वेदो मे पुराण के नाम
#वेदों_में_पुराणों_के_नाम
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ब्रह्मपुराण
(क) ब्रह्म जज्ञानं प्रथमम् । ( यजुः १३ । ३)
(ख) ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यम् ।
(बृहदारण्यक ६ । ३ । १८)
अर्थात्-प्रथम पुराण का नाम ब्रह्म है और उस अग्रिम पुराण को वे ऋषि लोग जानते हुवे ।
(पद्मपुराण)
अजस्य नाभावधि एकमपितं यस्मिन् विश्वा
भुवनानि तस्थुः ।(ऋग्वेद १०। ८२।६)
अर्थात-अजन्मा विष्णु भगवान् की नाभि में एक अण्डरूप पद्मथा जिस में समस्त भुवनों की स्थिति थी । ( सायण ने यहां अण्ड काउल्लेख किया है और पुराणों में इसी अण्ड का पद्म रूप से वर्णन किया है)
(विष्णुपुराण)
स (प्रजापतिः) यजुर्योऽधिविष्णु (असृजत)।
(तैत्तिरीय २ । ३।२।४)
अर्थात्-प्रजापति परमात्मा ने यजुर्वेदमूलक विष्णुपुराण कोबनाया ( यहां सर्जन रूप क्रिया के योग से 'विष्णु' शब्द का अर्थ ग्रन्थ-विशेष ही युक्तियुक्त है । )
(अग्नि-पुराण)
अग्निम वाचि श्रितः। (तैत्तिरीय ३।१०।८।४
अर्थात्--अग्निपुराण मेरी जिह्वा पर स्थित है यानी कण्ठान है । दयानन्दी शैली से यहां अग्नि शब्द का अर्थ भौतिक अग्नि नहीं हो सकता, क्योंकि वह किसी की जिह्वा पर थोड़े ही ठहर सकता है । दूसरे निराकार की जिह्वा भी नहीं हो सकती । अतः यहां अग्नि शब्द का अर्थ अग्निपुराण ही हो सकता है, क्योंकि जिह्वा पर ग्रन्थ-विशेष की स्थिति ही सम्भव है ।
(भिवष्यपुराण)
भविष्यत्प्रति चाहरत । (तैत्तिरीय ३।१२।६। ३)
अर्थात्--भविष्यत्पुराण (सृष्टि का ) प्रत्याहरण करता हुआ ।यानी भविष्यत्पुराण में उत्तरकालीन वर्णनों से सृष्टि के इतिहास काउपसंहार किया गया है।
(गरुडपुराण)
तार्यो वै पश्यतो राजेत्याह तस्य बचा सि विशः
पुराणं वेद ।(शतपथ १३।४।३।१३)
अर्थात्-पक्षियों का राजा गरुड़है और पक्षी ही उसकी प्रजा हैं,वह पुराण का ज्ञाता है।
(कूर्मपुराण)
स यस्कूर्मो नाम। एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः
प्रजा प्रसृज ।(शतपथ १० । ५ । १।५)
अर्थात्-जो कूर्म नामक पुराण है वह कूर्मरूपी परमात्मा द्वारा बनाई सृष्टि का प्रतिपादक है।
(मत्स्यपुराण)
तस्य (मनोः) अवनेनिजातस्य मत्स्य: पाणी आपेदे ।
(शतपथ १।८।१।१-२)
अर्थात्-मनुजी के अवनेजन करते हुए एक मत्स्य अंजलि में पा गया (इसी मत्स्यावतार का कथन किया हुआ मत्स्यपुराण है।)
(वाराहपुराण)
वराहेण पृथिवी संविदाना । ( अथर्व १२ । १ । ४८ )
मर्थात्-वाराह ने पृथिवी को प्रबुद्ध किया (उक्त संवाद को ही वाराहपुराण कहते हैं।)
(वामनपुराण)
इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् ।
समूढमस्य पा गुंग सुरे। (ऋग्वेद १ । २२ । १७)
अर्थात् वामनावतारधारी विष्णु ने इस ब्रह्माण्ड को तीन चरणों
में आक्रान्त कर पद धरे हैं। और यह सब लोक उसके धूलि-धूसर पांव में अन्तहित हो गया ( इसी चरित्र का विस्तार 'वामनपुराण' में किया गया है।)
(ब्रह्माण्डपुराण)
य आण्डकोशे भुवनं विभर्ति। (तैत्तिरीय ३ । १२)
अर्थात्-जो प्रजापति ब्रह्माण्ड में स्थित होकर भुवन की रक्षा करता है, (उसी की महिमा का धोतक 'ब्रह्माण्डपुराण' है।)
इसी प्रकार अन्यान्य पुराणों के भी साक्षात् नामों को या तत्तत्त्रतिपादित विशेष वृतान्तों को वेदों में से निकाला जा सकता है। हम उपर्युक्त प्रमाणों के सम्बन्ध में स्वयं कुछ न कहते हुये विज्ञ पाठकों से ही पूछना चाहते हैं कि आर्यसमाज जी जो कहते हैं 'प्रत्येक वस्तु को बेद में दिखाओ' इस अनुचित मांग का इससे बढ़कर और क्या उत्तर हो सकता है ? जिस समाज का प्रवर्तक किसी पादरी के यह पूछने पर कि वेदों में तोप का जिक्र नहीं मिलता, तो झट से--
('दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा......
यथेन्द्ररात्र: स्वरतोप राधात्') पढ़कर--'कानों को फाड़ देने वाला दुष्ट शब्द जिसका होता है, ऐसी भयङ्कर तोप से राजा को अपने शत्रु मार डालने चाहिएँ'-)
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ऐसा अर्थ कर सकता है तथा अध्यात्मज्ञान के भण्डार
वेदों में तार, तोप, ट्राम तथा बिजली का तुच्छतर भौतिक-विधान' निकालने के लिए समस्त ऋषि-मुनियों एवं वेद-भाष्यकारों को अंगूठा दिखा सकता है, उसे और उसके समाज को उनकी ही प्राविष्कृत शैली
से मूक कर देना सर्वथा न्याय है। आशा है, विज्ञ पाठक हमारे भाव को समझकर उपर्युक्त प्रमाणों का मनन करेंगे।
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।। जय श्री राम ।।
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ब्रह्मपुराण
(क) ब्रह्म जज्ञानं प्रथमम् । ( यजुः १३ । ३)
(ख) ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यम् ।
(बृहदारण्यक ६ । ३ । १८)
अर्थात्-प्रथम पुराण का नाम ब्रह्म है और उस अग्रिम पुराण को वे ऋषि लोग जानते हुवे ।
(पद्मपुराण)
अजस्य नाभावधि एकमपितं यस्मिन् विश्वा
भुवनानि तस्थुः ।(ऋग्वेद १०। ८२।६)
अर्थात-अजन्मा विष्णु भगवान् की नाभि में एक अण्डरूप पद्मथा जिस में समस्त भुवनों की स्थिति थी । ( सायण ने यहां अण्ड काउल्लेख किया है और पुराणों में इसी अण्ड का पद्म रूप से वर्णन किया है)
(विष्णुपुराण)
स (प्रजापतिः) यजुर्योऽधिविष्णु (असृजत)।
(तैत्तिरीय २ । ३।२।४)
अर्थात्-प्रजापति परमात्मा ने यजुर्वेदमूलक विष्णुपुराण कोबनाया ( यहां सर्जन रूप क्रिया के योग से 'विष्णु' शब्द का अर्थ ग्रन्थ-विशेष ही युक्तियुक्त है । )
(अग्नि-पुराण)
अग्निम वाचि श्रितः। (तैत्तिरीय ३।१०।८।४
अर्थात्--अग्निपुराण मेरी जिह्वा पर स्थित है यानी कण्ठान है । दयानन्दी शैली से यहां अग्नि शब्द का अर्थ भौतिक अग्नि नहीं हो सकता, क्योंकि वह किसी की जिह्वा पर थोड़े ही ठहर सकता है । दूसरे निराकार की जिह्वा भी नहीं हो सकती । अतः यहां अग्नि शब्द का अर्थ अग्निपुराण ही हो सकता है, क्योंकि जिह्वा पर ग्रन्थ-विशेष की स्थिति ही सम्भव है ।
(भिवष्यपुराण)
भविष्यत्प्रति चाहरत । (तैत्तिरीय ३।१२।६। ३)
अर्थात्--भविष्यत्पुराण (सृष्टि का ) प्रत्याहरण करता हुआ ।यानी भविष्यत्पुराण में उत्तरकालीन वर्णनों से सृष्टि के इतिहास काउपसंहार किया गया है।
(गरुडपुराण)
तार्यो वै पश्यतो राजेत्याह तस्य बचा सि विशः
पुराणं वेद ।(शतपथ १३।४।३।१३)
अर्थात्-पक्षियों का राजा गरुड़है और पक्षी ही उसकी प्रजा हैं,वह पुराण का ज्ञाता है।
(कूर्मपुराण)
स यस्कूर्मो नाम। एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः
प्रजा प्रसृज ।(शतपथ १० । ५ । १।५)
अर्थात्-जो कूर्म नामक पुराण है वह कूर्मरूपी परमात्मा द्वारा बनाई सृष्टि का प्रतिपादक है।
(मत्स्यपुराण)
तस्य (मनोः) अवनेनिजातस्य मत्स्य: पाणी आपेदे ।
(शतपथ १।८।१।१-२)
अर्थात्-मनुजी के अवनेजन करते हुए एक मत्स्य अंजलि में पा गया (इसी मत्स्यावतार का कथन किया हुआ मत्स्यपुराण है।)
(वाराहपुराण)
वराहेण पृथिवी संविदाना । ( अथर्व १२ । १ । ४८ )
मर्थात्-वाराह ने पृथिवी को प्रबुद्ध किया (उक्त संवाद को ही वाराहपुराण कहते हैं।)
(वामनपुराण)
इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् ।
समूढमस्य पा गुंग सुरे। (ऋग्वेद १ । २२ । १७)
अर्थात् वामनावतारधारी विष्णु ने इस ब्रह्माण्ड को तीन चरणों
में आक्रान्त कर पद धरे हैं। और यह सब लोक उसके धूलि-धूसर पांव में अन्तहित हो गया ( इसी चरित्र का विस्तार 'वामनपुराण' में किया गया है।)
(ब्रह्माण्डपुराण)
य आण्डकोशे भुवनं विभर्ति। (तैत्तिरीय ३ । १२)
अर्थात्-जो प्रजापति ब्रह्माण्ड में स्थित होकर भुवन की रक्षा करता है, (उसी की महिमा का धोतक 'ब्रह्माण्डपुराण' है।)
इसी प्रकार अन्यान्य पुराणों के भी साक्षात् नामों को या तत्तत्त्रतिपादित विशेष वृतान्तों को वेदों में से निकाला जा सकता है। हम उपर्युक्त प्रमाणों के सम्बन्ध में स्वयं कुछ न कहते हुये विज्ञ पाठकों से ही पूछना चाहते हैं कि आर्यसमाज जी जो कहते हैं 'प्रत्येक वस्तु को बेद में दिखाओ' इस अनुचित मांग का इससे बढ़कर और क्या उत्तर हो सकता है ? जिस समाज का प्रवर्तक किसी पादरी के यह पूछने पर कि वेदों में तोप का जिक्र नहीं मिलता, तो झट से--
('दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा......
यथेन्द्ररात्र: स्वरतोप राधात्') पढ़कर--'कानों को फाड़ देने वाला दुष्ट शब्द जिसका होता है, ऐसी भयङ्कर तोप से राजा को अपने शत्रु मार डालने चाहिएँ'-)
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ऐसा अर्थ कर सकता है तथा अध्यात्मज्ञान के भण्डार
वेदों में तार, तोप, ट्राम तथा बिजली का तुच्छतर भौतिक-विधान' निकालने के लिए समस्त ऋषि-मुनियों एवं वेद-भाष्यकारों को अंगूठा दिखा सकता है, उसे और उसके समाज को उनकी ही प्राविष्कृत शैली
से मूक कर देना सर्वथा न्याय है। आशा है, विज्ञ पाठक हमारे भाव को समझकर उपर्युक्त प्रमाणों का मनन करेंगे।
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