उत्तम प्रायश्चित मंत्र

#महामन्त्र_को_क्या_विलोम_क्रम_से_जपना_चाहिए!!

मित्रो! शुक्लयजुर्वेद की एक छोटी सी उपनिषद है जिसका नाम है
#कलिसंतरणोपनिषत् । इस उपनिषद में नारद जी के द्वारा ब्रह्मा जी को प्रश्न पूछने पर कि ," हे! भगवन  पृथ्वी पर भ्रमण करता हुआ मैं कैसे कलिकाल को पार कर सकता हूँ?'

ब्रह्मा जी ने कहा 'अच्छा प्रश्न पूछा है। यह सर्व वेदों  का रहस्य और गोपनीय बात है। तो यह सुनो कि जिससे कलिकाल के संसार को पार कर जाओगे। भगवान् आदि पुरुष नारायण के #नामोच्चारण मात्र से ही मनुष्य कलियुग को झाड़कर फेंकने वाला बन जाता है।'

#भगवत_आदिपुरुषस्य_नारायणस्य_नामोच्चारण_मात्रेण_निर्धूतकलिर्भवति ॥१।।

तब नारद ने फिर पूछा-'वह नाम क्या है ?' तब हिरण्यगर्भ ब्रह्मा बोले-हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे'-इस प्रकार ये सोलह नाम कलिकाल के पापों को नाश करने वाले हैं। इससे बड़ा उपाय सभी वेदों में दिखाई नहीं देता। इन सोलह नामों से सोलह कलाओं से आवृत जीव के आवरण का नाश होता है। इसके बाद जैसे बादलों के हट जाने से
रविमण्डल साफ प्रकाशित होता है, वैसे ही जीव के आगे परब्रह्म प्रकाशित हो उठता है।

#नारद_पुनः #पप्रच्छ_तन्नाम_किमिति । #स_होवाच_हिरण्यगर्भः । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । इति षोडशकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम् । नातः परतरोपायः सर्ववेदेषुदृश्यते। इति षोडशकलावृतस्य जीवस्यावरणविनाशनम्। ततःप्रकाशते परं ब्रह्म मेघापाये रविरश्मिमण्डलीवेति ॥२॥

नारद ने फिर पूछा भगवन् ! इसकी विधि क्या है ?' तब ब्रह्मा बोले-इसकी कोई विधि नहीं है। सदैव पवित्र या अपवित्र ब्राह्मण( यहां अपवित्र ब्राह्मण के अंतर्गत ब्राह्मणेतर वर्णो को लेना चाहिए) इसको जपते-पढ़ते हुए ईश्वर की सलोकता (एकलोकता) को सामीप्य को, ईश्वर जैसे स्वरूप को और ईश्वर में मिल जाने की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। जब साधक इस षोडश नाम वाले मन्त्र को  साढे तीन करोड जप कर लेता है, तब वह ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है। वह वीर हत्या के पाप से मुक्त हो जाता है । वह सुवर्ण चोरी के पाप से मुक्त हो जाता है ।पिता-देव-मनुष्यों पर किए गए उपकार को पापों से मुक्त हो जाता है। सर्वधर्म त्याग के पाप सेवह शीघ्र मुक्त हो जाता है । वह पवित्र हो जाता है । छूट जाता है, छूट जाता है,।

पुनर्नारदः पप्रच्छ भगवन्कोऽस्य विधिरिति । तं होवाच नास्य विधिरिति । सर्वदा शुत्रिरशुचिर्वा पठन्ब्राह्मणः सलोकरतां समीपतां
सरूपतां सायुज्यतामेति यदास्य षोडशीकस्य सार्धत्रिकोटीर्जपति का ब्रह्महत्यां तरति। तरति वीरहत्याम्। स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति।
पितदेवमनुष्याणामपकारात्पूतो भवति । सर्वधर्मपरित्यागपापात्मा
शुचितामाप्नुयात् सद्यो मुच्यते सद्यो मुच्यत।।३।।

मित्रों तीसरे मन्त्र मे नारद जी के द्वारा इसकी विधि पूछने पर भगवान ब्रह्मा जी ने स्पष्ट कहा है इसको जपने की कुछ भी विधि नहीं है इसको पवित्र और अपवित्र ब्राह्मण सदैव ही जप सकते हैं।

ये केवल शुद्ध नाम मंत्र है इसमें किसी प्रकार का भी "नमो ,नमः ॐ  , स्वाहा इत्यादि का समावेश नहीं किया गया है। इसलिए इस मन्त्र को जपने के सभी अधिकारी है भले ही वह चाहे द्विज हो या न हो । स्त्री, शुद्र आदि को भी इस नाम मंत्र को जपने का अधिकार है ।

नारद जी का प्रश्न ही कलियुग के जीवो का सुगम कल्याण कैसे हो इसके सन्दर्भ में था । और ब्रह्मा जी ने भगवान के नामों का उच्चारण करने का संकेत किया ।

कुछ लोग ये कहते है कि उपनिषद मन्त्रों पर द्विज का अधिकार होता है अन्यों का नही । अन्यों(स्त्री, शुद्र आदि) को अधिकार दिलाने के लिए चैतन्य महाप्रभु ने इस मन्त्र को उल्टा करके जपने का आदेश सबको दिया है और संकीर्तन में भी विलोम क्रम से ही मन्त्र जपना चाहिए ऐसा कहा है । मतलब ये नाम मंत्र हरे कृष्ण से शुरू करना चाहिए ।

परंतु मित्रों ये बात उचित नही है । मैंने चैतन्य महाप्रभु का जीवन चरित्र पढ़ा तो उसमे मैंने पाया कि चैतन्य महाप्रभु ने अपने एक शिष्य को श्रीमद्भागवत का श्लोक उल्टा पढ़ने के कारण बहुत डांटा । फिर मुझे इस बात पर संदेह हुआ कि जो श्रीमद् भागवत के श्लोक को उल्टा पढ़ने से अपने शिष्य को डांट सकते हैं वह स्वयं उपनिषद का मंत्र उल्टा जपने का संकेत या आदेश क्यों देंगे!!

मित्रो तंत्र ग्रंथो में आया है कि --

चतुर्दशस्वरो देवि पुण्यसिद्धि प्रदायक:।
नादबिंदुसमोपेतो दीर्घप्रणव उच्यते॥
तंत्रोक्त: प्रणव: सोऽपि स्त्री शूद्राणां प्रशस्यते।
तस्मात्स्त्रीणाञ्च शूद्राणां स एव परिकीर्तित:॥
(यामल तंत्र)

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को वेदोक्त मूल प्रणव (ॐ), जिसमें साढ़े तीन मात्रा होती है उसका उच्चारण करना चाहिए किंतु स्त्री और शूद्रों को बिंदु एवं चौदहवें स्वर से युक्त दीर्घ प्रणव (औं) जिसमें ढाई मात्रा होती है, उसका उच्चारण करना चाहिए।

स्वाहाप्रणवसंयुक्तं शूद्रे मन्त्रं ददद् द्विज:।
शूद्रोनिरयगामी स्याद्ब्राह्मणो यात्यधोगतिम्॥
(देवीयामल तंत्र)

जो ब्राह्मण शूद्र को स्वाहा एवं (वैदिक) प्रणव से युक्त मंत्र देता है, वह मंत्रग्राही शूद्र नरक जाता है और ब्राह्मण भी अधोगति को प्राप्त होता है।

तंत्रोक्तं प्रणवं देवि वह्निजायां च सुन्दरि ।
प्रजपेत् सततं शूद्रो नात्र कार्या विचारणा॥
(भूतशुद्धि तंत्र)
वह्निजायास्थले मायां दत्वा शूद्रो जपेद्यदि।
(शाक्तानंदतरंगिणी)

वेदोक्त वह्निजाया (स्वाहा) और वेदोक्त प्रणव (ॐ) के स्थान पर तंत्रोक्त वह्निजाया (ह्रीं) तथा तथा तंत्रोक्त प्रणव (औं) का प्रयोग करके शूद्रों को मंत्र देना चाहिए।

किन्तु इस उपनिषद में न तो इस नाम मन्त्र की कोई विधि बताई गयी है और न साथ में प्रणव आदि जपने का विधान किया गया है । बल्कि ब्रह्मा जी के द्वारा स्पष्ट कहा गया है कि" इसको जपने की कुछ भी विधि नही है , पवित्र या अपवित्र ब्राह्मण इसे सदैव जप सकते है ।

तब आप पूछोगे की उल्टे क्रम से जपने की परम्परा कहां से चल पड़ी!!। तो मित्रों ये परम्परा चली है इस्कॉन के द्वारा क्योंकि वो भगवान राम को भगवान कृष्ण से छोटा मानते है । भगवान राम को 12 कलाओं से युक्त और भगवान कृष्ण को 16 कलाओं से युक्त मानते है । इनकी भेद बुद्धि ने ही इस नाम मन्त्र को उल्टा जप है और इसका प्रचार भी किया है ।

मित्रों मैं एक और प्रमाण देता हूं जिसके बाद आपको सत्य का भान होगा ।

मित्रों "श्रीराम जय राम जय जय राम" ये नारा प्रत्येक हिन्दू मन्दिरों में लगाया जाता है । यहां तक कि वर्तमान में  पूज्य शंकराचार्य (पुरी पीठ )जी भी अपने प्रवचन के मंगलाचरण में ये नारा लगवाते है।

किन्तु क्या आप जानते है कि ये केवल नारा नही है बल्कि #रामरहस्योपनिषद का मन्त्र है जो की अथर्ववेद की उपनिषद है।

#रामरहस्योपनिषद के दूसरे अध्याय के ५६ मन्त्र में हनुमान जी सनकादिकों इसका उपदेश देते है

श्रीरामेति पदं चोक्त्वा जयराम पदं ततः
जयद्वयं वदेत् प्राज्ञो रामेति मनुराजकः ।।५६॥
त्रयोदशार्ण ऋष्यादि पूर्ववत् सर्वकामद ः।

"श्रीराम' ऐसा शब्द बोलकर उसके बाद 'जय' शब्द बोलना चाहिए। इसके बाद, दो बार 'जय' शब्द बोलने से और बाद में 'राम' शब्द कहने से त्रयोदशाक्षर परमबुद्धिमय मन्त्रराज होता है । पूरा मन्त्र इस प्रकार होगा—'श्री राम जय राम जय जय राम ।' यह त्रयोदशाक्षर मन्त्रराज के ऋषि पहले की तरह ही हैं । यह मन्त्र सर्वकामनाओं की सिद्धि देने वाला है।"

मित्रों! जब सार्वजनिक मंचों से ये मन्त्र बोला जा सकता है वो भी पुज्य शंकराचार्यों , वैष्णवचार्यो के द्वारा ,तब महामन्त्र को अधिकारी भेद के कारण विलोम क्रम से जपने को क्यूं कह जाता है । जब कि महामन्त्र में तो भगवान के केवल नाम है और उसकी विधि का निषेध ब्रह्मा जी ने स्वयं उस उपनिषद में किया है ।

अंत में केवल इतना ही कहूंगा कि भगवन्नाम कोई कैसे भी जपता है वह मुक्त हो ही जाता है इसमे अजामिल उपाख्यान प्रमाण है और श्रीमद्भागवत के १२ स्कन्द में कहा गया है -

पतितः स्खलितश्चार्तः क्षुत्त्वा वा विवशो ब्रुवन् ।
हरये नम इत्युच्चैर्मुच्यते सर्वपातकात् ॥ ४७॥
सङ्कीर्त्यमानो भगवाननन्तः
श्रुतानुभावो व्यसनं हि पुंसाम् ।
प्रविश्य चित्तं विधुनोत्यशेषं
यथा तमोऽर्कोऽभ्रमिवातिवातः ॥ ४८॥

"जो मनुष्य गिरते-पड़ते, फिसलते, दु:ख भोगते अथवा छींकते समय विवशता से भी ऊँचे स्वर से बोल उठता है—‘हरये नम:’, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है ॥

यदि देश, काल एवं वस्तु से अपरिच्छिन्न भगवान्‌ श्रीकृष्ण के नाम, लीला, गुण आदि का सङ्कीर्तन किया जाय अथवा उनके प्रभाव, महिमा आदि का श्रवण किया जाय तो वे स्वयं ही हृदय में आ विराजते हैं और श्रवण तथा कीर्तन करनेवाले पुरुष के सारे दु:ख मिटा देते हैं—ठीक वैसे ही जैसे सूर्य अन्धकार को और आँधी बादलों को तितर-बितर कर देती है ॥"

इसलिए किसी भी तरह भगवन्नाम का उच्चारण कीजिये उसमे दोष नही है । लेख का उद्देश्य केवल समाज में फैले भ्रम का निवारण करना था ।

जय श्रीराम

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