से राम जी की मित्रता थी ही, फिर कैसे सन्देह की बात ? सन्देह इसीलिए क्योंकि वानर का अर्थ यहां बन्दर ही है और बन्दर का पर्यायवाची हरि है। इसीलिए यहां अलग से हरीश्वर और नरेश्वर शब्द का वर्णन करना पड़ा, इसीलिए सन्देह भी हुआ कि मनुष्य और बन्दर में कैसे मित्रता हुई और इसीलिए हनुमानजी को पूरी कथा सुनानी पड़ी।
ततस्तौ प्रीतिसम्पन्नौ हरीश्वरनरेश्वरौ।
परस्परकृताश्वासौ कथया पूर्ववृत्तया॥
आगे सर्ग ३७ में सीता जी हनुमानजी से कहती हैं, जिसमें कुछ विशेष सम्बोधन हैं -
विधिर्नूनमसंहार्थः प्राणिनां प्लवगोत्तम।
साथ ही,
वर्तते दशमो मासो द्वौ तु शेषौ प्लवङ्गम।
एवं
शरजालांशुमाञ्छूरः कपे रामदिवाकरः।
अन्यच्च,
तदेव खलु ते मन्ये कपित्वं हरियूथप।
इसमें प्लवगोत्तम, प्लवंगम, कपि, हरियूथप आदि शब्द आये हैं जो सब के सब एक स्वर में कहते हैं कि हम वानर यानी बन्दर के पर्यायवाची ही हैं। सीताजी कहती भी हैं कि तुम मेरे कष्ट के निवारण के लिए बिना युद्ध के अभी ही मुझे पीठ और बैठाकर श्रीरामजी के पास ले जाना चाहते हो इसे मैं तुम्हारे कपि (बन्दर) होने के कारण हुई चंचलता समझती हूँ। फिर हनुमानजी ने उन्हें जब अपना विराट रूप दिखाया तो वहां भी उनके लिए कुछ विशेषण आये हैं,
इति सञ्चिन्त्य हनुमांस्तदा प्लवगसत्तमः।
एवं
स तस्मात् पादपाद्धीमानाप्लुत्य प्लवगर्षभः।
यहाँ प्लवगसत्तम एवं प्लवगर्षभ शब्द भी बन्दर के ही पर्यायवाची हैं। हनुमानजी का रूपदर्शन करें -
हरिः पर्वतसङ्काशस्ताम्रवक्त्रो महाबलः ।
वज्रदंष्ट्रनखो भीमो...
हरि (बन्दर), पर्वत के समान विशाल, तांबे के समान लाल मुंह वाले, महाबली, वज्र के समान कठोर और तीखे नाखून एवं दांत वाले, भयानक ....
ये सब कौन से वनवासी मनुष्य के स्वरूप हैं ? न शब्द का अर्थ मनुष्य बता रहा है, न स्वरूप का विवरण ...
*कुतर्क ५) हनुमान् जी के अतिरिक्त अन्य वानर जैसे कि बालि पुत्र अंगद का भी वर्णन वाल्मीकि रामायण में संसार के श्रेष्ठ महापुरुष के रूप में किष्किन्धा कांड ५४/२ में हुआ है। हनुमान् बालि पुत्र अंगद को अष्टांग बुद्धि से सम्पन्न, चार प्रकार के बल से युक्त और राजनीति के चौदह गुणों से युक्त मानते थे।*
बुद्धि के यह आठ अंग हैं- सुनने की इच्छा, सुनना, सुनकर धारण करना, ऊहापोह करना, अर्थ या तात्पर्य को ठीक ठीक समझना, विज्ञान व तत्वज्ञान।
चार प्रकार के बल हैं- साम , दाम, दंड और भेद।
राजनीति के चौदह गुण हैं- देशकाल का ज्ञान, दृढ़ता, कष्टसहिष्णुता, सर्वविज्ञानता, दक्षता, उत्साह, मंत्रगुप्ति, एकवाक्यता, शूरता, भक्तिज्ञान, कृतज्ञता, शरणागत वत्सलता, अधर्म के प्रति क्रोध और गंभीरता।
भला इतने गुणों से सुशोभित अंगद बन्दर कहाँ से हो सकते हैं ?
*कुतर्क ६) वेदज्ञ और राजमन्त्री हनुमान जी :-*
सचिवोऽयं कपीन्द्रस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ।
तमेव कांक्षमाणस्य ममान्तिकमिहागतः॥
नाऋग्वेद विनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः ।
नासामवेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितम्॥
(वाल्मिकीय रामायण, किष्किन्धा काण्ड सर्ग -३ )
अर्थात् :- हे लक्ष्मण ! यह ( हनुमान जी ) सुग्रीव के मन्त्री हैं और उनकी इच्छा से यह मेरे पास आये हैं । जिस व्यक्ति ने ऋग्वेद को नहीं पढ़ा है, जिसने यजुर्वेद को धारण नहीं किया है, जो सामवेद का पण्डित नहीं है, वह व्यक्ति, जैसी वाणी यह बोल रहे हैं वैसी नहीं बोल सकता है ।
शब्दशास्त्र, व्याकरण के पण्डित हनुमान जी :-
नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् ।
बहुव्याहरतानेन न किञ्चिदपशब्दितम्॥
( वाल्मिकीय रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग -३ )
अर्थात् :- इन्होंने निश्चित ही सम्पूर्ण व्याकरण पढ़ा है क्योंकि इन्होंने अपने सम्पूर्ण वार्तालाप में एक भी अशुद्ध शब्द का उच्चारण नहीं किया है ।
श्रीरामो लक्ष्मणं प्राह पश्यैनं बटुरूपिणम्।
शब्दशास्त्रमशेण श्रुतं नूनमनेकधा॥
अनेकभाषितं कृत्स्नं न किञ्चिदपशब्दितम् ।
ततः प्राह हनुमन्तं राघवो ज्ञानविग्रहः॥
( वल्मिकी रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग-१ )
अर्थात् :- राम ने कहा "हे लक्षमण ! इस ब्रह्मचारी को देखो । अवश्य ही इसने सम्पूर्ण व्याकरण कई बार भली प्रकार से पढ़ा है । देखो ! इतनी बातें कहीं किन्तु इसके बोलने में कहीं कोई एक भी अशुद्धि नहीं हुई ।
*समाधान ५-६)* अंगद जी स्वयं भी हनुमानजी के समान ही किंपुरुष हैं, उनके पिता बालि भी इंद्रपुत्र होने से किंपुरुष देवयोनि के हैं, माता तारा भी कामरूपिणी हैं तो उनका दिव्य गुणों से सम्पन्न होने में कैसा आश्चर्य ?
कुतर्क षष्ठ के अंतिम श्लोक प्रमाण में उक्त श्लोक मुझे वाल्मीकीय रामायण के किष्किंधाकांड के सर्ग १ में कहीं नहीं मिले। वैसे कुतर्क षष्ठ का समाधान वैसे तो तीसरे कुतर्क में कर ही चुका हूँ, फिर भी कुछ बातें हैं जो अतिरिक्त में जोड़ देना चाहूंगा। हनुमानजी ने अपने कपि रूप को त्याग कर भिक्षु रूप बनाया था, ऐसा वर्णन उसी प्रसङ्ग में स्पष्ट है। कपि का कोई अर्थ वनवासी मनुष्य से नहीं लगाया जा सकता।
कपिरूपं परित्यज्य हनुमान् मारुतात्मजः ।
भिक्षुरूपं ततो भेजे शठबुद्धितया कपिः॥
(वाल्मीकीय रामायण, किष्किंधाकांड, ०३-०२)
अब समस्या यह है जो पहले से मनुष्य है वो कपि रूप क्यों छोड़ेगा ? सीधे लिखते कि भिक्षु का रूप बनाकर गए। रूप बदलने से पहले कपि रूप को छोड़ा, ऐसा क्यों लिखा ? मतलब हनुमानजी मनुष्यरूप में नहीं थे। अब यदि कहें कि सुग्रीव आदि के साथ छिप कर रहते थे इसीलिए नकली बन्दर का रूप बनाया रहा, उसे ही छोड़ दिया तो ध्यान रखें कि नकली रूप बनाने का उद्देश्य बालि से बचना ही होता। और जहां दो अपरिचित धनुर्धरों के बालिपक्षीय होने का सन्देह हो वहां नकली रूप को छोड़ना कौन सी बुद्धिमत्ता है ? और यदि कहें कि बन्दर का एक नकली रूप छोड़ा तो भिक्षु का दूसरा नकली रूप बनाया भी तो, फिर भी यह बात संगत नहीं, क्योंकि श्लोक के अंत में हनुमानजी के लिए पुनः कपि शब्द आया है। यदि मनुष्य होते तो कहते कि मनुष्य थे, कपि (बन्दर) बन कर रह रहे थे, जसे छोड़कर भिक्षु का वेश बनाया। किन्तु ऐसा नहीं लिखा श्लोक में, अपितु लिखा कि कपि ने कपि रूप छोड़कर भिक्षु रूप धारण किया।
आगे हनुमानजी का भिक्षु रूप छोड़कर वापस वानर/कपि (बन्दर) रूप धारण करने का वर्णन भी है। श्लोक में वानर और कपिकुंजर दोनों शब्द है, अर्थ बन्दर ही है।
भिक्षुरूपं परित्यज्य वानरं रूपमास्थितः ।
पृष्ठमारोप्य तौ वीरौ जगाम कपिकुङ्जरः॥
(वाल्मीकीय रामायण, ४-४-३४)
*कुतर्क ०७) अंगद की माता तारा के विषय में मरते समय किष्किन्धा कांड १६/१२ में बालि ने कहा था कि-*
"सुषेण की पुत्री यह तारा सूक्ष्म विषयों के निर्णय करने तथा नाना प्रकार के उत्पातों के चिह्नों को समझने में सर्वथा निपुण है। जिस कार्य को यह अच्छा बताए, उसे नि:शंक होकर करना। तारा की किसी सम्मति का परिणाम अन्यथा नहीं होता।”
ऐसे गुण विशेष मनुष्यों में ही संभव है।
*समाधान ७)* यहां भी लेखक महोदय ने मूल श्लोक न देकर केवल हिंदी अनुवाद और श्लोक संख्या दी है। किंतु उपर्युक्त सन्दर्भ में ऐसे भाव वाला कोई श्लोक मुझे नहीं मिला। अपितु उस अध्याय में या उसके आगे पीछे के दो तीन अध्यायों तक भी बालि के ऐसा कहने का कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। केवल युद्ध का वर्णन है।
हां, मैं सहमत हूँ कि बाली ने तारा की नीतिनिपुणता की प्रशंसा की है और लेखक का हिंदी अनुवादित भाव निम्न श्लोकों का है,
सुषेणदुहिता चेयमर्थसूक्ष्मविनिश्चये ।
औत्पातिके च विविधे सर्वतः परिनिष्ठिता॥
यद्येषा साध्विति ब्रूयात् कार्यं तन्मुक्तसंशयम् ।
न हि तारामतं किंचिदन्यथा परिवर्तते॥
(वाल्मीकीय रामायण ४-२२-१३+१४)
यहां ध्यातव्य है कि निश्चय ही ये गुण किसी सामान्य बन्दर के नहीं हो सकते किन्तु मैं सिद्ध कर चुका हूँ कि ये लोग सामान्य पशुयोनि के बन्दर न होकर दिव्य किंपुरुष योनि के वानराकृति देवता थे। अतएव ये गुण उनमें होने का कोई संशय नहीं है। इतना ही नहीं, इन प्रसंगों में भी,
हते तु वीरे प्लवगाधिपे तदा
प्लवंगमाः तत्र न शर्म लेभिरे ।
वने चराः सिंह युते महावने
यथा हि गावो निहते गवां पतौ॥
इस जैसे अनेकों श्लोकों में आये प्लवगाधिप और प्लवंगम शब्द बन्दर के ही पर्यायवाची हैं।
*कुतर्क ८) किष्किन्धाकांड (२५/३०) में बालि के अंतिम संस्कार के समय सुग्रीव ने आज्ञा दी – मेरे ज्येष्ठ बन्धु आर्य का संस्कार राजकीय नियम के अनुसार शास्त्र अनुकूल किया जाये। किष्किन्धा कांड (२६/१०) में सुग्रीव का राजतिलक हवन और मन्त्रादि के साथ विद्वानों ने किया। क्या बंदरों में शास्त्रीय विधि से संस्कार होता है ?*
*समाधान ८)* यहां भी लेखक ने मूल श्लोक नहीं दिए हैं। दिए होते और बात अधिक स्पष्ट होती। अस्तु, मैं ही श्लोक दे रहा हूँ -
आज्ञापयत्तदा राजा सुग्रीवः प्लवगेश्वरः ।
और्ध्वदैहिकमार्यस्य क्रियतामनुरूपतः॥
यहां सुग्रीव ने जो आज्ञा दी है, उसने सुग्रीव का वर्णन प्लवगेश्वर के विशेषण के साथ आया है, अर्थात् बंदरों के स्वामी। यहाँ मूल श्लोक देने से लेखक की पोल खुल जाती इसीलिए चतुराई से केवल हिंदी अर्थ दिया।
अब आगे आते हैं राज्याभिषेक की बात पर। यहां भी मूल श्लोक लेखक ने नहीं दिया है इसीलिए मैं ही दे रहा हूँ,
ततः कुशपरिस्तीर्णं समिद्धं जातवेदसम्।
मंत्रपूतेन हविषा हुत्वा मंत्रविदो जनाः॥
किन्तु इससे भी पहले इसी अध्याय के प्रथम श्लोक पर चर्चा करते हैं ताकि समाधान हो सके ,
ततः शोकाभिसंतप्तं सुग्रीवं क्लिन्नवासनम् ।
शाखामृगमहामात्राः परिवार्योपतस्थिरे॥
भातृवध से ग्लानिग्रस्त सुग्रीव को महान् शाखामृग मन्त्रीगण घेर कर खड़े हो गए।
यहां शाखामृग शब्द से बन्दर का ही संकेत है। बन्दर के लिए ही संस्कृत वांग्मय में शाखामृग शब्द प्रयुक्त होता है, किसी वनवासी मनुष्य के लिए नहीं। अब रही बात शास्त्रीय विधि से संस्कार की, तो बता चुका हूँ कि ये मूढ़बुद्धि, जंगली पशु नहीं थे, किंपुरुष देवयोनि के थे, वेदज्ञानसम्पन्न थे इसीलिए इनका संस्कार शास्त्रीय विधि से होता था। देवताओं ने ही किंपुरुष योनि का आश्रय लेकर बन्दर भालू इत्यादि के रूप में अवतार लिया था -
ब्रह्माजी ने रामावतार से पूर्व भगवान् विष्णु से कहा -
अहं तव सहायार्थमृक्षयोनौनिजान्शतः।
सम्भूतोऽस्मि पुरा देव महाबलपराक्रमः॥
(महाभागवत, ३७-१२)
मैं आपकी सहायता के लिए ऋक्षयोनि में अत्यंत पराक्रमी अवतार ले चुका हूँ।
ऐसे ही शिव जी ने भी कहा,
अहं वानररूपेण सम्भूय पवनात्मज:।
साहाय्यं ते करिष्यामि यथोचितमरिन्दम॥
(महाभागवत, ३७-०५)
हे शत्रुओं का नाश करने वाले विष्णो ! मैं वानर का रूप धारण करके पवनपुत्र बनकर आपकी यथोचित सहायता करूँगा।
ऐसे ही अन्य सभी देवता बन्दर भालू के स्वरूप का आश्रय लेकर भगवान की लीला में सहायता करने हेतु वन में उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे -
तथैवान्ये च त्रिदशा ऋक्षवानररूपतः।
संस्थिता कानने विष्णुं प्रतीक्षन्तो महामते॥
(महाभागवत, ३७-२४)
अतएव स्वरूप से सभी बन्दर भालू होने पर भी तात्विक रूप से देवता थे इसीलिए वैसे ही व्यवहार भी करते थे।
*कुतर्क ९) जहाँ तक जटायु का प्रश्न है, वह गिद्ध नामक पक्षी नहीं था। जिस समय रावण सीता का अपहरण कर उसे ले जा रहा था। तब जटायु को देख कर सीता ने कहा –*
जटायो पश्य मामार्य ह्रियमाणामनाथवत्।
अनेन राक्षसेद्रेण करुणं पाप कर्मणा॥
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ४९-३८)
हे आर्य जटायु ! यह पापी राक्षसपति रावण मुझे अनाथ की भांति उठाये ले जा रहा है।
कथं तत् चन्द्रसंकाशं मुखमासीत् मनोहरम्।
सीतया कानि चोक्तानि तस्मिन् काले द्विजोत्तम॥
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ६८-०६)
यहाँ जटायु को आर्य और द्विज कहा गया है। यह शब्द किसी पशु-पक्षी के सम्बोधन में नहीं कहे जाते।
रावण को अपना परिचय देते हुए जटायु ने कहा -
जटायुः नाम नाम्नाहम् गृध्रराजो महाबलः।
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड ५०-०४)
अर्थात्- मैं गृधकूट का भूतपूर्व राजा हूँ और मेरा नाम जटायु है।
यह भी निश्चित है कि पशु-पक्षी किसी राज्य का राजा नहीं हो सकते। इन सभी प्रमाणों से यह सिद्ध होता हैं कि जटायु पक्षी नहीं था, अपितु एक मनुष्य था। जो अपनी वृद्धावस्था में जंगल में वास कर रहा था।
*खंडन ९)* इस कुतर्क में लेखक की पूर्ण मूर्खता और अंधत्व का संकेत मिलता है। आर्य कोई व्यक्ति या समुदाय या जाति का नाम नहीं होता, श्रेष्ठ आचरण करने वाले को आर्य कहते हैं और ये बात तो आर्य समाजियों की समझ में आने से रही। जटायु अत्यंत धर्मात्मा, नीतिनिपुण थे एवं राजा दशरथ के मित्र भी थे इसीलिए सीता जी ने उन्हें पितातुल्य जानकर ही आर्य कहा। स्वयं श्रीराम जी भी राजा दशरथ और जटायु को समान समझ कर सम्मानित व्यवहार करते थे -
राजा दशरथः श्रीमान् यथा मम मया यशाः।
पूजनीयश्च मान्यश्च तथायं पतगेश्वरः॥
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ६८-२६)
यहां जटायु जी के लिए राम जी ने पतगेश्वर शब्द का प्रयोग किया है। पतगेश्वर का अर्थ है उड़ने वालों का राजा, और सभी जानते हैं कि मनुष्य नहीं उड़ते, पक्षी ही उड़ते हैं।
अब आते हैं द्विज शब्द पर। लेखक स्वयं महामूर्ख है जो उसे अनेकार्थ शब्दों का ज्ञान नहीं। द्विज कहते किसे हैं ? जिसका दो बार जन्म हो। ब्राह्मण आदि द्विजाति का यज्ञोपवीत ही दूसरा जन्म है, इसीलिए उन्हें द्विज कहते हैं। किंतु केवल उन्हें ही द्विज नहीं कहते, पक्षियों को भी द्विज कहते हैं, क्योंकि उनका पहला जन्म अंडे के रूप में होता है और दूसरा जन्म अंडे के बाहर निकलने ओर होता है। दो बार जन्म लेने से दांतों को भी द्विज कहते हैं। अमरकोष में मछली, सर्प, पक्षी आदि अंडे से उत्पन्न जीवों को भी द्विज बताया गया है - अण्डजः । स पक्षिसर्पमत्स्यादिः (अमरकोष, ३-३-३०) इसीलिए यहां द्विज का अर्थ मनुष्य नहीं, पक्षी ही है। और निःसन्देह द्विज शब्द पक्षियों के सम्बोधन में भी कहा जाता है।
अब तीसरे प्रमाण पर आते हैं जो लेखक ने दिया है। दिए गए श्लोक या उसके पूर्वापर प्रसङ्ग से भी कहीं यह स्पष्ट नहीं होता है कि "मैं गृध्रकूट का भूतपूर्व राजा हूँ" गृध्रकूट शब्द कहाँ से ले आये ? और भूतपूर्व राजा, यह शब्द किस संस्कृत पद का अनुवाद है ? लेखक मनमाना अनुवाद करके भ्रमित कर रहा है। सीधा अर्थ है, मैं जटायु नाम का महाबली गृध्रराज हूँ। और हां, जटायु कोई मनुष्य नहीं थे जो अपनी वृद्धावस्था में जंगल में वास कर रहे थे। वृद्ध थे, जंगल में थे किंतु वे तब भी निरंतर राज्य कर रहे थे, ऐसा उन्होंने स्वयं रावण से कहा है कि पूर्वजों के दिये गए राज्य का वे पिछले साठ हजार वर्षों से निरंतर पालन करते आ रहे हैं -
षष्टिवर्षसहस्राणि जातस्य मम रावण।
पितृपैतामहं राज्यहं यथावदनुतिष्ठतः॥
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ५०-२०)
लेखक का तर्क है कि पशु पक्षी किसी राज्य के राजा नहीं होते। पहले यह स्पष्ट करें कि राज्य की क्या परिभाषा है ? क्या केवल मनुष्यों के द्वारा अपने समाज के आधार पर बनाया गया शासकीय विभाजन ही राज्य है ? नहीं। अपितु प्रत्येक प्राणी के लिए उसका अपना अलग राज्य होता है। मधुमक्खियों का भी अपना झुंड होता है जिसकी एक रानी होती है। यही बात मछली और चींटियों पर भी लागू होती है। उनके लिए उनका भी एक राज्य है, एक व्यवस्था है, उसके नियम और अनुशासन हैं और साथ ही एक शासक भी है। बड़े जीवों में बगुला, गीध, भेड़िया, बन्दर, हिरण, हाथी, सिंह आदि के भी झुंड एक नायक के नीचे चलते हैं। मनुष्यों के बनाये राज्य ही प्रकृति में नहीं हैं, अन्य भी हैं जो मनुष्यों की दृष्टि से समझे नहीं जा सकते। वैसे ही पक्षियों के राज्य के राजा जटायु थे और वे स्वयं गीध की योनि का आश्रय लेकर रहते थे। इस बात को पुष्ट करने के लिए कुछ श्लोक देता हूँ -
रक्षसां नीयमानां तां जटायु: पक्षिपुंगवः।
(महाभागवत, ३८-५२)
यहां जटायु को पक्षियों में श्रेष्ठ बताया गया है।
तद्बभूवाद्भुतं युद्धं गृध्रराक्षसयोस्तदा।
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ५१-०३)
तब उन गीध (जटायु) और राक्षस (रावण) के मध्य अद्भुत युद्ध हुआ।
स तानि शरजालानि गृध्रः पत्ररथेश्वरः।
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ५१-०५)
यहां पत्ररथ का अर्थ पक्षी है, क्योंकि वे पंखों से ही भ्रमण करते हैं। उनके स्वामी गृद्ध, ऐसा विशेषण जटायु जी के लिए आया है।
उसी सर्ग में आगे युद्ध के वर्णन में आया है कि कैसे जटायु ने अपने पंखों से रावण को मारा, युद्ध में नाखून, मुख (चोंच) और पंजों का प्रयोग किया। कैसे रावण ने उनके पैर, पंख आदि काट डाले, और साथ ही जटायु जी के लिए सर्वत्र पतगेश्वर, गृद्ध, पक्षियों में प्रवर (श्रेष्ठ) आदि शब्द भी आये ही हैं, यथा -
स तानि शरजालानि पक्षाभ्यां तु विधूय ह।
और,
केशाञ्चोत्पाटयामास नखपक्षमुखायुधः।
एवं,
राक्षसानां च मुख्यस्य पक्षिणां प्रवरस्य च।
साथ ही,
पक्षौ पादौ च पार्श्वौ च खड्गमुद्धृत्य सोऽच्छिनत्।
स छिन्नपक्षः सहसा रक्षसा रौद्र
कर्मणा।
निपपात महागृध्रो धरण्यामल्पजीवितः॥
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, सर्ग - ५१)
राम जी ने बाद में जटायु का दाह संस्कार एवं श्राद्ध भी किया है, हालांकि ये बात आर्य समाजियों की क्षुद्र बुद्धि में नहीं आएगी क्योंकि उन्हें तो श्राद्ध पाखण्ड ही लगता है। इसीलिए हम आर्य समाजियों का अनुसरण न करते हुए श्राद्ध का समर्थन करेंगे क्योंकि ये स्वयं श्रीराम जी के द्वारा आचरित है। वहां दाह संस्कार से पूर्व राम जी ने कहा है कि इस घोर राक्षसों से घिरे वन में भी आजतक हमलोग इन पितातुल्य गृद्धराज जटायु के कारण ही निर्भय होकर रहते थे।
बहूनि रक्षसां वासे वर्षाणि वसता सुखम्।
अनेन दण्डकारण्ये विशीर्णमिह पक्षिणा॥
(वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकांड, ६८-२०)
इसी सर्ग में आगे श्लोक २५ देखें, श्रीराम जी कहते हैं कि मुझे सीताहरण का उतना कष्ट नहीं है जितना इस गृद्ध के मेरी सहायता हेतु मरने का हो रहा है।
सीता हरणजं दुःखं न मे सौम्य तथा गतम् ।
यथा विनाशो गृध्रस्य मत्कृते च परंतप॥
इतना ही नहीं, राम जी ने उनका श्राद्ध भी किया। श्राद्ध में परिजन भी भोजन करते हैं, गृद्ध के परिजन, अन्य पक्षी भी आये। अब गीध के परिजन अन्य पक्षी और गीध शाकाहारी तो होंगे नहीं, इसीलिए उनके प्रजातिगत स्वभाव को देखते हुए राम जी ने रोहू मछली से उन्हें तृप्त किया।
रोहिमांसानि चोद्धृत्य पेशी कृत्वा महायशाः ।
शकुनाय ददौ रामो रम्ये हरितशाद्वले॥
यहां पक्षियों के लिए शकुन शब्द आया है जो उनका संस्कृत पर्यायवाची है। आपको स्मरण होगा, दुष्यंत शकुन्तला का प्रसङ्ग, शकुन यानी पक्षियों के द्वारा पालित होने से ही मेनकापुत्री का नाम शकुंतला पड़ा था।
राम जी ने जटायु के लिए जो तर्पण किया है, उस श्लोक में उनके लिए पक्षिराज और गृद्ध अर्थ वाले सम्बोधन स्पष्ट हैं, उसी सर्ग (६८) के अंतिम श्लोकों को देखें -
ततो गोदावतीं गत्वा नदीं नरवरात्मजौ ।
उदकं चक्रतुस्तस्मै गृध्रराजाय तावुभौ॥
शास्त्रदृष्टेन विधिना जले गृध्राय राघवौ।
स्नात्वा तौ गृध्रराजाय उदकं चक्रतुस्तदा॥
स गृध्रराजः कृतवान् यशस्करम्,
सुदुष्करम् कर्म रणे निपातितः ।
महर्षिकल्पेन च संस्कृतः तदा
जगाम पुण्यां गतिमात्मनः शुभाम् ॥
और भी सैकड़ों श्लोकों में ऐसे शब्द यह सिद्ध करते हैं कि जटायु कश्यपवंशी गृद्धराज ही थे।
१०) जहाँ तक जाम्बवान् के रीछ होने का प्रश्न है। यह भी एक भ्रान्ति है। रामायण में वर्णन मिलता है कि जब युद्ध में राम-लक्ष्मण मेघनाद के ब्रह्मास्त्र से घायल हो गए थे, तब किसी को भी उस संकट से बाहर निकलने का उपाय नहीं सूझ रहा था। तब विभीषण और हनुमान् जाम्बवान् के पास परामर्श लेने गये। तब जाम्बवान् ने हनुमान् को हिमालय जाकर ऋषभ नामक पर्वत और कैलाश नामक पर्वत से संजीवनी नामक औषधि लाने को कहा था।
इसका सन्दर्भ रामायण के युद्ध कांड सर्ग ७४/३१-३४ में मिलता है। आप्त काल में बुद्धिमान और विद्वान जनों से संकट का हल पूछा जाता है। जैसे युद्धकाल में ऐसा निर्णय किसी अत्यंत बुद्धिवान और विचारवान व्यक्ति से पूछा जाता है। पशु-पक्षी आदि से ऐसे संकट काल में उपाय पूछना सर्वप्रथम तो संभव ही नहीं हैं। दूसरे बुद्धि से परे की बात है। इसलिए स्वीकार्य नहीं है।
इसलिए जाम्बवान का रीछ जैसा पशु नहीं अपितु महाविद्वान् होना ही संभव है।
इन सब वर्णन और विवरणों को बुद्धिपूर्वक पढ़ने से यह सिद्ध होता है कि हनुमान, बालि, सुग्रीव आदि विद्वान एवं बुद्धिमान् मनुष्य थे। उन्हें बन्दर आदि मानना केवल मात्र एक कल्पना है और अपने श्रेष्ठ महापुरुषों के विषय में असत्य कथन है।
*समाधान १०)*
कुतर्की लेखक के बुद्धि से परे की बात है तो सनातन इतिहास क्या करे ? उलूक को भी सूर्य का अस्तित्व स्वीकार्य नहीं होता, बाकी कोई भ्रांति नहीं है। भ्रांति तो आर्य समाज फैला रहा है। यह बात सत्य है कि जाम्बवान् अत्यंत बुद्धिमान्, एवं पराक्रमी थे। किंतु वे मनुष्य योनि में नहीं थे। वे भी किंपुरुष ही थे साथ ही ब्रह्मदेव के अवतार थे, इसका श्लोक सहित प्रमाण पहले ही दे चुका हूँ। निःसन्देह किसी पशु पक्षी से आपत्ति का समाधान नहीं मांगा जाता किन्तु जाम्बवान् कोई पशु पक्षी नहीं थे, वे ब्रह्मदेव के अवतार, किंपुरुष ऋक्षयोनि के स्वामी थे। उनके लिए सर्वत्र ऋक्षराज शब्द ही आया है। अब ये मत कहना कि वन में रहने वाले को ऋक्ष भी कहते हैं। मतलब वन में रहने वाले मनुष्य को ऋक्ष वानर छोड़कर कुछ और नहीं लिख सकते थे ऋषिगण ? साथ ही अन्य लोग, जिनका मनुष्य होना प्रमाणित है, उनके लिए कहीं ऋक्ष या वानर नहीं लिख सकते थे ? राम जी की अयोध्या वापसी में उनके साथ असंख्य देवता, राक्षस, वानर और भालू, ये सब भी थे -*
पुष्पकं रथमारुह्य वानरेश्वरसंयुतः।
सहितो वानरै: सर्वै: राक्षसेशसमन्वित:॥
वेष्टितैस्त्रिदशैश्चापि भल्लूकै: कोटिकोटिशः।
(महाभागवत, ४८-९+१०)
लेखक ने जिस प्रसंग का उल्लेख किया है, उससे भी, उसी सर्ग के श्लोकों में भालू यानी ऋक्ष होने का प्रमाण मिलता है, जाम्बवान् जी को ऋक्षपुंगव कहा गया है,
विभीषणवचः श्रुत्वा जाम्बवानृक्षपुङ्गवः।
एवं
ऋक्षवानरवीराणामनीकानि प्रहर्षय ।
साथ ही अन्य स्थानों पर भी देखें,
वाल्मीकीय रामायण के युद्धकाण्ड (लंकाकांड) के सर्ग ३७ में व्यूहरचना के समय भगवान् अपने योद्धाओं को निम्न निर्देश देते हैं,
वानरेन्द्रश्च बलवानृक्षराजश्च जाम्बवान्।
राक्षसेन्द्रानुजश्चैव गुल्मे भवतु मध्यमे॥
न चैव मानुषं रूपं कार्यं हरिभिराहवे।
एषा भवतु नः संज्ञा युद्धेऽस्मिन्वानरे बले॥
वानरा एव नश्चिह्नं स्वजनेऽस्मिन्भविष्यति।
वयं तु मानुषेणैव सप्त योत्स्यामहे परान्॥
अहमेव सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन महौजसा।
आत्मना पञ्चमश्चायं सखा मम विभीषणः॥
अर्थात्,
बलवान् वानरराज एवं ऋक्षराज, तथा राक्षसराज विभीषण बीच में रहेंगे। इस युद्ध में किसी भी हरि (बन्दर/भालू) के द्वारा मनुष्य का रूप धारण नहीं किया जाएगा, क्योंकि युद्ध में यही हमारी पहचान होगी। युद्ध में केवल मैं, लक्ष्मण, विभीषण और उनके चार मंत्री, यही सात लोग मनुष्य रूप धारण करके लड़ेंगे।
उपर्युक्त निर्देश देने का उद्देश्य यही था कि भगवान् जानते ही थे कि ये सभी वानर भालू वास्तव में दिव्ययोनि के देवता हैं, इसीलिए इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हैं, अतएव उन्होंने यह विशेष निर्देश दिया है।
हनुमान् सुग्रीव, जाम्बवान् आदि विद्वान् तो थे किंतु मनुष्य नहीं थे, अपितु मनुष्यों से कई गुणा श्रेष्ठ दिव्य *किंपुरुष योनि* के थे। उन्हें बन्दर भालू कहना कल्पना नहीं है, अपितु उनके लौकिक दृष्टि से दिखने वाले स्वरूप का वैसा ही वर्णन करना है, जैसा कि ग्रंथकार ऋषियों ने बताया है।
*महाभारत आदि में भी हनुमानजी के भीम से भेंट और भीम के द्वारा पूंछ उठाने का प्रयास द्रष्टव्य है।*
*वामपंथी आर्य समाजियों को जो बात समझ में नहीं आती, उसे या तो मिलावटी कह देते हैं या फिर उनका अलग ही कुतर्कपूर्ण अर्थ कर बैठते हैं।*
मूल लेखक के लेख में दिए गए कुतर्क एवं श्लोकों में इतनी अधिक अशुद्धियां थीं कि मुझे शुद्ध करने में अतिरिक्त परिश्रम करना पड़ा। जो व्यक्ति शुद्ध संस्कृत लिख नहीं सकता, केवल कॉपी पेस्ट जानता हो, उससे क्या आशा की जा सकती है ? जो आर्य समाज श्रीराम को भगवान् का अवतार ही न माने उससे क्या आशा करें हम ? ये लोग केनोपनिषत् में वर्णित ब्रह्म के यक्षरूपी साकार सगुण अवतरण पर मौन क्यों रहते हैं ? ये लोग छान्दोग्योपनिषत् में वर्णित विद्याओं की गणना में पुराण का नाम आने पर मौन क्यों रहते हैं ? 33 प्रकार के देवताओं पर अटकने वाले अनन्ता वै देवाः एवं अग्निर्देवता मन्त्र में क्यों चुप हो जाते हैं ? वस्तुतः संसार भर की जड़ता का मूल आर्य समाज ही है जो अपनी बुद्धि को विकसित करने के स्थान पर अनंत ज्ञान को ही दबा कर जैसे तैसे अपनी क्षुद्र बुद्धि में घुसाना चाहता है और इसमें असफल रहने पर उन बातों को ही मिलावटी कह देता है।
अंत में यही कहूंगा, लेखक का नाम भले "विवेक" हो किन्तु उसने ये लेख लिखकर अविवेक का ही प्रदर्शन किया है।
सद्भावो नास्ति वेश्यानां स्थिरता नास्ति सम्पदाम् ।
विवेको नास्ति मूर्खाणां विनाशो नास्ति कर्म्मणाम्॥
वेश्याओं में सद्भावना नहीं होती, सम्पत्ति में स्थिरता नहीं होती, मूर्खों में "विवेक" नहीं होता एवं कर्मयोगियों का विनाश नहीं होता।
साभार श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु
*वैदिक ब्राह्मण ग्रुप गुजरात*
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें