उपवास

#उपवास_व्रत ==#एक_नियम_संयम--!!
नियमो का पालन करना ही व्रत की सिद्धि है!!

अनेक वार जल पीने से ,पान खाने से,दिन में सोने से,ओर मैथुन करने से व्रत भंग हो जाता है।
नोट--नमक आदि पदार्थ सर्वदा व्रत में त्याज्य है।।

 जल,फल,मूल,दूध ,हविष्य(घी)ब्राह्मण की इच्छापूर्ति ,गुरु का वचन,तथा ओषध ----ये आठ व्रत के नाशक नही है!!

 क्षमा,दया,सत्य,दान,शौच,इन्द्रिय संयम,देवपूजा,अग्निहोत्र,सन्तोष तथा चोरी न करना---ये दश नियम सम्पूर्ण व्रतों में आवश्यक माने गये है!!

उपवास करनेवाले मनुष्य को कांसे का वर्तन,मसूर ,चना,कोदो,साग,मधु, पराया अन्न,तथा स्त्री संग का त्याग करना चाहिए।।

------व्रती को फूल,अलंकार,सुन्दर वस्त्र,सुगन्ध ,दातुन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए!!

उपवास के दिन शरीर मे तेल लगाकर नहाना छोड़ दे!
--क्योकि यह कुरूप बनानेवाला(सौंदर्य का विनाशक)है!!
उपवास के दिन लकड़ी की दातुन नही करनी चाहिए-अन्यथा नरक की प्राप्ति होती है।।
किसी भी प्रकार के प्लास्टिक से दन्ता धावन न करे!!

 #अस्कृज़्जलपणाच्च_ताम्बूलस्य_च_भक्षणम्!
#उपवासःप्रदुष्येत_दिवा_स्वप्नाच्च_मैथुनात्!!

#अष्टौ_तान्यब्रतघ्नानि_आपो_मूलं_घृतं_पयः!
#हविर्ब्राह्मणकाम्या_च_गुरौर्वचनमौषधम्!!
#अष्टौ_तान्यब्रतघ्नानि_आपोमूल_फलं_पयः!
#हविर्ब्राह्मणकामाय_गुरौर्वचनमौषधम्!!

  #क्षमा_सत्यं_दया_दानं_शौचमिन्द्रियनिग्रहः!
#देवपूजाग्निहरणं_सन्तोषो_स्तेय_मेव_च!!
#सर्वव्रतेष्वयं_धर्म:#सामान्यो_दशधा_स्मृत:!!

 #कांस्यं_मांसं_मसूरं_च_चणकं_कोरदूषकं!
#शाकं_मधुपरान्नं_च_त्यजेदुपवसन्_स्त्रियम्!!
#पुष्पालंकारवस्त्राणि_धूप_गन्धादि_लेपनम्!
#उपवासे_न_शस्यन्ति_दन्तधावनमंजनम्!!

 #उपोसितैर्नरैस्तस्मात्_स्नानमभ्यंगपूर्वकम्!
#वर्जनीयं_प्रयत्नेन_रूपघ्नं_तत्परं_नृप!
 #उपवासदिने_यस्तु_दन्तधावनकृन्नरः!
#स_घोरं_नरकं_याति_व्याघ्रभक्षश्चतुर्युगम्!!

#प्रश्न_नही_स्वाध्याया_करें!!
Arun  Shastri जबलपुर
अपनी सन्तति को सनातनी बनाये मलेच्छ नही!!
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

व्रत या उपवास कितने प्रकार के होते हैं??????

व्रत रखने के नियम दुनिया को हिंदू धर्म की देन है। व्रत रखना एक पवित्र कर्म है और यदि इसे नियम पूर्वक नहीं किया जाता है तो न तो इसका कोई महत्व है और न ही लाभ, राजा भोज के राजमार्तण्ड में 24 व्रतों का उल्लेख है।

 हेमादि में 700 व्रतों के नाम बताए गए हैं। गोपीनाथ कविराज ने 1622 व्रतों का उल्लेख अपने व्रतकोश में किया है। व्रतों के प्रकार तो मूलत: तीन है:- 1. नित्य, 2. नैमित्तिक और 3. काम्य।

1.नित्य व्रत उसे कहते हैं जिसमें ईश्वर भक्ति या आचरणों पर बल दिया जाता है, जैसे सत्य बोलना, पवित्र रहना, इंद्रियों का निग्रह करना, क्रोध न करना, अश्लील भाषण न करना और परनिंदा न करना, प्रतिदिन ईश्वर भक्ति का संकल्प लेना आदि नित्य व्रत हैं। इनका पालन नहीं करते से मानव दोषी माना जाता है।

2.नैमिक्तिक व्रत उसे कहते हैं जिसमें किसी प्रकार के पाप हो जाने या दुखों से छुटकारा पाने का विधान होता है। अन्य किसी प्रकार के निमित्त के उपस्थित होने पर चांद्रायण प्रभृति, तिथि विशेष में जो ऐसे व्रत किए जाते हैं वे नैमिक्तिक व्रत हैं।

3.काम्य व्रत किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाते हैं, जैसे पुत्र प्राप्ति के लिए, धन- समृद्धि के लिए या अन्य सुखों की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले व्रत काम्य व्रत हैं।

व्रतों का वार्षिक चक्र :-
1.साप्ताहिक व्रत : सप्ताह में एक दिन व्रत रखना चाहिए। यह सबसे उत्तम है।

2.पाक्षिक व्रत : 15-15 दिन के दो पक्ष होते हैं कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। प्रत्येक पक्ष में चतुर्थी, एकादशी, त्रयोदशी, अमावस्या और पूर्णिमा के व्रत महतवपूर्ण होते हैं। उक्त में से किसी भी एक व्रत को करना चाहिए।

3.त्रैमासिक : वैसे त्रैमासिक व्रतों में प्रमुख है नवरात्रि के व्रत। हिंदू माह अनुसार पौष, चैत्र, आषाढ और अश्विन मान में नवरात्रि आती है। उक्त प्रत्येक माह की प्रतिपदा यानी एकम् से नवमी तक का समय नवरात्रि का होता है। इन नौ दिनों तक व्रत और उपवास रखने से सभी तरह के क्लेश समाप्त हो जाते हैं।

4.छह मासिक व्रत : चैत्र माह की नवरात्रि को बड़ी नवरात्रि और अश्विन माह की नवरात्रि को छोटी नवरात्रि कहते हैं। उक्त दोंनों के बीच छह माह का अंतर होता है। इसके अलावा

5.वार्षिक व्रत : वार्षिक व्रतों में पूरे श्रावण मास में व्रत रखने का विधान है। इसके अलवा जो लोग चतुर्मास करते हैं उन्हें जिंदगी में किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता है। इससे यह सिद्ध हुआ की व्रतों में 'श्रावण माह' महत्वपूर्ण होता है। सोमवार नहीं पूरे श्रावण माह में व्रत रखने से हर तरह के शारीरिक और मानसिक कलेश मिट जाते हैं।

उपवास के प्रकार:- 1.प्रात: उपवास, 2.अद्धोपवास, 3.एकाहारोपवास, 4.रसोपवास, 5.फलोपवास, 6.दुग्धोपवास, 7.तक्रोपवास, 8.पूर्णोपवास, 9.साप्ताहिक उपवास, 10.लघु उपवास, 11.कठोर उपवास, 12.टूटे उपवास, 13.दीर्घ उपवास। बताए गए हैं, लेकिन हम यहां वर्ष में जो व्रत होते हैं उसके बारे में बता रहे हैं।

1.प्रात: उपवास- इस उपवास में सिर्फ सुबह का नाश्ता नहीं करना होता है और पूरे दिन और रात में सिर्फ 2 बार ही भोजन करना होता है।

2.अद्धोपवास- इस उपवास को शाम का उपवास भी कहा जाता है और इस उपवास में सिर्फ पूरे दिन में एक ही बार भोजन करना होता है। इस उपवास के दौरान रात का भोजन नहीं खाया जाता।

3.एकाहारोपवास- एकाहारोपवास में एक समय के भोजन में सिर्फ एक ही चीज खाई जाती है, जैसे सुबह के समय अगर रोटी खाई जाए तो शाम को सिर्फ सब्जी खाई जाती है। दूसरे दिन सुबह को एक तरह का कोई फल और शाम को सिर्फ दूध आदि।

4.रसोपवास- इस उपवास में अन्न तथा फल जैसे ज्यादा भारी पदार्थ नहीं खाए जाते, सिर्फ रसदार फलों के रस अथवा साग-सब्जियों के जूस पर ही रहा जाता है। दूध पीना भी मना होता है, क्योंकि दूध की गणना भी ठोस पदार्थों में की जा सकती है।

5.फलोपवास- कुछ दिनों तक सिर्फ रसदार फलों या भाजी आदि पर रहना फलोपवास कहलाता है। अगर फल बिलकुल ही अनुकूल न पड़ते हो तो सिर्फ पकी हुई साग-सब्जियां खानी चाहिए।

6.दुग्धोपवास- दुग्धोपवास को 'दुग्ध कल्प' के नाम से भी जाना जाता है। इस उपवास में सिर्फ कुछ दिनों तक दिन में 4-5 बार सिर्फ दूध ही पीना होता है।

7.तक्रोपवास- तक्रोपवास को 'मठाकल्प' भी कहा जाता है। इस उपवास में जो मठा लिया जाए, उसमें घी कम होना चाहिए और वो खट्टा भी कम ही होना चाहिए। इस उपवास को कम से कम 2 महीने तक आराम से किया जा सकता है।

8.पूर्णोपवास- बिलकुल साफ-सुथरे ताजे पानी के अलावा किसी और चीज को बिलकुल न खाना पूर्णोपवास कहलाता है। इस उपवास में उपवास से संबंधित बहुत सारे नियमों का पालन करना होता है।

9.साप्ताहिक उपवास- पूरे सप्ताह में सिर्फ एक पूर्णोपवास नियम से करना साप्ताहिक उपवास कहलाता है।

10.लघु उपवास- 3 से लेकर 7 दिनों तक के पूर्णोपवास को लघु उपवास कहते हैं।

11.कठोर उपवास- जिन लोगों को बहुत भयानक रोग होते हैं यह उपवास उनके लिए बहुत लाभकारी होता है। इस उपवास में पूर्णोपवास के सारे नियमों को सख्ती से निभाना पड़ता है।

12.टूटे उपवास- इस उपवास में 2 से 7 दिनों तक पूर्णोपवास करने के बाद कुछ दिनों तक हल्के प्राकृतिक भोजन पर रहकर दोबारा उतने ही दिनों का उपवास करना होता है। उपवास रखने का और हल्का भोजन करने का यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि इस उपवास को करने का मकसद पूरा न हो जाए।

13.दीर्घ उपवास- दीर्घ उपवास में पूर्णोपवास बहुत दिनों तक करना होता है जिसके लिए कोई निश्चित समय पहले से ही निर्धारित नहीं होता। इसमें 21 से लेकर 50-60 दिन भी लग सकते हैं। अक्सर यह उपवास तभी तोड़ा जाता है, जब स्वाभाविक भूख लगने लगती है अथवा शरीर के सारे जहरीले पदार्थ पचने के बाद जब शरीर के जरूरी अवयवों के पचने की नौबत आ जाने की संभावना हो जाती है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जाति जन्म से है ।जन्मना जायते शूद्र: खंडन

जन्मना जायते शूद्र:

क्या हनुमान वानर नही थे ???