न हिन्दु पतितो भवेत्
‼️ #हिन्दु_भी_पतित_होता_है ‼️
!! महादेव !!
"न हिन्दु पतितो भवेत्" इस वाक्य को दिखला के लोग कहते है कि हिन्दू कभी पतित ही नहीं होता , चाहे कुछ भी करे या ना करे । वे लोग अपने को सर्वदा पवित्र मानता है ये उनका भ्रम जाल मात्र है कुकी पतित को उद्धार करने के लिए ही धर्म शास्त्रों ने प्रायश्चित आदि का विधान किया । लोग कहते है हम भक्ति करेंगे धर्म शास्त्र को नहीं मानेंगे , उनका ये बचन भी भ्रम मात्र ही है । भक्ति के बड़े अचार्य नारद जी अपने भक्ति सुत्र में कहते है "#शास्त्र_रक्षणम्" जितना भी बड़ा भक्त हो शास्त्र के मर्यादा विधि निषेध आदि का पालन करों "#अन्यथा_पतित्याशङ्कया" नहीं तो पतित वन जाओगे । अव हम आगे करपात्री जी के लेख दे रहे है जहा उन्होंने शास्त्र वचनों से सिद्ध किया कि हिन्दु पतित होता है । आगे के लेख "#विदेश_यात्रा_शास्त्रीय_पक्ष " नामक ग्रन्थ से ।
(आगे के लेख में जिस स्थान में विदेश यात्रा शब्द आयेगा बहा आप हिन्दुओं के मन मुखी आचरण का अनुमान लगा लेना हम भी अलग करके कोटेशन में लिख देंगे )
[ #हिन्दु_भी_पतित_होता_ही_है ]
"#विदेश_यात्रा" (मन मुखी आचरण वाले हिन्दु) के समर्थन के प्रसंग में -"न हिन्दु पतितो भवेत्" हिन्दु पतित होता ही नहीं , अत: उन्हें विदेश जाने मे (मन् मुखी आचरण करने से ) क्या आपत्ति है :- ये बात उठायी गयी है, पर इस्मे कोई तत्व नहि दीखता, क्योकि वेदों , उपनिषदों एवं धर्म शास्त्रों में ऐसे अनेक कर्मो का वर्णन है , जिनसे हिन्दु पतित होता है । सुर्योपनिषद के "#पतितसम्भाषणात्_पूतो_भवति" इस बचन में स्पष्ट ही "पतित" का उल्लेख है ।
किसी को हिन्दुजाति या हिन्दु धर्म से बहिष्कृत न किया जाय, यह तो उचित है, परन्तु हिन्दु कुछ भी करे, पतित होता ही नहीं, यह कैसे माना जाय? यदि हिन्दु पतित होतो ही नहीं, तो निम्न वचनों की क्या संगति होगी?
"सद्य:पतति मांसेन लाक्षया लवणेन च।
त्र्यहैन शूद्रो भवति ब्राह्मण: क्षीरविक्रयात्।। मनु।।
:-मांस , लाक्षा तथा लवण विक्रय से ब्राह्मन सद्य: पतित होता है । क्षीर विक्रय से ब्राह्मन तीन दिनों में शूद्र हो जाता है।
"ब्राह्मनत्वं शुभं प्राप्य दुर्लभं योSवमन्यते।
अभोज्यन्नानि चाश्नाति स द्विजत्वात् पतेत वै।।
अब्रती वृषलीभर्त्ता कुण्डाशी सोमविक्रयी।
विहीनसेवी विप्रो हि पतति ब्रह्मयोनित:।।
गुरुतल्पी गुरुद्रोहि गुरुकुत्सारतिश्च यः।
ब्रह्मविच्चापि पतति ब्राह्मणो ब्रह्मयोनितः।।(म. भा . आयुध प १४३)
:-जो दुर्लभ ब्राह्मणत्व को पाकर उसका अपमान करता है, अभोज्ज्यान्न खता है, वोह द्विजत्व से पतित हो जाता है , अब्रती, वृषलीभर्त्ता,कुण्डाशी,सोमविक्रयी, तथा विहीनसेवी व्राह्मन भी पतित होता है । गुरुद्रोही , गुरुस्त्रीगामी, गुरुनिंदारत ब्रह्मवित भी पतित होता है।
"ये स्तेनपतितक्लीवा ये च नास्तिकवृत्ययः।
तान् हव्यकव्ययोर्विप्राननहार्न् मनुरब्रवीत्।।मनु स्मृति।।
:-चोर, पतित, नपुंसक, एवं नास्तिक ब्राह्मन देव- पितृकार्य में मनु के अनुसार सर्वथा वर्जित है।
"ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः।
महान्ति पातकान्याहु: संगसर्गश्चापि तै: सह।। मनु स्मृति ।।
:- ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्णस्तेय, गुरुतल्पगमन - इन महान पातकों को करने वाले और उनके साथ सम्पर्क रखने वाले पतित होते है।
"अकुर्वन् विहितं कर्म निन्दितं च समाचरन्।
प्रसक्तश्चेन्द्रियस्यार्थे नरः पतनमृच्छति ।।
:- विहित कर्म ना करने से, निंदित कर्म करने से तथा इन्द्रियों के विषय में अति आसक्त होने से मनुष्य का पतन होता है ।
जो लोग किन्हीं पारम्परिक आप्त ग्रन्थों को तथा शास्त्रों को प्रमाण मानते ही नहीं हैं, वे लोग इन वचनों के सम्बद्ध में कुछ भी कह सकते हैं, पर शास्त्र तथा शास्त्रोक्त मर्यादा में पूर्ण आस्था प्रकट करने वाले लोग इन वचनों की उपेक्षा केसे कर सकते हैं?
(नोट :- हमने ऊपर करपात्री महाभाग जी के लेख लिख दिये जहा शास्त्रों के प्रमाण से सिद्ध ही है कि "न हिन्दु पतितो भवेत्" वाक्य व्यार्थ प्रलाप मात्र है )
।।हर हर शंकर ।।
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