संन्यास
#संन्यास आश्रम_के_अधिकारी_अनाधिकारी तथा संन्यासियों_के_भेद_भ्रमोछेदन ◆◆◆👇👇👇
मित्रो! हमारे सनातन धर्म में चार वर्ण है और चार ही आश्रम है। चार वर्णों हैं- ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र और चार आश्रम है- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम । श्रेष्ठता की दृष्टि से कहीं-कहीं गृहस्थाश्रम को श्रेष्ठ माना गया और कहीं-कहीं सन्यास आश्रम को । इसमें हमारा मत यह है जहां धर्म के दृष्टिकोण से देखा जाता है, उस समय गृहस्थाश्रम को श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि जीवन धारण करने के लिए गृहस्थ आश्रम पर तीनों आश्रम ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम निर्भर रहते हैं और जहां मोक्ष के दृष्टिकोण से देखा जाता है , वहां सन्यास आश्रम को श्रेष्ठ माना जाता है । यदि स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो श्रेष्ठता की दृष्टि से पहले दर्जे पर सन्यास आश्रम , दूसरे दर्जे पर वानप्रस्थ आश्रम , तीसरे दर्जे पर गृहस्थ आश्रम और चौथे दर्जे पर ब्रह्मचर्य आश्रम माना जाता है ।
अब देखिए कि प्रत्येक वर्ण का कितने आश्रमों में अधिकार है!!
ब्राह्मण को ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम चारों में अधिकार है।
क्षत्रिय को ब्रह्मचर्य गृहस्थ और वानप्रस्थ में ही अधिकार है। सन्यास आश्रम में उसे अधिकार नहीं है।
वैश्य को केवल ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम में ही अधिकार है। वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम में उसको अधिकार नहीं है।
शूद्र को केवल गृहस्थ आश्रम में ही अधिकार है ब्रह्मचर्य , वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम में उसको अधिकार नहीं है ।
इससे यह सिद्ध होता है कि सलिंग सन्यास में केवल ब्राह्मण ही अधिकृत है ।
अब देखिए वेदों में सन्यास आश्रम के लिए किन-किन को अनाधिकारी माना है गया है । मित्रों!सामवेद की एक उपनिषद है जिसका नाम है #संन्यासोपनिषत । सन्यास आश्रम की मर्यादा के लिए, अधिकारी- अनाधिकारी के लिए , सन्यासी के आचरण के लिए, भिक्षा नियम के लिए, संग -अंसग के लिए इसी उपनिषद को प्रमाण माना जाता है । इसी उपनिषद के दूसरे अध्याय के चौथे मंत्र में कहा गया है 👇👇👇
अथ षण्डः पतितोऽङ्गविकलः स्त्रैणो बधिरोऽर्भको मूकः पाषण्डश्चक्री लिङ्गी कुष्ठी वैखानस हरद्विजौ भृतकाध्यापकः शिपिविष्टोऽनग्निको नास्तिको वैराग्यवन्तोऽप्येते न संन्यासार्हाः। संन्यस्ता यद्यपि महावाक्योपदेशे नाधिकारिणः ॥4॥
#अर्थात : "नपुंसक, पतित, विकलांग, स्त्री जैसे स्वभाववाला, बधिर(बहरा), बालक, बकवास करने वाला, पाखण्डी, कुचक्र (कौभाण्ड) करने वाला, कोढ़ी, वैखानस और भ्रष्ट ब्राह्मण, वेतनभोगी अध्यापक, अजितेन्द्रिय, अग्निहोत्र से वंचित और नास्तिक- ये लोग विरक्त हो गए हों, तो भी संन्यास दीक्षा के लिए योग्य नहीं हैं। यदि उन्हें संन्यास कदाचित् दिया भी जाए, तो भी वे महावाक्यों के उपदेश के लिए तो अधिकारी है ही नहीं।"
मित्रों! सनातन धर्म का दुर्भाग्य देखिए कि सरकारी तंत्र के प्रभाव से हमारे यहां हिजड़ा महामंडलेश्वर भी बना दिया जाता है ,नकली शंकराचार्य भी बनाकर घुमाए जाते हैं और शंकराचार्य पद की गरिमा को तार-तार किया जाता है । अंधे ,बहरे ,गूंगे ,लंगड़े -लूले भी सन्यास आश्रम पर अपना डेरा जमाए बैठे हैं । और तो और नकली पीठों का निर्माण करके स्वघोषित जगतगुरु भी बने हुए हैं।
स्त्रियों की सन्यासिनी बनी हुई है , और आर्य समाज के तो कहने ही क्या ! इनके सन्यासी तो ऐसे ही होते हैं कि विपत्ति आने पर सलवार पहनकर भाग भी जाते हैं😁 ऐसे छद्म वेशियों से सनातन धर्म को जितना नुकसान हो रहा है उतना तो विधर्मियों के द्वारा भी नहीं हो रहा । श्रुति ने स्पष्ट कहा है कि इन लोगों को सन्यास आश्रम में बिल्कुल भी अधिकार नहीं है। यदि कदाचित इनको सन्यास दे भी दिया जाए तो भी ये महावाक्य श्रवण करने के बिल्कुल भी अधिकारी नहीं है । आगे श्रुति ने स्पष्ट कहा है --
आरूढपतितापत्यं कुनखी श्यावदन्तकः।
क्षयी तथाङ्गविकलो नैव संन्यस्तुमर्हति ॥5॥
संप्रत्यवसितानां च महापातकिनां तथा।
व्रात्यानामभिशस्तानां संन्यासं नैव कारयेत् ॥।6।।
व्रत यज्ञ तप दान होम स्वाध्याय वर्जितम् ।
सत्यशौचपरिभ्रष्टं संन्यासं नैव कारयेत् ।
एते नार्हन्ति संन्यासमातुरेण विना क्रमम् ॥7॥
#अर्थात: "आरूढ़ होकर पतित हुए मनुष्य की सन्तान, निकृष्ट नख से युक्त, मैले दुर्गन्धी दाँत वाले, क्षयरोगी, विकलांग, आदि लोग संन्यास धर्म की दीक्षा लेने योग्य नहीं हैं । जो मनुष्य व्रत, यज्ञ, तप,दान,होम और स्वाध्याय से रहित है. सत्य और पवित्रता से रहित हैं, ऐसे मनुष्यों को संन्यास की दीक्षा नही देनी चाहिए। परन्तु ऐसे लोग यदि चाहें तो आतुर संन्यासी हो सकते हैं, परन्तु संन्यास के नियमानुसार तो ऐसे लोग संन्यासी नहीं हो सकते। "
मित्रों! हम जो भी कर्म करते हैं (मानसिक, वाचिक, शरीरिक )उसका हमारे तीनों शरीरों पर प्रभाव पड़ता है स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर । उस कर्म का संस्कार हमारे अंतःकरण पर पड़ता है और जैसा हमने कर्म किया है वह हमारे स्थूल शरीर के अंगों से भी दिखने लगता है ।
उदाहरण के लिए यदि कोई कामुक व्यक्ति परस्त्री को काम की दृष्टि से देखता है तो उसकी आंखें लाल हो जाती हैं। पूर्व जन्म में किए हुए पाप पुण्य कर्मों के अनुसार हमारे स्थूल शरीर के अंग प्रत्यंगों का निर्माण होता है । जैसे किसी ने पिछले जन्म में अन्नदान बहुत मात्रा में किया है तो वह इस जन्म में सुंदर देह से युक्त होता है । मित्रों हमारे यहां एक सामुद्रिक शास्त्र भी है जिसमें मनुष्य के अंगों को ही देख कर उसके पूर्व जन्म के पाप पुण्य का निर्णय कर लिया जाता है और और इस जन्म में उसके क्या क्या आचरण रहेंगे इसका भी पता चल जाता है । इन सब बातों को देखते हुए ही इस मंत्र में यह कहा गया है कि विकलांग, मैले दांत वाले, निकृष्ट नख से युक्त आदि मनुष्यों को सन्यास आश्रम में अधिकार नहीं है क्योंकि इनके जीवन में पाप की ही बहुलता है, ये पाप के संस्कारों से रचे पुचे हैं और और यदि ये श्रेष्ठ सन्यास आश्रम में आरूढ़ होंगे तो सन्यास आश्रम का बेड़ा गर्क ही करेंगे ।
किंतु दुर्भाग्य यही है कि कलयुग में इन सब विधि निषेधों की उपेक्षा करके सरेआम सन्यास आश्रम की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं😡😡😡
अब देखिए सन्यासी कितने प्रकार के होते हैं👇👇👇
वैराग्यसंन्यासी ज्ञानसंन्यासी ज्ञानवैराग्यसंन्यासी कर्मसंन्यासी चेति
चातुर्विध्यमुपागतः ॥ 8॥
#अर्थात: "संन्यासी के चार भेद बताए गए हैं-(1) वैराग्य संन्यासी, (2) ज्ञान संन्यासी, (3) ज्ञानवैराग्य संन्यासी और (4) कर्म संन्यासी।"
तद्यथेति । दृष्टानुअविकविषयवैतृष्णयमेत्य प्राक्पुण्यकर्मवशात् संन्यस्तः,स वैराग्य संन्यासी ॥19॥
#अर्थात: "दृष्ट (जागतिक) और आनुश्रविक (श्रुति कथित) विषयों में तृष्णारहित होकर तथा पूर्वजन्मों पुण्यकर्मों के परिणामस्वरूप वैराग्य उत्पन्न होने के कारण जो मनुष्य संन्यासधर्म ग्रहण कर लेता है. वह वैराग्य संन्यासी कहा जाता है।"
शास्त्र ज्ञानात् पापपुण्य लोकानुभव श्रवणात् प्रपञ्चो परतो देहवासनां
शास्त्रवासनां लोकवासनां च त्यक्त्वा वमनान्नमिव प्रवृत्तिं सर्वा हेयां
मत्वा साधनचतुष्टयसम्पन्नो यः संन्यस्यति, स एव ज्ञान संन्यासी ॥20॥
#अर्थात: "शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके पाप पुण्यादि सांसारिक विषयों को सुनकर जो 'जगत्प्रपंच' से उपरत हो गया हो (परे हो गया हो) और दैहिक वासना (पुत्र-धन-कीर्ति की वासना) तथा शास्त्रवासना तथा
लोकव्यवहार की वासना छोड़कर सभी प्रकार की सांसारिक प्रवृत्तियों को वमन किए हुए अन्न की भाँति त्याज्य मानकर साधन चतुष्टय से (विवेक, वैराग्य, षट्संपत्ति और मुमुक्षुत्व से) युक्त होकर जो संन्यास लेता है, वह ज्ञान संन्यासी कहा जाता है।"
क्रमेण सर्वमभ्यस्य सर्वमनुभूय ज्ञानवैराग्याभ्यां स्वरूपानुसन्धानेन देह मात्रावशिष्टः संन्यस्य जातरूपधरो भवति, स ज्ञान वैराग्य
संन्यासी ॥21॥
#अर्थात: जो मनुष्य कर्मानुसार सभी का अभ्यास करके सभी प्रकार के अनुभव लेकर बाद में ज्ञान और वैराग्य के द्वारा परमतत्व को भली-भाँति जानकर देह मात्र को ही जगत् में रहा हुआ मानकर जो संन्यास धर्म ग्रहण करता हैं, उसे ज्ञान वैराग्य संन्यासी कहा जाता है।
ब्रह्मचर्य समाप्य गृही भूत्वा वानप्रस्थाश्रममेत्य वैराग्याभावेऽप्याश्रम क्रमानुसारेण यः संन्यस्यति, स कर्मसंन्यासी ॥22॥
#अर्थात : "ब्रह्मचर्य गृहस्थ वानप्रस्थ इन तीनों आश्रमों का क्रमानुसार पालन करने के बाद वैराग्य परिपक्व न होने पर भी शास्त्रों के नियमानुसार सन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए, ऐसा मानकर जो सन्यास लेता है उसे कर्म सन्यासी कहा जाता है ।"
स संन्यासः षड्विधो भवति कटीचकबहुदकहंसपरमहंसतुरीयातीता
वधूताश्चेति ॥23॥
#अर्थात:"यह संन्यास छ: भेद वाला होता है- (1) कुटीचक, (2) बहूदक, (3) हंस, (4) परमहंस, (5) तुरीयातीत और (6) अवधूत।"
कुटीचकः शिखायज्ञोपवीती दण्डकमण्डलुधरः कौपीनशाटीकन्थाधरः
पितृमातृगाराधनपरः पिठरखनित्रशिक्यादिमात्रसाधनपर एकत्रान्नादनापरः श्वेत र्ध्व पुण्ड्र धारी त्रिदण्ड ॥24॥
#अर्थात :"कुटीचक संन्यासी अपने शरीर पर शिखा और यज्ञोपवीत को धारण किए रहता है। इसके अतिरिक्त वह दण्ड, कमण्डलु , कौपीन, चादर और कन्था (गुदड़ी) को भी धारण करता है वह माता-पिता और गुरु की आराधना करता रहता है। बटलोई, कुदाली और छीका-बस इतने ही उपकरण वह अपने साथ रखता है वह एक ही जगह पर भोजन करने वाला होता है। वह श्वेत उध्र्वपुण्ड्र को धारण करता है और त्रिदण्ड को भी धारण करता है।"
मित्रों ! यह जितने लक्षण बताए गए हैं यह सब के सब वैष्णव सन्यासियों में देखने को मिलते है । वे भी त्रिदंडी सन्यासी होते हैं शिखा और यज्ञोपवीत का त्याग नहीं करते। वे भी उध्र्वपुण्ड्र को धारण करने वाले होते हैं । इसलिए वैष्णव सन्यासी कुटिचक सन्यासी है।
बहूदकः शिखादिकन्थाधरस्त्रिपुण्ड्रधारी कुटीचकवत् सर्वसमो मधुकर वृत्त्याष्टकवलाशी ॥25॥
अर्थात: "बहूदक प्रकार का संन्यासी चोटी आदि को तथा कन्था (गुदड़ी) और त्रिपुण्ड्र को धारण किए रहता है। शेष तो सभी तरह पूर्वोक्त कुटीचक की तरह भिक्षा आदि से आजीविका चलाता है और वह केवल आठ ग्रास ही भोजन करता है।"
हंसो जटाधारी त्रिपुण्ड्रोर्ध्वपुण्डूधार्यसंक्लुप्तमाधूकरान्नाशी कौपीन
खण्डतुण्डधारी ॥26॥
#अर्थात:"और हंस प्रकार का संन्यासी जटाधारी होता है, वह उध्र्वपुण्ड्र और त्रिपुण्ड-दोनों को धारण करता है। वह किसी अनजाने स्थान से ही भिक्षा माँगकर प्राप्त हुआ अन्न खाता है। वह शरीर पर केवल कौपीन ही धारण करता है।
परमहंसः शिखायज्ञोपवीतरहितः पञ्चगहेष करपात्र्येककौपीनधारी शाटीमेकामेकं वैणवं दण्डमेकशाटीधरो वा भस्मोद्धलनपरः सर्वत्यागी ॥27॥
#अर्थात: "परमहंस संन्यासी शिखा और यज्ञोपवीत से रहित होता है। वह केवल पाँच घरों में भिक्षा का मांग कर हाथरूपी पात्र में ही खाता है । वह अपने पास एक चादर, एक लंगोटी और एक बांस का दण्ड ही केवल रखता है । अथवा शरीर पर भस्म लगाकर केवल एक चादर ही अपने पास रखता है और सभी वस्तुओं का त्याग कर देता है।"
मित्रों ! जितने लक्षण बताए गए हैं ये सब के सब शांकर परंपरा में आने वाले सन्यासियों में चरितार्थ होते हैं। वे भी शिखा और यज्ञोपवीत का त्याग करके सन्यास धारण करते हैं। वह एकदण्ड सन्यासी होते हैं, त्रिपुण्ड्र को धारण करने वाले होते हैं । इसलिए शांकर परंपरा में जो सन्यासी आते हैं वे परमहंस सन्यासी कहलाते है । त्याग और आचरण की दृष्टि से परमहंस सन्यासी सन्यासी कुटीचक सन्यासी से बहुत ऊपर है । 😀😀
तुरीयातीतो गोमुखवृत्त्या फलाहारी, अन्नाहारी चेद गृहत्रये, देह
मात्रावशिष्टो दिगम्बरः कुणपवच्छरीरवृत्तिकः ॥ 28 ॥
#अर्थात: "तुर्यातीत संन्यासी तो सब कुछ छोड़ देने वाला होता है वह गोमुखवृत्ति वाला (यदृच्छया जो कुछ आ मिले उससे आजीविका चलाने वाला) होता है अथवा तीन घरों से फलों या अत्र की भिक्षा से आजीविका चलाता है । वह अपना शरीर निर्वस्त्र (नग्न) ही रखता है। वह अपने शरीर को मरे हुए की तरह जान करके किसी तरह जीवन की वृत्ति को निभाता रहता है।"
मित्रों ! इस श्रेणी में शुकदेव मुनि जी और भगवान दत्तात्रेय जी आते है ।
अवधतस्त्वनियमः पतिताभिशस्तवर्जनपूर्वकं सर्ववर्णेष्वजगरवृत्त्याहार परः स्वरूप अनुसंधान परः ॥29॥
#अर्थात : "'अवधूत' नामक संन्यासी किसी भी तरह के नियम को नहीं मानता। पतित और निन्दित लोगों को छोड़कर अन्य सभी से वह आहार प्राप्त करके खाता है। वह अपने स्वरूप की खोज में ही सतत लगता रहता है ।"
मित्रों! इस श्रेणी में शुकदेव मुनि जी और भगवान ऋषभदेव जी आते हैं।
मित्रों वर्तमान में जो शंकराचार्य पद है वह इन सबसे ऊपर है क्योंकि वह गौरव और स्वाभिमान का पद है । शासकों पर शासन करने वाले को शंकराचार्य कहते हैं राजा सुधन्वा ने अपने ताम्रपत्र में यह स्पष्ट कहा है । शंकराचार्य भगवान शिव के ज्ञानमय अवतार होते हैं । शंकरचार्यों को इतना अधिकार भगवान आदि गुरु शंकराचार्य जी ने दिया है कि वे यदि किसी जीव को ये कह दे कि," तू पाप से मुक्त हो जा" तो वह उसी क्षण पाप से मुक्त हो जाता है। इतना बड़ा अधिकार आज के कथित जगतगुरुओं के पास भी नहीं है । इसलिए शंकराचार्य जी की अवहेलना करनी, उनका अपमान करना, यह वर्तमान समय में सबसे बड़ा पाप है। मैं तो इसे ब्रह्म हत्या से भी बड़ा पाप मानता हूँ। आज के सभी हिन्दुओं को, वैष्णवचार्यो को और कथित जगद्गुरुओं को शंकराचार्य जी के प्रति आस्थानवित होना चाहिए और वे जो सनातन धर्म के रक्षा और उत्थान के लिए आदेश देते है उनका पालन करना चाहिए ।
कहा भी गया है--
कृते विश्व गुरु ब्रह्मा त्रेतायाऋषि सत्तमाः।
द्वापरे व्यास एव स्यात् कलावत्र भवाम्यहम्।।
भावार्थ-सतयुग में जगद्गुरु ब्रह्मा, त्रेता में ऋषि श्रेष्ठ दत्तात्रेय
द्वापर में व्यास जी तथा कलियुग में शंकराचार्य ही जगदगुरु होते है।
इसलिए कलयुग में भगवान आदि गुरु शंकराचार्य ही एकमात्र जगतगुरु है।
और जो शंकराचार्य पद पर आरूढ़ हैं उन्ही पूज्यों को आपने नाम के आगे जगतगुरु लगाने का अधिकार हे ।
अब इस संसार मे नये नये सम्प्रदायी मान्यता से संन्यासी बन के विचर रहे है ये शास्त्रीय सहमत तथ्य विपरीत हे ।
सप्रमाण लिखा है सेव करलो कभी काम आएगा।
साभार:- केशव मिश्र जी
जय श्रीराम
हर हर महादेव ।
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