पुराणोक्त बलिवैश्वदेव
स्त्री-अनुपनीत-शूद्राद्यधिकृत-बलिवैश्वदेव -
तीन आचमन करे , हाथ धोकर
नमो भगवते वासुदेवाय मन्त्र से प्राणायाम करे (अर्थात् श्वास का यथाशक्ति रोधन करे)
अग्निस्थापन क्रम - जल से स्थंडिल को सिंचित करना ,
ईंधन को प्रेक्षित करना ,
कर्पूर वा बाती स्थंडिल में रखना,
किसी ज्वलनशील काष्ठादि से प्रदीप्त वह्नि को ग्रहणकर उसमें से क्रव्यादंश नैर्ऋत्य में त्यागना,
स्थंडिल स्थित कर्पूर या बाती को हस्तस्थिताग्नि द्वारा प्रदीप्त करना -
ह्रीं वह्निचैतन्याय नमः।
काष्ठ-गोबरकंडे आदि से अग्नि को अच्छी तरह प्रदीप्त करना
अक्षत से आवाहन करना - रं अग्नये नमः इत्यावाह्य।
ध्यानम्- "( अग्निरूपमथो वक्ष्ये सिद्ध्यर्थं सर्वकर्मणाम्। यतस्तस्मिन्नविज्ञाते होमो भवति निष्फलः।। स्मरेदग्निं द्विजो होष्यन् रक्तं गोवृषरूपिणम्। विततोर्द्ध्वाननं मध्ये बृहत्कर्णं सुलोचनम्।। चतुःश्रृंगं त्रिपादं च द्विशीर्षं सप्तहस्तकम्। द्विपुच्छं च त्रिधाबद्धं चतुर्नेत्रं त्रयीमयम्। शृंगाश्चत्वार उद्दिष्टा या ऊर्द्ध्वा समिधश्च ताः। वैदिके तान्त्रिकं वक्त्रे पादाः परिधस्त्रयः।। ऋगाद्याश्च त्रयोवेदाः पुरुषार्थास्तदीक्षणः।। छन्दांसि सप्तहस्तानि पुच्छौ पक्षौ सितासितौ।। वसिष्ठकल्प।।)" इति ध्यायन्
गंधाक्षत से अग्निनारायण का पूजन - ह्रीं अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम् । हिरण्यवर्णममलं समिद्धं विश्वतोमुखम्।। पावकाग्नये नमः।।
संकल्प - अद्य श्री विष्णोर्विष्णोर्विष्णोः विष्णोराज्ञया वर्तमान मासपक्षतिथिवासरयोगे मम गृहे पञ्चसूनाजनितपातक प्रमादकृतहिंसाजनितैरन्यैश्च सकल पातक निवृत्यर्थं चतुर्भिर्यज्ञैः वैश्वदेवाख्यंकर्म करिष्ये।
चूल्हीपर पकी भात में घृतमिश्र करे
पुराणोक्त गायत्रीमंत्र से भात को प्रेक्षित करे - ह्रीं यो देवः सविताऽस्माकं मनःप्राणेन्द्रियक्रिया। प्रचोदयति तद्भर्गं वरेण्यं समुपास्महे।।
छोटे बदरीफल की मात्रा में भात की आहुति प्रदीप्त अग्नि में दे -
(१) ह्रीं ब्रह्मणे नमः- इदं ब्रह्मणे न मम ।
(२)मनमें पढकर - ह्रीं प्रजापतये नमः - इदं प्रजापतये न मम।
(३)ह्रीं गृह्याभ्यो नमः-इदं गृह्याभ्यो न मम।
(४)ह्रीं कश्यपाय नमः-इदं कश्यपाय न मम।
(५) ह्रीं अनुमतये नमः- इदमनुमतये न मम।
(६)ह्रीं विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः- इदं विश्वेभ्योदेवेभ्यो न मम।
(७) ह्रीं अग्नये स्विष्टकृते नमः- इदमग्नयेस्विष्टकृते न मम।
बलिदानादिकर्म -->
किसी परात में
दाहिनी ओर नीचे -- तीन बलि दान क्रम से पूर्वकी ओर
(१)ह्रीं पर्जन्याय नमः इदं पर्जन्याय न मम।।
(२)ह्रीं अद्भ्यो नमः इदमद्भ्यो न मम।
(३)ह्रीं पृथिव्यै नमः इदं पृथिव्यै न मम।
चारो दिशा में क्रम से -
(१)ह्रीं वायवे नमः - इदं वायवे नमः । (२) ह्रीं वायवे नमः इदं वायवे न मम। (३)ह्रीं वायवे नमः इदं वायवे न मम। (४) ह्रीं वायवे नमः इदं वायवे न मम।
पुनः चारो दिशा में क्रम से --
(१) ह्रीं प्राच्यैदिशे नमः -इदं प्राच्यै दिशे न मम।
(२)ह्रीं दक्षिणायैदिशे नमः इदं दक्षिणायैदिशे न मम।
(३)ह्रीं प्रतीच्यैदिशे नमः इदं प्रतिच्यैदिशे न मम।
(४) ह्रीं उदीच्यैदिशे नमः इदमुदीच्यैदिशे न मम।
परात की मध्य में नीचे से पूर्व की ओर तीनबलिदान क्रम से
(१) ह्रीं ब्रह्मणे नमः इदं ब्रह्मणे न मम।
(२) ह्रीं अन्तरिक्षाय नमः इदमन्तरिक्षाय न मम।
(३) ह्रीं सूर्याय नमः इदं सूर्याय न मम।
ब्रह्मादि तीन बलिदान की बाहिनी ओर दो बलिदान क्रम से
(१)ह्रीं विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यो न मम।
(२)ह्रीं विश्वेभ्योभूतेभ्यो नमः इदं विश्वेभ्योभूतेभ्यो न मम।----इन दो बलिदान की बाहिनी ओर दो बलिदान क्रम से -
(१) ह्रीं उषसे नमः इदमुषसे न मम।
(२)ह्रीं भूतानां पतये नमः इदं भूतानां पतये न मम।
होमशेष में से किंचित् ग्रास निकालकर आपोशानब्रह्मार्पणादि के लिए अलग पात्र में रखे।
दुपट्टा दाहिने कन्धेपर करके - १बलिदान परात में दक्षिणदिशा की ओर
(१) ह्रीं पितृभ्योनमः इदं पितृभ्यो न मम।
दूपटा बाहिने कन्धे पर रखे और हाथ धोकर धूलापानी परात में बाहिनी ओर नीचे की तरफ छोडे
ह्रीं यक्ष्मैतत्ते निर्णेजनं नमः इदं यक्ष्मणे न मम।।-- इस निर्णेजनजल की बाजू मे - ह्रीं सनकादि मनुष्येभ्यो नमः इदं सनकादिमनुष्येभ्यो न मम।
(गौग्रास भाग निकाले
कुत्ते का ग्रास निकाले
कौओ का ग्रासभाग निकाले
चीटींयो का ग्रासभाग निकाले --- इन सबको यथा यथा सुलभ प्रदान करे)
हाथ पैर धोकर आचमन करे।
संकल्प -- अनेन वैश्वदेवाख्यकर्मणा कृतेन यज्ञरूपीपरमेश्वरः प्रीयताम्।
विष्णोःस्मरणम् - यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु। न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्।। ह्रीं विष्णवेनमो विष्णवेनमो विष्णवेनमः ।।
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