वर्णाश्रमधर्म

#हिन्दू_संस्कृति_व_वर्णाश्रमधर्म ••• #भाग-१

भारत ही वह राष्ट्र है जिसने समग्र ज्ञाननिधि को समग्र विश्व के कल्याणार्थ मानवमात्र के लिए प्रदान किया।सनातन वैदिक आर्य हिन्दुओं के पूर्वजों ने विश्व को धर्मशास्त्र,अर्थशास्त्र,कामशास्त्र,मोक्षशास्त्र,ज्यौतिष,गणित तथा चिकित्सादि का विज्ञान सुलभ करवाया।१८ विद्याओं व ६४कलाओं का प्रदाता भारत ही है।स्वल्प कालखण्ड की संकटघड़ी को छोड़कर हमारे पूर्वजों ने अपनी ज्ञानशक्ति के बल पर सम्पूर्ण पृथिवी पर निर्बाध शासन किया।
जब प्राचीनकाल में भारत में #वर्णाश्रम_व्यवस्था चरम पर थी तो सम्पूर्ण दृष्टि से भारत एक अत्यन्त सुसम्पन्न राष्ट्र था।
बौद्धिक दृष्टि से आर्य हिन्दू जाति संसार की सर्वश्रेष्ठ नस्ल है अब इस विषय में संसार के सभी बुद्धिजीवियों में मतैक्यता है।अतःइसके विषय में कुछ कहना पिष्टपेषण ही होगा।
इस सर्वश्रेष्ठता का रहस्य क्या है????
जी,इसका रहस्य है वर्णाश्रम-व्यवस्था।
क्योंकि सनातन वैदिक आर्य हिन्दुओं के पूर्वजों नें अपने धर्मशास्त्र का अनुपालन कर अपनी रोटी-बेटी का सम्बन्ध सभी से न कर अपने रक्त को विशुद्ध रखा।संकरता न होने दी।
आर्य हिन्दू जाति नें एक हजार वर्ष की अग्निपरीक्षा द्वारा अपनी सर्वश्रेष्ठता,उपयोगिता व योग्यता सिद्ध कर ली है।शक,यवन,हूण सब आए और अपनी तलवार तोड़ गऐ पर हिन्दुत्व उससे अप्रभावित ही रहा।यह एक अत्यन्त विचारणीय तथ्य है कि इतने लम्बे कालखण्ड तक सतत् भयङ्कर दंशों को झेलते हुऐ भी आर्य हिन्दू जाति अध्यात्म,विज्ञान,सौहार्द,विश्वबंधुत्व के नूतन सौपान गढ़ती गई।जिसने हिन्दुओं को संजीवित रखा उस संजीवनी का नाम है 'वर्णाश्रम-व्यवस्था'।
वैदैशिक आक्रांताओं के मार्ग में भारत में सबसे बड़ी समस्या थी वर्णव्यवस्था अथवा #जातिव्यवस्था।
वैदेशिक आक्रांताओं का भारत पर आक्रमणों का मुख्य ध्येय रहा है 'लूट व धर्मप्रचार'।ईसाई मिशनरीज़ व पादरी धर्मप्रचार के उद्देश्य से ही भारत आए थे।
एक वृत्तान्त स्मरण आ रहा है।बात उस समय की है जब हम विशुद्ध भारतीय थे।उन्हीं दिनों कलकत्ता बन्दरगाह पर एक जहाज आ लगा।उसमें साधारण वस्तुओं से लेकर विलासिता सम्बन्धी उच्चतम कोटि की विलायती सामग्री भरी पड़ी थी।पाश्चात्य दस्युओं ने भरसक प्रयत्न किया कि विलासिता भरी सामग्री भारत में बेचकर भारतीयों को प्रमादी बना डालें।परन्तु ईसाई दस्युओं को मुँह की खानी पड़ी और जहाज़ जिस प्रकार आया उसी प्रकार वापस लौट गया।
उस समय क्रोध और द्वेष में आकर ब्रिटिश भारतीय प्रशासन के सचिव लाॅर्ड बैबिंग्टन मैकाले नें यह प्रण लिया कि -"जिस पुरातन शिक्षा ने इन भारतीयों को इतना स्वाभिमानी व स्वाबलम्बी बनाया है मैं उस पुरातन भारतीय शिक्षा को ध्वस्त कर आर्य हिन्दू जाति को एक ऐसी नस्ल में परिवर्तित कर दूंगा जो रक्त व आकृति से तो भारतीय होगी परन्तु स्वभाव व आदतों से अंग्रेज"।तब उसने अनर्थकारी पाश्चात्य शिक्षा का संगठन किया और भारत की लूट शुरू हुई तथा विलायत से चाय बिस्कुट से लेकर विलासिता की सभी वस्तुओं का भारी संख्या में आयात शुरू हुआ।
प्रथमतया जो जहाज कलकत्ता बन्दरगाह पर विलायती माल लेकर आया था वह किस कारण वापस लौटा?
हिन्दु धर्मशास्त्र विलायती वस्तुओं के उपयोग को निषिद्ध मानता है।
विदेश यात्रा धर्मशास्त्र के अनुसार निषिद्ध क्यों है???
भारत की स्वाधीनता व स्वावलम्बन का मूल धर्मशास्त्रीय शिक्षा ही है।
प्राचीनकाल में चीन से भी वस्त्र हमारे यहाँ आता था परन्तु उसकी खपत भारत में न हो सकी क्योंकि धर्मशास्त्र किसी भी विदेशी सामग्री से धर्मानुष्ठान न करने की शिक्षा देते हैं-
#न_स्यूतेन_न_दग्धेन_पारक्येण_विशेषतः।
#मूषिकोत्कीर्णं_जीर्णेन्न_कर्म_कुर्यान्हिचक्षणः।।
अर्थात् सिले हुऐ,जले हुऐ,विदेश में बुने हुऐ वस्त्रों से बुद्धिमान कोई यज्ञानुष्ठान न करें।
हिन्दू संस्कृति का आधार वेदादि धर्मशास्त्रोक्त वर्णाश्रमधर्म है,जातिव्यवस्था है।
ब्राह्मण तथा क्षत्रिय की सामाजिक स्वाधीनता में एक दूसरे का हस्तक्षेप नही है।वैश्य व शूद्र अपनी सामाजिक उलझनों को सुलझाने के लिए पूर्ण स्वतन्त्र हैं। शिल्पी,तैली,जुलाहे ये सभी अपने व्यवसाय के स्वयं स्वामी थे।एक कर्म कर के ही अपने जीवन की सारी आवश्यकताऐं पूर्ण हो जाती थी।आजकल की तरह खरीदी हुई डिग्रीज़(उपाधियाँ) हाथ में लेकर भटकने की आवश्यकता नही थी।
गाँधी जी ने कुटीर उद्योग को स्वराज्य व स्वावलम्बन का आधार बताया।गांधी की बताई यह कोई नई बात नहीं है।
सर्वप्रथम भगवान मनु ने #गृहशिल्प को सर्वश्रेष्ठ बताया है और यान्त्रिकता की निन्दा की है।--(द्रष्टव्य•मनुस्मृति११वां अध्याय)
क्योंकि यन्त्रों के अन्धाधुन्ध उपयोग से व्यक्ति मानवोचित गुणों से दूर हो जाता है।
हम जब भी गिरे हैं अपने ही प्रमाद के कारण गिरे हैं। हमारा प्रमाद ही विधर्मियों का बल है।
दसवीं शताब्दी में भारत की जातिव्यवस्था के विषय में अल्बेरूनी ने लिखा है---"हिन्दुओं की जातिपरायण धर्मिता का शिकार विदेशी जातियाँ होती है।वे उन्हें म्लेच्छ,दस्यु और अपवित्र समझते हैं।वे उनके साथ परस्पर खान-पान आदि का सम्बन्ध नहीं रखते।उनका विचार है कि ऐसा करने से हम भ्रष्ट हो जाऐंगे।"
क्रमशः•••••••

श्रीराम जय राम जय जय राम।
श्रीराम जय राम जय जय राम।।



*हिन्दू_संस्कृति_व_वर्णाश्रमधर्म*•••*भाग-२*

समस्त तथाकथित शिक्षाविदों,विचारकों,बुद्धिजीवियों व संस्कृत व संस्कृति से विद्वेष करने वाले महानुभावों के समक्ष एक प्रश्न निवेदित है;भारत में शिक्षा की वर्तमान स्थिति को देखते हुऐ यह प्रश्न बड़ा उपयुक्त व सामयिक है कि-
"शिक्षा,रक्षा,अर्थ,और सेवा के साधन वा प्रकल्प समाज के सभी व्यक्तियों को समानरूपेण समुपलब्ध हो सके ऐसी नीति वा विधा क्या है?"
समाज के हर वर्ग के व्यक्तियों का समुचित विकास जिससे हो सके ऐसी कोई नवीन विधा आपके पास हो तो बताएं।
मैकॅलीय एजुकेशन के शिकार बुद्धिपंगु इस प्रश्न का उत्तर नही दे सकते।
क्योंकि उनका मस्तिष्क खरीदा हुआ है मैकॅलीय एजुकेशन ने।
वास्तव में भारत में अभी शिक्षा नाम की कोई वस्तु नही है।चकित होने की आवश्यक्ता नही है एजुकेशन(Education) का अन्तर्भाव 'शिक्षा' में कभी नही हो सकता।
१७वीं शताब्दी जब में भारत के कालीकट में पुर्तगाली वास्कोडिगामा उतरा था उसके बाद ही मिशनरी टोलियां भारत में ईसाई धर्मप्रचार हेतु आने लगी थी।उनमे 'जैवियर' प्रमुख था जो गले में घण्टी बांधकर गली-गली घूमकर धर्मप्रचार करता था।आज भी इन म्लेच्छों का स्वभाव नही बदला है यत्र-तत्र सड़कों व गलियारों में पर्चे बांट-बांटकर सबको ईसाई बनाने की होड़ में लगे रहते हैं।

तो बुद्धिपंगुओ को तो विदित होगा नही कि शिक्षा,रक्षा,अर्थ और सेवा के समान और समुचित अवसर सुलभ करवाने वाली विधा वा व्यवस्था ही #वर्णाश्रमव्यवस्था है।
क्यों जी!भगवान का अवतरण कहां होता है?जैनियों॔ के यहां,बौद्धों के यहां,आर्यसमाजियों के यहां या विधर्मियों के यहां???
भगवान का अवतार केवल वर्णाश्रमियों के यहां होता है।

हमारा सिद्धान्त है कि बुद्धि सदैव सत्य का ही पक्षपात करती है हमारे सिद्धान्त को बौद्धों ने अपने शब्दों में निरूपित किया है-#सत्य_पक्षपातो_हि_स्वभावो_धियम्। म्लेच्छों में भी कुछ सत्य के पक्षधर हैं।
वर्णाश्रम विरोधियों को परिश्रम करना चाहिऐ,अध्ययन करना चाहिऐ #सिडनी_लाॅ ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "Vision Of India" में वर्णव्यवस्था की प्रशंसा में अपनी लेखनी तोड़ी है।
यदि आप संस्कृत के ज्ञाता नही है यदि आपने संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन नहीं किया है तो आप सनातन भारतीय सिद्धान्तों कैसे जान सकते हैं,तो फिर आप पुरातन भारतीय इतिहास को कैसे जान पायेंगे??
यदि ऐसा है तो आप किसी भी हिन्दु परम्परा व व्यवस्था पर अंगुली नही उठा सकते।

वर्णाश्रम के बिना आप तिलभर भी विकास के नाम पर राष्ट्र को खिसका के दिखाईऐ।
म्लेच्छों में सबसे पहले इस तथ्य को समझने वाले अंग्रेज ही थे।इसीलिए उन्होंने मुस्लिमों की तरह तलवार का सहारा न लेकर कूटनीति का सहारा लिया।उन्होनें देशभर में पुरातन भारतीय शिक्षा का उच्छेद करने हेतु अंग्रेजी शिक्षा का जाल बिछाया।
'विलियम जोन्स' ने मनुसंहिता का सर्वप्रथम अंग्रेजी में अनुवाद किया था जिसके बाद योरप में संस्कृत निबद्ध धर्मशास्त्रीय विधान को जानने के लिए क्रान्ति मच गई थी।इसके बाद 'काॅलब्रुक' ने भी विलियम जोन्स का ही अनुकरण किया।इसी समय फ्रान्स में एक बड़ा ही विद्वान व्यक्ति हुआ था जिसका नाम 'बर्नाफ' था।उसने 'जिन्द' और संस्कृत का तुलनात्मक अध्ययन कर दौनों के पारस्परिक सम्बन्ध पर एक भाषाशास्त्रीय मौलिक शोध किया।इसके पश्चात् बर्नाफ ने ॠग्वेद की व्याख्या की।इसने योरप में अपना चिरस्मरणीय प्रभाव छोड़ा है।बर्नाफ के शोधकार्यों ने योरप में अनुमानतः२५ वर्षों तक(१८२५-१८५२)तक बड़ा आन्दोलन उत्पन्न किया।
उपरोक्त भाषाविदों के बाद राॅथ व मैक्समूलर संस्कृत के बड़े पण्डित माने जाते हैं।
आप सोच रहे होंगे कि मैं इन सबकी चर्चा क्यूं कर रहा हूँ?
संस्कृत साहित्य को विकृत कर संस्कृत ग्रन्थों का भ्रामक अर्थ कर इनमें अनास्था उत्पन्न करने का जो कार्य इन पाश्चात्य षडयन्त्रकारियों ने किया है वह किसी ने नही किया।
मैक्समूलर जर्मनी का था किन्तु उसने जीवन भर इंग्लैंड के प्रति वफादारी निभाई। क्यों ?
"History Of Ancient Sanskrit Litrature" में मैक्समूलर लिखता है-"हिन्दू दार्शनिकों की जाति थी।किन्तु उनका संघर्ष विचारों का संघर्ष था उनका अतीत सृष्टि की समस्या था।उनका भविष्य अस्तित्व का प्रश्न था।इसलिऐ यह कहना न्यायोचित है कि विश्व के राजनैतिक इतिहास में भारत का कोई स्थान नही है।"

उसने महाभारत नही पढ़ा और सीधे वेद पर भाष्य लिखने का दुस्साहस करने चल पड़ा।यदि उसने महाभारत पढ़ना होता तो उसे ये ज्ञात होता कि विश्व के राजनैतिक इतिहास में हिन्दुओं का क्या योगदान है।

एक स्थान पर मैक्समूलर उगलता है कि-
"जिस देश ने(इंग्लैंड ने) मुझे इतना विशाल साहित्य पढने और समझने का अवसर प्राप्त करवाया है व भरपूर सम्मान व पद दिलवाया उसके प्रति निष्ठावान रहना मेरा नैतिक कर्त्तव्य है।इंग्लैड ने भारत पर अपने परिश्रम से भौतिक विजय प्राप्त की है उसकी जीत स्थिर रहनी चाहिऐ व इंग्लैंड की बौद्धिक हार यदि भारत से हुई तो उसकी भौतिक विजय निरर्थक सिद्ध होगी।"
अब आप को यह समझ आ जाना चाहिऐ कि मैक्समूलर आदि को इंग्लैंड ने भारत पर चिरशासन के लिए बौद्धिक अस्त्र के रूप में प्रयुक्त किया।
मुझे कई ऐसे तथाकथित शिक्षाविद् व संस्कृतज्ञ मिलते हैं जो स्वयं को बडा भारी पण्डित मानकर मैकाले और मैक्समूलर के गुणों का गान करते हैं और भारत में इनको शिक्षा का पुरोधा मानते हैं।
यह एजुकेशन नामक रोग से कितने ग्रस्त हैं यह पहली दृष्टि में ही ज्ञात हो जाता है।
यदि इनसे पूछा जाऐ कि वैदेशिक आक्रमणों से पूर्व भारत इतना सम्पन्न व विद्यायुक्त क्यूं था विश्वगुरु क्यूं था तो इनकी वाणी सहसा अवरुद्ध हो जाती है।
विश्व को #शून्य देकर गणित के क्षेत्र में महाक्रान्ति उत्पन्न करने वाले कौन थे जी?
वो वर्णाश्रमी सनातनी हिन्दू थे या नही?
यदि वर्णाश्रम नही होता सब संकर हो जाता म्लेच्छों की तरह तो सारी दिव्यता रह पाती क्या?

'मार्कोपोलो' ने कहा है-" हिन्दुओं की मेधाशक्ति अद्भुत् होती है।ब्राह्मण संसार के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति होते हैं।उनकी सत्यनिष्ठा अविस्मरणीय होती है।पृथ्वी की किसी भी वस्तु के लिए वह झूठ नही बोलते।"
अब मुगलों को भी देख लेते हैं।१६वीं शताब्दी में अकबर के वज़ीर 'अबुफज़ल' ने 'आईनेअकबरी' में क्या लिखा देखिए उसकी लेखनी को-
"हिन्दू लोग धार्मिक,सहनशील,नम्र,प्रसन्नमन,न्यायप्रिय,त्यागी,व्यवहारवाद,सत्यनिष्ठ एवं महावीर महापराक्रमी होते हैं क्षत्रियों को तो ये भी पता नही है कि युद्धभूमि से भागना किसे कहते हैं।"
विकट प्रहारों के सन्मुख वज्रवत स्थित हिन्दू संस्कृति की अजरता-अमरता का कारण है वर्णाश्रम-व्यवस्था।हिन्दुत्व का पोषण किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा नही हुआ है।यह समूचे बृहद् भारत का श्रम था।
क्रमशः••••

श्रीराम जय राम जय जय राम।
श्री राम जय राम जय जय राम।।




#हिन्दूसंस्कृति_तथा_वर्णाश्रमधर्म #भाग-३

संस्कृति ही हमारे विवेक की संचालिका शक्ति होती है जो सच्चाई और अच्छाई का बोध करवा कर उत्तरोत्तर हमें उन्नति के पथ पर ले जाती है।संस्कृति की एक संश्लिष्ट विशेषता होती है जो कभी न्यून नही होती।संस्कृति की परिधि देश और काल में बन्धती नहीं है।
देववाणी संस्कृत में प्राचीन भारत का समग्र साहित्य निबद्ध हुआ है।भारत के इतिहास मे योजनाबद्ध ढंग से धांधली कर वास्तविक इतिहास को लुप्त कर दिया गया है।तथाकथित इतिहासकारों ने भारत के इतिहास में ऐसी सेंध मारी है कि सत्यासत्य का निर्णय कठिनता से होता है।यह धांधली योरप के नास्तिकवाद और मिथ्याविज्ञानवाद के कारण हुई है।इसके मूल में यहूदी,ईसाई और इस्लाम की मिथ्यायुक्तियुक्त जीवन मीमांसा स्पष्टतया प्रतीत होती है।
जब भारत मुस्लिम शासन के अधीन था तब भारत के इस्लामीकरण के लिए मुस्लिम शासकों ने भारत के प्राचीन ग्रन्थों को जलाने का यथासंभव प्रयास किया और मदरसों की स्थापना कर ईस्लामिक शिक्षा बलात् चलाई।
ग्रन्थ लिखने वालों को राज्य का प्रोत्साहन और शान्त वातावरण न मिला इस्लामिक कट्टरवाद और प्रभुत्त्व जमाने के लिए सात सौ वर्षों तक प्रयास जारी रहा और आर्य हिन्दू जाति #वर्णाश्रम और #सनातन_संस्कृति को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगाती रही।

पश्चात् अंग्रेजी राज्य आया।अंग्रजों ने कूटनीतिपूर्वक काम लिया व भारतीय शिक्षा को विनष्ट करने की षडयन्त्र बनाया। पुरातन भारतीय शिक्षा को विकृत व ध्वस्त किया गया।मैकाले इसका कर्णधार है।
भारत के तथाकथित शिक्षाविद्,प्रिंसीपल्स,प्रोफेसर्स,लेक्चरर्स, अध्यापक और इण्डोलाॅजिस्ट्स मैकाले व ईसाई मिशनरीज़ का यह कूटनीतिक षड्यन्त्र स्कूलों व काॅलेजों में क्यूं नही बताते?
यह षडयन्त्र क्यों उजागर नही करते?
नौकरी चली जावेगी क्या?
बताऐं तो तब जब उन्हें कुछ ज्ञात हो,जब उनका अपना कोई अनुसंधान या परिश्रम हो;पाश्चात्यों का उगला चाटना जैसे उनका स्वभाव बन गया है।
मैकाले की नाजायज सन्तानों को तो केवल पेट और परिवार से आसक्ति है राष्ट्र जाऐ भाड़ में।
मैकाले,मैक्समूलर,विन्टरनिट्ज,कीथ,वेबर,जाॅली तथा वामपंथियों इत्यादियों ने जो उगला है वही वर्षों से पढ़ाया जा रहा है।
कूटनीतिक षडयन्त्र के माध्यम से अंग्रेजों ने भारत के वास्तविक इतिहास व साहित्य को लुप्त व विकृत कर अपने अनुरूप करने का बीड़ा उठाया।गुरूकुलों को तुडवाकर अंग्रेजों ने कान्वेंट्स और कालेजों की स्थापना कर संस्कृत ग्रन्थों को अंग्रेजी मे अनूदित कर ब्रिटिश परिवर्तित विषयों को पढ़ाया जाने लगा तो भारतीय बालकों की मानसिकता बदलने लगी आर्यों की सन्तान योरोपियन सभ्यता की गुलाम बनने लगी।
वे अंग्रेजी साहित्य,कला तथा मिथ्या विज्ञान का प्रचार कर भारतीय ज्ञान-विज्ञान को अयुक्तियुक्त और निष्क्रिय सिद्ध करते रहे और #वर्णव्यवस्था की मान्यताओं को निरर्थक और हानिकारक बताते रहे तथा इतिहास के विषय में ऐसी धारणाएं उत्पन्न करने लगे जिससे हिन्दू जनता में यह सिद्ध हो सके आर्य हिन्दूजाति सप्तसिन्धु की मूल निवासी नही अपितु बाहर से यहाँ आई है।
वेदों को गडरियों का गीत तथा वर्णाश्रम को व्यर्थ बतलाकर वैदिक साहित्य को ईसा से मात्र दो-तीन सहस्र वर्ष प्राचीन बताया।
ईसाई पादरियों को संस्कृत सीखने और संस्कृत ग्रन्थों को अनूदित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी????

सोचिए•••••!!सोचने में क्या जाता है जी;जितना सोच सकते हो उससे भी उपर तक सोचिऐ।

ईसाई पादरियों ने संस्कृत का अध्ययन ही इस उद्देश्य से किया कि भारत में ईसाई मत का प्रचार कर सकें।
ताकि भारतीय जनता को ईसाईयों मे परिवर्तित कर दिया जाऐ।पारम्परिक रीति से गुरुशिष्य परम्परा से विद्या ग्रहण करने से म्लेच्छों की किसी भी कूटनीति पर पानी फिर सकता है अतः गुरुकुलीय प्रणाली को ध्वस्त कर अंग्रेजों का मार्ग साफ हो सकता था।
हम इस बात को तथ्यात्मक रीति से प्रमाणित करेंगे ध्यानपूर्वक पढ़िऐगा-
ईसाई मिशनरीज़ पादरियों ने संस्कृत ग्रन्थों के वास्तविक अर्थ को विकृत करने लिए ही संस्कृत का अध्ययन किया ताकि वह भारत को इसाई मत में ढाल कर इतने सुसमृद्ध राष्ट्र को चिरकाल तक शासन कर लूट कर खोखला कर डालें।
इसके लिए इंग्लैंड मैं 'संस्कृत-अंग्रेजी' शब्दकोष लिखने का बृहत्प्रयास किया गया।इस प्रयास के
विषय में 'मोवियर विलियम' शब्दकोष के Preface (प्राक्कथन) में लिखता है-
'I must draw attention to the fact that I'm only the second occupant of the Bodden chair and that its founder.Colonel that the special object of his munificent bequest was to promote the translation of the scriptures into #Sanskrit.
So as to enable his country men to proceed in this convention of the natures of India of the #Christion_religion.----(Sanskrit English Dictionary by Monier Williom preface)
"अर्थात् मैं यह बतलाना चाहता हूँ कि बाॅडन आसन्दी(Chair)पर बैठने वाला मैं दूसरा व्यक्ति हूँ। यह कर्नल बाॅडन ने स्थापित की थी।उन्होनें अपनी वसीयत में स्पष्ट लिखा है कि इस चेयर को स्थापित करने का उद्देश्य यह है कि #बाईबल का #संस्कृत में अनुवाद किया जाऐ ताकि हिन्दुस्थानियों को ईसाइयत में ढाला जाऐ।"

परन्तु मित्रों योरप में कुछ ऐसे भी व्यक्ति हुऐ हैं जो सत्य के पक्षधर हुऐ हैं हम इस विषय पर समासविधि से तुलनात्मक विश्लेषण(Comparative Analysis)करेंगे।
#शाॅपेनहावर जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिक हुऐ हैं उन्होनें उपनिषद् के विषय में लिखा है-
"It is the most satisfying and elevating reading which is possible in the world; it has been the solace of my life and will be the solace of my death.
"अर्थात् उपनिषद् सर्वोच्च मानव बुद्धि की उपज है।इसमें महामानवीय विचार है।संसार में संभावित यह सबसे सन्तोषप्रद और उन्नत कर देने वाला पाठ है।यह मेरे जीवन के लिए आश्वासन रहा है और मृत्यु के समय आश्रय देगा।"
इसी प्रकार के एक ओर योरोपीय विद्वान् को उद्धृत करते हैं।-
एक फ्रैंच दार्शनिक हुऐ हैं '#लूई_जैकोलियट' भारत के विषय में उनके विचार क्या है समाहितचित्त होकर पढिऐगा-
"हे प्राचीन भूमि भारत!मानवमात्र का जन्मस्थान! तेरी जय हो।जिसको नृशंस शताब्दियों के आक्रमणों ने विस्मृति की धूल के नीचे दबाया है तेरी जय हो!श्रद्धा,प्रेम,काव्य और विज्ञान की पितृभूमि तेरी जय हो!
क्या कभी ऐसा दिन भी आऐगा जब हम अपने पाश्चात्य देशों में तेरे अतीत काल की सी उन्नति देखेंगे।"

इसके अतिरिक्त 'हम्बोल्ट' ने भी भारत की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है।समयाभाव के कारण केवल नामोल्लेख कर रहे हैं।
इस तरह कुछ सत्याकांक्षी योरोपीय स्काॅलर्स जब भारत के ज्ञान-विज्ञान की प्रशंसा करने लगे तो ईसाई पादरी जल भुन गऐ और उन्हें गरियाने लगे।
ईसाई पादरियों की गालियों का एकाध नमूना देखिऐ-

शोपेनहावर के विषय में ईसाई पादरी 'विन्टरनिट्ज' जल भुन कर लिखता है-
"Yet l believe It's a wild exaggeration when Schopan Harper says that the thoughts of the Upanishads the fruit of the highest human knowledge and wisdom."
"अर्थात् मेरा मानना है कि शोपेनहावर का उपनिषद् के विषय में कथन अतिश्योक्ति है।"

इसी प्रकार 'मैक्समूलर' ईर्ष्या के वशीभूत जल भुन कर 'लूई जैकोलियट' के विषय में लिखता है
"#जैकोलियट_किसी_ब्राह्मण_के_धोखे_में_आ_गया_है।"

क्रमशः••••••••••••

श्रीराम जय राम जय जय राम।
श्रीराम जय राम जय जय राम।।

#हिन्दू_संस्कृति_तथा_वर्णाश्रमधर्म•••भाग-४ ✍

मित्रों उपरोक्त आलेख श्रृंखला के तीन भागों में आपने पढ़ा कि यहूदि,ईसाई और मुस्लिम शासकों ने भारतीय इतिहास के विकृतिकरण द्वारा किस तरह 'सनातन वैदिक आर्य हिन्दू संस्कृति' के मेरूदण्ड #वर्णाश्रम के प्रति तथा पुरातन भारतीय शिक्षा के प्रति भारतीयों के मन में अनास्था उत्पन्न करवाई तथा उसमें वह कितने सफल हुए हैं।
एतदतिरिक्त वर्णाश्रम के विषय में कुछ तथाकथित योरोपीय समालोचकों तथा उनके भारतीय अनुयायियों(Indologists) के विचार भी आपने पढ़े।
वर्णाश्रम के विषय में भारतीय महापुरुषों के विचारों को आलेख के अन्तिम भाग में उपस्थापित करेंगें।
वर्णाश्रम-व्यवस्था के विषय में जितना कुछ मेरी बुद्धि में है उसका यथार्थतः वर्णन करना यहाँ अशक्य है।
यथाशीघ्र ही भविष्य में 'वर्णाश्रम के शास्त्रीय व वैज्ञानिक पक्ष' पर अपने विचारों को पुस्तक का आकार दूँगा।

भारतीय इतिहास के विकृतिकरण और असत्य व तथ्यहीन इतिहास के प्रचार के पीछे मुस्लिमों व अंग्रेजों के कुछ राजनीतिक उद्देश्य थे।सर्वप्रथम उन्होनें भारतीय शिक्षा पर आघात किया।और भारत के ही कुछ बुद्धिपंगुओं को अपने एजेन्ट्स बनाकर अपने कार्य को अत्यन्त सरल कर दिया।
इतिहास के लेखन में #मैकडोनाल्ड आदि का नाम उल्लेखनीय है।उसने लिखा है कि ,"भारतीयों को इतिहास लिखना नही आता है इसलिऐ इतिहास जानने के लिऐ शिलालेखों और पुराने खण्डहरों पर लिखे लेखों से अनुमान लगाने पड़ते हैं।"
भारतीयों का इतिहास रामायण,महाभारत और पुराणों में है।यदि उस महामूर्ख को यह ज्ञात होता तो वह ऐसा न लिखता।
इतिहास जानने का एक क्रम होता है जो उपरोक्त ग्रन्थों में यथाविधि है।इसी को ऐतिहासिक कालानुक्रम(Historic and Chronological Sequence) कहते हैं।

ये तथाकथित इतिहासज्ञ अंग्रेजी सरकार के वेतनधारी प्रोफेसर्स थे।आज भी भारत में इन्हीं पाश्चात्य लेखकों के निष्कर्षों से प्रभावित व ब्रिटिश सरकार से सुनियोजित मिथ्या इतिहास को पढ़ाया जा रहा है और भारत की अदूरदर्शी सत्तालोलुप सरकारें विपुल धन व्यय करके उसका प्रचार-प्रसार कर रही है।
इस अत्यन्त अव्यावहारिक व अवैज्ञानिक शिक्षा का परिणाम यह हो रहा है कि भारतीयों को 'शेक्सपीयर' और 'जाॅन मिल्टन' तो प्रिय हैं किन्तु 'वाल्मीकि और 'व्यास' से उनका परिचय नहीं है।
पुरातन भारतीय शिक्षा में भारतीय बालक-बालिकाओं को वर्णाश्रम की साङ्गोपाङ्ग शिक्षा दी जाती थी इसी कारण भारत विश्वगुरू था,यहां शत-प्रतिशत जनता सुशिक्षित,सुरक्षित,सुसंस्कृत व सेवापरायण थी।ये वर्णाश्रम का चमत्कार था।

वर्णाश्रम के बिना भारत को पुनः विश्वगुरू बनाना तो क्या परन्तु विकास के नाम पर तिल भर भी खिसका के दिखाईऐ।
मैं चुनौती देता हूँ अंग्रेजी में बोलें तो Challenge करता हूँ उन इण्डोलाॅजिस्ट्स,इतिहासज्ञों व बुद्धिजीवियों को जो वर्णाश्रम को व्यर्थ बताते हैं कि वो शास्त्रीय,व्यावहारिक और वैज्ञानिक आधार पर 'वर्णाश्रम' की अनुपयोगिता सिद्ध करके दिखाऐं।

विध्वंसकारी मैकलीय ऐडुकेशन ने भारतीयों को काले अंग्रेजों के तीन वर्गों में विभाजित कर दिया है-
एक वह जो ईसाई मिशनरियों के काॅन्वेट्स में पढ़ते हैं वह भारत में पैदा होकर व रहकर भी वह इस एडुकेशन से स्वयमेव अंग्रेज हो जाते हैं।
दूसरे श्रेणी में वे काले अंग्रेज हैं जो सामान्य सरकारी अथवा निजी स्कूल-कालेजों में पढ़ते हैं।इनके नाॅलेज में राम व कृष्ण तो हैं परन्तु सत्यता से ये सुदूर हैं।सत्यता के अभाव में उनको यह वाक्य "lndia's Policy of Non-alignment is rational " अधिक मधुर प्रतीत होता है और "भारत की नीति व व्यवस्था निष्पक्ष है" यह कहना कठोर प्रतीत होता है।
तृतीय श्रेणी के वे काले अंग्रेज हैं जो यूनिवर्सिटीज़ और सरकारी शिक्षा विभाग से सम्बद्ध हैं।ये भारतीय परम्पराओं से परिचित तो हैं उनसे प्रीति भी रखते हैं परन्तु ये सद्शिक्षा के अभाव से असन्तुष्ट हैं तथा शिक्षा को सुधारने का कोई उचित उपाय इनके पास नही हैं।चूंकि सारे उपक्रम व साधन प्रथम व द्वितीय श्रेणी के काले अंग्रेजों के हाथों में अतः तृतीय श्रेणी के अंग्रेज उनके 'पिछलग्गू' हो जाते हैं।

इंग्लैंड के प्राचीन निवासी जाहिल व अनपढ़ थे वहाँ के इतिहास की खोज का ढंग वह नही हो सकता था जो भारत का होना चाहिऐ था।शिक्षा,ज्ञान व विज्ञान की भूमि भारत है इंग्लैड या कोई अन्य देश नहीं। भारतीय इतिहास के मुख्य स्रोत रामायण,महाभारत,ब्राह्मण ग्रन्थ,पुराण तथा अन्य ग्रन्थ हैं। इसके बाद लोक गाथाऐं आती हैं।

पाश्चात्य लेखकों के अनर्गल प्रलाप का एक उदाहरण देखिऐ-
'मेगस्थनीज यूनान का रहने वाला था।वह सम्भवतः दो सहस्र वर्ष पूर्व भारत आया था।ऐसा उल्लेख है कि उसकी पुस्तक के कुछ पन्ने कटे हुऐ मिले हैं।इन पन्नों में एक स्थान पर लिखा हुआ है कि मेगस्थनीज सेल्यूकस का राजदूत था तथा सेण्ड्राकोट्स के दरबार में रहा जहां उसने यह विलुप्त पुस्तक लिखी।'
इस वक्तव्य को एक अंग्रेज समालोचक ने इस तरह विकृत करके लिखा कि " मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त की राजधानी पाटलिपुत्र आकर रहा था।'
वह सैण्ड्राकोट्स को चन्द्रगुप्त तथा सैण्ड्राकोट्स की राजधानी पालिब्रोवा को पाटलिपुत्र का अपभ्रंश मानता है।
यह अंग्रेज था 'विलियम जाॅन्स'।
विलियम जाॅन्स,मैक्समूलर,विन्टरनीट्ज इत्यादि म्लेच्छों की सुनियोजित कूटनीतिक व भ्रममूलक लेखों कारण ही भारतीय इतिहास का विकृतिकरण हुआ है।

हमारी असंख्य प्राचीन व प्रामाणिक पुस्तकें बौद्ध और मुस्लिम शासकों की मूर्खता के कारण विलुप्त हो गई हैं।
यहूदियों,ईसाईयों और मुस्लिमों के भारत की संस्कृति को नष्ट करने के प्रयास का एक कारण यह भी था कि उन्हें ईसा,मूसा और अल्लाह से उपर किसी को देखना पसन्द नहीं था।
बाइबिल में जो सृष्ट्युत्पत्ति का सिद्धान्त है वह नितान्त असत्य है।विश्व स्तर पर यह तथ्य उजागर हो चुका है।ईसाई पादरियों को यह बात कैसे सहन हो सकती थी।
यहाँ पूरा विश्व सनातनियों के सृष्ट्युत्पत्ति विषयक 'पुरुषसूक्त' तथा 'नासदीयसूक्त' पर मोहित है।

क्रमशः••••••

श्रीराम जय राम जय जय राम।


नमोऽस्तु रामाय सलक्ष्मणाय देव्यै च तस्यै जनकात्मजायै।
नमोऽस्तु रूद्रेन्द्रयमानिलेभ्यो नमोऽस्तु चन्द्रार्कमरुद्गणेभ्यः।।

इस आलेख श्रृङ्खला के पूर्व वर्णित चार भागों में अंग्रेजों और यवनों की दुरभिसन्धिपूर्ण कूटनीति का वर्णन किया गया तथा तथाकथित योरोपीय समालोचकों के वर्णाश्रम के विषय में वक्तव्य भी वर्णित किए गऐ।
इस आलेख श्रृङ्खला के इस अन्तिम भाग में वर्णाश्रम का शास्त्रीय पक्ष उपस्थापित किया जाऐगा अतः इस आलेख को सम्यकरूपेण समझने हेतु पूर्वलिखित चार भागों का आलोडन अपेक्षित है~>
भाग•१ https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=468872380722383&id=100027988751045
भाग•२ https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=471521560457465&id=100027988751045
भाग•३ https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=481856582757296&id=100027988751045
भाग•४ https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=500054737604147&id=100027988751045

*वर्णाश्रम-व्यवस्था* हिन्दूधर्म का #मेरूदण्ड है।वर्णाश्रम राष्ट्र की सर्वोत्कृष्ट उन्नति व भगवत्प्राप्ति में परमसाधन तो है ही वरन् यह हिन्दुओं का सुदृढ़ #रक्षाकवच भी है।मुस्लिम आक्रान्ताओं के समय वर्तमान पाकिस्तान और बांग्लादेश के स्थल बौद्ध बाहुल्य क्षेत्र थे जो बड़ी सरलता से तलवार की नौक पर धर्मान्तरित कर मुस्लिम बना दिए गऐ।क्योंकि बौद्धों में वर्णाश्रम का तिरस्कार होता है।किन्तु जहाँ वर्णाश्रम था वहाँ अनेकों अन्याय,अत्याचार,भय-लोभ,जजिया कर लगाने पर भी सनातनी हिन्दू बने रहे।हजारों वर्षों की परतन्त्रता के पश्चात् भी यदि हम *सनातनी वैदिक हिन्दू* हैं तो यह वर्णाश्रम का चमत्कार है।
"रोटी-बेटी" की मर्यादा रक्तशुद्धि का आधार है।रक्तशुद्धिमूलक वर्णाश्रम-व्यवस्था के आधार पर ही "श्रौतस्मार्त" धर्मानुष्ठान व व्यवहार(विगतःअवहारःधर्मस्य येन स व्यवहारः) सम्भव होते हैं।
यमनियमों से युक्त वर्णाश्रमाचार "स्मार्तधर्म" कहलाता है। सप्तर्षियों ने पूर्ववर्ती ॠषियों से श्रौतस्मार्तधर्म का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् उसका उपदेश किया था।-"स्मार्तोवर्णाश्रमाचारोयमैश्चनियमैर्युतः।पूर्वेभ्यो वेदयित्वेह श्रौतं सप्तर्षयोऽब्रवीत्।।"-मत्स्यपुराणम्।
दारसम्बन्ध(विवाह),अग्निहोत्र और यज्ञ ये श्रौतधर्म के लक्षण हैं- "दराग्निहोत्रसम्बन्धमिज्याश्रौतस्यलक्षणम्।।"
वैदिकवाङ्मय के निरभ्राकाश में यत्र-तत्र-सर्वत्र वर्णाश्रम का विशदविवेचन हुआ है।विशेषतया स्मृतियाँ और धर्मसूत्र इसके सत्यप्रतीक हैं।वैदिक वाङ्मय में सभी धर्म वर्णाश्रमविभागपूर्वक उपदिष्ट हुऐ हैं~>
"सर्वेधर्माःसमुदिष्टाःवर्णाश्रमविभागतः।।"~जैमिनीयाश्वमेध।

हिमालय से लेकर दक्षिण समुद्र तक की वर्णाश्रमधर्म से विशिष्ट कर्मभूमि ही भारत है और वहाँ "वर्णाश्रमवती" भारतीय प्रजा निवास करती है।~>
"तं भगवान्नारदो "वर्णाश्रमवतीभिर्भारतीभिर्प्रजाभिर्भगवत्प्रोक्ताभ्याम्सांख्ययोगाभ्याम्भगवदनुभावोपवर्णनंसावर्णेरूपदेक्ष्यमाणपरमभक्तिभावेनोपसरतीदम्चाभिगृणाति।।"~श्रीमद्भागवतमहापुराणम्(५/१९/११)।

"उत्तरम्यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्तति।।"~विष्णुपुराणम्(२/३/१)।

जम्बूद्वीप में भारतवर्ष ही श्रेष्ठ है क्योंकि भारतवर्ष में ही वर्णाश्रम का विधान है अन्यत्र नही।इससे जो अन्यत्र भूमियाँ हैं वे सब भोगभूमियाँ हैं।~
"अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महामुने।
यतो हि कर्मभूमिरेषा ह्यतोऽन्या भोगभूमयः।।~विष्णुपुराणम्(२/३/२२)।

यहीं(भारतवर्ष में)सृष्टि,स्वर्ग और मोक्ष कहा गया है।यहाँ से अन्यत्र मर्त्यलोक की भूमि में कर्म(वर्णाश्रमाचार) का विधान नही है।~
"इतःस्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यश्चान्तश्च लभ्यते।
न खल्वन्यत्र मर्त्यानां भूमौ कर्म विधीयते।।~विष्णुपुराणम्(२/३/५)।

"वर्णाश्रम-व्यवस्था" जहाँ नहीं होती वह #म्लेच्छदेश कहलाता है।आर्यावर्त उससे भिन्न है।~>
"चातुर्वर्ण्यव्यवस्थानं यस्मिन् देशे न विद्यते।
म्लेच्छदेशः स विज्ञेय आर्यावर्तस्ततःपरः।।~विष्णुस्मृतौ(८४/४)।

कालक्रम से जो क्षत्रिय स्वधर्म से विमुख होकर अन्यान्य देशों में जाने से वर्णाश्रमविहीन होने से तथा वर्णाश्रमोपदेष्टा ब्राह्मणों की कृपादृष्टि से वञ्चित् होने के कारण वहीं जाकर बस गए वे #वृषल या म्लेच्छ कहलाऐ।
"शनकैस्तुक्रियालोपादिमा क्षत्रियजातयः।
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च।।"(मनु•१०/४३)
भगवान् मनु के इस कथन पर श्रीकुल्लुकभट्टकृतमन्वर्थमुक्तावली व्याख्या देखिऐ~
"इमा वक्ष्यमाणाः क्षत्रियजातयः उपनयनादिक्रियालोपेन ब्राह्मणानां च याजनाऽध्यापनप्रायश्चित्ताद्यर्थदर्शनाभावेन शनैर्शनैर्लोके शूद्रतां प्राप्ता।"
अब श्रीमेधातिथि का 'मनुभाष्य' भी देखिऐ~
"क्रियालोपे यत्र संस्कारतया संबध्यते,यश्चोपनयनादिषु;यत्र वा कर्तृतया,यथा नित्याग्निहोत्रसन्धयोपासनादिषु।तासां लोप उभयास मप्यननुष्ठानम्।अतश्च न केवलमुपनयनसंस्कारभावेन जातिभ्रंशः,अपि तूपनीतानां विहितक्रियात्यागेनापि।"

भगवान् मनु का कथन है कि यद्यपि पौण्ड्र,चौल,द्राविड़,कम्बोज,यवन,शक,पारद,पह्लव,खश,चीनी,किरातादि जातियाँ पहिले क्षत्रिय ही थी किन्तु विदेशों में ब्राह्मणों का अदर्शन होने से भारत से द्वीपान्तर गई सूर्यवंशी,चन्द्रवंशी क्षत्रियजातियाँ ही क्रियालोप(वर्णाश्रमाचारहीन) होने से म्लेच्छता,दस्युता वा वृषलता को प्राप्त हुईं। ~>
"पौण्ड्रकाश्चौलद्राविड़ा काम्बोजा यवनाःशकाः।
पारदापह्लवाश्चीनाःकिराताःदरदा खशाः।।
शनकैस्तुक्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः।
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनात्।।"~मनु•।

भगवान् वेदव्यास भी महाभारत में यही कहते हैं~
"शकायवनकाम्बोजास्तास्ताः क्षत्रियजातयः।
वृषलत्वं परिगता ब्राह्मणानामदर्शनात्।।"~महा•अनु•३३/२१

"किरातयवनाश्चैव तास्ताःक्षत्रियजातयः।
वृषलत्वमनुप्राप्ता ब्राह्मणानामदर्शनात्।।~महा•अनु•३४/१८
(वृषलशब्दनिर्वचनेन मिथ्यादर्शी निन्द्यते।कामान् वर्षतीति वृषः,वृषशब्देन धर्मेवाऽभिधीयतेति।अलं शब्दो वारणार्थः।अतः धर्मस्य यः वारणं करोति तं देवा वृषलं जानन्ति, धर्मोच्छेदकः इत्यर्थः।)

वर्ण चार है ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य व शूद्र।
और आश्रम भी चार हैं ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ व सन्यास।
चारो वर्णों में पहिले तीन वर्ण अर्थात् ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य द्विजातीय हैं।अर्थात् जिनका दो बार जन्म होता है पहिला माता पिता से तथा दूसरा मौञ्जीबन्धन संस्कार से।उपनयन के समय माता सावित्री तथा संस्कार करने वाला गुरू पिता कहलाता है।

"ब्राह्मणःक्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्चेति वर्णाश्चत्वारः।"
के पुनस्ते आश्रमाः-
"ब्रह्मचारी गृहस्थो भिक्षु वैखानसः।"
"चत्वार आश्रमा गार्हस्थ्यमाचार्यकुलंमौनं वानप्रस्थ्यमिति।"
ब्राह्मण के धर्म~>
"अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा।
दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्।।"

"ब्राह्मणस्याध्यापनम्।"

"स्वधर्मो ब्राह्मणस्याध्ययनमध्यापनं यजनं याजनं दानं प्रतिग्रहश्चेति।।"

"ब्राह्मणस्ययाजनप्रतिग्रहौ।।"

अध्यापन,अध्ययन,यजन,याजन,दान और प्रतिग्रह यह ब्राह्मण के धर्म हैं।
आपत्तिकाल में ब्राह्मण क्षत्रियवृत्ति से वा वैश्यवृत्ति से जीवनयापन कर लेवें किन्तु शूद्रवृत्ति से कदापि जीविका न चलाऐं।
"अजीवंस्तु यथोक्तेन ब्राह्मणः स्वेन कर्मणा।
जीवेत् क्षत्रियधर्मेण स ह्यस्य प्रत्यनन्तरः।।
उभाभ्यामप्यजीवंस्तु कथं स्यादिति चेद् भवेत्।
कृषिगोरक्ष्यमास्थाय जीवेद्वैश्यस्य जीविकाम्।।
सत्यानृतं तु वाणिज्यं तेन चैवापि जीव्यते।
सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत्।।"

ब्राह्मण ऋत,अमृत,मृत,प्रमृत या सत्यानृत से अपना जीवन बिताऐ;किन्तु श्ववृत्ति अर्थात् सेवावृत्ति न करें।उञ्छ और शील को 'ऋत'कहते हैं।बिना याचना जो प्राप्त हो वह 'अमृत' है।याचना करने पर जो मिले वह 'मृत' है।तथा कृषिगोरक्ष्यवाणिज्य को 'सत्यानृत' कहते हैं।

क्षत्रिय के धर्म~>
"प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च।
विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः।।"

"शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्य युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।"

"क्षत्रियस्य शास्त्रनित्यता।"

"क्षत्रियस्याध्ययनं यजनं दानं शस्त्राजीवो भूतरक्षणं च।"

"क्षत्रियस्यक्षितित्राणात्।।"

प्रजारक्षण,धर्मयुद्ध,अध्ययन,यजन,दान देना समासतः ये क्षत्रियों के धर्म हैं।
क्षत्रिय आपत्तिकाल में वैश्यवृत्ति से जीविका चला सकता है;किन्तु ब्राह्मणवृत्ति से जीविका की अभिलाषा कभी न करे।
"जीवदेतेन राजन्यःसर्वेणामप्यनयं गतः।
न त्वेव ज्यायसीं वृत्तिमभिमन्येत कर्हिचित्।।

वैश्य के धर्म~>
"पशूना रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च।
वाणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च।।"

"कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्मस्वभावजम्।"

"वैश्यस्याध्ययनं यजनं दानं कृषिपाशुपाल्ये वाणिज्या च।"

"कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यकुसीदयोनिपोषणानि वैश्यस्य।।"

कृषि,गौपालन,पशुपालन,अध्ययन,दान देना,यज्ञ करना और वाणिज्य यह वैश्य के धर्म हैं।
वैश्य आपत्तिकाल में क्षत्रियवृत्ति से निर्वाह कर लें अथवा शूद्रवृत्ति का आलम्बन ले लें परन्तु समर्थ होने पर शूद्रवृत्ति को छोड़ दें।भगवान् मनु का कथन है-
"वैश्योऽजीवन् स्वधर्मेण शूद्रवृत्यापि वर्तयेत्।
अनाचरन्नकार्याणि निवर्तेत् च शक्तिमान्।।"

शूद्र के धर्म~>
"एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्मः समादिशत्।
एतेषामेव वर्णानां शूश्रूषामनसूयया।।

"परिचर्यात्मक कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।।"

"शूद्रस्य द्विजाति शुश्रूषा वार्ता कारकुशीलवकर्म।।"

"शूद्रस्य सर्वशिल्पानि।।"

द्विजातियों की सेवा, शिल्प व कारीगरी यह शूद्र के धर्म हैं।
आपत्तिकाल में शूद्र शिल्पवृत्ति,करागरी से जीविका चला ले परन्तु ब्राह्मण का कर्म करके कदापि जीवन यापन न करें।
"अशक्नुवंस्तु शुश्रूषां शूद्रःकर्तुं द्विजन्मनाम्।
पुत्रदारात्ययं प्राप्तो जीवेत् कारुकर्मभिः।।

इस प्रकार चारों वर्णों के सनातन धर्मों का संक्षेप से वर्णन किया गया और आपद्धर्मों का भी।

सभी वर्णों को विहित है कि स्व-स्व वर्ण और आश्रम में रहते हुऐ तदाधारित शास्त्रोक्त कर्मों का अनुष्ठान करें,आचरण करे वर्णाश्रमाचार बाह्य कृत्य कदापि न करें वर्णसंकरता तथा कर्मसंकरता न होना दें;बस यही वर्णाश्रमाचार है,यही वर्णाश्रम-व्यवस्था है।

देवता भी वर्णाश्रमविशिष्ट भारतभूमि की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुऐ गाते हैं ~>
"गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पद मार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषा सुरत्वात्।।"

वेदों में वर्णाश्रमाचार को ही प्रथम कहा गया है। वर्णाश्रमाचार से धर्म की उत्पत्ति
श्रीराम जय राम जय जय राम।।


*आइए वर्ण एवं जातिव्यवस्था के विज्ञान को समझने का प्रयास करें !*

देखिए इस संसार में कई प्रकार के जीव धरती पर रहते है उदाहरण के लिए पेड़ , पौधे , पशु , पक्षी , जलचर , एवं मनुष्य इत्यादि , अब देखें , पेड़ कहने से सभी पेड़ आम नही होते , पौधा कहने से प्रत्येक पौधा तुलसी नही होता , पशु कहने से प्रत्येक पशु सिंह नही होता , पक्षी कहने से हजारो प्रकार के पक्षी होने का बोध होता है न कि केवल तोता या कबूतर - ठीक उसी प्रकार मनुष्य कहने से प्रत्येक मनुष्य ब्राह्मण या क्षत्रिय नही होता अपितु मनुष्य कहने से भिन्न – भिन्न प्रकार के मनुष्य का होना समझा जाता है l
आपने निश्चित ही आम तो खाया ही होगा ...अब प्रश्न यह है कि खाया तो कौन सा आम खाया , तोतापरी , हापूस , लंगड़ा , बादाम या दशहरी , मतलब ? जाति के बाद प्रजाति गेंहू जाति है और लोकवन , शरबती , प्रजाति , चावल मे चावल जाति है और बासमती , कालीमूंछ प्रजाति , और तो और प्रत्येक वस्तु की जाति व् प्रजाति दोनों होती है , तो कहने का भाव यह है कि यह सब ईश्वर या प्रकृति द्वारा निर्मित है इसे मानवीय व्यवस्था समझाना भूल है !
इसलिए पहले इसे भलीभांति समझ लें इसके बाद आत्मचिंतन करें कि जो व्यवस्था हम लागु कर रहे है उसका वैज्ञानिक व् शास्त्रीय आधार क्या है !

मै आपको यत पिंडे तत ब्रह्मांडे के  आधार पर समझाने का प्रयास करता हूँ , सनातन शास्त्र कहते है भगवान विराट ने अपने सिर से ब्राह्मण को उत्पन्न किया , भुजाओ से क्षत्रियो को उत्पन्न किया , अपने उदर से वेश्यो को प्रकट किया तथा अपने चरणों से शुद्रो की उत्पत्ति की , आर्थात मुख से मेधाशक्ति , भुजाओ से रक्षाशक्ति , उदर से अर्थशक्ति एवं चरणों से श्रमशक्ति को उत्पन्न किया , इसका अर्थ यह हुआ की ब्राह्मणों के पास जो शक्ति है उसका सम्बन्ध सिर से है यानि ब्राह्मण के पास देखने , सुनने , बोलने , बताने की शक्ति होती है , प्राचीन काल में किसी भी राज्य में जो राजा होता था वह मार्गदर्शक के रूप में किसी ब्राह्मण को जरुर नियुक्त करता था तथा उन्ही के परामर्श से अपनी प्रजा का पालन करता था क्योकि वह जानता था कि  मेरे पास शक्ति है  ज्ञान नहीं , क्षत्रियो को भुजाओ से उत्पन्न किया तो स्वाभाविक है की उनके पास भुजाओ का बल अत्यधिक पाया जाता है और किसी भी राज्य की रक्षा का दायित्व क्षत्रियो का होता है , उसी प्रकार वैश्यो की उत्पत्ति उदर से हुई तो उनके पास संग्रह तथा वितरण की कुशलता पाई जाती है l यही उसकी शक्ति का आधार है , ठीक उसी प्रकार शुद्रो को पैरो से उत्पन्न किया याने शुद्रो के पास श्रम शक्ति होती है जो श्रम वे कर सकते है वह अन्य कोई वर्ण या जाती का व्यक्ति नहीं कर सकता इसीलिए भगवान् कहते है सभी  धर्मो की सिद्धि का मूल सेवा है ,  सेवा किये बिना किसी का भी धर्म सिद्ध नहीं होता अतः सब धर्मो की मुलभुत सेवा ही जिसका धर्म है , वह शुद्र सब वर्णों में महान है , ब्राह्मण का धर्म मोक्ष के लिए है  , क्षत्रिय का धर्म भोग केलिए , वैश्य का धर्म अर्थ के लिए है  ,और शुद्र का धर्म - धर्म के लिए है , इस प्रकार अन्य तीन वर्णों के धर्म अन्य तीन पुरषार्थ के लिए है l किन्तु शुद्र का धर्म स्व पुरषार्थ के लिए है  अतः इसकी वृति से ही भगवन प्रसन्न हो जाते है !

 अस्तु अब आगे सुनिए यह जो  सृष्टि है , यह भगवान विराट का शरीर ही है  इसी में सारा ब्रम्हाण्ड बसा हुआ है ,  सारे लोक इसी शरीर में है ! यह विराट शरीर ही हमारा संसार है  ! अब आप बताइए की किस किस अंग से कौन सा कार्य होता है ?
सिर का कार्य हाथो द्वारा संभव है ? नहीं , हाथो का कार्य उदर द्वारा संभव है ?
नहीं , उदर का कार्य पैरो द्वारा संभव है ?
नहीं , जातिगत व्यवस्था को कदाचित भंग कर दिया जाए तो क्या स्थिति उत्पन्न होगी विचार कीजिए..l

विचार क्या कीजिए अरे देख ही लीजिए वर्तमान में जो शिक्षा पद्धति व् जीविका पद्धति हमारे ऊपर थोपी गयी है  उसका परिणाम क्या हो रहा है  वर्णसंकरता , कर्मसंकरता और ऊपर से आरक्षण , हमारे यहाँ कभी भी किसी के लिए भी रोजी रोटी का संकट था क्या ?
कभी नहीं , प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति तथा वर्ण के अनुसार अपना जीवन यापन करता था !
कोई भी किसी के कर्म का अतिक्रमण नहीं कर सकता था , अपितु एक दुसरे के सामंजस्य से सारे कार्य होते थे , कोई भी समाज अपने को हिन् नहीं समझता था ! प्रत्येक समाज अपनी जाति पर गर्व महसूस करता था क्योकि वो जानते थे की जो गुण योग्यता उनमे है , वह अन्य के पास नहीं है  यह ईश्वर का उस समाज के लिए वरदान हुआ या नहीं ?

अब मै आपको दुसरे रूप में समझाता हूँ , कल्पना कीजिए कि आप स्वयं भगवान् विराट है यह शरीर जो आपको प्राप्त हुआ है , यह आपका संसार है और इस शरीर के मालिक या भगवान आप है .. एवं इस संसार में आपको मुख के रूप में ब्राह्मण , भुजाओ के रूप में क्षत्रिय , उदर के रूप में वेश्य और पैरो के रूप में शुद्र प्राप्त हुए है ! अब इनसे आपको इस संसार रूपी शरीर का संचालन करना है .. कैसे करेंगे ? अब आप कहे की मै जातिव्यवस्था में विश्वास नहीं करता बल्कि सबको समान दृष्टि से देखता हूँ , कोई ब्राह्मण नहीं , कोई क्षत्रिय नहीं , कोई वेश्य नहीं , कोई शुद्र नहीं , आर्थात सभी अंगो को समान मानता हूँ  किसी भी अंग से कोई भी कार्य करा सकता हूँ और तो और अब मै अपने चरणों को यानि की शुद्रो को मुख्य धारा में लाने का प्रयास करूँगा और ब्राह्मणों से वो कार्य करवाऊंगा जो आजतक श्रमशक्ति {शुद्र} द्वारा किये जाते थे ! वेश्यो के कार्य क्षत्रिय करेंगे , क्षत्रिय के कार्य वेश्यो से , आर्थात सभी वर्णों को सभी कार्य का अधिकार होगा ! अब फिर से आप कल्पना करके बताओ की आपके संसार रूपी शरीर की स्थिति क्या होगी ?

वही स्थिति आज हमारे समाज की हो रही हे उदाहरण लीजिए जब से आरक्षण आया है  तब से हमारे चरण {श्रमशक्ति} जमींन  से ऊपर उठ गए क्या मतलब निकला , चरणों का स्थान वाहनों ने ले लिया या नहीं... आज कितने व्यक्ति संसार में अपने पैरो का उपयोग करते है  आवागमन मे , अब पैरो का उपयोग केवल विशेष परिस्थिति में ही किया जाता हे ताकि इन्हें किसी प्रकार का कष्ट न हो ! और तो और टी.वी.का चेनल बदलने के लिए भी पैरो को कष्ट देना उचित नहीं रह गया विकल्प के तौर पर अब हमारे पास रिमोट कण्ट्रोल जो आ गया है !

 अब जब पैरो द्वारा श्रम ही नहीं होगा तो क्या होगा , मोटापा बढ़ जाएगा पेट बाहर निकल आएगा , मतलब संसार की सारी संपत्ति का वेश्य {उदर} संग्रह तो करेंगे किन्तु वितरण नहीं होगा , वितरण क्यों नहीं होगा क्योकि श्रम नहीं हो रहा , सारा श्रम तो मशीने कर रही है और उन्हें धन नही मिलता अपितु उसके मालिक को मिलता है , अब यदि इस पर गंभीरता से चिंतन किया जाए तो आरक्षण के द्वारा हमने जो परिस्थिति निर्मित की है उससे तो दलितों [ श्रमशक्ति ] का आस्तित्व ही खतरे में पड गया क्योंकि स्रष्टि में उनकी उपयोगिता को ही ही आरक्षण नामक असुर ने अपने अधीन कर लिया , अरे भाई जिसकी उपयोगिता निरस्त हो जाती है उसका आस्तित्व तो मिटना ही है , अर्थ क्या हुआ श्रमशक्ति के द्वारा श्रम नही होने से उनका स्थान वाहन और मशीनरी ले रही है !

विचार करेंगे तो पाएंगे कि भविष्य का मनुष्य बगैर पैर का उत्पन्न होगा या पोलियो ग्रसित होगा , तब क्या होगा पेट इतना बढ़ जाएगा कि हिलना डुलना भी बंद , अब बारी आती है ब्राह्मणों की यानि मुख की , क्या स्थिति है आज मुख {ब्राह्मण}की जितनी सफाई इसकी की जाती है  शायद ही किसी अंग को इतना चमकाया जाता हो जितना चेहरे को चमकाया जाताहै  !
सबसे ज्यादा जिम्मेदारी भी इसी की है , क्योकि संसार रूपी शरीर के सञ्चालन में इसकी भूमिका सबसे अहम् होती है , बगैर पैरो के शरीर जीवित रह सकता है ?
बगैर हाथो के शरीर जीवित रह सकता है , किन्तु सिर को अगर धड से अलग कर दिया जाए तो कोई जीवित रह सकता है ?
कल्पना कीजिए , एसा है कि हम कोई समानता के विरोधी नहीं है सभी को समानता का अधिकार निश्चित ही प्राप्त होना चाहिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है  किन्तु समानता का मतलब किसी के अधिकारों का अतिक्रमण करना नहीं है  ! आप ही बताईए आप अपने किस अंग से भेदभाव करते है , किसी से नहीं , क्योकि वे सब आपके अंग है !

अभी कुछ समय पहले एक पोस्ट फेसबुक पर पढ़ रहा था उसमे एक सज्जन ने जातिव्यवस्था के बारे में लिखा की ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण , क्षत्रिय का बेटा क्षत्रिय ,एसा कैसे संभव हो सकता है ....इस प्रकार तो डॉक्टर का बेटा डॉक्टर , मास्टरजी का बेटा मास्टर यह तो गलत है , अब मै उन सज्जन से कहूँगा की मान्यवर आप जिस व्यवस्था के अंतर्गत बात कर रहे वह मैकाले महोदय की शिक्षा पद्धति के डॉक्टर व् ,मास्टरजी है न कि सनातन व्यवस्था के , हमारे यहाँ तो वैद्य का बेटा वैध , सुतार का बेटा सुतार , लोहार का बेटा लोहार , सुनार का बेटा सुनार , ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण , और क्षत्रिय का बेटा क्षत्रिय ही होता है ! उन्हें कुछ सिखने कही बाहर नहीं जाना होता अपितु अपनी परम्परा प्राप्त आजीविका का ज्ञान उसके DNA यानि संचित कर्म में रचा बसा होता है ! आवश्यकता है तो अपने वर्ण या जाति के गुणों को निखारने की क्योकि हीरे को जब तक तराशा नहीं जावेगा तब तक वह किसी के मुकुट की शोभा नहीं बढ़ा सकता !!

!! हर हर महादेव !

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