क्या जाति से हिंदू धर्म को नुकसान हुआ है??
जात पात से हिन्दु नहीं वंटा है
आरएसएस/महासभा आदि------> हिन्दू तो जात -पात में ही बंट कर रह गया , इसीलिये एक नही है ।
#खण्डन - हिन्दू अपने जात -पात में #बंटा नही है अपितु अखण्डित होकर #बंधा है । ये श्रुति स्मृति प्रतिपादित जात-पात का बन्धन ही हिन्दू की एकता और अखण्डता है ।
हिन्दू का जात- पात विधर्मियों वाला जात -पात नहीं है, जो एक दूसरे के एकता सूत्र तोड़ती है । ये तो वो डोरी है जो मणियों से मणि को जोड़ती है ।
सब नर करहिं परस्पर प्रीती ।
चलहिं #स्वधर्म , निरत श्रुति नीती ।।
चलहिं #स्वधर्म , निरत श्रुति नीती ।।
….........ये हमारा हिन्दू रामराज्य है । जिसकी महिमा वेदों ने, सन्तों ने सबने गायी है ।
तुम आरएसएस और महासभा आदि के तथाकथित सनातन हिन्दू धर्म के ज्ञानविज्ञान से विहीन विचारक ! कहॉ ले जा रहे हो हमारे हिन्दू समाज को ? तुमको हिन्दू धर्म शास्त्रों , हिन्दू परम्परा की कख नही ज्ञात , तुम शिखा सूत्र संस्कार विहीन क्या जानो क्या है हिन्दू धर्म !
एकता के नाम पर हिन्दू जात-पात पर मिथ्या आक्षेप कर कर के सनातन हिन्दू परम्पराओं को ध्वस्त करने का षडयन्त्र बन्द करो ! हमारे हिन्दू चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में कोई भी वर्ण किसी दूसरे वर्ण पर अत्याचार नही करता ! ऐसा सिद्धान्त ही नहीं है कहीं हमारे यहॉ कि किसी पर हम अत्याचार करें !
।। जय श्री राम ।।
जातियों के कारण ये देश गुलाम रहा है और इस देश के पतन का कारण जाति व्यवस्था है अतः इसे मिटा देने से ही हिन्दुओं में एकता आएगी, जैसा कि आप लोग कहते है कि हिन्दुओं में एकता नहीं थी क्योंकि उनमे जातिवाद था तो मित्रों मै इनके इस बात का खण्डन इस बात से कर सकता हूँ कि अगर आप पिछले हजार वर्षों का इतिहास उठाकर देखेंगे तो जितने भी युद्ध हमारे देश में हुए, उनमे से क्या सारे युद्ध हम हार ही गए? तो आपको उत्तर मिलेगा कि हिन्दू राजाओं ने अनेक युद्ध जीते हैं, जिसके कारण मुघलों और उसके पहले जो लोग आयें उन्हें लगातार कई सौ वर्षों तक चुनौती मिलती रही यहाँ तक की 1857 की क्रान्ति में भी भारतीयों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए तो आप ये बताइए की क्या तब जातियाँ नहीं थी? जब हम जीत रहे थें, यदि आप हारने का कारण जाति को मानते है तो जीतने का कारण भी जाति को ही मानिये क्योंकि जाति तब भी थी, जब हम हारे और तब भी थी जब हम जीतें| इसी तरह आप यदि पराधीनता का कारण जाति को मानते है तो स्वाधीनता का कारण भी जाति को ही मानिये क्योंकि जाति तब थी और आज भी है| सच्चाई तो ये है कि जातियों में संगठित भारतीय आपस में अपने राष्ट्र और धर्म के लिये इतना संघठित था जैसे कि एक धागे से सारे मोती जुड़े होते हैं, अतः हमारी जाति व्यवस्था को मुघल कभी तोड़ नहीं पाए थें, जिसके कारण मुघलों के राज होने के पश्चात भी हम दुनिया में सबसे अधिक शिक्षित और धनवान थें| आज की तुलना में सबसे अधिक व्यापार हम, दुनिया में, सन 1800 के आसपास तक करते रहे, (उसके बाद अंग्रेजो ने कृषि और शुद्रो के उद्योगों को नष्ट कर दिया जिससे सभी भूखे मरने लगे और इस प्रकार धीरे धीरे समाज में अंग्रेजों ने वैमनश्यता को बढ़ावा दिया जो आज भी जारी है), जबकि मुघल बहुत पहले आ चुकें थें इससे यह सिद्ध होता है कि जातियों से इस देश को कभी कोई खतरा नहीं रहा है बल्कि उलटा मजबूती ही रही है| आप पूछेंगे कि कैसे जातियों में मजबूत था भारत? तो इसे, इस प्रकार समझिये, जब मुघल युद्ध करते तो वो क्षत्रियों से युद्ध करते पर, धन तो वैश्यों के पास होता अतः उसके लिये उन्हें फिर वैश्यों से भी लड़ना पड़ता, और अगर वो वैश्य से लड़ कर एक बार धन छीन भी लेतें तो वैश्य के पास धन फिर आ जाता क्योंकि वैश्य तो केवल व्यापारी था, उत्पादन का सारा कार्य तो शूद्र करते थें अतः शुद्र व्यापार के लिये फिर से वैश्य को उत्पाद दे आता अतः उन्हें वैश्यों के बाद शुद्रों से लड़ना पड़ता और इतना आसानी से वो पुरे समाज से नहीं लड़ पातें क्योंकि ब्राह्मण स्वयं मुघलों से लड़ने के साथ साथ पुरे समाज को धर्म में बांध कर रखता था और सबका धर्मोचित कर्त्तव्य भी समझा देता था जिसे समाज चुपचाप स्वीकार कर लेता था| समाज ब्राह्मण के धर्मोचित ज्ञान को इसलिए मानता था क्योंकि ब्राहमण स्वयं इसे आचरण से दिखाता था, अपना गला कटा लेता था पर सिखा सूत्र नहीं कटाता, अतः इसे देख कर हिन्दू समाज भी ब्राह्मण, साधु, सन्त, आचार्यों के धर्म ज्ञान को मान के जीवन जीता, फिर ब्राहमण को सबसे अधिक, धर्म कार्य करने के लिये, वैश्य धन देता जिससे गुरुकुल, मंदिर इत्यादि के सभी प्रकल्प चलते अतः कुछ ही समय में पूरा समाज फिर खड़ा हो जाता, लेकिन प्रायः इसकी नौबत नहीं आती क्योंकि मुस्लिम, क्षत्रियों से जीत भी जातें थें तो भी वो इतना कमजोर हो जातें थें कि पुरे समाज से लड़ नहीं पातें अतः इस प्रकार कई सौ वर्षों में भी वो हिंदुत्व को समाप्त नहीं कर पाए क्योंकि ज्ञान के मूल में ब्राह्मण था तो इधर उद्योग के मूल में शुद्र था, और मध्य में क्षत्रिय और वैश्य मिलकर रक्षा और अर्थ के प्रकल्प सम्भाल लेतें| फिर आप कहेंगे कि आखिर भारत पराधीन कैसे हुआ? तो इसका उत्तर है कि हमने शत्रु के साथ कई बार अत्याधिक उदारता दिखाई जैसे पृथ्वीराज चौहान ने दीखाई, कुछ राजा अपने ही लोगो द्वारा धोखा देने के कारण हारे और कुछ सेना की संख्या कम होने कारण तो, कुछ आधुनिक हथियारों के न होने के कारण हारे पर कोई राजा जाति के कारण नहीं हारा, आप एक भी उदाहरण मुझे दिखा दीजिये जिसमें कोई राजा मात्र जाति व्यवस्था के कारण युद्ध हारा हो तो मै मान जाऊंगा और वैसे भी युद्ध तो प्रायः क्षत्रिय ही लड़तें थें, फिर किस हिसाब से जातिवाद उनके हारने में कारण बनेगी भला....???
जातियों के कारण ये देश गुलाम रहा है और इस देश के पतन का कारण जाति व्यवस्था है अतः इसे मिटा देने से ही हिन्दुओं में एकता आएगी, जैसा कि आप लोग कहते है कि हिन्दुओं में एकता नहीं थी क्योंकि उनमे जातिवाद था तो मित्रों मै इनके इस बात का खण्डन इस बात से कर सकता हूँ कि अगर आप पिछले हजार वर्षों का इतिहास उठाकर देखेंगे तो जितने भी युद्ध हमारे देश में हुए, उनमे से क्या सारे युद्ध हम हार ही गए? तो आपको उत्तर मिलेगा कि हिन्दू राजाओं ने अनेक युद्ध जीते हैं, जिसके कारण मुघलों और उसके पहले जो लोग आयें उन्हें लगातार कई सौ वर्षों तक चुनौती मिलती रही यहाँ तक की 1857 की क्रान्ति में भी भारतीयों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए तो आप ये बताइए की क्या तब जातियाँ नहीं थी? जब हम जीत रहे थें, यदि आप हारने का कारण जाति को मानते है तो जीतने का कारण भी जाति को ही मानिये क्योंकि जाति तब भी थी, जब हम हारे और तब भी थी जब हम जीतें| इसी तरह आप यदि पराधीनता का कारण जाति को मानते है तो स्वाधीनता का कारण भी जाति को ही मानिये क्योंकि जाति तब थी और आज भी है| सच्चाई तो ये है कि जातियों में संगठित भारतीय आपस में अपने राष्ट्र और धर्म के लिये इतना संघठित था जैसे कि एक धागे से सारे मोती जुड़े होते हैं, अतः हमारी जाति व्यवस्था को मुघल कभी तोड़ नहीं पाए थें, जिसके कारण मुघलों के राज होने के पश्चात भी हम दुनिया में सबसे अधिक शिक्षित और धनवान थें| आज की तुलना में सबसे अधिक व्यापार हम, दुनिया में, सन 1800 के आसपास तक करते रहे, (उसके बाद अंग्रेजो ने कृषि और शुद्रो के उद्योगों को नष्ट कर दिया जिससे सभी भूखे मरने लगे और इस प्रकार धीरे धीरे समाज में अंग्रेजों ने वैमनश्यता को बढ़ावा दिया जो आज भी जारी है), जबकि मुघल बहुत पहले आ चुकें थें इससे यह सिद्ध होता है कि जातियों से इस देश को कभी कोई खतरा नहीं रहा है बल्कि उलटा मजबूती ही रही है| आप पूछेंगे कि कैसे जातियों में मजबूत था भारत? तो इसे, इस प्रकार समझिये, जब मुघल युद्ध करते तो वो क्षत्रियों से युद्ध करते पर, धन तो वैश्यों के पास होता अतः उसके लिये उन्हें फिर वैश्यों से भी लड़ना पड़ता, और अगर वो वैश्य से लड़ कर एक बार धन छीन भी लेतें तो वैश्य के पास धन फिर आ जाता क्योंकि वैश्य तो केवल व्यापारी था, उत्पादन का सारा कार्य तो शूद्र करते थें अतः शुद्र व्यापार के लिये फिर से वैश्य को उत्पाद दे आता अतः उन्हें वैश्यों के बाद शुद्रों से लड़ना पड़ता और इतना आसानी से वो पुरे समाज से नहीं लड़ पातें क्योंकि ब्राह्मण स्वयं मुघलों से लड़ने के साथ साथ पुरे समाज को धर्म में बांध कर रखता था और सबका धर्मोचित कर्त्तव्य भी समझा देता था जिसे समाज चुपचाप स्वीकार कर लेता था| समाज ब्राह्मण के धर्मोचित ज्ञान को इसलिए मानता था क्योंकि ब्राहमण स्वयं इसे आचरण से दिखाता था, अपना गला कटा लेता था पर सिखा सूत्र नहीं कटाता, अतः इसे देख कर हिन्दू समाज भी ब्राह्मण, साधु, सन्त, आचार्यों के धर्म ज्ञान को मान के जीवन जीता, फिर ब्राहमण को सबसे अधिक, धर्म कार्य करने के लिये, वैश्य धन देता जिससे गुरुकुल, मंदिर इत्यादि के सभी प्रकल्प चलते अतः कुछ ही समय में पूरा समाज फिर खड़ा हो जाता, लेकिन प्रायः इसकी नौबत नहीं आती क्योंकि मुस्लिम, क्षत्रियों से जीत भी जातें थें तो भी वो इतना कमजोर हो जातें थें कि पुरे समाज से लड़ नहीं पातें अतः इस प्रकार कई सौ वर्षों में भी वो हिंदुत्व को समाप्त नहीं कर पाए क्योंकि ज्ञान के मूल में ब्राह्मण था तो इधर उद्योग के मूल में शुद्र था, और मध्य में क्षत्रिय और वैश्य मिलकर रक्षा और अर्थ के प्रकल्प सम्भाल लेतें| फिर आप कहेंगे कि आखिर भारत पराधीन कैसे हुआ? तो इसका उत्तर है कि हमने शत्रु के साथ कई बार अत्याधिक उदारता दिखाई जैसे पृथ्वीराज चौहान ने दीखाई, कुछ राजा अपने ही लोगो द्वारा धोखा देने के कारण हारे और कुछ सेना की संख्या कम होने कारण तो, कुछ आधुनिक हथियारों के न होने के कारण हारे पर कोई राजा जाति के कारण नहीं हारा, आप एक भी उदाहरण मुझे दिखा दीजिये जिसमें कोई राजा मात्र जाति व्यवस्था के कारण युद्ध हारा हो तो मै मान जाऊंगा और वैसे भी युद्ध तो प्रायः क्षत्रिय ही लड़तें थें, फिर किस हिसाब से जातिवाद उनके हारने में कारण बनेगी भला....???
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