सनातन वैदिक मान्यता सिद्धान्त सङ्ग्रह
इन सनातन वैदिक सिद्धान्ताें मैं सभी सनातन वैदिक (हिन्दु) ओं काे सहमत हाेकर आगे बढना उचित दीखता है---
१. चार वेद ऋक्, यजु, साम, अथर्व की (शुक्ल कृष्ण दाेनाें प्रकार के यजुर्वेदाें की शाखासहित) सभी शाखाएँ अपाैरूषेय वेद हैं ।
२. एेतरेय, शतपथ, तैत्तिरीय, पञ्चविंश इत्यादि ब्राह्मणग्रन्थ भी अपाैरूषेय वेद हैं ।
३. वेदाें का परम प्रामाण्य है ।
४. जन्मना जाति और संस्कार तथा अाचार से जातित्व की पूर्णता मान्य है । जन्मना जाति व्यवस्था पुनर्जन्म के सिद्धान्त अनुरूप न्यायपूर्ण है ।
५. चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) ।
६. चार आश्रम (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, सन्न्यास) ।
७. गृहस्थ-आश्रम की श्रेष्ठता और गुरुत्व तथा आचार्यत्व (गृहस्थ ब्राह्मण ही गुरु और आचार्य बन सकते हैं) ।
८. शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, छन्दःशास्त्र, वेदाङ्गज्याेतिष-- इन छः वेदाङ्ग तथा मीमांसाशास्त्र के अनुसार का वेदार्थ ही सही है और उसके अनुसार आचार का ग्रहण करना चाहिए।
९. स्कन्दस्वामी, उद्गीथ, वेङ्कटमाधव, उवट, भट्टभास्कर, सायण, महीधर, मुद्गल आदि प्राचीन विद्वानाें से रचित वेदव्याख्याएँ प्रामाणिक हैं, ग्राह्य हैं । (वेदभगवान् के कथन-विधान के उपर अपनी स्वल्पबुद्धि से हिंसा-अहिंसा, अश्लील-अनश्लील, उचित-अनुचित इत्यादि समीक्षा करना अनुचित है)
१०. वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति--- सिद्धान्त । (वैदिक पशुबन्ध-साेमयागादि की --अग्नीषाेमीयं पशुमालभेत-- इत्यादि विधि से विहित पशुहिंसा अहिंसा ही है, तस्माद् यज्ञे वधाेऽवधः--- सिद्धान्त) ।
११. स्वशाखा-वेद का शास्त्रीय रूप में अदृष्टाेत्पादन के लिए अध्यापन का अधिकार गृहस्थ ब्राह्मण का है । अदृष्टफल के लिए अध्ययन का अधिकार भी ब्राह्मण का है । ब्रह्मचारी, गृहस्थ तथा वानप्रस्थ भी गुरु से वेद पढ सकते हैं । अन्य लाेग वेदाेक्त ज्ञान ब्राह्मणाें से प्राप्त कर सकते हेैं ।
१२. वेदाध्यायी शुद्ध ब्राह्मणाें काे दान देना बडा पुण्याेत्पादक कार्य है ।
१३. धर्मसूत्रविहित आचार अत्यन्त मान्य है ।
१४. स्मृतियाें की मान्यता है ।
१५. स्त्रीका पुनर्विवाह धर्म में अमान्य है ।
१६. स्व-शाखा श्राैतसूत्र-गृह्यसूत्र अनुसार कर्मकाण्डका अनुष्ठान करना चाहिए।
१७. श्राद्ध-कर्म-विषयक वैदिक मन्त्राें की गृह्यसूत्राेक्त व्याख्या तथा विनियाेग अत्यन्त प्रमाण हैं ।
१८. कान्यकुब्ज, सारस्वत इत्यादि ब्राह्मणाें का राेटी-बेटी का नियम शास्त्रानुकूल है ।
१९. सभी गृह्यसूत्राेक्त कर्मकाण्डपद्धतियाँ परम प्रमाण हैं (स्वशाखा का गृह्यसूत्र वेदतुल्य है) ।
२०. पुराण तथा इतिहास से वेदाें का उपबृंहण हाेता है । वेद, पुराण तथा इतिहास की कथाओं का तात्पर्य का ज्ञान करने का प्रयास करना चाहिए। सभी कथाओं का हितकारी अर्थ ग्रहण करना चाहिए । वेद, पुराण, इतिहास की कथाओं काे समस्या के रूप में नहीं देखना चाहिए ।
२१. वेदाध्ययनाधिकारहीन सनातनियाें के लिए पुराण (१८ पुराण) तथा इतिहास (रामायण-महाभारत) के अध्ययन की व्यवस्था है ।
२२. अधिकारिविशेष के लिए मूर्तिपूजा की ग्राह्यता है। मूर्तिपूजा से आत्मज्ञान की ओर आगे बढना चाहिए ।
२३. अधिकारिविशेष के लिए भक्तिमार्ग की ग्राह्यता है। ज्ञानमार्ग तथा कर्ममार्ग की ओर आगे बढना चाहिए ।
२४. कर्मानुसार पुनर्जन्म तथा माेक्षमार्गगमन शास्त्रानुसार मान्य है ।
२५. आत्मज्ञान से मुक्ति मान्य है ।
२६. अद्वैत-सिद्धान्त मान्य है ।
२७. वैदिक यज्ञाें की आत्मज्ञानाेपकारकता है ।
२८. ज्ञान- कर्म-समुच्चय (केवल ज्ञान अथवा केवल कर्म ही ग्राह्य नहीं, दाेनाें का अवलम्बन करने का) मार्ग श्रेष्ठ है ।
---- इत्यादि ।
*सनातन धर्म को दुषित करने वाली संस्था की सुचि*
१)आर्य समाज (कहते वैदिक लेकिन मानते केवल चार संहिता ब्राह्मणग्रंथ आरण्यक वदो का अंतिम भाग यानि वेदांत उपनिषद को नही मानते उपर से संहिता पर झुठे अर्थघटन अौर बाते फैलाने वाले बहोत से मस्तिष्क को गुप्त या प्रकट रुप से सोशियल मिडिया आदि माध्यम से भ्रमित करने वाली संस्था)
२)गायत्री परिवार (शांतिकुंज हरिद्धार)
३)रामकृष्ण मिशन (स्वामि विवेकानंद)
४)कलयुगी अवतार सदानंद परमहंस
५)अोशो रजनीश
६)ब्रह्माकुमारी
७)निरंकारी मिशन
८)वीरशैव (लिंगायत्) अौर रावलपूजारी केदारनाथ
९)हठयोगी दिग्मंबर अखाडा परिषद
१०)प्रमोद कृष्णम् कल्कि पीठ
११)चक्रपाणी महाराज हिंदुमहासभा
१२)सद्गुरु निखिलेश्वर (सिद्धाश्रम)
१३)सर्व श्री आशुतोष महाराज (लाईट महाराज)
१४)निर्मलबाबा (निर्मल दरबार)
१५)राधेमां गोल्डन बाबा कमप्युटरबाबा आदि नौटंकी
१६)स्वामी नित्यानंद
१७)गुरु राम रहिम
१८)सतपाल महाराज
१९)रामपाल
२०)ईस्कोन
२१)काशी प्रयाग सुमेरु पीठ सहित अन्य फर्जी जगतगुरु अौर संघ विहिप या राजकीय पक्ष द्धारा बनाए गए तथाकथित फर्जी शंकराचार्य ।
२२)स्वामिनारायण की सभी शाखा कालुपुर वडताल BAPS (उद्धव संप्रदाय)
२३)सांई भगवान वादी
सत साहेब (कबीरपंथी)
२४)प्रणामी संप्रदाय
२५)सदगुरु (दक्षिण भारत)
२६)गोरखनाथ
२७) सभी अद्धिज भगवा वेशधारी संन्यासी
२८) सभी महिला संन्यासी
२९) जुना अखाडे के नौटंकी एवं किन्नर अखाडा
३०) जे कृष्ण मुर्ति
३१) मोरारीबापु
३२) रामभद्राचार्य
*गुप्त रुप से हानि पहुँचाने वाली संस्था*
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ
विश्व हिंदू परिषद
स्वाध्याय परिवार(आंशिक दोषी)
किसी भी अधर्म फेलाने वाली संस्था को पहेचाने कैसे??
अधर्म फैलाने वाली सभी संस्था कर्मणा वर्ण जाति मानती है
आंतरजातीय विवाह,विधवा विवाह,पुर्नविवाह आदि का समर्थन करती है
स्मृति अौर श्रुति पुराण के किसी भी अंश पर प्रक्षिप्त है पीछे से मिलावट की गई है ऐसा आरोप लगाती है या उस को बुद्धीप्रमाण्यता के नाम पर गलत ढंग से प्रस्तुत करती है जिससे जनमानस या समाज मे उसकी विपरीत समज क्रियान्वित हो।
ईस मे से महतम संस्था १८ वी शताब्दी के पश्चात् अंग्रेजो के शासनकाल एवं गुप्त रुप से अंग्रेजो की गुलामी स्वरुप भारत की तथाकथित आझादी के पश्चात् के लोकतंत्र मे बनी है।
अौर भी बहोत से नाम है लेकिन अब सच्चे धर्माचार्यो की ही सुचि बनाते है उनसे अतिरिक्त सब कही ना कही अधर्म ही फैला रहे है।
*कौन है सनातन धर्म के वास्तविक धर्माचार्य??*
ई.स से ५०७ वर्ष पुर्व भगवान आध शंकराचार्य स्थापित चार पीठो मे १ अरब ९७ करोड २९ लाख ५९ हजार ११७ वर्ष से चली आती ऋषियों की गुरु परंपरा से सनातन धर्म का ज्ञान प्राप्त मान्य चार शंकराचार्य ही सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्य अौर जगतगुरु है।
सनातन धर्म मे पंचदेव अौर उनके शास्त्र सहमत अवतार ही भगवान के रुप मे मान्य है।
ज्योतीष पीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी श्री स्वरुपानंद सरस्वती जी महाराज
द्धारकापीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी श्री स्वरुपानंद सरस्वती जी महाराज
गोवर्धनपीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज
श्रृगेरीपीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी श्री भारती तीर्थ जी महाराज
अन्य सन्मान पात्र सनातनी आचार्य एवं संस्था अौर अखाडा
रामानुजाचार्यजी
रामानन्दाचार्यजी
माधवाचार्यजी
निम्बकाचार्यजी
वल्लभाचार्यजी समेत पांच वैष्णवाचार्य
सात संन्यासी अखाडा के आचार्य महामंडलेश्वर
अौर सभी मान्य वैष्णव दिगम्बर निर्वाणी अौर निर्मोही उदासीन(बडा अौर नया) अौर निर्मल अखाडो के सभापति
समस्त प्राचीनमठो की संन्माननीय संस्था हिंदु धर्म आचार्य सभा
नोंध :- सनातन हिंदू धर्म का कुम्भ हो या कोई भी अवसर हो सनातन धर्म का नेतृत्व ईन्ही आचार्यो के द्धारा होता है।
सनातन हिंदू धर्म मे शंकराचार्यो से अतिरिक्त पांच वैष्णवाचार्यो का वैदिक धर्म पर मतभेद नही है आध्यात्मिक विषय मे मतभेद है जैसे द्धेत अद्धेत आदि आदि।वेद प्रतिपादित धर्म यानि वेद के पुर्वभाग मे सभी आचार्य एक मत है।वेदांत मे मत है।
एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति यह बात आप यहां अध्यात्म विषय मे मान सकते है।धर्म विषय किसी का मत नही होता वेद आज्ञा ही सर्वोच्च होती है।
आध्यात्म मुख्य रुप से विद्वानो का विषय है।सामन्य जनता के लिए सर्वप्रथम स्वधर्म ही कल्याण का मार्ग है।
बाकी सभी सनातनी आचार्य जन्मना वर्णश्राम तदनुसार विवाह ,समाज व्यवस्था एवं विधवा विवाह,पुनः विवाह निषेध रोटी की मर्यादा आदि विषय मे एकमत है।
धर्म का जय हो।
अधर्म का नाश हो।
प्राणीयो मे सदभावना हो।
विश्व का कल्याण हो।
गौ माता की जय हो।
गौ हत्या बंध हो।
भारत अखंड हो।
सनातन धर्म की जय।
।।हर हर महादेव।।
*सनातन धर्म उदार नही है वर्तमान समय मे अव्यवस्थित है उस अव्यवस्था को कुछ हिंदूवादी संगठन अगर उदारमतवादी उदारमतवादी चिल्ला रहे है तो वे सबसे बडे धर्म द्रोही है।*
२. एेतरेय, शतपथ, तैत्तिरीय, पञ्चविंश इत्यादि ब्राह्मणग्रन्थ भी अपाैरूषेय वेद हैं ।
३. वेदाें का परम प्रामाण्य है ।
४. जन्मना जाति और संस्कार तथा अाचार से जातित्व की पूर्णता मान्य है । जन्मना जाति व्यवस्था पुनर्जन्म के सिद्धान्त अनुरूप न्यायपूर्ण है ।
५. चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) ।
६. चार आश्रम (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, सन्न्यास) ।
७. गृहस्थ-आश्रम की श्रेष्ठता और गुरुत्व तथा आचार्यत्व (गृहस्थ ब्राह्मण ही गुरु और आचार्य बन सकते हैं) ।
८. शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, छन्दःशास्त्र, वेदाङ्गज्याेतिष-- इन छः वेदाङ्ग तथा मीमांसाशास्त्र के अनुसार का वेदार्थ ही सही है और उसके अनुसार आचार का ग्रहण करना चाहिए।
९. स्कन्दस्वामी, उद्गीथ, वेङ्कटमाधव, उवट, भट्टभास्कर, सायण, महीधर, मुद्गल आदि प्राचीन विद्वानाें से रचित वेदव्याख्याएँ प्रामाणिक हैं, ग्राह्य हैं । (वेदभगवान् के कथन-विधान के उपर अपनी स्वल्पबुद्धि से हिंसा-अहिंसा, अश्लील-अनश्लील, उचित-अनुचित इत्यादि समीक्षा करना अनुचित है)
१०. वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति--- सिद्धान्त । (वैदिक पशुबन्ध-साेमयागादि की --अग्नीषाेमीयं पशुमालभेत-- इत्यादि विधि से विहित पशुहिंसा अहिंसा ही है, तस्माद् यज्ञे वधाेऽवधः--- सिद्धान्त) ।
११. स्वशाखा-वेद का शास्त्रीय रूप में अदृष्टाेत्पादन के लिए अध्यापन का अधिकार गृहस्थ ब्राह्मण का है । अदृष्टफल के लिए अध्ययन का अधिकार भी ब्राह्मण का है । ब्रह्मचारी, गृहस्थ तथा वानप्रस्थ भी गुरु से वेद पढ सकते हैं । अन्य लाेग वेदाेक्त ज्ञान ब्राह्मणाें से प्राप्त कर सकते हेैं ।
१२. वेदाध्यायी शुद्ध ब्राह्मणाें काे दान देना बडा पुण्याेत्पादक कार्य है ।
१३. धर्मसूत्रविहित आचार अत्यन्त मान्य है ।
१४. स्मृतियाें की मान्यता है ।
१५. स्त्रीका पुनर्विवाह धर्म में अमान्य है ।
१६. स्व-शाखा श्राैतसूत्र-गृह्यसूत्र अनुसार कर्मकाण्डका अनुष्ठान करना चाहिए।
१७. श्राद्ध-कर्म-विषयक वैदिक मन्त्राें की गृह्यसूत्राेक्त व्याख्या तथा विनियाेग अत्यन्त प्रमाण हैं ।
१८. कान्यकुब्ज, सारस्वत इत्यादि ब्राह्मणाें का राेटी-बेटी का नियम शास्त्रानुकूल है ।
१९. सभी गृह्यसूत्राेक्त कर्मकाण्डपद्धतियाँ परम प्रमाण हैं (स्वशाखा का गृह्यसूत्र वेदतुल्य है) ।
२०. पुराण तथा इतिहास से वेदाें का उपबृंहण हाेता है । वेद, पुराण तथा इतिहास की कथाओं का तात्पर्य का ज्ञान करने का प्रयास करना चाहिए। सभी कथाओं का हितकारी अर्थ ग्रहण करना चाहिए । वेद, पुराण, इतिहास की कथाओं काे समस्या के रूप में नहीं देखना चाहिए ।
२१. वेदाध्ययनाधिकारहीन सनातनियाें के लिए पुराण (१८ पुराण) तथा इतिहास (रामायण-महाभारत) के अध्ययन की व्यवस्था है ।
२२. अधिकारिविशेष के लिए मूर्तिपूजा की ग्राह्यता है। मूर्तिपूजा से आत्मज्ञान की ओर आगे बढना चाहिए ।
२३. अधिकारिविशेष के लिए भक्तिमार्ग की ग्राह्यता है। ज्ञानमार्ग तथा कर्ममार्ग की ओर आगे बढना चाहिए ।
२४. कर्मानुसार पुनर्जन्म तथा माेक्षमार्गगमन शास्त्रानुसार मान्य है ।
२५. आत्मज्ञान से मुक्ति मान्य है ।
२६. अद्वैत-सिद्धान्त मान्य है ।
२७. वैदिक यज्ञाें की आत्मज्ञानाेपकारकता है ।
२८. ज्ञान- कर्म-समुच्चय (केवल ज्ञान अथवा केवल कर्म ही ग्राह्य नहीं, दाेनाें का अवलम्बन करने का) मार्ग श्रेष्ठ है ।
---- इत्यादि ।
*सनातन धर्म को दुषित करने वाली संस्था की सुचि*
१)आर्य समाज (कहते वैदिक लेकिन मानते केवल चार संहिता ब्राह्मणग्रंथ आरण्यक वदो का अंतिम भाग यानि वेदांत उपनिषद को नही मानते उपर से संहिता पर झुठे अर्थघटन अौर बाते फैलाने वाले बहोत से मस्तिष्क को गुप्त या प्रकट रुप से सोशियल मिडिया आदि माध्यम से भ्रमित करने वाली संस्था)
२)गायत्री परिवार (शांतिकुंज हरिद्धार)
३)रामकृष्ण मिशन (स्वामि विवेकानंद)
४)कलयुगी अवतार सदानंद परमहंस
५)अोशो रजनीश
६)ब्रह्माकुमारी
७)निरंकारी मिशन
८)वीरशैव (लिंगायत्) अौर रावलपूजारी केदारनाथ
९)हठयोगी दिग्मंबर अखाडा परिषद
१०)प्रमोद कृष्णम् कल्कि पीठ
११)चक्रपाणी महाराज हिंदुमहासभा
१२)सद्गुरु निखिलेश्वर (सिद्धाश्रम)
१३)सर्व श्री आशुतोष महाराज (लाईट महाराज)
१४)निर्मलबाबा (निर्मल दरबार)
१५)राधेमां गोल्डन बाबा कमप्युटरबाबा आदि नौटंकी
१६)स्वामी नित्यानंद
१७)गुरु राम रहिम
१८)सतपाल महाराज
१९)रामपाल
२०)ईस्कोन
२१)काशी प्रयाग सुमेरु पीठ सहित अन्य फर्जी जगतगुरु अौर संघ विहिप या राजकीय पक्ष द्धारा बनाए गए तथाकथित फर्जी शंकराचार्य ।
२२)स्वामिनारायण की सभी शाखा कालुपुर वडताल BAPS (उद्धव संप्रदाय)
२३)सांई भगवान वादी
सत साहेब (कबीरपंथी)
२४)प्रणामी संप्रदाय
२५)सदगुरु (दक्षिण भारत)
२६)गोरखनाथ
२७) सभी अद्धिज भगवा वेशधारी संन्यासी
२८) सभी महिला संन्यासी
२९) जुना अखाडे के नौटंकी एवं किन्नर अखाडा
३०) जे कृष्ण मुर्ति
३१) मोरारीबापु
३२) रामभद्राचार्य
*गुप्त रुप से हानि पहुँचाने वाली संस्था*
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ
विश्व हिंदू परिषद
स्वाध्याय परिवार(आंशिक दोषी)
किसी भी अधर्म फेलाने वाली संस्था को पहेचाने कैसे??
अधर्म फैलाने वाली सभी संस्था कर्मणा वर्ण जाति मानती है
आंतरजातीय विवाह,विधवा विवाह,पुर्नविवाह आदि का समर्थन करती है
स्मृति अौर श्रुति पुराण के किसी भी अंश पर प्रक्षिप्त है पीछे से मिलावट की गई है ऐसा आरोप लगाती है या उस को बुद्धीप्रमाण्यता के नाम पर गलत ढंग से प्रस्तुत करती है जिससे जनमानस या समाज मे उसकी विपरीत समज क्रियान्वित हो।
ईस मे से महतम संस्था १८ वी शताब्दी के पश्चात् अंग्रेजो के शासनकाल एवं गुप्त रुप से अंग्रेजो की गुलामी स्वरुप भारत की तथाकथित आझादी के पश्चात् के लोकतंत्र मे बनी है।
अौर भी बहोत से नाम है लेकिन अब सच्चे धर्माचार्यो की ही सुचि बनाते है उनसे अतिरिक्त सब कही ना कही अधर्म ही फैला रहे है।
*कौन है सनातन धर्म के वास्तविक धर्माचार्य??*
ई.स से ५०७ वर्ष पुर्व भगवान आध शंकराचार्य स्थापित चार पीठो मे १ अरब ९७ करोड २९ लाख ५९ हजार ११७ वर्ष से चली आती ऋषियों की गुरु परंपरा से सनातन धर्म का ज्ञान प्राप्त मान्य चार शंकराचार्य ही सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्य अौर जगतगुरु है।
सनातन धर्म मे पंचदेव अौर उनके शास्त्र सहमत अवतार ही भगवान के रुप मे मान्य है।
ज्योतीष पीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी श्री स्वरुपानंद सरस्वती जी महाराज
द्धारकापीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी श्री स्वरुपानंद सरस्वती जी महाराज
गोवर्धनपीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज
श्रृगेरीपीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी श्री भारती तीर्थ जी महाराज
अन्य सन्मान पात्र सनातनी आचार्य एवं संस्था अौर अखाडा
रामानुजाचार्यजी
रामानन्दाचार्यजी
माधवाचार्यजी
निम्बकाचार्यजी
वल्लभाचार्यजी समेत पांच वैष्णवाचार्य
सात संन्यासी अखाडा के आचार्य महामंडलेश्वर
अौर सभी मान्य वैष्णव दिगम्बर निर्वाणी अौर निर्मोही उदासीन(बडा अौर नया) अौर निर्मल अखाडो के सभापति
समस्त प्राचीनमठो की संन्माननीय संस्था हिंदु धर्म आचार्य सभा
नोंध :- सनातन हिंदू धर्म का कुम्भ हो या कोई भी अवसर हो सनातन धर्म का नेतृत्व ईन्ही आचार्यो के द्धारा होता है।
सनातन हिंदू धर्म मे शंकराचार्यो से अतिरिक्त पांच वैष्णवाचार्यो का वैदिक धर्म पर मतभेद नही है आध्यात्मिक विषय मे मतभेद है जैसे द्धेत अद्धेत आदि आदि।वेद प्रतिपादित धर्म यानि वेद के पुर्वभाग मे सभी आचार्य एक मत है।वेदांत मे मत है।
एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति यह बात आप यहां अध्यात्म विषय मे मान सकते है।धर्म विषय किसी का मत नही होता वेद आज्ञा ही सर्वोच्च होती है।
आध्यात्म मुख्य रुप से विद्वानो का विषय है।सामन्य जनता के लिए सर्वप्रथम स्वधर्म ही कल्याण का मार्ग है।
बाकी सभी सनातनी आचार्य जन्मना वर्णश्राम तदनुसार विवाह ,समाज व्यवस्था एवं विधवा विवाह,पुनः विवाह निषेध रोटी की मर्यादा आदि विषय मे एकमत है।
धर्म का जय हो।
अधर्म का नाश हो।
प्राणीयो मे सदभावना हो।
विश्व का कल्याण हो।
गौ माता की जय हो।
गौ हत्या बंध हो।
भारत अखंड हो।
सनातन धर्म की जय।
।।हर हर महादेव।।
*सनातन धर्म उदार नही है वर्तमान समय मे अव्यवस्थित है उस अव्यवस्था को कुछ हिंदूवादी संगठन अगर उदारमतवादी उदारमतवादी चिल्ला रहे है तो वे सबसे बडे धर्म द्रोही है।*
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