वामपंथी प्रक्षिप्तवाद /क्या शास्त्रो मे मिलावट है?

प्रक्षिप्तवाद

हिन्दू समाज गिर रहा है। गिरने का अर्थ सभी प्रकार से है। राजनैतिक, सामाजिक, चारित्रिक, वैचारिक, धार्मिक, हर प्रकार से गिर रहा है। पहले नभोमंडल में था यह समाज, आज धरातल पर है। अब इसको एक नया शौक चढ़ गया है। अब इसे रसातल जाना है। रसातल जाने में अगर भूतल बाधक बने तो बोरिंग करके इसे रसातल जाना है। इसका कारण जानते हैं, क्या है ? धार्मिक, राजनीतिक आदि बड़ी बातें छोड़ भी दें, तो वैयक्तिक स्तर पर भी इसके चार कारण हैं -

१) स्वयं के हिन्दू होने पर घमंड !
२) मस्तिष्क की अपेक्षा वाणी का अधिक सक्रिय रहना।
३) स्वयं को पूर्ण और सबसे अधिक समझदार मानकर बिना वस्तुस्थिति को समझे ही प्रतिक्रिया देना।
४) ग्रंथोल्लिखित बातों की अपेक्षा मन:कल्पित बातों को प्रधानता देना।

हिंदुओं में एक नया स्वभाव आया है। "मार लाठी" का स्वभाव। बिना सोचे, समझे, बस लाठी पटक देनी है। हिन्दू सहमा हुआ है, हिन्दू डरा हुआ है। वह डरता है कि कहीं उसके सामने कोई उसके धर्म के विषय में कोई आपत्ति न कर दें, और वह डरता है, इस बात से कि कहीं वह उत्तर न देने के कारण "बुरा" तो नहीं बन जायेगा। कहीं यदि वह मान ले कि शम्बूक वध हुआ था, तो संसार उसे और उसके रामजी को अधर्मी तो नहीं कहेगा। वह डरता है कि यदि वह सीतात्याग को सही मान लेता है तो कहीं उसपर नारीविरोध का ठप्पा तो नहीं लग जायेगा ? इसीलिए हिन्दू लाठी पटकने लगता है। सामने फण फैलाया सर्प हो तो बेसुध आदमी कहीं भी लाठी मारता रहता है, यही हाल हिन्दू समाज का है।

हिन्दू समाज के पास परम्परागत शास्त्रीय शिक्षा का अभाव है यह अभाव स्वार्थी एवं फ़र्ज़ी धर्मगुरुओं तथा कुचक्री शासन तंत्र के द्वारा पिछली चार पांच पीढ़ियों में उत्पन्न किया गया है।

आप किसी व्यक्ति के पास जाएं, और उसकी बेटी का नाम बोलें, और कहें कि इतने बजे, अमुक विद्यालय जाती है और वहां से इतने बजे लौटती है, अमुक कक्षा में पढ़ती है, मैं देख लूंगा तुझे। अब भले वह व्यक्ति आपको न जानता हो, किन्तु सदैव आशंकित और चिंतित रहेगा। इसके लिए कुछ लगा ? नहीं। बस एक छोटा सा अभिनय ...

आपके मन में यह बात डाल दी जाए कि आपकी पत्नी या पति चरित्रहीन है, तो भले वह कितना भी शुद्ध क्यों न हो, आपका मन प्रत्येक बात पर संदेह करने लगेगा। और यदि इसी बात को अलग अलग विधियों से दो चार और लोगों से कहलवा दें, तो फिर ? उनकी वाणी आपके लिए प्रमाण बन जाएगी, और आपका प्रेम एवं विश्वास ही संदिग्ध हो जाएगा। आखिर, किसका फोन था। अचानक कहाँ चले गए ? हमारे बाद घर में कौन कौन आता है, क्यों आता है, आदि आदि। आपका दृष्टिकोण ही बदल जायेगा। क्या इसके लिए आपके जीवन में कोई बड़ा षड्यंत्र करके, बहुत पैसा खर्च करके, बहुत व्यवस्था बनाकर कुछ करना पड़ा ? नहीं। बस आपके मन में एक बात डालनी पड़ी।

आपको क्या लगता है, हमारे सनातनी ग्रंथों में मिलावट है ? प्रक्षिप्त हैं वे ? अच्छा ठीक है। एक उदाहरण देखिए।

मान लीजिए, मैं एक ऋषि हूँ, मैंने एक ग्रंथ लिखा। वो मुझे पूरा अक्षरशः याद है। फिर मैंने उसे अपने शिष्यों को पढ़ाया और पूरा याद करा दिया। साथ ही मैंने उसे लिपिबद्ध करके उन्हें दे दिया और उन्होंने भी उसे लिपिबद्ध करके अनेकों स्थान पर प्रसारित किया। उन्होंने आगे इसकी परम्परा बढ़ाई। अब वो ग्रंथ हज़ारों विद्वानों को याद है और उसकी हज़ारों प्रतियां भी हैं। अंग्रेजों के आने के समय तक भारत में पांच लाख से अधिक गुरुकुल थे। मैं सारे ग्रंथों की बात नहीं करता, किंतु जो प्रधान और आधारभूत प्रसिद्ध, वेद, उपनिषत्, पुराण, स्मृति, रामायण आदि हैं, उनमें से उदाहरण के लिए रामायण प्रत्येक "सौ गुरुकुल" में कम से कम एक प्रति तो होगी। ऐसे होनी तो सबमें चाहिये, किन्तु मान लिया कि आचार्यों को स्मरण था सब कुछ, तो सभी लोग लिखित में नहीं रखते थे। किंतु फिर भी प्रत्येक सौ गुरुकुल में एक लिखित प्रति तो होगी ? ये बहुत बड़ा अनुपात रख रहा हूँ, फिर भी कम से कम सौ में से एक गुरुकुल के पास तो लिखित में रामायण होगी ?

अब पूरे भारत में उसकी, सभी गुरुकुल, विश्वविद्यालय, मठ, आश्रम आदि मिलाकर कम से कम ५००० प्रतियां तो होंगी !! प्रक्षिप्त करने वाले दो काम कर सकते हैं। या तो मूल प्रतियों के बीच में स्थान स्थान पर अपने से लिखकर जोड़ देते, या नए पन्ने सम्मिलित कर देते, अथवा स्वयं से ही नई प्रतियां बनाते, जिसमें नकली भागों को जोड़ते जाते।

अब दोनों ही स्थितियों में बड़ी समस्या है। यदि पहले वाली प्रतियों में मिलावट करते तो, दो बातें उन्हें फंसा देतीं। एक तो हस्तिलिखित प्रति है तो लेखन शैली में भेद हो जाता। दूसरे, जिनके पास वो प्रति है, वो स्वयं उसका ज्ञाता है तो नकली अंश पहचान कर विरोध करता।

यदि मिलावट करने वालों ने अपनी नई प्रतियां बनाई थीं, तो भी एक एक प्रति के लेखन में कई वर्ष लगते। साथ ही यदि अलग अलग व्यक्तियों ने मिलावट की है तो यह कैसे पता चलता था उन्हें कि कहां पर कौन सा श्लोक मिलाना है ? इसका मतलब कि एक दो प्रतियों में ही मिलावट कर पाते। हर मिलावट एक दूसरे से भिन्न होती और पकड़ में आ जाती।

यदि हम कहें कि एक ही आदमी ने किया। जैसा कि एक प्रक्षिप्तवादी ने टीवी चैनल में कहा कि गुणाढ्य नामक बौद्ध ने रामायण में मिलावट की। तो वह गुणाढ्य नामक बौद्ध अकेला कर रहा था क्या ? यदि हां, तो अपने पूरे जीवन में एक ही ग्रंथ में मिलावट करने और उसकी नई मिलावटी प्रतियाँ बनाने में उसे अधिक से अधिक दस, बीस या पचास प्रतियां बनाने का ही अवसर मिला होगा। और यदि वह पहले से उपलब्ध मूल प्रतियों में अलग से जोड़ रहा था तो जिन गुरुकुलों में वो प्रतियां थीं, जो आचार्यगण उनके माध्यम से रोज पढ़ा रहे थे, उन्हें भनक तक लगी ? कि कल तक तो ये अंश न था और ऊपर से हस्तलिपि भी नहीं मिल रही।

यदि कहें कि अकेला था, तो अकेला आदमी हज़ारों नई मिलावटी प्रतियां नहीं बना सकता, और प्रयास भी करे तो अकेले बहुत अधिक दिन नहीं कर सकता। साथ ही उसकी प्रतियां प्रसिद्ध भी न होंगी, क्योंकि उस समय इंटरनेट आदि भी न था, रहने से भी बाकी विद्वान् तुरन्त पकड़ लेते।

यदि कहें कि अकेला नहीं, बहुत लोग थे, तो फिर सबको कैसे ज्ञात था कि कहां पर क्या श्लोक या काण्ड मिलाना है ? एक सा मिलावट किया सबने ? और यदि कहें कि एक संस्था ने बहुत से लोगों से करवाया, तो बाकी विद्वानों को उन प्रतियों के समाज के सामने आने पर क्यों पता नहीं चला ? उन्होंने कुछ विरोध क्यों नहीं किया ? उन्होंने कहीं अपने ग्रंथ, भाष्य आदि में यह क्यों नहीं लिखा कि रामायण, महाभारत, पुराण आदि में अमुक अमुक बात प्रक्षिप्त है, सावधान रहें। उल्टे यह देखने को मिलता है कि उन्होंने कलियुग की संभावना देखते हुए कहा कि सावधान ! कोई इनकी लीला के रहस्यों को न समझने से आगे के काल में इन्हें प्रक्षिप्त कह सकता है, मत फंसना।

प्रक्षिप्तवादी तो ऐसे कहते हैं, मानो सारे ग्रंथ एक कॉमन राऊटर से एक ही सर्वर पर थे। मुख्य डेटाबेस में घुस कर किसी ने एक फ़ाइल बदल थी तो सारे प्रति बदल गए। हमारे किसी ग्रंथ में कोई मिलावट नहीं है। सम्भव ही नहीं था। इसीलिए विधर्मियों ने चाल चली। अपने चार एजेंट बनाये। दो को विदेशी रखा, दो को देशी। विदेशियों को प्रोफेसर और इतिहासकार घोषित कर दिया एवं देशियों को गेरुआ वस्त्र पहनाकर संन्यासी बना दिया। और एक दो से लिखवा दिया कि ग्रंथों में मिलावट है, एक दो से यही बात कुछ शोध के नाम पर लिखवा भी दी। इसके अलावा गुरुकुलों को बंद कर दिया और अफवाह उड़ा दी कि घर में रामायण रखने से, महाभारत रखने से झगड़े होते हैं। अब घरों से ग्रंथ निकलवा दिए, गुरुकुल बन्द करवा दिए, दिमाग में बात डाल दिये कि ग्रंथों में मिलावट है। बाकी काम हिंदुओं के "मार लाठी" के भय से स्वतः कर दिया।

इसके बाद शुरू हुआ एक दौर, जहां एक ओर से विधर्मियों ने प्रहार करना प्रारम्भ किया। रामजी ने ऐसा क्यों किया ? कृष्ण से ऐसा क्यों किया ? अमुक बात शोषण का प्रमाण है, अमुक बात में अश्लीलता है, आदि आदि। हिन्दू समाज को ऐसे प्रश्नों के उत्तर देने की आदत थी नहीं। वह तो अब तक ग्रंथों पर श्रद्धा रखता आया था। उनकी आलोचना करके की कुबुद्धि उसमें थी ही नहीं, इसीलिए तर्क तैयार न थे। उसने एक सरल रास्ता निकाला, दुबक गया। लड़ा ही नहीं। उसने कहा दिया कि किसी ने बाद में मिलावट कर दी होगी, प्रक्षिप्त कर दिया होगा। और "कर दिया होगा" ये कहते कहते, प्रक्षिप्तवाद इतना गहरा हो गया कि अब सीधे कहते हैं, "प्रक्षिप्त कर दिया है"।

सारे संसार की भूमि ढंकना तो सम्भव है नहीं, इसीलिए हम चप्पल पहन लें, पैर को ही ढक लें। वैसे ही इतने विस्तृत और सर्वमान्य, सर्वसिद्ध ग्रंथों को प्रक्षिप्त करना सम्भव तो था नहीं, इसीलिए हिंदुओं के दिमाग को ही प्रक्षिप्त कर दिया। यदि किसी के लिये पूरा संसार दुर्गंधमय कर देना है तो ऐसा सम्भव ही नहीं है। इसीलिए दो काम कीजिये। उसके गालों में दुर्गंध लगा दीजिये और दिमाग में बैठा दीजिये कि संसार में दुर्गंध है। अब वह व्यक्ति जहाँ भी जाएगा, दुर्गंध ही पायेगा। ऐसे ही हिंदुओं के दिमाग में डाल दिया कि ग्रंथ प्रक्षिप्त हैं। अब हिन्दू जिस भी ग्रंथ को देखता है, उसे जो बातें समझ में नहीं आती हैं, या जहां भ्रम होता है, उसे प्रक्षिप्त कह देता है। यही है इस षड्यंत्र का घृणित सत्य।

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