स्वधर्म और आपद्धर्म

#स्वधर्म और #आपद्धर्म -
प्राण संकट में भी स्वधर्म का त्याग नही करना चाहिए!!

*वेदादिशास्त्रों* को पढ़ना-पढाना, यज्ञ करना-करना, दान देना और दान लेना - ये छः कर्म ब्राह्मण के लिये रचे गये हैं । इनमें यज्ञ करना, दान देना और वेदादिशास्त्रों को निष्कारण पढ़ना - ये तीन तो धर्म-पालन के लिये आत्मोन्नति के कारक हैं और यज्ञ कराना, दान लेना और वेदादिशास्त्रों को पढ़ाना - ये तीन आजिवीका के लिये मुख्य स्वधर्म हैं।
प्रजा की रक्षा, दान देना, यज्ञ करना,अध्ययन और विषयों में अनासक्ति -->
*" (प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः।। मनुः १/८९।।)"*
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव -- ये सब के सब कर्म क्षत्रिय के हैं --> *"(शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।। गीता १८/४३।।)"*
पशुओं की रक्षा,दान देना, यज्ञ करना, अध्ययन,व्यापार तथा ब्याज और खैती ये सब वैश्योचित स्वधर्म हैं->
*"(पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च।।मनुः१/९०।।)"* ///  कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।।गीता १८/४४।।///

आपत्ति  में केवल आजीविका के साधन बदलतें हैं शिक्षा और आत्मोन्नति के नहीं , ब्राह्मण के लिये आपत्ति में क्षत्रिय अथवा वैश्य की वृत्ति से अपना निर्वाह करना हैं -- मनुः १०,८१।। उसमें भी वैश्य की वृत्ति में कृषि,गोरक्षा,वाणिज्यादि का समावेश हैं // कृषिगोरक्षमास्थाय जीवेद्वैश्यस्य जीविकाम्।।मनुः१०/८२।।///
ब्राह्मण को नौकरी जैसे शूद्रवृत्ति के वृत्ति का अवलम्बन तो आपत्ति में भी स्पष्टरूप से नहीं करना चाहिये --> *"(सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत्।। मनुः ४/६।।)"*
उत्तमधर्म तो आपत्ति का इस प्रकार से हैं कि बिना माँगे मिला हुआ अमृत हैं, नौकरी बिना माँगे घरपर दस्तक नहीं दैती। माँगी हुई भीक्षा मृत कहलाती हैं , तथा खैती को प्रमृत कहा हैं। वाणिज्य को सत्यानृत कहा हैं क्योंकि व्यवसाय सच-जूठ पर ही टीका हैं। (यहाँ - मृतवृत्ति में - माँगनेपर अन्न, शरीर ढँकने के लिये कपड़े का  भी समन्वय हैं, वैदिकशिक्षा निःशुल्क होती हैं, तो फिर परधर्म की आवश्यकता ही कहाँ रहती हैं - मौजशौख में ?)
क्षत्रिय का आपत्तिधर्म --> वैश्य की वृत्ति में हैं --मनु १०,९५. और वैश्य का आपत्तिधर्म शूद्रवृत्ति में हैं - १०,९८.
मनुस्मृति १०,११५ पर कुल्लुकटीका - आपत्ति में १वारसाई, २ आकस्मिकधन(भूमिगत द्रव्य) और ३- अनिंद्य वस्तु का विक्रय - चारोंवर्णों के लिये उत्तम हैं । ४ संग्राम में विजय क्षत्रियोचित और ५-६ न्यायोपूर्वक व्याज तथा खैती - यह वैश्योचित हैं। ७ केवल दानप्रतिग्रह में ब्राह्मण का ही अधिकार हैं, इन सात मार्गों में से जिस वर्ण को जो जो मार्ग जिसके लिये उत्तम हैं उन्हीं मार्गों से धनप्राप्त करना धर्मयुक्त हैं। इन मार्गों से यदि संभव न हो तो "(मनुस्मृति १०/११६ - में कहे " विद्या, शिल्प=कारिगरी,नोकरी, सेवा, गोरक्षादि पशुपालन, तराजूपर होने वालें व्यापार(आँकड़े वाले आधुनिक तोलमापक नहीं),खेती, संतोषपूर्वक धैर्यता से जीवननिर्वाह, भिक्षावृत्ति और व्याज - यह दश )* कर्म आपत्ति में कहे हैं ।। कुल्लुक।। (यहाँ -- ब्राह्मण को  नौकरी जैसे शूद्रवृत्ति  का अवलम्बन तो आपत्ति में भी स्पष्टरूप से नहीं करना चाहिये --> *"(सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत्।। मनुः ४/६।।)"*

इसमें भी ब्राह्मण और क्षत्रिय को व्याज का व्यापार नहीं करना चाहिये, परंतु यदि शूद्रादि को आवश्यकता हो तो उन्हें धर्मनिमित्त कमव्याज में धन दै सकतें हैं --"( ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि वृद्धिं नैव प्रयोजयेत्। कामं तु खलु धर्मार्थं दद्यात् पापीयसेऽल्पिकाम्।। मनुः १०/११७।।)"
आपत्ति न हो तो आपद्धर्म उचित नहीं हैं, जो द्विज बिना आपत्ति(पेट की भूख मिटा़ने का खाने की आपत्ति , शरीर ढँकने के लिये कपड़े और रुग्णादि विकट अवस्था में बचे-बचायें कुछ पैसों का न होने की आपत्ति )के  आपद्धर्म का आचरण करता हैं वह परलोकमें धर्म के फल को प्राप्त नहीं कर सकता। आपद्धर्म का आचरण  आपत्तिवेला में ही उचित हैं। इसलिये विश्वेदेवों, साध्यों, ब्राह्मणों और महर्षियों ने मरण से भय प्राप्त होनेपर ही आपद्धर्म को मुख्य स्वधर्म का प्रतिनिधि माना हैं। जो मनुष्य स्वधर्म के आचरण के लिये (यथा रोटी,कपड़ा और संग्रहितधन से) समर्थ होनेपर भी गौणवृत्ति को आचरता हैं वह दुर्बुद्धिमनुष्य ! पारलौकिक फल की प्राप्ति नहीं कर सकता अतः स्थिति सुधरनेपर स्वधर्म में स्थिर होना चाहिये  -- "( आपत्कालेन यो धर्मं कुरुतेऽनापदि द्विजः। स नाप्नोति फलं तस्य परत्रेति विचारितम्।। विश्वैश्च देवैः साध्यैश्च ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः । *#आपत्सु_मरणाद्भीतैर्विधेः_प्रतिनिधिः_कृतः।।* प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पेन वर्तते। न सांपरायिकं तस्य दुर्मतेर्विद्यते फलम्।।मनुः ११/२८--३०।।)" बिना आपत्ति के आपद्धर्म आचरनेपर प्रायश्चित्त का भागी हैं।

यज्ञ(नित्य पञ्चमहायज्ञ से तात्पर्य हैं बलिवैश्वदेव), स्वशक्ति के अनुसार दान(जल,तृण पदार्थ मात्र भी), तपरूप(स्वशाखीयवेदाध्ययन, शुद्धि के लिये प्रायश्चित्त आदि व्रत तथा परमात्मा की सत्ता पर अड़िग विश्वास की धैर्यता)कर्म त्याग करने के योग्य नहीं हैं,बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य हैं; क्योंकि ये तीनों ही कर्म विवेकी मनुष्यों को पवित्र करता हैं -- *"( यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्। गीता १८/५।।)"*
अतः शास्त्र में बतलायें हुए अपने अपने धर्म का पालन करना चाहिये, इसीमें सबका परम हित और कल्याण हैं (सभी में समानता तो कलह का कारण ही उद्भासित करेगा)--> *"(वरं स्वधर्म विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः। परधर्मेण जीवनी हि सद्यः पतित जातितः।। मनु १०/९७।।)"* - इस प्रकार धार्मिकनिर्णय से यह निष्कर्ष निकलता हैं कि वर्तमान में अधिक-मनुष्य परधर्म में आसक्त हैं - धर्म और आत्मोन्नति के धर्म तो स्वधर्म से भिन्न मौजशौख की  अधिक-तृष्णा के कारण धृति तथा स्वधर्म में अरुची और संतोषरहित हो चूके हैं केवल धर्माभास दिखाई दे रहा हैं।

गीतोक्ति हैं कि अपना धर्म गुणरहित हो, तो भी श्रेष्ठ हैं और परधर्म अच्छी प्रकार (न्याय )से आचरण किया हुआ हो तो भी श्रेष्ठ नहीं हैं; *क्योंकि परधर्म से जीवन बितानेवाला मनुष्य तुरंत अपनी जाति से पतित हो जाता हैं -- "( श्रेयान् स्वधर्मं विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्म भयावहः।।गीता ३/३५।।)"* कितना सटिक आनुभाविक सत्य हैं। हमें इसलिये ही स्वधर्म से अधिक आत्मबल प्राप्त होता हैं।
अच्छी प्रकार आचरण में लायें हुए दूसरे के धर्म की अपेक्षा गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम हैं। अपने धर्म के पालन में मरना भी कल्याणकारक हैं और दूसरे के धर्म भय को (यथा -  जाति से पतित होना //कर्मसंकरता//वर्णसंकरता//पाश्विकता ) देनेवाला हैं -> *"(श्रेयान् स्वधर्मं विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्म भयावहः।।गीता ३/३५।।)"*

स्वधर्मपालन का महत्त्व और फल भगवान् ने यों बतलाया हैं - अपने अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्तिरूप परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता हैं। अपने स्वाभाविक कर्मों में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परम सिद्धि को प्राप्त होता हैं, उस विधि को सुनिये ! जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई हैं और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त हैं, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा सेवा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता हैं --> ///
*स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।। यतः प्रवृत्ति भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दन्ति मानवः।।गीता* १८/४५-४६।। ///
भगवान् इस जगत् की उत्पत्ति-स्थिति-संहार करनेवाले, सर्वशक्तिमान् , सर्वाधार, सबके प्रेरक, सब के आत्मा, सर्वान्तर्यामी और सब में व्यापक हैं, यह सारा जगत् उन्हीं की रचना हैं और वे स्वयं ही अपनी योगमाया से जगत् के रूप में प्रकट हुए हैं, अतः यह सम्पूर्ण जगत् भगवान् का हैं तथा मेरे शरीर,इन्द्रिय,मन,बुद्धि और मेरे द्वारा जो कुछ भी यज्ञ,दान आदि *#स्ववर्णाश्रमोचित कर्म* किये जाते हैं, वे सब भी भगवान् के हैं, उनकी प्रीतिकर है मै स्वयं भी भगवान् का हूँ - ऐसा समझना चाहिये; क्योकि समस्त देवताओं के एवं प्राणियों के आत्मा होने के कारण वे ही समस्त कर्मों के भोक्ता हैं -- "( भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।।५/२९।।)" - इस प्रकार परम श्रद्धा विश्वास के साथ समस्त कर्मों में ममता, आसक्ति और फलेच्छा का त्याग करके भगवान् की आज्ञानुसार उन्हीं की प्रसन्नता के लिये अपने स्वाभाविक कर्मों के द्वारा जो समस्त जगत् का आदर-सत्कार और सेवा करता हैं अर्थात् समस्त प्राणियों को सुख पहुँचाने के लिये उनके हित में रत हुआ उपर्युक्त प्रकार से स्वार्थ उत्साहपूर्वक अपने अपने कर्तव्य का पालन करता हैं, वह मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता जाता हैं ।
"स्वे स्वे कर्मणि०० गीता १८/४५-४६" इन श्लोकों में नर और मानव शब्द देकर भगवान् ने यह व्यक्त किया हैं कि प्रत्येक मनुष्य, चाहे वह किसी भी वर्ण या आश्रम में क्यों न हो, अपने कर्मों से भगवान् की पूजा करके परम सिद्धिरूप परमात्मा को प्राप्त कर सकता हैं;  परमात्मा को प्राप्त करने में सभी मनुष्यों का समान अधिकार हैं। अपने अध्ययनाध्यापन आदि कर्मों को उपर्युक्त प्रकार से भगवान् के समर्पण करके उनके द्वारा भगवान् की पूजा करनेवाला ब्राह्मण जिस पद को प्राप्त होता हैं, अपने प्रजापालनादि कर्मों के द्वारा भगवान् की पूजा करनेवाला क्षत्रिय भी उसी पद को प्राप्त होता हैं; उसी प्रकार अपने वाणिज्य,गोरक्षा आदि कर्मों द्वारा भगवान् की पूजा करनेवाला वैश्य तथा अपने सेवा-सम्बन्धी कर्मों द्वारा भगवान् की पूजा करनेवाला शूद्र भी उसी परमपद को प्राप्त होता हैं। यही बात आश्रमधर्मों के सम्बन्ध में समझ लेनी चाहिये।
अतएव कर्मबन्धन से छूटकर परमात्मा को प्राप्त करने का, जो मानव-जीवन का चरम उद्देश्य और लक्ष्य हैं,लयह बहुत ही सुगम मार्ग हैं। इसलिये मनुष्य को उपर्युक्त निष्कामभाव से तत्परतापूर्वक अपने धर्म का पालन करना चाहिये, भारी आपत्ति पड़नेपर भी स्वधर्म का त्याग नहीं करना चाहिये। महाभारत में बतलाया हैं - मनुष्य को किसी भी समय काम से, भय से, लोभ से या जीवन रक्षा के लिये भी स्वधर्म का त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि धर्म नित्य हैं और सुख-दुःख अनित्य हैं तथा जीव नित्य हैं और जीवन का हेतु अनित्य हैं -- *"(#न_जातु_कामान्न_भयान्न_लोभाद् #धर्मं_त्येजेज्जीवितस्यापि_हेतोः। #नित्यो_धर्मः_सुखदुःखे_त्वनित्ये *#जीवो_नित्यो_हेतुरस्य_त्वनित्यः।।महाभा० स्वर्गारो० ५/६३।।)"*
इसलिये मरण-संकट उपस्थित होनेपर भी मनुष्य को चाहिये कि वह हँसते-हँसते मृत्यु को स्वीकार करलें, पर स्वधर्म का त्याग किसी भी हालत में न करे। इसी में मनुष्य का सब प्रकार से कल्याण हैं।

ARunshastri
#प्रश्न_नही_स्वाध्याय_करें!!

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