जाति बचावो

*जाति वैचित्र्यवाद*- *(अति विचित्र भगवत गति, को जग जानन जोग)* *इस प्रघट्ट मे 'जाति' शब्द की परिभाषा 'समानप्रसवात्मिका जाति' अभीष्ट नहीं अपितु किसो एक ही जाति विशेष मे दीख पड़ने वालो परम्परागत वे विशेषताए हैं जिनको आजकल 'नस्ल' के नाम से याद किया जाता है । पाश्चात्य जगत् आज पशु पक्षी और वृक्षो की नस्लो को सुरक्षित रखना और उनकी अभिवृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करना तो अपना कर्तव्य समझता है परन्तु मनुष्य की भी कोई खास नस्ल होती है और उसकी रक्षा करना भी आवश्यक है, दुर्भाग्यवश्य यह तथ्य अभी तक इन लोगो की खोपडी मे नही बैठ पाया है। यह सभी जानते हैं कि कहने मे 'ग्राम' एक साधारण वृक्ष है, परन्तु उसमे कलमी, लगडा, सफेदा, बम्बई, मलगोवा, तोता-परी और सिन्दूरी आदि अनेक जातियें पाई जाती हैं, जिनका रंग रूप और स्वाद एक दूसरे से सर्वथा विचित्र होता है, इसी प्रकार प्रयाग मे अमरूद की, नागपुर मे सतरे को, और बम्बई मे केले को जो नस्लें विद्यमान है वे अपने वैचित्र्य के कारण अन्यत्र उपलब्ध नहीं होती। पशुओ मे खास कर वैलो और घोड़ो की कई विशेष नस्ले पाई जाती है । अग्रेजो ने अपने शासनकाल मे हरियाणे के गोवश की नस्ल की सुरक्षा के लिए एक बड़ी गोशाला - स्थापित की थी जो अभी भी सुरक्षित है । अग्रेजो की ओर से युद्धमे दिया जाने वाला सब से बड़ा पदक='विक्टोरिया क्रास' विगत युद्ध में भारत के एक बैलको भी प्राप्त हुआ था-यह सभी समाचारपत्र-पाठको को विदित होगा। यह बैल इसी नस्ल का कहा जाता है । प्रोज कुत्तो की नस्ल को सुरक्षित रखने के लिए अनेक प्रयत्न किये जाते है । *'बुलडाग' और 'पपीडाग' जनने वाली कुतियाको अन्य जाति के कुत्तो के ससर्ग से बचाने के लिये खास प्रबन्ध किये जाते है।* रबड के जाघिये तक पहिनाये जाते है परन्तु यह कितने आश्चर्य और शोक का स्थान है कि आज मानव नस्ल की सुरक्षा की न केवल उपेक्षा की जा रही है अपितु जातिगत विशेषताओ की रक्षा के दुर्ग-जन्मना वर्ण व्यवस्था, गोत्र प्रवर विचार, जातियो उप जातियो मे विवाह सम्बन्ध तथा भोजन सम्बन्ध आदि २ वैज्ञानिक विधानो की धज्जिया उड़ाई जा रही है। भारत ही एक मात्र ऐसा देश है और हिन्दू जाति ही एक मात्र ऐसी जाति है कि जिसने स्व-वर्ण मे ही 'यौन सम्बन्ध' को अभी तक यथातथा तत्परता पूर्वक सुरक्षित रक्खा है । सात सौ वर्षों के मुस्लिम शासन काल मे केवल 'यौन सम्बन्ध' को लेकर राजपूतो ने अनेको युद्ध लडे, अगणित बलिदान दिये, सहस्रो राजपूत रमणियें जौहर व्रत धारण कर सहर्प चिता पर चढ गईं, कालकूट को घू ट गई परन्तु अकवर महान् की साम दाम भेद पूर्ण और औरङ्गजेब की दण्ड पूर्ण सारो नीति व्यर्थ सिद्ध हुई, इस के लिए यदि अपने ही घर के राजा मानसिंह जैसे वीरो का भी सामजिक बहिष्कार करना पड़ा तो वह भी हृदय पर पत्थर रख कर किया परन्तु आर्यललनामो की विशुद्ध कोख को, गोमांसभक्षक अनार्यों के ससर्ग से दूषित नही होने दिया, फल स्वरूप हिन्दूपति राणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज, श्री गुरु गोविन्दसिंह और वीर बन्दा वैरागी जैसो की नस्ल सुरक्षित रह सकी। आज भी पाकिस्तान के जन्मकालीन हत्याकाण्ड के समय अनेको देविये अपने सतीत्व को रक्षा के लिये हसते २ चितामो पर चढ गईं, पूरे गांव के गांव सती हो गए । इस कष्ट पूर्ण स्थानो ने जहां हमारे हृदयो को भस्म कर डाला वहां इन वलिदानो के प्रकाश मे एक आशा को किरण भी सुस्पष्ट झलक पडी। आस्तिक जगत् को पुनः यह निश्चित समझने का अवसर मिला कि हिन्दू जाति की 'नस्ल' अभी सुरक्षित है । सीता सावित्री और पद्मिनी का परम्परागत रक्त आज भी हिन्दू नारियो मे ठाउँ मार रहा है, *जब तक हमारी यह नस्ल सुरक्षित है, तब तक हिन्दू जाति का वाल भी बांका नही हो सकता-इस प्रकार के उदात्त विचार एक बार फिर हमारे हृदय में उबुद्ध हुए।* यदि यह नस्ल समाप्त हो गई तो फिर यहां भी जर्मनी के प्रसिद्ध नाजी नेता फील्ड मार्शल कहे जाने वाले गोयरिंग की विधवा पत्नी की भांति वीरगतिप्राप्त पति की लाश पर फिल्म-स्टार के रूप में थिरक कर, पति के जानो दुश्मन' अग्रेज,अमेरिकन और रसियन सैनिको से “वंस मोर हियर २” की दाद चाहने वाली नटियें देखने मे आयेंगी। मानवता का दीवाला ही निकल जायगा । आज भी हम सभ्य कहे जाने वाली समस्त अहिन्दू जातियो को खुला चैलेज कर सकते हैं-वे अपनी जाति मे उत्पन्न हुए किसी व्यक्ति का नाम बताए जो राम सा आदर्श शासक, भरत लक्ष्मण सा अादर्श भ्राता, सीता उर्मिला सी धर्मपत्नी, शिवि, दधीचि, हरिश्चन्द्र और कर्ण सा दानी, भीम अर्जुन सा आदर्शवीर और वृहस्पति शुक्र विदुर कामन्दक एव चाणक्य सा राजनीतिज्ञ हुआ हो।ईसा जगत् केवल ईसा पर अभिमान कर सकता है परन्तु यह भो पूरे तीस वर्ष तक भारतीय वैष्णवो के सम्पर्क मे रहकर और उनकी शिष्यता स्वीकार करके ही 'क्राइस्ट' बगला टोन में 'कृस्टा' और वस्तुत कृष्ण बन पाया था यह रहस्य पाली भाषा मे उपलब्ध एक प्राचीन जीवन चरित्र से सिद्ध हो चुका है । कल तक प्रत्येक पादरी ईसा का तीस वर्ष तक अज्ञातवास तो मानते थे परन्तु वे तीस वर्प कहा बीते थे यह रहस्य किसी को विदित नही था । अत ईसा भी कलमी ग्राम की भाति भारती का विशुद्ध नस्ल को मानसिक पेवद का हो परिणाम है । मुस्लिम ससार भी हजरत मोहम्मद पर तभी तक अभिमान कर सकता है जब तक कि उसे यह विदित न हो कि वह भारत के शैव मतानुयायी सन्यासियो की शिक्षा दीक्षा मे रहकर ही "उम्मी' योमी अर्थात् प्रोकारोपासक वन पाया था । मक्के मे प्रतिष्ठापित 'सगे असबद' नाम का काला शिवलिग और पञ्च-कोण तारे वाला अर्धचन्द्र त्रिपुण्ड अभा तक मुस्लिम जगत् का आदरणीय चिह्न बना हुआ है। कहना न होगा कि भारतीय ऋपियो ने जाति गत विशेष गुणो के सरक्षण और उनके सवर्द्धन के निमित वैदिक विज्ञान के आधार पर जो व्यवस्थाए सुस्थिर की थी यह उनका ही प्रत्यक्ष फल था कि अर्को वर्ष पुरानो हिन्दू जाति अभी तक ससार में अपनी सत्ता को रख सकी है। अन्यथा इससे पीछे उत्पन्न हुई सिथियन, हून, वैवोलियन, शक, और ग्रीक आदि अनेक जातिया केवल इतिहास के पृष्ठो मे ही ढूढो जा सकती है। अब संसार मे उनका अस्तित्व भी शेष नही रह सका है। दो विभिन्न असमान जातियो के सांकर्य का परिणाम विनाश ही होता है । घोड़े और गधे के साकर्य से उत्पन्न खच्चर आगे वश नही बढ़ा सकता । कलमी ग्राम के गुटुल से कभी आगे आम पैदा नहीं हो सकता। यथास्थान इन सब बातो पर विशेष प्रकाश डाला जायगा। यहा तो केवल यह तथ्य मस्तिष्क में बैठा लेना चाहिये कि 'जातिगत वैचित्र्य' का भी संसार को समृद्धि मे विशिष्ट स्थान है। जो जाति इस तथ्य को हठात् मिटाना चाहेगी उसका अस्तित्व भी सहस्राब्दियो से अधिक ससार मे सुस्थिर नहीं रह सकेगा। कुछ श्लोक श्रीमद्भागवत गीता से जो वर्णसङ्करता के बारे में है--------------◆◆ ●कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ भावार्थ : कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है॥ ●अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ भावार्थ : हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसङ्कर उत्पन्न होता है॥ ●संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ भावार्थ : वर्णसङ्कर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं॥ ●दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः । उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ भावार्थ : इन वर्णसङ्करकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं अब वैज्ञानिक विधा देख लेते है आजकल यही प्रमाणपत्र है 1. यहां बात जेनेटिक बीमारियों की हुयी है तो याद रखिये की सबसे ज्यादा हिज़ड़े, मुसलमानो के यहां ही पैदा होते है (जनसँख्या के अनुपात में देखें) 2. आप गूगल सर्च लें सिर्फ मेरी ही बात न माने, पाकिस्तान की लगभग 1/3 आबादी बिभिन्न प्रकार की मानसिक बीमारियों से ग्रस्त है। 3. नर जानवर भी (शेर, चीता, बाघ, तेंदुआ) इत्यादि भी वयस्क होने पर अपना झुण्ड छोड़ देते हैं तथा नए झुण्ड की मादाओं के साथ प्रजनन करते हैं ताकि उनकी संतान बलशाली हो। 4. खेत की फसलो में भी वर्णशंकर (Hybrid) बीजो का इस्तेमाल किया जाता है ताकि अच्छी पैदावार मिल सके, जो की दो भिन्न प्रजाति की बीजो को मिलाकर बनाया जाता है। मैं भी खेती करवाता हूँ और जो बीज एक खेत में 3-4 बार इस्तेमाल हो जाए उसको बदलना ही पड़ता है वर्ना पैदावार खत्म हो जाती है। उम्मीद है की आपको आपके सवाल का जवाब मिल गया होगा की अपनी जाती से बाहर विवाह क्यों नही करना चाहिये *ये बेसिक सी समझ तो जानवरो भी है।*

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