द्रौपदी के पांच पति ही थे।

आजकल महाभारतके बारे में यह भ्रामक प्रचार किया जा रहा है ,कि द्रौपदीजीके पाँचों पाण्डव पति नहीं थे ,केवल युधिष्ठिर ही उनके पति थे । और इस भ्रामक प्रचारका श्रेय जाता है हमारे आर्यसमाजी बन्धुओंको , वे इस बात को कभी स्वीकार ही नहीं पाये हैं कि द्रौपदीजी पांचों पाण्डवोंकी पत्नी थीं और इसके लिये अनेक तर्क देते थे अब उन्होंने दावा किया है कि उन्होंने महाभारतमें बड़े परिश्रमके बाद २-३ श्लोक खोज लिये हैं जिनसे द्रौपदी अकेले युधिष्ठिरकी पत्नी सिद्ध होती हैं , पांचों पाण्डवोंकी नहीं । इस पर हम आगे चर्चा करेंगे पहले ये बता दूँ १ लाख श्लोकोंके बृहद ग्रन्थ में जो चीज खोजनी पड़े उसकी सत्यता संदिग्ध हो जाती है , क्या २-३ श्लोकोसे प्रसंग को बदला जा सकता है भला ? समाजी बन्धुओंका कहना है एक स्त्रीके पाँच पति नहीं हो सकते हैं यह आर्य संस्कृति में नहीं है आर्य कभी अनुचित कार्य नहीं कर सकते हैं (लेकिन ये ही बन्धु नियोग को सिद्ध करने में एक स्त्री के ११ पति तक बना देते हैं ) , इसीलिए यह प्रक्षिप्त है , यह हमारे इतिहास में विधर्मियों द्वारा मिलावट की गयी है , इसीलिए द्रौपदीके पाँच पतियों वाली घटना को महाभारतसे निकाल दिया है । अब अनुचित प्रसङ्ग को निकालकर यह इतिहासके साथ खिलवाड़ नहीं है क्या ? आप जिसे अनुचित मानते हैं उसे इतिहाससे निकाल देंगे तब इतिहास लिखने और पढ़ने का उद्देश्य ही क्या रह जाएगा ? इतिहास तो वह है जो घटना जैसी घटित हुई उसको यथावत वर्णन करना इतिहास है , इतिहास लिखने और पढ़ने का उद्देश्य इतिहास से उचित-अनुचित , गलतियों और महापुरुषोंके आदर्श चरित्रसे शिक्षा ग्रहण कर सकें , नहीं तो फिर इतिहास तो गड़े मुर्दे उखाड़ना मात्र रह जाएगा । अब यदि हम इतिहास से गलतियों , अनुचित प्रसङ्गोंको निकालकर इतिहास लिखेंगे फिर रामायण से क्या सीताहरण और वाली द्वारा रूमाका हरण , युधिष्ठिर द्वारा द्युतक्रीड़ा-दुःशासन द्वारा द्रौपदीजी का विवस्त्र करने का दुष्कर्म आदि को निकाल देंगे फिर रामायण महाभारत का औचित्य ही क्या रह जाएगा ? इतिहास को तो यथावत वर्णनको स्वीकार करके ही उचित-अनुचित का निर्णय करके ग्राह्य और त्याज्य चरित्र की शिक्षा ग्रहण करना है ।
अब पाण्डवोंने जो गलतियाँ की हैं हम उसका समर्थन नहीं करेंगे न उसे प्रक्षिप्त कहकर महाभारतका अंग भङ्ग करने का दुःशाहस् करेंगे । महाभारतको समझने महाभारतके चरित्र नायकों और तात्कालिक परिस्थितियोंको जानना आवश्यक है । यह सर्वविदित है कि पांचों पाण्डवों सहित द्रौपदीजी देवस्वरूप थे ,दिव्य जन्मा थे , अब हम देव योनि और मनुष्य योनिके भेद और उनके संसर्ग में भेद पर चर्चा करेंगे । देवता सङ्कल्प सिद्ध होते हैं , उनका स्वरूप , उनके रथ-वाहन,शस्त्र आदि सभी उनके सङ्कल्प से निर्मित होने हैं , निरुक्तिकार यास्क कहते हैं -‘आत्मैवैषां रथो भवति, आत्मा अश्व: आत्माऽऽयुधमात्मेषव आत्मा सर्वं देवस्य देवस्य ।’ (निरुक्ति ७/१/४) देवताओंके स्त्री पुत्रादि भी स्व सङ्कल्प निर्मित आत्म स्वरूप ही होते हैं और उनका सम्बन्ध भी भौतिक स्त्री पुरुषोंकी तरह नहीं होता है , देवता मनुष्योंकी तरह कर्मेन्द्रियोंसे स्थूल सम्भोग नहीं करते अपितु ज्ञानेंद्रियोंसे भोग करते हैं , देवता ज्ञान स्वरूप होते हैं । इन्द्रादि समस्त देवता ब्रह्मचारी होते हैं , श्रुति भगवती कहती है -“ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत । इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्व१राभवत् ।। (अथवर्वेद ११/५/१९)” देवता सङ्कल्प से ही बिना स्थूल सम्भोगके संतान उत्पन्न करते हैं , व्यासजी महाभारत में लिखते हैं देवता मानसिक सङ्कल्प , वाणी, दृष्टि, स्पर्श और संघर्षणादि पांच प्रकार से संतान उत्पन्न करते हैं -“सन्ति देवनिकायाश्च सङ्कल्पाज्जनयन्ति ये । वाचा दृष्ट्या तथा स्पर्शात् संघर्षेणेति पञ्चधा ।। “(आश्रमबासिक पर्व ३८/२१) यही नहीं मनुष्योंमें और देवताओं जो भेद है वह केवल संतति उत्पन्न करने में ही नहीं अपितु शरीरों में भी भेद होता है , न्यायभाष्यकार वात्स्यायन मुनि कहते हैं , मनुष्य का शरीर पृथ्वी तत्त्वसे निर्मित होता है , जबकि देवताओंका शरीर जल,तेज ,वायु तत्त्वसे निर्मित होता है , -“तत्र मानुषं शरीरं पार्थिवम् …… आप्य तैजानवायव्यानि लोकान्तरे शरीराणि । तेष्वपि भूतसंयोगा:पुरुषार्थ तन्त्रा इति ।। (न्यायदर्शन वात्स्यायन भाष्य ३/१/१८) यही नहीं मनुष्यका शरीर योनिज होता है और देवताओंका शरीर अयोनिज होता है -“तत्र शरीरं द्विविधं योनिजमयोनिजं च । तत्रायोनिजमन पेक्ष्य शुक्रशोणितं देवर्षीणां शरीरं धर्म विशेष सहितेभ्योऽणुभ्यो जायते । क्षुद्रजन्तूनां यातना शरीराण्यधर्म विशेष सहितेभ्योऽणुभ्यो जायन्ते । शुक्रशोणितसन्निपात्जं योनिजम् । (१७९ वात्स्यायन ) अर्थात् – ‘योनिज और अयोनिज भेद से शरीर दो प्रकार के होते हैं , शुक्र और रजकी बिना अपेक्षा किये धर्मविशेष से प्रेरित परमाणुओंके संयोग से पैदा होता है । शुक्ररजके संयोगसे पैदा हुआ शरीर योनिज कहलाते हैं ।’
इससे यही सिद्ध है कि देवता ब्रह्मचारी होते हैं , उनका शरीर , उनके रथ-वाहन , पत्नी पुत्र आदि सङ्कल्पसे निर्मित होते हैं , देवता मनुष्यों की तरह स्थूल सम्भोग नहीं करते हैं , देवताओंकी संतति मनुष्यों की योनिज नहीं होती अपितु बिना शुक्र शोणितके अयोनिजके उत्पन्न दिव्य जन्मा होती है । इसीलिए देवताओंके चरित्र और देवताओंके सम्बन्ध की मनुष्योंके चरित्र और मनुष्यों के तरह स्त्री पुत्रादि के सम्बन्ध नहीं होते हैं । महाभारत में दौपदी सहित पांचों पाण्डव देवताओं की संतान हैं , देवताओं की तरह अयोनिज और दिव्य जन्मा हैं ,उनके सम्बन्ध भी लौकिक स्त्री पुरुष की तरह कल्पना करना उचित नहीं है , क्योंकि देवताओं से मनुष्योंका धर्म दूषित नहीं होता । ये तो सभी जानते हैं द्रौपदी याज्ञसैनी उप्याज मुनिके यज्ञसे उत्पन्न हुई थीं । पाँचों पाण्डव भी धर्मराज,वायु,इन्द्र ,अश्विनीकुमार आदि से उत्पन्न उन्ही के स्वरूप थे । पाण्डवोंके जन्मके विषयमें भी व्याजजी लिखते हैं कि पाण्डवों मनुष्यों की तरह स्थूल सम्भोग से नहीं अपितु देवताओं द्वारा योगशक्ति से उत्पन्न हुए थे । “धर्मदेवेनापि योगशक्त्यैव युधिष्ठिरो जनितः , न मैथुनेन ।” (आदि पर्व १२१/२) “न च मैथुन सम्भूता निष्पापाः पाण्डवा मताः । “(उद्योगपर्व ५५/३१)
अतः पाण्डव देवता हैं उनका द्रौपदीजी से सम्बन्ध भी देवताओंकी तरह दिव्य है क्योंकि देवता ब्रह्मचारी होते हैं ,इसीलिए मनुष्योंके स्त्री पुरुष जैसी कल्पना निःसार है । पाण्डवोंके जन्म से लेकर स्वर्गारोहण तक सब कथा दिव्य ही है , इसमें मानवीय स्वरूप अवश्य है किन्तु मनुष्य से भिन्न हैं ।
अब आगे देखिये ,ऋग्वेदकी ऋचामें ( समाजी बन्धु इस मन्त्र से नियोग पति सिद्ध करते है) कहा है सभी स्त्रियोंके सोम देवता प्रथम पति हैं , गन्धर्वदेवता द्वितीय पति हैं , अग्नि देवता तृतीय पति हैं , और मनुष्य स्त्रीका चौथा पति है । -“सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः । तृतीयो अग्निष्टे पतिरस्तुरीयस्ते मनुष्यजा ।।(ऋक्०१०/४५/४०) उपरोक्त मन्त्रके अनुसार स्त्रीके सोम,गन्धर्व ,अग्नि आदि देवता दिव्य पति हैं जिनसे लौकिक सम्बन्ध नहीं होता है , जबकि चौथा मनुष्य वंशज लौकिक पति है , जिससे स्थूल सम्बन्ध है । इससे सभी स्त्रियोंके पातिव्रत्य धर्म पर कोई दोष नहीं लगता क्योंकि देवता स्थूल शरीरधारी नहीं होते हैं । ‘सोमः प्रथमो विविदे ०ऋक्०१०/४५/४० ‘ मन्त्र में जो सोम-अग्नि आदि स्त्रीके दिव्य पति से दिव्य सम्बन्ध का उल्लेख है , वही श्रुति महाभारत में द्रौपदीजी और उनके पाँच देवता पति के ऐसे ही अलौकिक सम्बन्धको चरितार्थ किया है। फिर इस पर आपत्ति क्यों है ? महाभारत में तो स्पष्ट कहा है द्रौपदी स्वयं इन्द्राणी शची थीं और पाँचों पाण्डव इन्द्रके पांच स्वरूप ही प्रकट हुए थे
“एवमेते पाण्डवाः सम्बभूवुर्ये ते राजन् पूर्वमिन्द्रा बभूव: । लक्ष्मीश्चैषां पूर्वमेवोपदिष्टा भार्या येषा द्रौपदी दिव्यरूपा ।।(आदि पर्व १९६/३५)”
अब जो अकेले युधिष्ठिरके ही पति होने के जो तर्क दिए हैं , उन पर चर्चा करते हैं —
पहला तर्क है ‘युधिष्ठिर सबसे बड़े थे , भीम उनसे छोटे थे और अर्जुन उनसे भी छोटे । भीमका विवाह युधिष्ठिरसे पहले हिडिम्बा से हुआ था फिर यदि अर्जुन स्वयंवरमें द्रौपदीको जीतकर विवाह करते तो युधिष्ठिर को दोष नहीं लगता , कि भीम अर्जुन दोनों छोटे भाइयों का विवाह हो गया युधिष्ठिर बड़े हैं फिर भी न हुआ क्या दोष है युधिष्ठिरमें ? और इस तरह युधिष्ठिरका विवाह ही नहीं होता कभी , लेकिन एक माँ अपने पुत्र का कभी अहित नहीं करती इसीलिए युधिष्ठिरका विवाह द्रौपदीसे हुआ था , अर्जुनने द्रौपदीको नहीं जीता ।’
समाधान — यदि सम्पूर्ण महाभारतका अनुशीलन किया होता तो यह शङ्का ही न होती कभी , पर आपको तो केवल दोष ढूंढकर अपना मत सिद्ध करना था । आदि पर्व १६८ में व्यासजी स्वयं माता कुन्ति और पाँचों पाण्डवोंसे कहते हैं ‘पांचालीको वरदानके कारण पाँचों पाण्डवोंकी पत्नी निकयुक्त किया है , इसीलिए पाँचों पाण्डव पाञ्चाली से विवाह करें । भीम-अर्जुन भी द्रौपदीजी को जीतकर लाये तब स्वयं विवाह नहीं किया बल्कि माता को ही सौंप दिया था कि माता हम भिक्षा लाये हैं , स्त्री को भिक्षा कहकर गलत वाक्यके कारण कितना अनर्थ हुआ जो पाँचों में आपस में बाँटने की आज्ञा दी माताने , यही शिक्षा इस प्रसङ्ग में लेने को कहा गया जिससे मनुष्य कभी स्त्रीको कोई वस्तु न समझे । यही गलती युधिष्ठिरने द्यूतसभा में द्रौपदीको वस्तु समझकर दाव पर लगाकर की
आपने पाँव पाण्डवोंसे विवाह अनुचित माना ,इसीलिए महाभारत से निकाल दिया , द्यूतसभा , द्रौपदीजी को दाव पर लगाना और द्रौपदीजी को विवस्त्र करना उचित मानते हैं अथवा इस घटना को भी महाभारतसे इसलिये निकाल देंगे क्योंकि आपको उचित नहीं लगता ? जबकि दोनों घटनाओं से महाभारतकारने यही शिक्षा दी है कि नारी कोई वस्तु नहीं जो भिक्षामें मिली हो जिसका बटवारा किया जाय , नारी कोई वस्तु नहीं जिसे जुए में दाव पर लगाया जाय । यदि ऐसा करते हैं आप तब निश्चित ही उस कुलका विनाश होगा , महाभारत जैसा भीषण संग्राम होगा , इसीलिए मनुष्य को इस चरित्र को ग्रहण न करके त्याग ही करना चाहिये ।
दूसरा तर्क -‘ यदि द्रौपदी पाण्डवोंकी पत्नी होती तो युधिष्ठिर को क्या अधिकार था द्रौपदीजी को दाव पर लगाने का ? यह तो तभी सम्भव है , जब युधिष्ठिर अकेले की पत्नी हो द्रौपदी ।’
समाधान — यहां भी वहीं कहूंगा महाभारत का स्वस्थ्य परम्परासे अनुशीलन करते तो यह शङ्का उत्पन्न ही नहीं होती । आप कह रहे हैं द्रौपदी पाँचों की पत्नी होती तो युधिष्ठिरको उन्हें जुए में दाव पर लगाने का अधिकार नहीं होता , द्रौपदी अकेले युधिष्ठिरकी पत्नी थीं इसीलिए उन्हें दाव पर लगाने का अधिकार था ? क्या अकेले युधिष्ठिरकी पत्नी होने पर आप स्वीकार करते हैं कि द्रौपदीजी को दाव पर लगाने का अधिकार था युधिष्ठिरको ? हम तो इसे कभी नहीं मानते कि युधिष्ठिरको ये अधिकार था , यदि द्रौपदी पाण्डवों की पत्नी न होकर अकेले युधिष्ठिरकी पत्नी थीं इसीलिए युधिष्ठिर को उन्हें दाव पर लगाने का अधिकार था , तो पाण्डव भी युधिष्ठिरकी पत्नी थे जिन्हें युधिष्ठिरने द्रौपदीजी से पहले दाव पर लगाया था ? हम तो न द्यूतको ही उचित मानते हैं न पाण्डवों सहित द्रौपदीजी को दाव पर लगाना उचित मानते हैं , पर द्यूत में उचित अनुचित होता ही कहाँ है , स्वयं द्यूत क्रीड़ा ही उचित नहीं है । आपने कहा पाण्डवोंकी पत्नी को दाव पर लगाने का अधिकार नहीं था , भीमसेन ने द्यूतके बाद युधिष्ठिरके हाथों को जलाने की प्रतिज्ञा क्यों की थी ? इसका उत्तर है आपके पास ? नहीं है तो हम बताते हैं , भीमसेन को यह सहन नहीं हुआ कि युधिष्ठिरने पाँचों पाण्डवोंकी पत्नीको दाव पर लगा दिया जिससे उन्होंने क्रोध में ये प्रतिज्ञा कर डाली —
“एषा ह्यर्हती बाला पाण्डवान् प्राप्य कौरवै: ।
त्वत्कृते क्लिष्यते क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभि: ।।
अस्या: कृते मनुरयं त्वपि राजन निपात्यते ।
बाहू ते सम्प्रधक्ष्यामि सहदेवाग्नि मानय ।। (सभापर्व ० ६८/५-६)
अर्थात् -यह भोली भाली अबला पाण्डवोंको पति रूप में पाकर इस प्रकार अपमानित होने के योग्य नहीं थी , परन्तु आपके कारण ये नीच , नृशंस और अजितेन्द्रिय कौरव इसे नाना प्रकार के कष्ट दे रहे हैं । राजन ! द्रौपदीकी इस दुर्दशाके लिये मैं आप पर ही अपना क्रोध छोड़ता हूँ । आपकी दोनों बाहुओं को जला डालूँगा (क्योंकि इन्ही भुजाओं से द्रौपदीको दाव पर लगाया था ) । सहदेव ! आग ले आओ ।”
द्रौपदीजी के अपमान का एक मात्र विरोध करने वाला विकर्ण भी द्रौपदीजी को इसीलिए दाव पर लगाना उचित नहीं मानता था क्योकि द्रौपदी अकेले युधिष्ठिरकी पत्नी नहीं थी और इसलिये हारा हुआ भी नहीं मानता था क्योंकि युधिष्ठिर स्वयं हार चुके थे फिर उन्हें द्रौपदीको दाव पर लगाने का क्या अधिकार था —
“साधारणी च सर्वेषां पाण्डवानामनिन्दिता ।
जितेन पूर्वं चानेन पाण्डवेन् कृत: पण: ।। (सभा पर्व ६८/२२)” इसीलिए यह शङ्का भी निर्मूल ही है ।
तीसरा तर्क — समाजी बन्धु कहते हैं “वन पर्व २६७ अध्याय श्लोक १२ में द्रौपदी अपनी कुशल बताती हुए जयद्रथ से कहती है कि ‘मेरे पति कुरुराज युधिष्ठिर सकुशल हैं । मैं उनके भाई भी सकुशल हैं और जिनके बारे में आपने पूछा है वे सब कुशल हैं ।’ यह श्लोक में द्रौपदी युधिष्ठिर को अपना पति कहती हैं और पाण्डवोंको उनका भाई न कि पाँचों पाण्डवों को अपना पति कहा है , इससे यह सिद्ध है कि द्रौपदी अकेली युधिष्ठिरकी पत्नी थी न कि पाण्डवों की । ”
समाधान — समाजी बन्धु वन पर्व २६७-१२ श्लोक से जो सिद्ध करना चाह रहे हैं वह धूल प्रक्षेप मात्र है , इस श्लोक में ऐसा कोई सङ्केत मात्र भी नहीं है , देखिये —
” कौरव्य: कुशलो राजा कुन्तिपुत्रोयुधिष्ठिरः ।
अहं च भ्रातरश्चास्य याश्चान्यान् परिपृच्छसि ।।( वनपर्व २६७ /१२) अर्थात् कुरुकुलोत्पन्न कुन्तिपुत्र राजा युधिष्ठिर कुशल हैं । मैं और उनके भाइयों सहित अन्य जिनके बारे में आप पूछ रहे हैं वे सभी कुशल हैं । ”
इस श्लोकमें मेरे पति युधिष्ठिर तो कहा ही नहीं है ‘पतिं मे युधिष्ठिर: ‘ ,’ भर्ता मे युधिष्ठिरः ‘ ये शब्द तो कहीं आया ही नहीं श्लोकमें जिससे यह सिद्ध हो कि मेरे पति युधिष्ठिर कुशल हैं , यहाँ तो कुन्तिपुत्रो युधिष्ठिरः ‘ शब्द है जिसका अर्थ है कुन्तिपुत्र युधिष्ठिर होता है न कि मेरे पति । अब प्रसङ्ग को समझाते हैं , यहाँ पति क्यों न कहकर कुन्तिपुत्र युधिष्ठिर क्यों कहा है और अन्य पाण्डवों को उनका भाई क्यों कहा है , द्रौपदीने ये क्यों नहीं कहा मेरे सभी पति कुशल हैं ? इससे पूर्वका श्लोक देखिये जयद्रथके कुशल पूछने के बाद द्रौपदीजी कहती हैं –
“अपि ते कुशलं राजन् राष्ट्रे कोशे बले तथा ।।(वन पर्व २६७-१० ) इस श्लोक में राजा , राजा का राज्य, राजाका कोश और राजाके बल के कुशलकी पूछा गया है यही दो राजाओं के आपसी शिष्टाचार में पूछा जाता है , अब द्रौपदीजी के पांचो पति राजा नहीं हैं इसीलिए द्रौपदी कहें मेरे पाँचों पति कुशल हैं , राजा तो एक ही हैं इसलिए ‘कुशलो राजा कुन्तिपुत्रो युधिष्ठिरः ‘ कहा है अर्थात् कुन्तिपुत्र राजा युधिष्ठिर कुशल हैं और यहाँ वनमें उनका राष्ट्र , कोश और बल सब भाइयों सहित द्रौपदीजी ही हैं इसीलिए कहा ‘अहं च भ्रातरश्चास्य यांश्चान्यान् परिपृच्छसि ।’ अर्थात् राजा युधिष्ठिरके जो सारा कोश और बल है वे चारो भाई और मैं कुशल हूँ जिनके बारे में आपने पूछा है । अब इस श्लोकसे ये कैसे सिद्ध किया जा सकता है कि पाँचों पाण्डव द्रौपदीजी के पति नहीं थे?
चौथा तर्क – समाजी बन्धु कहते हैं -‘ विराट पर्व अध्याय १८/१ श्लोक में
” अशोच्यत्वं कुतास्तस्य यस्या भर्ता युधिष्ठिरः ।
जानन् सर्वाणि दुःखानि किं मां त्वं परिपृच्छसि ।”
अर्थात् – जिस स्त्रीके पति राजा युधिष्ठिर हों वो स्त्री बिना शोकके रहे ये कैसे सम्भव हो सकता है ? तुम मेरे सारे दुःखों को जानते हुए भी मुझसे कैसे पूछते हो ? ”
इस श्लोक में युधिष्ठिर को ही पति कहा है पाण्डवों को नहीं इसीलिए द्रौपदी केवल युधिष्ठिरकी पत्नी थी । ‘
समाधान — यही यदि युधिष्ठिरको पति कहा है पाण्डवों को पति नहीं तो इससे ये कैसे सिद्ध हुआ कि अन्य पाण्डव उनके पति नहीं थे ? अन्य पतियोंका अपलाप कैसे हो जाएगा ? अब समझाता हूँ पाण्डवों को पति न कहकर युधिष्ठिर को पति कहने का क्या कारण है ? इस श्लोक में अतिउदारता (कायरता ) विशेषण है और विशेष्य युधिष्ठिर हैं , विशेष्य पाँचों पाण्डव नहीं हो सकते हैं कारण , द्रौपदीजी कहती हैं , जिस स्त्रीके पति युधिष्ठिर हों वह बिना शोकके कैसे रह सकती है और कहती हैं द्यूत सभा में उनके सामने अपमानित करना हो या कीचक द्वारा उनके सामने द्रौपदी को लात मारना हो युधिष्ठिरने अतिउदारता (कायरता) से ये सब अपमान द्रौपदीका देखते रहे और कुछ बोले नहीं , यहाँ ये नहीं कह सकती द्रौपदी की तुम्हारे कारण भी मुझे अपमान सहन करना पड़ रहा है क्योंकि भीम ही थे अर्जुन नकुल सहदेव सभी ने द्यूत सभामें प्रतिज्ञा की थी कुरु वंशके विनाश की किन्तु युधिष्ठिर द्रौपदीजी के अपमान पर मौन ही रहे कोई प्रतिकार नहीं किया । जबकि कीचक उनके सामने द्रौपदीको लात मारता है , युधिष्ठिर मौन ही रहते हैं किन्तु भीम क्रोध से कीचक को मारने को उद्यत् होते हैं तो युधिष्ठिर उन्हें रसोईके लकड़ी लेने भेज देते हैं । भीम तो द्यूत सभा में ही कौरवों को मार डालते , कीचक को विराटके सामने ही मार डालते इसमें केवल युधिष्ठिर की अतिउदारता के कारण द्रौपदीजी को अपमान सहन करना पड़ा । फिर द्रौपदीजी उन्ही भीमसे ये कैसे कहतीं कि मेरे पाँचों कायर पतियों , जिस स्त्री के तुम जैसे पति हों वो स्त्री बिना शोकके कैसे रह सकती है ? जो भीम भीष्म द्रौण कर्ण के सामने ही कौरवों को मार डालने को उद्यत् थे । द्रौपदीजी के शोकके कारण अकेले युधिष्ठिर थे न कि पाँचों पाण्डव , कायरता विशेषण है और युधिष्ठिर विशेष्य हैं , पाँचों पाण्डव विशेष्य कैसे हो सकते हैं ? इसलिए इस श्लोकके आधार पर यह सिद्ध करना कि पाण्डव उनके पति नहीं थे यह सम्भव ही नहीं है क्योंकि आपको विशेषण और विशेष्य ज्ञान होना आवश्यक है तभी किसी श्लोक को समझ सकते हैं तभी किसी प्रसङ्ग को समझ सकते हैं । चलिये एक श्लोक हम आपको देते हैं –
“तमृते भीमधन्वानं भीमादवरजं वने ।”(वन पर्व ८०/७६) में नकुल अपने भाइयों से कहते -‘भीमके छोटे भाई उन भयंकर धनुर्धर देवोपम अर्जुन के बिना इस समय मुझे काम्यक वन में रहने की इच्छा नहीं होती है ।’
क्या इस श्लोकके आधार पर हम ये कहें कि अर्जुन केवल भीमके भाई थे पाण्डवों के नहीं क्योंकि नकुल ने अपने या सभी पाण्डवोंके भाई न कहकर भीमके भाई कहा है इससे तो अर्जुन अकेले भीम के ही भाई मानने चाहिये अन्य पाण्डवों के नहीं ? किन्तु ऐसा मानना उचित नहीं यह सभी जानते हैं , यहाँ भीमकर्म (भयंकर कर्म ) विशेषण है और भीम ही यहाँ विशेष्य बनते हैं , अन्य पाण्डव नहीं , इसलिए यहाँ भीम के ही भाई कहकर अर्जुन को उनके समान ही भयंकर कर्मा कहा गया है इसका यह अर्थ कभी भी नहीं निकलता कि अर्जुन अकेले भीम के ही भाई थे समस्त पाण्डवों के नहीं । इसी तरह बुद्धिमान लोग द्रौपदीजी के भीमके प्रति कहे श्लोक का सही अर्थ जान सकते हैं , इसमें कोई शङ्का उत्पन्न ही नहीं होती है ।

|| जय श्री राम ||

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