संघ : विश्वसत्ता द्धारा सनातन धर्म विरुद्ध एक षड्यंत्र

विषय:- संघ एक छलावा भारत को संगठनवाद से मुक्ति का कारण सेक्रेट सोसाईटी अर्थात ब्रिटिश राजघराने की चाल स्वयंसेवकों को मनोवैज्ञानिक तरीके से भ्रमित करने के तरीके संघ के भ्रमित करने वाले कुछ झूठे जुमले और धारणाओं की समाज एवं स्वयंसेवकों के मन में स्थापना सनातन धर्म के मूल आधार वर्ण व्यवस्था पर भ्रमित करने की साजिस मुसलमानों पे संघ की योजना राममंदिर एवं मुसलमान साथियों दुनिया के जीतने भी बड़े संगठन आज किसी भी लोकतान्त्रिक देश में चल रहे हैं उनके पीछे कौन लोग है?, कौन उनकी नीति, रणनीति बनाता है?, कौन उनको धन देता है? आप सोच भी नहीं सकते बस ये जान लीजिये कि ऐसे सभी संगठनों पे उन लोगो का सीधा कब्ज़ा है जो ऐसे संगठनो को चलने दे रहे है और ऐसे लोगों को हम सीक्रेट सोसायटी के नाम से भी जानते है जिसके बारे में दुनिया को उतना ही पता है जितना वो स्वयं अपने बारे में जनाना चाहतें हैं और ये सेक्रेट सोसाईटी किसी भी देश या समाज में 100, 200 से 300 साल तक का प्लान करके अपना एजेंडा चलाती हैं| जिनमे से कई प्रभावी सेक्रेट सोसायटी ब्रिटिश राज परिवार एवं अन्य कई पश्चिमि राज परिवारों का है जिन्होंने दुनिया भर में राज किया है धन लुटा है और आज भी पूरी दुनिया के सभी तरह के व्यापार में उनका कितना पैसा लगा है कोई नहीं जानता सबसे ज्यादा व्यापार उनका हथियारों का ही है (सीक्रेट सोसायिटी के कार्यपद्धति के बारे में अलग से कभी और लिखूंगा) मेरा स्पष्ट मानना है कि दुनिया में अनेक सीक्रेट सोसायिटी हैं जिनका प्रभाव भारत में है पर भारत की सरकारों एवं संघ सहित अनेक पार्टियों, गुप्त संगठनो पर अभी भी ब्रिटेन राजघराने का अप्रत्यक्ष पकड़ है ऐसा मेरे सहित अनेक लोगों का मत है इसे समझने के लिये आप इतना जान लीजिये कि ब्रिटेन के शासक कोई बेवकूफ नहीं है जो भारत को इतने आसानी से छोड़ देंगे, इसलिए उन्होंने भारत से जाने से पहले अनेक संगठनो को अपने भविष्य के अनेकों उद्देश्यों के लिये खड़ा कर के गए जिसमे संघ और आर्य नमाज प्रमुख हैं जो केवल धार्मिक, राष्ट्रवादी हिन्दुओ को भ्रमित कर दिशाहीन करने का काम करते है बाकी उनके कुछ गुप्त संगठन भी सक्रीय है इस देश में जो अन्य क्षेत्रों में उनके हिसाब से कार्य करते हैं | इसे आप इस उदाहरण से समझिये कि एक किसी स्वतंत्र दुधारू गाय को उसके बच्चे सहित पकड़ लिया जाये और उसके बच्चे को बांध कर उसका पूरा दूध निचोड़ लिया जाये और उस बेचारी गाय को उसके हाल पर छोड़ दिया जाये जिससे वो फिर अपनी मेहनत से जंगल में चरने जाये और इधर अपने बच्चे के मोह में वापस आये तो फिर उसे निचोड़ा जाये और तब तक यह प्रक्रिया किया जाये जिससे वो गाय दूध देने लायक न बचे| गाय अपने बच्चे के प्यार में वापस आती है पर गाय को पकड़ने वाले ने, गाय का बच्चा कही भाग न जाये इसलिए देख रेख के लिये अपना आदमी बैठा रखा है न की गौसेवा के लिये, जो दुनिया के नजर में तो गौरखवारा है पर वो गौरखवारा इसलिए बना है कि यदि वो बछड़ा भाग गया और गाय के साथ मिल गया तो गाय का आना असंभव हो जायेगा और इनको फिर दुबारा दूध नहीं मिल पायेगा| इसी प्रकार अंग्रेजों ने जब भारत माता को हर प्रकार से निचोड़ लिया तो इसे इसके हाल पे छोड़ के चले गयें, पर अपने चमचों को इसके बच्चे यानि भोले भाले या अज्ञानी भारतीय नागरिकों को बेवकूफ बनाने के लिये रख गए हैं, जिसे हम अपना हितैषी संगठन या सरकारें कहते आये हैं| यहाँ देखने वाली बात यह है कि जिसे हम अपना विरोधी समझते हैं और जिसे अपना हितैषी समझतें हैं दोनों उन्ही के आदमी हैं| और ये बात उन्हें भी पता था कि जब भारत लगभग 100 वर्ष में फिर से मजबूत हो जायेगा तो वो फिर से भारत को निचोड़ने के लिये आ जायेंगे इसलिए इसकी पूरी योजना वो भारत छोड़ने से पहले ही बना गयें, वैसे भी इनके लोग जो यहाँ उनके बनाये कानून के तहत शासन करते हैं, कई लाख करोड़ घोटाला या हथियार खरीद कर भारत के आम नागरिकों का पैसा उन्हें सीधे भेजते रहते हैं, जिसमे दुनियाभर के हथियारों के व्यापारी यही सब अंग्रेज राजघराने वाले और पोप सहित, कुछ अन्य लोग है| ब्रिटिश राजघराने को लोकतंत्र जैसी व्यवस्थाओं के बारे में यहाँ के लोगो से ज्यादा अनुभव है क्योंकि वो पहले से ही वहाँ लागु कर वहाँ के लोगों को बेवकूफ बना रखा है वहाँ कोई भी प्रधानमंत्री बने राजघराने के खिलाफ नहीं जा सकता वही हाल वो भारत में भी बना के गयें हैं, यहाँ कोई भी बड़ी पार्टी या हिन्दुत्ववादी संगठन हो सब जाने अन्जाने उनके हिसाब से ही छाल रही है, ये सभी मूल रूप से हिन्दू धर्म और संस्कृति का विनाश ही कर रही है जिसमे संघ ने अप्रत्यक्ष रूप से सबसे ज्यादा कर रखा हैं| (आगे विस्तार से चर्चा करेंगे की कैसे संघ ने सबसे ज्यादा विनाश कर रखा है सनातन धर्म का) भारत में अनेक संगठन हुए पर कोई और नहीं टिक पाया सिवाय संघ के इसका कारण सिर्फ इतना है कि संघ के पीछे सीधे ब्रिटेन राजघराना खड़ा है, और जितने भी प्रभावशाली लोग संघ के खिलाफ खड़े हुए उन्हे धीरे से रास्ते से हटा दिया गया| अतः जो लोग ये कहते हैं कि आज तक संघ के आगे कोई टिका क्यों नहीं या उसके जैसा कोई और संगठन क्यों नहीं खड़ा हो पाया तो वो जान लें की भारत में आज भी किसी व्यक्ति या संस्था में सामर्थ्य नहीं है जो ब्रिटिश राजघराने से टकरा सके| और जिसने टकराया वो रास्ते से हटा दिया गया जैसे इन्दिरा गाँधी, दरअसल राजघराना ये जानता था कि आज नेहरू अपने इशारे पे नाच रहा है तो जरुरी नहीं कि उसकी सन्ताने भी नाचे उसके इशारे पे और वही हुआ इसलिए इन्दिरा को हटाया गया पर इन्दिरा के बेटे के पीछे एंटोनिया मायिनों को लगा दिया और वो जब राजीव से ब्याह कर भारत आ गयी तब राजीव को भी मरवा दिया और फिर कांग्रेस की सारी कमान एंटोनिया मायिनों के माध्यम से अपने हाथ में ले लीया, जिससे एंटोनिया के माध्यम से कई लाख करोड़ पैसा घोटाले के माध्यम से देश से बाहर ब्रिटिश राजघराने के पास चला गया | ब्रिटिश राजपरिवार ये जानता था की लोकतंत्र में जनता का मोह भंग होता है, वो बदलाव करती है इसलिए उन्होंने राष्ट्रवाद का चोला पहनाये संघ में गुरु गोलमालकर को घुसाया (यहाँ कुछ लोगों का मानना है कि संघ का जन्म ही ब्रिटिश राजपरिवार की ओर से कांग्रेस से निकाल कर अलग से डाक्टर साब के द्वारा कराया जो की सच भी हो सकती है बाकी बहुत सी फर्जी स्टोरियाँ, किताबे लिखी जा चुकीं है, संघ में, इनके प्रति जिससे इन लोगों को समाज परमपूज्य और भारत भक्त समझे हालाकिं इनमें ज्यादा शक, मुझे गोलमालकर पे है ), जिससे आगे चलकर उन्हें दो फायदे हों एक तो कांग्रेस का राजनितिक विकल्प मिल जाये वो भी राष्ट्रवादी हिन्दुओं से और दूसरा भारत की सनातन धर्म और व्यवस्था को पूरी तरह से नष्ट किया जा सके जिससे सरलता से हिन्दुओं का ईसाईकरण हो सके और वह हुआ भी| जिसके लिये उन्होंने पहले दयानंद और विवेकानंद को भी खड़ा किया और आज भी कई लोग छद्म भेष में लगे है जैसे इस्कान, एवं अन्य कई फर्जी संप्रदाय और साधुवेश धारी इत्यादि इनके बारे में बाद में लिखूंगा (यहाँ विवेकानंद 90% लोगों को पचेंगे नहीं मै जानता हूँ क्योंकि उनकी छवि देशभक्त और भगवान जैसी बनायी जा चुकी है और इस्कान भी बहुतों को नहीं पचेगा जिसने कृष्ण के नाम पर सनातन धर्म की धज्जियां उड़ाई और आज भी लगी है सनातन धर्म को समाप्त करने में जैसे वेदों के नाम पर दयानंद का गिरोह और राष्ट्र के नाम पर संघी गिरोह धर्म की धज्जियाँ उड़ाएं और उड़ा रहे हैं| इस्कान को तो देखकर गोलोकधाम से स्वयं कृष्ण भगवान भी हसतें होंगे इनपे इन्होने गीता को ही सबसे पहले तोड़ा मरोड़ा भगवान भी कहते होंगे वाह रे मेरे भक्तों मेरे नाम से मेरी ही बनायीं सनातन व्यवस्था को कुतरने में लगे हों )| इन सबका एजेंडा एक ही है जिसमे सबसे अधिक संघ और दयानन्द का संगठन आर्य नमाज को सफलता मिली, ध्यान देने वाली बात ये है कि अंग्रेज पहले राजा राममोहन राय का भी उपयोग कर चुके है, जिसे सतीप्रथा जैसी काल्पनिक बात के लीए आज भी हीरो बनाया जाता है जबकि सती प्रथा जैसी कोई प्रथा नहीं थी सनातन धर्म ये मैं बहुत पहले ही सिद्ध कर चूका हूँ | आज संघ अपने को दुनिया का सबसे बड़ा संगठन कहता है| पर यदि आप संघियों से ये पूछना चाहेंगे कि आखिर कोई संगठन कैसे बड़ा सिद्ध होता है तो आप को कोई संघी, सही से उत्तर नहीं दे पायेगा | (संघी स्वयं आगे इसे पढना रोककर इसका उत्तर सोचे जिससे उनकी बुद्धि थोड़ी मेहनत करेगी क्योंकि संघी बुद्धि को मार लेते हैं, वैसे इसका उत्तर आगे के लेख में यही लिख दूंगा) आज जब मै ये कहता हूँ की इस देश को किसी भी संगठन की आवश्यकता ही नहीं है, भारतीयों को संगठनवाद से बाहर निकलना चाहिए, तो बहूत से लोग मुझे पागल कहते है उनको लगता है कि ये क्या बोल रहा है, अगर संघ नहीं होता तो हिन्दुओ का क्या होता संघ नहीं होता तो ये होता, संघ नहीं होता तो वो होता, हिन्दू नहीं बचतें पता नहीं क्या क्या हो जाता, जैसे हजारों साल से हिन्दुओं को संघ ने ही बचा के रखा हो, जबकि सच्चाई ये है कि संघ ने ही उलटा हिन्दुओ और हिंदुत्व का विनाश, अंग्रेजों के बाद सबसे ज्यादा किया है और आज भी यही कर रहे हैं | इसे जानने के लिये आप ये जानिए की “संगठन” वास्तव में होता है क्या है, आज जिस प्रकार के संगठन हैं भारत में दरअसल उसका सारा प्रारूप तो अंग्रजो का तैयार किया गया है जिनमे सबसे पहले उन्होंने 1857 के क्रान्ति के बाद इन्डियन सोसाईटी एक्ट 1860 पास कराया जिससे देशभक्ति के फर्जी संगठन बनवा के भारतीय लोगों को भ्रमित किया जा सके, और आगे 1885 में ही अंग्रेजो के वफादार अधिकारी ए ओ ह्युम ने कांग्रेस रूपी संगठन बनायीं जिसका वर्तमान अध्यक्ष उन्ही का आदमी पप्पू गाँधी हैं, अतः आप समझ जाइये संगठनवाद किसकी परिकल्पना है और क्यों? ये कानून आज भी भारत में चल रहा है और भारत के सारे सोसायिटी इसी कानून के तहत बनते हैं| भले कोई संगठन किसी अच्छे व्यक्ति द्वारा राष्ट्र धर्म के लिये बन भी जाये तो भी इसमे अपने आदमी को घुसा कर उसे पूरी तरह से कंट्रोल करना बड़ी सरल होता है, इन संगठनो में चाहे लाखों कार्यकर्ता ही क्यों न हो पर फैसला 5-10 लोग ही लेते है और वो संगठन के नाम पर लाखों करोडो कार्यकर्ताओं पर थोप देतें हैं जैसे आज संघ के चन्द अधिकारी अपने फैसले हिन्दुओं पर थोप देतें है| संगठनो से धर्म और राष्ट्र के भलाई से ज्यादा उलटा नुकसान होने की सम्भावना होती है, क्योंकि संगठनो में कौन फैसले ले रहा है कुछ पता ही नहीं चलता जैसे संघ में स्वयंसेवकों को प्रचारकों के माध्यम से चन्द लोगों का तय किया हुआ एजेंडा क्षेत्र प्रचारकों से होता हुआ प्रान्त प्रचारकों, विभाग प्रचारकों से सामान्य स्वयंसेवकों के बीच चलाया जाता है, सामान्य स्वयंसेवक कि मति अर्थात बुद्धि तो रोज रोज शाखाओं से हर ली जाती है अर्थात ब्रेनवास लगातार शाखाओ में बुलाकर कर लिया जाता है और ऊपर के अधिकारीयों में पूज्य भाव प्रकट करा दिया जाता है जिससे सामान्य स्वयंसेवक अधिकारीयों पर प्रश्नचिन्ह लगाने का कभी सपने में भी नहीं सोच सकें, जो की स्वयंसेवकों या हिन्दुओं के साथ एक मनोवैज्ञानिक षडयंत्र है, उदाहरण के लिये भागवत जी के आगे स्वयंसेवकों को “परमपूज्य” शब्द लगाना अनिवार्य है जैसे वो कोई देव कोटि के अवतारी पुरुष हो, हमारे यहाँ तो नौ देवों या गुरुजनों की बात कही गयी है जो परमपूज्य है और ये हैं 1.धर्म 2.वेद 3.गुरु 4.देव 5.गौ 6.साधु 7.माता-पिता 8.ब्राह्मण 9.अतिथि आदि. चूँकि भारत माता तो साक्षात् देवी है तो उनके साथ बराबरी में शुरू के दोनों सरसंघचालको की छवि क्यों रखी जाती है जबकि वो कोई भगवान तो नहीं है और सनातन धर्म में ईश्वर के साथ बराबरी से मानव को रख कर पूजा नहीं की जाती, पर संघ में तो भारत माता और दोनों सरसंघचालाको को बराबर रख कर दीप माला धुप पुष्प इत्यादि से पूजने का दिखावा किया जाता है और ये इसलिए किया जाता है जिससे सांस्कृतिक हिन्दुओ में शुरू के दोनों सरसंघचालकों के प्रति देव या गुरु भाव आ जाये अर्थात श्रद्धा भाव आ जाये जिससे सामान्य स्वयंसेवक के मन में इनके ऊपर कभी विरोधाभास ही न पनपे जैसे रामरहीम, रामपाल, साई इत्यादि लोगो के भक्तों के लिये वो भगवान ही है अतः आप उनकी कमियाँ बताएँगे तो वो आपको मारने दौड़ेंगे जैसे आजकल संघी मुझे मारने के लिये तड़प रहे है पर उन्हें गाली से काम चलाना पड़ रहा है अतः वो छटपटा रहे हैं जो इस बात का प्रमाण है कि संघ और संघी कभी हिन्दू धर्म और हिन्दू संस्कृति को अपनाये ही नहीं, फिर इनसे हिंदुत्व के कल्याण के बारे में सोचना भी छोड़ दीजिये | संघ चालकों के आगे परमपूज्य लगाना पहले दो संघचालाको को भारत माँ के समकक्ष रख कर पूजना ये स्वयंसेवकों को बेवकूफ बनाने के लिये है और यह पिछले 90 वर्षों से यही कर रहे है और ऐसा भाव न रखने वाले को ये अशिष्ट या अमर्यादित या संस्कारहीन कहेंगे जबकि इनको परमपूज्य या पूज्य न मानने से हिन्दुओं के शिष्टाचार, सभ्यता या संस्कृति का कोई सम्बन्ध ही नहीं है| और यदी कोई विद्वान प्रश्न कर दे इसपे तो ये कहेंगे कि ये परमपूज्य शब्द व्यक्ति नहीं पद के लिये होता है जबकि सच्चाई ये है कि स्वयंसेवक पद के नाम पर भी श्रद्धा व्यक्ति के प्रति ही करता है क्योंकि पद पर बैठे व्यक्ति को ही वो देखता, सुनता, समझता है और उसी मानव के प्रति श्रद्धावान होता चला जाता है जो उसे पद पर दिखाई देता है, श्रद्धाभाव पूज्यभाव होते ही स्वयंसेवक ऊपर के अधिकारीयों के हर बात को ब्रह्मवाक्य मानता चला जाता है अतः ये सिद्ध होता है कि भले आप कहें की परमपूज्य शब्द पद के लिये है पर उसका लाभ पद पर बैठे व्यक्ति को ही मिलता है क्योंकि फैसले कोई पद नहीं उस पद पर बैठा व्यक्ति ही लेता है भले वो गलत फैसले ले पर उसके प्रति पूज्य भाव रखने के कारण स्वयं के कार्यकर्ता उसे गलत नहीं कहते बल्कि कुतर्क तक करके अधिकारीयों के बात को सही सिद्ध करते है जैसे आज मुसलमानों को अपना जिजा बनाने के लिये ये संघी पगलायें हुए है क्योंकि भागवत ने कह दिया तो मानना ही पड़ेगा क्योंकि वो इन संघियों का परमपूज्य अर्थात भगवान है पर ये संघी सभी हिन्दुओं पर अपना फैसला थोपना चाहते हैं चूँकि हिन्दुओ के लिये परमपूज्य असली भगवान है ये स्वघोषित परमपूज्य नहीं अतः ये संभव ही नहीं है कि मुसलमानों से हिन्दू मेलजोल करें और ये मेलजोल संघियों के तरह रोटी बेटी तक करे (ये मुल्लो से रोटी बेटी का सम्बन्ध करना, इनका बहुत पुराना प्लानिंग है जिसे ये हिन्दुओ से आने वाले समय में कहेंगे जिसके लिये मुस्लिम राष्ट्रिय मंच भी बनाया गया है जिससे मुल्लो को हिन्दुओ के मन और घर में अच्छे मुसलमान के रूप में घुसाया जा सकें जो कि एक मुख्य एजेंडा है इनका मुस्लिम राष्ट्रीय मंच बनाने के पीछे और इसमे भी इन्होने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इण्डिया के तहत “मुस्लिम राष्ट्रिय मंच” बनाया न की “राष्ट्रिय मुस्लिम मंच” अर्थात मुसलमानों का राष्ट्रिय स्तर का मंच न की राष्ट्रिय अर्थात राष्ट्रप्रेमी मुसलमानों का मंच और ऐसा इसलिए कि मुसलमान कभी राष्ट्रिय होता ही नहीं वो सदैव इस्लामिक होता है इस लिये संघी “राष्ट्रिय मुस्लिम मंच” नहीं बना पायें, बाकी “मुस्लिम राष्ट्रिय मंच” का कुछ एजेंडा आगे लिखूंगा और इस एजेंडा को भी हिन्दू स्वयंसेवक ही मानेगा और अपनी बहन बेटियाँ ब्याहेगा जैसे आज रोटी का सम्बन्ध तो कर ही लिया है इन मुल्लो से संघियों ने), जो कि सच्चे हिन्दू कभी इसे मानेंगे नहीं भले इसे मनवाने के चक्कर में संघ ही समाप्त हो जाये | दरअसल ये सब ड्रामा एक मनोवैज्ञानिक खेल है जिसमे स्वयंसेवक उलझ के रह जाता है, चूँकि मैंने मानव के मन पर कई वर्ष अध्ययन, चिंतन, शोध इत्यादि किया है इसलिए मुझे ये सब खेल समझ में आता है कोई भी संगठन जबतक उसके निर्माताओं और वर्तमान नेतृत्वकर्ता अधिकारीयों के प्रति अपने कार्यकर्ताओ में परमपूज्य या देव भाव नहीं स्थापित करेगा तब तक वो संगठन अच्छे से चल ही नहीं पायेगा क्योंकि शुल्करहित और ईमानदार, समय देने वाला कार्यकर्ता उसे मिलेगा ही नहीं जैसे आजकल संघ में धर्म और राष्ट्र भक्ति के नाम पर अपना समय, पैसा, जीवन ख़राब करने वाले बहुत लोग मिल जायेंगे पर वो न तो धर्म का मतलब जानते हैं और न ही राष्ट्र का मतलब जानते है अतः वो राष्ट्र धर्म के लिये जातें तो अवश्य हैं, संघ में, पर कार्य केवल संघ के लिये ही करते हैं, न कि धर्म और राष्ट्र के लिये हा यदि वो संघ की सच्चाई जानते तो संघ से सदैव दूर रहते| ......................................................... मैंने ऊपर जो प्रश्न किया था कि कोई संगठन आखिर कैसे बड़ा कहलाता है? तो इसका उत्तर ये है कि कोई संगठन तभी बड़ा कहलाता है जब वो अपने उद्देश्य जिसके लिये वो संगठन बना था, कि पूर्ति के लिये कोई बड़ा कार्य किया या करता हो| फिर आप मुझसे पूछेंगे कि कोई संगठन बड़ा काम कैसे करेगा? तो मै आपको बोलूँगा कि कोई भी संगठन बड़ा काम तभी करेगा जब उसके पास 1.ज्ञान बल (अर्थात संगठन में हर प्रकार का ज्ञान रखने वाले परम विद्वान व्यक्तियों का समूह हो ) 2.धन बल (अर्थात संगठन के पास अपने सभी योजनाओ के पूर्ति के लिये पर्याप्त धन हो) और 3. बाहु बल (अर्थात भेड़ बुद्धि वाले लोगों की पर्याप्त संख्या हो जिसे संगठन के अधिकारीयों द्वारा जब जो कहा जाये, वो उनकी कही बात को आँख मूंद कर, बिना सोचे विचारे स्वीकार करता हो) हो | =>अब इस परिभाषा के अंतर्गत आप आयेंगे तो आपको पता चलेगा कि संघ के पास सबसे पहला ज्ञानबल है ही नहीं और ये इस लिये नहीं है की यदि ज्ञानबल आ जायेगा, इस संगठन में तो वो उद्देश्य कभी पूरा हो ही नहीं पायेगा जिस उद्देश्य के लिये इसका निर्माण भारत के शत्रुओं ने करवाया या होने के बाद अपने लोगों को घुसा कर इसपर पूरी तरह से आधिपत्य कर लिया | आखिर ब्रिटेन राजघराना कोई मुर्ख तो है नहीं और वैसे भी आप देखेंगे की संघ ने पिछले 90 वर्षों में न्यायपालिका, कार्यपालिका, सूचनातंत्र(मिडिया बालीवुड एवं अन्य सभी), शिक्षा क्षेत्र इत्यादी सभी क्षेत्रों में अपनी कोई पकड़ ही नहीं बना पाया बस समाज को संगठित करने के बहाने राजनितिक लाभ लिया और देश तोड़ने वालों के हाथ में सत्ता सौप दिया, दरअसल संघ को ज्ञानबल से लेना देना वैसे भी नही है क्योंकि संघ को ज्ञान की आवश्यकता क्या है?, वो तो ऊपर से जो आदेश आता है संघ उसी हिसाब अपनी निति तय करता है अतः संघी सब ज्ञानी हो जायेंगे तो संघ छोड़कर भाग नहीं जायेंगे जिससे संघ ऐसे ही समाप्त हो जायेगा अतः संघी ज्ञानी न हो इसीलिए तो संघ रोज रोज स्वयंसेवकों को शाखा में बुला कर ब्रेनवाश करता है और उनके मन में फर्जी बातें धारणा के रूप में इस प्रकार स्थापित करता है जिससे वो सही गलत का अंतर ही न समझ पाए इसलिए तो मै उन्हें मानसिक गुलाम कहता हूँ, यदि ये मानसिक गुलाम न होते तो जो कलतक भारत को मुसलामों से मुक्त करने की बात कहते थे, क्या आज वो मुलमानो की प्रशंशा करते? और कह रहे है की 30 करोड़ मुसलमान है इसलिए उनके साथ मिल कर चलो जबकी वीर पुरुष संख्या से भयभीत नहीं होता कायर ही झुण्ड देखकर भागता है, ऐसे लोगों से मै कहता हूँ कि मुल्लो से थोडा ज्यादा मिल लो उन्हें अपनी बेटियाँ भी ब्याह आओ अच्छा मेल जोल हो जायेगा | ये गधे ऐसे गुलाम हैं कि अपने शंकराचार्यों को भी गाली देने लग जाते हैं, संघ के समर्थन में ये संघी, वेद शास्त्र जो की सनातन धर्म है अपौरुषेय ग्रन्थ हैं अर्थात काल, स्थान, परिस्थिति से परे हैं, उन्हें भी ये गधे समय के साथ अप्रासंगिक बताते हैं अतः आप समझ ही सकते है कि ये कैसे ज्ञानशुन्य लोग होते हैं| => अब बात करता हूँ धनबल की, आप ये जान लो धनबल संघ के पास बहुत है इनके पास अथाह पैसा है और देश में न जाने कितनी जमीने हैं, पुरे देश में 5 सितारा कार्यालयों का जाल बिछा है और वैसे भी जिसके पीछे ब्रिटेन राज घराने का हाथ हो उसे पैसे की कमी होगी क्या भला| ये एक रजिस्टर्ड संगठन नहीं है और न ही इनका कोई हिसाब किताब ले सकता है इनके पैसे का सारा संरक्षण कुछ चन्द लोगों के पास होता है जिस प्रचारक को जितना चाहिए उसे उतना मिल जाता है | कार्यकारिणी समिति में जो कुछ लोग है उनमे से ही 2-3 लोगों को सारे गुप्त चल अचल संपत्तियों की जानकारी होती है बाकी कुछ गुप्त धन की जानकारी क्षेत्र प्रचारक और थोड़े से गुप्त पैसे की जानकारी प्रान्त प्रचारक के पास भी होता है बाकी प्रान्त से नीचे सभी को गुरुदक्षिणा वाले पैसे से ही काम चलाना पड़ता है जिसमे व्ययपत्र भर के जितना रोज का खर्च होता है उतना ले लेते है और प्रचारकों को भी उतने ही पैसे की जानकारी होती है जितना उनके लिये आवश्यक है बाकी संघ के पास कहाँ कीतनी चल-अचल संपत्ति है किसी को नहीं मालूम सिवाय 2-3 लोगों के जो सबसे ऊपर वाले कोर कमिटी अर्थात अखिल भारतीय कार्यकारिणी समिति में होते है| बाकी इनके पास ब्लैकमनी भी पर्याप्त है जिससे ये जितना चाहे, जब चाहे उतना खर्च कर सकते हैं लेकिन प्रचारक को कम से कम खर्च करने का आदेश है बल्कि दुसरे के घर भोजन करके भी काम चलाना पड़ता है| =>अब बात करते हैं संघ के बाहुबल अर्थात जनसंख्याबल की तो आप ये जान लीजिये कि किसी भी संगठन के पास जनसंख्या बल इस प्रकार से होनी चाहिए जिससे उस संगठन का कार्य कमखर्च, कम मेहनत और कम समय में हो जाये और ये तभी होगा जब कोई भी संगठन अपने कार्यकर्ताओं के भावनाओं को, संगठन के निर्माताओं, वर्तमान संचालकों एवं अन्य अधिकारियों के प्रति पूज्य या श्रद्धा से भर दे| जिसके लिये किसी भी संगठन को अपने कार्यकर्ता को पक्का बनाने के लिये निरंतर प्रतिदिन ट्रेनिंग अर्थात शारीरिक और मानसिक (ब्रेनवाश) प्रशिक्षण देना पड़ता है अतः प्रशिक्षण देकर अपना भक्त बना लेता है जिससे उसके कार्यकर्ता का मन कभी भी उसके बारे में गलत बात बर्दाश्त ही न कर सके तो सोचने की बात ही क्या करनी, उस संगठन के ऊपर उसका कार्यकर्ता आँख मूंद कर विश्वास करता है| कार्यकर्ता संगठन पर आँख मूंद कर विश्वास एवं श्रद्धा करे तब तो कोई संगठन अच्छा चलता है अन्यथा अधर्मी संगठन चलाना अत्यंत कठिन हैं क्योंकि बुद्धिमान कार्यकर्ता इनकी सच्चाई जान लेता है और इन्हें समझते हीं संघ से निकल लेता है | यदि आप संघियों के व्यवहार को देखेंगे तो आप को ये समझ में आ जायेगा की संघ ऊपर वाले पद्धति से ही कार्य करता है जिसके कारण संघ के कुछ कार्यकर्ता संघ के आलोचक के साथ अत्यंत ही निंदनीय व्यवहार करते हैं पर दूसरो को हमेशा संस्कार एवं शिष्टाचार का ज्ञान देते रहते हैं| कार्यकर्ता धीरे धीरे इतने मुर्ख बन जातें हैं कि उनकी बुद्धि संघ से परे कुछ सोच ही नहीं पाती, भले ही संघ के संचालक लोगों ने, दुनिया को, इसके बताये गए मूल उद्देश्य (संघ इसके वास्तविक उद्देश्य पर ही चल रहा है मैंने दुनिया को बताये गए की बात की है, अन्दर से इनका उद्देश्य भारत का विनाश करना है पर बाहर से ये दुनिया को राष्ट्रभक्ति की बात कहके भ्रमित करते हैं) को छोड़ दिया हो तब भी ये कार्यकर्ता उद्देश्य छोड़ने पर भी यही कहेंगे की संचालक ठीक कह रहे है जबकि इन्हें उलटा विरोध करना चाहिए जैसा की आजकल भागवत के बयान को संघी सही सिद्ध करने पर तुले हैं, ये सब मति हरने का परिणाम है जिसे मनोविज्ञान से आसानी से समझा जा सकता है| आज वर्तमान में संघ में जा कर संघ को छोड़ आने वाले लाखो लोग है और जैसे जैसे संघ की सच्चाई लोगों को पता चलती है वैसे वैसे संघी संघ छोड़ के अपना अलग राह बनाता चलता है| ................ अब यहाँ समझने वाली बात यह है कि किसी भी धोखेबाज संगठन के सस्ते कार्यकर्ता जो अपना धन, समय यहाँ तक की जीवन भी देने के लिये तैयार हों, वो तभी तक संगठन में रहता है जबतक कि उसका, संगठन के प्रति श्रध्दा बना रहता है इसलिए संघ स्वयंसेवकों का मति हरता है अर्थात ब्रेनवाश कर देता है जिससे संघ की सच्चाई उसे पता ही न चले, पर जब कभी किसी की श्रद्धा जिसका आधार विश्वास है टूटता है तो, वो व्यक्ति, जिसके प्रति श्रद्धा किया था, उससे घृणा कर बैठता है और यह तभी होता है, जब उसे ऐसा लगता है कि वो व्यक्ति धोखा दे रहा है| यहाँ संघ के प्रति स्वयंसेवकों की श्रद्धा तब नष्ट हो जायेगी, जब कोई विद्वान व्यक्ति इनकी आँखे खोलेगा चूँकि मतिहीन स्वयंसेवकों को इतना आसानी से नहीं समझाया जा सकता है इसलिए इनसे अगर कोई ऐसा प्रश्न करे जिसका जवाब इनके पास न हो तो इनके अहंकार को चोट पहुचेगी और ये उस प्रश्न को अपने अधिकारीयों से पूछेंगे जब इनके अधिकारी भी विद्वान व्यक्ति के द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर नहीं दे पायेंगे तो संघ के उन कार्यकर्ताओं अर्थात स्वयंसेवकों के अहंकार को चोट पहुचेगी जिसके कारण स्वयंसेवक के मन में संघ के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न हो जायेगी जो आगे चलकर घृणा में बदल जायेगी अतः स्वयंसेवक का ईगो अर्थात अहंकार न टूटे भले उसे संगठन द्वारा किसी प्रश्न का उत्तर न दिया जाये और भले वो स्वयं किसी के प्रश्न का उत्तर न दे पाये और उत्तर न देने के कारण भी वो अपने आप को अपमानित भी न महसूस करे तो इसके लिये कुछ ऐसी धारणाएं बनानी पड़ेगी जिससे उसे प्रश्न का उत्तर न मिल पाने या किसी को न दे पाने के कारण लज्जा न आये बल्कि वो ये सोच ले की जरुर कोई बड़ी बात होगी जिससे मै इसका उत्तर न दे पा रहा हूँ, इस परिस्थिति में भी उसकी संघ के प्रति श्रद्धा समाप्त न हो अतः इसके लिये संघ ने कुछ झूठे धारणाएं बनाये है जिसे स्वयंसेवकों के मन में प्रतिदन, शाखा के माध्यम से, ब्रेनवास करके स्थापित किया जाता है और ये झूठी धारणाएं संघ ने पुरे देश के संघियों में बना रखा है जिसमे अधिकांश प्रचारक भी भ्रमित रहकर संघ के लिये पुरे निष्ठा से कार्य करते है| जो निम्नलिखित हैं| 1:-संघ को जानना है तो शाखा में जाओ| 2:- संघ को समझना बहुत कठीन है बड़े बड़े लोग जब संघ को नहीं समझ पाते तो तुम और हम क्या है? गुरु गोलमालकर जी ने भी कहा था कि संघ को मै नहीं समझ पाया अतः उनके सामने हम क्या चीज हैं| 3:- संघ कुछ नहीं करता जो करता है स्वयंसेवक करता है| 4:- संघ कोई धार्मिक संगठन नहीं है ये एक सामाजिक संगठन है या संघ ने हिन्दुओं का कोई ठेका नहीं ले रखा है| 5:- इस राष्ट्र को हम परमवैभवशाली बनाएंगे। 6:- वर्ण जन्म से नही होता कर्म से होता है| 7:- जातियों के कारण ये देश गुलाम रहा है और इस देश के पतन का कारण जाति व्यवस्था है अत: इसे मिटा देने से ही हिन्दुओं में एकता आएगी | 8:- हिन्दुओ को एकता लाना है तो सभी हिन्दुओ को वर्ण जाति की मर्यादा हटा कर आपस में रोटी बेटी का सम्बन्ध करना चाहिए| 9:- आपने क्या किया देश( धर्म, गाय, संस्कृत जिस विषय पर प्रश्न करो उसी पर आपसे उलटा पूछ लेंगे) के लिये ये उपरोक्त बातें किस प्रकार झूठीं हैं मै इसपर आपसे क्रमशः चर्चा करता हूँ| => पहला बिंदु है संघ को को जानना है तो शाखा में जाओ अब आप देखेंगे की जब संघी आपके प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाते हैं तो वो कहते है कि संघ को समझना इतना आसान नहीं है, एक बार गुरु गोलमालकर ने भी कहा था कि “संघ को आजतक मै भी नहीं समझ पाया” अतः संघ को हम और आप क्या समझेंगे| मित्रो यहाँ पर प्रश्न यह उठता है कि जब गुरु गोलमालकर ही संघ को नहीं समझ पाए जो कि संघ के अबतक के सबसे विद्वान व्यक्ति माने जाते है तो ये संघी किस हिसाब से हमें शाखा में बुलाते है? वहा क्या हमें समझायेंगे भला जब इनके पूज्य गुरु ही नहीं समझ पाए संघ को अतः ये कुछ नहीं, बस हमें भी ब्रेनवाश करने के लिये बुलाते है अपने शाखा में जिससे हम भी इनके भ्रम में पड़े रहे | मित्रो शाखा में आखिर होता क्या है? जो आपको संघ समझ में आ जायेगी ? शाखा में प्रार्थना होता है पर प्रार्थना में से भी अगर आप कुछ पूछ लीजिये तो ये संघी वो भी नहीं बता पायेंगे क्योंकि ये भेड़ की तरह फॉलो अर्थात नक़ल करने वाले लोग है ये किसी भी विषय में गहराई से चिंतन नहीं कर पाते प्रार्थना के अलावा शाखा में खेलकूद, व्यायाम, गीत, अमृतवचन, शुभाषित, वचन इत्यादि यही सब होता है| मित्रों इन सब विषयों से आपको क्या ये पता चल जायेगा कि नागपुर में चन्द लोग मिलकर क्या गुप्त फैसले लिये है? जो आगे चलकर भारत को, सनातन धर्म को, सनातन संस्कृति को न जाने कैसे प्रभावित करेगा| साथियों यदि आपको किसी संगठन की सच्चाई जाननी है तो ये आवश्यक नही है कि उसे ऊपर से अर्थात बनने के असली उद्देश्य को ही समझा जाये आप उसे जमीन पर चल रही उसकी गतिविधि, उसके वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के आचरण और भाषण से भी जान सकते हैं कि वो जो कहते हैं वही करते हैं या नहीं, इसके लिये आपको उस विषय का गहरायी से अध्ययन होना चाहिए जो इनका उद्देश्य है| ये ठीक इसी प्रकार से है जैसे गणित में दाये से बाये सिद्ध करते है तो बाये से दाये भी सिद्ध कर सकते है अर्थात किसी व्यक्ति की अच्छाई सुन कर उस पर विश्वास करने से अच्छा है उसके चरित्र से उसे समझा जाये उदाहरण के लिये यदि कोई कहे कि संघ समझना कठिन है तो आप ये जान लीजिये कि वो स्वयं भ्रमित है और दूसरों को भी कर रहा है क्योंकि कोई भी संगठन उनके विचार और व्यवहार से समझे जा सकते है और 90 वर्ष तो समझने के लिये पर्याप्त है अतः यह कहना की संघ को समझना हो तो शाखा में आवो, ये बात उसी प्रकार है कि कीचड़ को समझना है तो उसमे लोटो उसमे घुस के देखो जबकी दूर से भी देख के सूंघ के कीचड़ को समझा जा सकता है| =>अब बात करते है दुसरे बिंदु कि तो मित्रों, ये एक मनोवैज्ञानिक ड्रामा है जिससे की संघ के कार्यकर्ता स्वयं भी भ्रमित रहें और दुसरे को भी भ्रमित करके रखें, जब कोई व्यक्ति संघ पर तथ्यात्मक प्रश्न करता है और संघी जवाब नहीं दे पाते तो ये कभी उस प्रश्न का उत्तर जानने का प्रयास नहीं करते अपितु उलटा ये सोच लेते है कि जब संघ को गुरु गोलमालकर नहीं समझ पाए तो वो क्या समझेंगे भला, और यही बात ये, प्रश्नकर्ता को उसके उत्तर के बजाय कहते है, कि संघ को समझना अत्यन्त कठिन है या नामुमकिन है| मित्रों दरअसल मनुष्य का मनोविज्ञान ये कहता है की यदि कोई व्यक्ति किसी संगठन या व्यक्ति के प्रति अथाह श्रद्धा रखता हो और यदि कोई उसे उसके संगठन या श्रध्येय व्यक्ति की सच्चाई उसके सामने रखे जिसका जवाब उस व्यक्ति के पास न हो तो उस व्यक्ति का श्रद्धा अपने संगठन या अपने श्रध्येय व्यक्ति के प्रति नष्ट होने लग जाता है और कभी कभी तो ये श्रद्धा उलटा घृणा में भी बदल जाती है और ये होता है व्यक्ति के अहंकार अर्थात इगो टूटने के कारण अतः ऐसा न हो, इसलिए संघ ने जिसमे स्वयं गुरु गोलमालकर ने ये तक कह दिया कि संघ स्वयं उन्हें समझ न आया तो और किसी को क्या समझ में आएगा ये एक सोची समझी रणनीति है बस, मित्रों अब आप स्वयं सोचिये की संघ के एकमात्र सबसे विद्वान माने जाने वाले व्यक्ति, जो द्वितीय सरसंघचालक रह चुके हैं और जिनके कार्यकाल में संघ का सबसे अधिक विस्तार हुआ, ऐसे व्यक्ति को जब संघ न समझ आया तो आखिर संघ जैसे संगठनो के होने का उद्देश्य क्या है इस देश में? मित्रों सच्चाई तो ये है की संघ समझना बड़ी सरल है और इसके लिये ज्यादा कुछ नहीं बस आप संघियों के भाषण सुनिए और भागवत गीता का अध्ययन कीजिये| यदि आपको भगवत गीता समझ में आ गया तो आपको बड़ी सरलता से संघ भी समझ में आ जायेगा और जिसे संघ समझ में आ जाता है, वो संघ को छोड़ के चला जाता है चाहे वो कितने ही वर्षों तक संघ में रहा हो, जैसे की मैंने स्वयं संघ के लिये अपने जीवन का अनमोल समय दे दिया पर जैसे ही मैंने सनातन धर्म और सनातन समाज व्यवस्था को समझा वैसे ही संघ और इसके विचारो की तिलांजलि दे दी| संघी अपने पूर्व प्रचारकों, अधिकारीयों के झूठे महिमामंडन करने के लिये, समाज के पैसे से, दुनियाभर के फर्जी साहित्य छपवातें है और समाज में बटवातें हैं, जिसे 2% लोग भी नहीं पढ़ते, कार्यालयों में कूड़े के तरह सारा साहित्य पड़ा रहता है, पर ये संघी कभी किसी को गीता,रामायण, पुराण इत्यादि शास्त्र पढ़ने को नहीं कहते क्योंकि ये जानते है, यदि हिन्दू समाज, हिन्दू शास्त्र पढ़ने लग जायेगा तो सबसे पहले संघ को ही लात मार के अलग हो जायेगा अतः ऐसा न हो इसलिए ये सब बकवास बाते संघी सबको कहते रहते है कि संघ समझना अत्यंत कठीन है या नामुमकिन है और इस भ्रम को फ़ैलाने का काम स्वयं गुरु गोलमालकर ने भी किया था क्योंकि वो भी जानते थें कि संघ की सच्चाई जितना ज्यादा लोगों को पता चलेगी उतना ही लोग इससे दूर होते जायेंगे इसलिए लोगों को इस बात का भ्रम डाल दो और, सबसे ज्यादा अपने कार्यकर्ताओ में ही कि, संघ समझना अत्यंत कठिन ही नहीं नामुमकिन है, जिससे अनेक प्रश्नों का सामना करने के बाद भी संघी को यही लगे कि भले वो संघ के प्रश्नों का उत्तर न दे पा रहा हो पर, संघ सही है और इस प्रकार वो संघ से दूर न हो| => अब आते है तीसरे बिंदु पर, तो आप पायेंगे कि ये जुमला प्रायः संघ के अधिकारी उपयोग करते हैं जो की स्वयंसेवकों को मुर्ख बनाने के लिये किया जाता है, यदि किसी स्वयंसेवक के द्वारा संघ के कार्यों पर प्रश्न उठाया जाता है या किसी कार्य को लेकर संघ के योजना या विचार पर स्वयंसेवकों द्वारा अपने अधिकारियो से प्रश्न किया जाता है और ये अधिकारी या प्रचारक कोई उत्तर नहीं दे पातें तो सबसे पहले ये इसी जुमले का उपयोग करके सारी बात ख़त्म कर देतें है कि संघ कुछ नहीं करता, जो करता है स्वयंसेवक करता है| जबकि सच्चाई ये है कि नागपुर से कुछ लोग निर्णय लेते हैं और प्रचारकों के द्वारा स्वयंसेवको एवं समाज पे थोप देते हैं, पर समाज द्वारा प्रश्न पूछने पर यह कह देते हैं कि यदि संघ जानना है तो शाखा आओ और स्वयंसेवकों के प्रश्न पूछने पे कह देते हैं कि संघ कुछ नहीं करता है सबकुछ स्वयंसेवक ही करता है, जिससे स्वयंसेवक इनसे प्रश्न करना छोड़ दे और ये मान बैठे कि जब सब हमें ही करना है तो फिर हम अपने अधिकारीयों से प्रश्न ही क्यों कर रहे है अतः वो इसप्रकार शान्त हो जाता है, दरअसल ये झूठी धारणा स्वयंसेवकों में इसलिए फैलाई गयी है जिससे कि संघ के कार्यकर्ता संघ पर प्रश्न चिन्ह न लगा सकें और लगायें तो भी उन्हें प्रश्न का उत्तर दिए बिना चुप कराया जा सके| ये एक मनोवैज्ञानिक तरीका है जिसमे अपने कार्यकर्ताओं से मनमाना कार्य करवाना और उन्हें स्वयं कर्तापन का भाव प्रकट करा देना जिससे उनकी श्रद्धा प्रश्न के उत्तर न मिलने पर भी कम न हो और संघ स्वयंसेवकों का मनमाना उपयोग करता रहे| ये सारे जुमले आपको पुरे देश में संघियों द्वारा सुनने को मिल जायेंगे| => चतुर्थ बिंदु है कि संघ कोई धार्मिक संगठन नहीं है बल्कि एक सामाजिक संगठन है| साथियों जब भी आप संघ के लोगों से कहेंगे कि संघ ने हिन्दुओं या हिन्दू धर्म के लिये क्या किया तब ये संघी आपसे कहेंगे कि संघ कोई धार्मिक संगठन नहीं है अपितु एक सामाजिक संगठन है और ज्यादा प्रश्न करने पे ये उत्तेजना पूर्वक कहेंगे कि संघ ने क्या हिन्दुओ का ठेका ले रखा है? मित्रो ये शब्दावली, ये ऐसे ही नहीं उपयोग करते है इसके पीछे अगर आप चिंतन करेंगे तो पायेंगे कि ये वास्तव में ऊपर से नीचे की ओर आने वाली विचारधारा है जिसे स्वयंसेवकों तक पहुँचा दिया जाता है और ये सबकुछ तय होता है संघ के सबसे ऊपर के अधिकारीयों द्वारा और ये सब बातें आपको पुरे देश में स्वयंसेवकों के द्वारा सुनने को मिल जायेगा जबकी पहले ये ऐसा नहीं बोलतें थें, पर अब अहंकारवश बोलने का स्वभाव बनाया गया है| पूरी दुनिया जानती है कि संघ भारत का एक हिन्दू संगठन है, हिन्दुओ के लिये ही शंकराचार्यों से उद्घोष करवाया गया कि सभी हिन्दू आपस में सहोदर है पर शंकराचार्यों को क्या पता था कि इन्होने हिन्दू का अलगही मतलब निकाल रखा है और मुसलमानों को सिर्फ भारत में पैदा होने के वजह से ही हिन्दू मानने लगेंगे, ये आज इस बात के लिये पूरा जोर लगा रहे है कि हिन्दू समाज मुसलमानों से हर प्रकार का मेलजोल रखने लगे जबकि सच्चाई ये है कि मुस्लिम कभी किसी से मेलजोल नहीं रख सकें और भारत का अभी तक का इतिहास भी यही कहता है, ये अपने को सामाजिक संगठन कहते है पर हिन्दू धर्म को प्रभावित करने और उसके स्वरुप को बिगाड़ने के अनेकों प्रयास लगातार करते रहते हैं और आज समाज में जो व्यभिचार और पापाचार बढ़ा है जिसमे जाति एवं वर्णसंकरता प्रमुख है वो इन्ही जैसे लोगों की देन है, इसमे संघ प्रत्यक्ष नहीं अप्रत्यक्ष कारण है, जब भी आप शिक्षा वर्ग करेंगे या शाखा में जायेंगे या अन्य कहीं इनका भाषण सुनेंगे तो आपको ये हमेशा हिन्दू धर्म और हिन्दुओ के ऊपर ही बोलते मिलेंगे| ये हमेशा हिन्दुओं के कमियाँ गिनाएंगे ये कहेंगे हिन्दुओं को ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए, हिन्दुओ को, इनके साथ रहना चाहिए, उनके साथ रहना चाहिए, हिन्दू धर्म ऐसा है, हिन्दू धर्म वैसा है, इन्होने हिन्दू धर्म को लेकर विश्व हिन्दू परिषद् खड़ा कर दिया पर उसे कभी स्वतंत्र कार्य नहीं करने दिया, इन्होने हिन्दू धर्मं के स्वरुप को बिगाड़ने और हिन्दुओं को भ्रमित करने के लिये फर्जी शंकराचार्य तक खड़े कर दिए पर जब भी कहो तो कहते है संघ ने हिन्दुओं का कोई ठेका थोड़े ले रखा है अरे भैया आपने हिन्दुओं का ठेका नहीं ले रखा है तो किसका ले रखा है वही बता दो? यदि इनके स्वयं के संगठन में किसी ने हिंदुत्व के लिये कुछ करना चाहा तो उसे साजिश के तहत निकाल बाहर कर देतें हैं, इसका ताजा उदहारण अभी तुरंत की घटना है जिसमे तोगड़िया जी को सिर्फ मुसलमानों और राम मंदिर बनने के लिये आवाज उठाने के कारण जबरदस्ती हटाया गया, जबकि वो इनके बहुत पुराने स्वयंसेवक थें, यद्यपि मै तोगड़िया जी के हिंदुत्व को इनका हिंदुत्व ही मानता हूँ क्योंकि वो उसी विचारधारा के है अतः उनके हिंदुत्व से सहमत नहीं हूँ पर वो मुसलमानों के विषय में संघ से मतभेद रखते थें जिसके कारण उन्हें अलग किया गया ये बात स्पष्ट दिखाई देती है अतः जो संगठन हिन्दुओं को पिछले 90 वर्षों से प्रभावित कर रहा है उनको सपने दिखा कर राजनीतक लाभ लेते आया है वो अगर आज ये कहता है की संघ ने हिन्दुओं का ठेका नहीं ले रखा है तो इससे ये स्पष्ट हो जाता है कि संघ सदा से ही हिन्दुओं को धोखा दे रहा था जो की आज जा कर दिख रहा है और ये इनके बातों और व्यवहार से स्पष्ट हो जाता है| => अगला बिंदु आता है जिसमे ये कहते है कि, राष्ट्र को हम परमवैभवशाली बनायेंगे और यही बात ये प्रार्थना के माध्यम से प्रतिदिन दोहराते हैं पर यदि आप इनसे पूछ दीजिये कि भाईसाब आप राष्ट्र को परम वैभवशाली कैसे बनायेंगे? कब तक बना देंगे? और 90 वर्षों में राष्ट्र को परम वैभवशाली बनाने के लिये आपने अर्थात संघ ने क्या किया?, तो ये आपको किसी बात का उत्तर नहीं दे पायेंगे बल्कि कहेंगे संघ को समझना कठीन ही नहीं नामुमकिन है और फिर कहेंगे की संघ को समझना है तो शाखा में आओ, जो की इनके ही बात का विरोधाभाष है, मित्रो ये यहाँ तक नहीं बता पाते कि वास्तव में परम वैभवशाली राष्ट्र कहते किसे है? क्या है इसकी परिभाषा? मित्रों सच्चाई ये है कि इनका उद्देश्य ही नहीं है कि ये राष्ट्र को परम वैभवशाली बनाये बल्कि इनका जो असली उद्देश्य है वो उसी में लगे हैं और वो है मुसलमानों के वर्चस्व को स्थापित होने तक, जनसंख्या बढ़ने तक, हिन्दुओं को रोके रखना, जिसके लिये इन्होने मुस्लिम राष्ट्रीय मंच तक बना रखा है जिससे ये सदैव मुसलमानों के झूठे अच्छाईयों का प्रचार हिन्दुओं के घरों में करते रहते हैं जिससे आज का हिन्दू, मुसलमानों द्वारा अपने पूर्वजों के ऊपर हुए अत्याचार को भूल जाये और इनसे मेलजोल और रोटी-बेटी का सम्बन्ध कर ले और असावधान हो जाये जिससे मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ने के बाद वो हिन्दुओं पर जब भारी पड़ने लगे तो उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें और इस प्रकार आगे चलकर 15-20 वर्षों में जब पुरे देश में हिन्दू मुसलमान का भयंकर युद्ध हो, लाखों करोड़ों लोगों का नरसंहार हो और भारत सरकार इसे रोक न पाए तब ब्रिटेन को हस्तक्षेप करना पड़े और वो भारत को फिर से अपने अंतर्गत लेले क्योंकि भारत को ब्रिटेन ने आजाद नहीं किया था, बस अपने संसद में कानून पास करके 99 वर्ष के लिये सत्ता हस्तांतरण किया था, पर जब भारत भयानक गृहयुद्ध से जूझने लगेगा और किसी के सम्भाले नहीं सम्भलेगा, तो संयुक्त राष्ट्र संघ एवं अन्य ईसाई राष्ट्रों के सहयोग से ब्रिटेन राजघराना फिर इस देश को अपने अंतर्गत ले लेगा और इसे पुनः लुटने लगेगा या यदि ये संभव नहीं हुआ तो संयुक्त राष्ट्र संघ और अनेक राष्ट्रों के द्वारा इसे हिन्दू और मुसलमान देश सहित अनेक भागो में बाट दिया जायेगा जिसे स्वयं भारत के हिन्दू भी नहीं रोक पायेंगे क्योंकि रोज रोज के दंगा, मारकाट से बेहतर वो मुसलमानों से अलग हो जाना समझेंगे| इसी लिये संघ लगातार ब्रिटिश राजघराने के इशारे पर ऐसा कार्य करता है जिसमे हिन्दुओ का विनाश होना निश्चित है, वैसे भी अंग्रेजो के आने से पहले मोदी इस देश को सड़क, रेलवे, हवाई अड्डा, अच्छे अस्पताल इत्यादि से भर देगा जिससे आने वाले समय में अंग्रेजो को ज्यादा मेहनत न करना पड़े और बड़े आराम से देश को अपने कब्जे में लेकर लुटता रहे पर संघी सरकार कभी, हिन्दुओ के सम्मान से जुड़े विषयों पर कोई कार्य नहीं करेगा जैसे राम मंदिर, गौ रक्षा, संस्कृत भाषा, हिन्दू मंदिर से सरकार का कब्जा हटाने का कानून, गुरुकुल को धन देने का कानून इत्यादि अनेक विषय हैं जिसपे संघी सरकार कोई कार्य नहीं करेगा क्योंकि इससे ब्रिटिश राजघराने को दिक्कत हो जायेगी क्योंकि इससे हिन्दू के साथ साथ हिन्दुत्व भी सुदृढ़ होगा, जो की गरीब हिन्दुओं के ईसाईकरण में बाधा डालेगा अतः संघ इन सब विषयों पर कार्य करने का दिखावा तो कर सकता है पर कभी प्रभावी तरीके से कार्य नहीं कर सकता, जो कि आज सत्ता आने के बाद दिख रहा है| अतः इससे सिद्ध होता है कि, इनका ये कहना कि राष्ट्र को परम वैभवशाली बनायेंगे, ये बात सर्वथा झूठ है| => अगला बिन्दु आता है इनका कि वर्ण जन्म से नहीं कर्म से होता है जो कि सर्वथा झूठ है और ये बात ये संघी और आर्यसमाजी, सीधे साधे लोगों को बरगला कर, वर्णसंकरता फैला रहे हैं पर इनसे पूछ दो की कौन से कर्म, कौन से गुण के आधार पर ये वर्ण तय होता है तो ये कुछ नहीं बता पायेंगे बस आपको जातिवादी कहके भाग जायेंगे और चूँकि मानवों के लिये सनातन धर्म व्यवस्था का आधार ही वर्ण व्यवस्था है जिसके बिना सबकुछ नष्ट हो जायेगा चाहे वो भौतिक उन्नति हो या अध्यात्मिक उन्नति अतः ये उसका विनाश पहले करना चाहते हैं| वर्ण व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जिसमे मानव का ईश्वर द्वारा गुणों और कर्मो के आधार पर वर्गीकरण किया गया है जिसमे व्यक्ति को स्वभाव के अनुसार जन्म मिलता है और फिर उसके अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता मिलती है और इसी बात को गीता जी में भगवान ने भी बड़े सरल तरीके से समझाया है| इसपे अंग्रेजों की बहुत बड़ी कूटनीति थी जिसे उन्होंने दयानन्द(आर्य नमाज), राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानन्द और संघ सहित अनेक लोगों द्वारा हिन्दू समाज को भ्रमित करने के छल में सफलता पायी और आज तक सफलता पा ही रहे है| आप ये जान लीजिये वर्ण और इसके सभी जातियाँ जन्म से सिद्ध होती है वो भी गुण और कर्म के आधार पर जिसमे गुण 3 (सत, रज, तम )है और कर्म भी 3 (संचित,प्रारब्ध और क्रियमाण) है| मनुष्य के स्वभाव के अनुसार ही उसे उस कुल में परिवार में जन्म मिलता है जिस कुल के स्वभाव से वो जीवात्मा समानता रखता है, ये पूरी श्रृष्टि ही त्रिगुणात्मक है अर्थात इस सृष्टि में जितने भी जड़, चेतन, प्राणी, पदार्थ इत्यादि हैं उन सबके प्रकृति को इन तिन गुणों से सिद्ध किया जा सकता है और कर्म 3 है, जिसमे असंख्य जन्मो से लेकर पूर्व जन्म के मृत्यु तक के कर्म का एकत्रीकरण, संचित कर्म कहलाता है और असंख्य जन्मो से लेकर पूर्व जन्म के अन्त तक के अर्थात संचित कर्म का एक अंश उसके अगले जन्म में भोगने के लिये फलरूप में जीव को प्राप्त होता है अथवा बन जाता है जिसे अगले जन्म में भोगना ही पड़ेगा को, प्रारब्ध कर्म कहते है और प्रत्येक मनुष्य अपने प्रारब्ध को ले कर ही जन्मता है जो की दो जुड़वाँ बच्चे में भी भेद पैदा कर देता है और तीसरा है क्रियमाण कर्म, क्रियमाण कर्म मानव के जन्म के बाद वाले कर्म को कहते है जिसे मानव को अपने विवेक से करने की स्वतंत्रता है अतः इन्ही आधारों पर ईश्वरीय विधान जिसे धर्म कहते है, के अंतर्गत ईश्वर ने वर्णाश्रम नियम बनाये और क्रियमाण कर्म को अपने स्वभाव जो की जन्म से मिला है, के आधार पर करने की सलाह गीता के 18रवे अध्याय में दिए है, पर आर्यसमाजियों और संघीयों ने इसे जन्म के आधार पर मानव देह द्वारा किये जाने वाले कार्य जिसे कौशल और कार्य करने के तरीके के ज्ञान को गुण कह दिया है, जैसे खाना बनाना कर्म है और खाना बनाने की कला का ज्ञान होना इनके हिसाब से गुण है अतः इसी तरह के अनेक कार्यों के आधार पर ये वर्ण व्यवस्था तय करते है, जो कि पूरा असत्य है| ये जन्म के बाद कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था सिद्ध करके भ्रमित करते है जो कि सनातन धर्म और प्रकृति के नियमो का घोर उलंघन है| (मित्रो इसके बारे में विस्तार से व्याख्या मै अपने अगले लेख में करूँगा) मित्रों आपको लगेगा कि ये आखिर ऐसा क्यों करते हैं? तो आप ये जान लीजिये कि सनातन धर्म और भारतीय अर्थशास्त्र का पूरा आधार ही वर्ण व्यवस्था है जिसके कारण भारत कभी सोने की चिड़िया हुआ करता था और वर्णाश्रम के कारण ही सैकड़ो वर्षों से हिन्दू समाज बचा रहा, भारत बचा रहा अन्यथा मुसलमान तो 30-40 वर्षों में ही अनेक राष्ट्रों को पूरी तरह से इस्लामिक बना लेते थें, पर भारत में 500-600 साल लगातार आक्रमण करने तथा राज करने के पश्चात भी वो सनातन धर्म को नष्ट नहीं कर पाए क्योंकि वो इसके स्वरुप को कभी नहीं बिगाड़ पाए जिसे अंग्रेजों ने कई वर्ष अध्ययन करके समझा और बाद दयानन्द, विवेकानंद, संघ इत्यादि के माध्यम से भारत में लागु करवाया जो की आजतक चल रहा है| इसे आगे और भी स्पष्ट तरीके समझेंगे | => ये अक्सर कहते मिल जायेंगे कि जातियों के कारण ये देश गुलाम रहा है और इस देश के पतन का कारण जाति व्यवस्था है अतः इसे मिटा देने से ही हिन्दुओं में एकता आएगी, जैसा कि ये लोग कहते है कि हिन्दुओं में एकता नहीं थी क्योंकि उनमे जातिवाद था तो मित्रों मै इनके इस बात का खण्डन इस बात से कर सकता हूँ कि अगर आप पिछले हजार वर्षों का इतिहास उठाकर देखेंगे तो जितने भी युद्ध हमारे देश में हुए, उनमे से क्या सारे युद्ध हम हार ही गए? तो आपको उत्तर मिलेगा कि हिन्दू राजाओं ने अनेक युद्ध जीते हैं, जिसके कारण मुघलों और उसके पहले जो लोग आयें उन्हें लगातार कई सौ वर्षों तक चुनौती मिलती रही यहाँ तक की 1857 की क्रान्ति में भी भारतीयों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए तो आप ये बताइए की क्या तब जातियाँ नहीं थी? जब हम जीत रहे थें, यदि आप हारने का कारण जाति को मानते है तो जीतने का कारण भी जाति को ही मानिये क्योंकि जाति तब भी थी, जब हम हारे और तब भी थी जब हम जीतें| इसी तरह आप यदि पराधीनता का कारण जाति को मानते है तो स्वाधीनता का कारण भी जाति को ही मानिये क्योंकि जाति तब थी और आज भी है| सच्चाई तो ये है कि जातियों में संगठित भारतीय आपस में अपने राष्ट्र और धर्म के लिये इतना संघठित था जैसे कि एक धागे से सारे मोती जुड़े होते हैं, अतः हमारी जाति व्यवस्था को मुघल कभी तोड़ नहीं पाए थें, जिसके कारण मुघलों के राज होने के पश्चात भी हम दुनिया में सबसे अधिक शिक्षित और धनवान थें| आज की तुलना में सबसे अधिक व्यापार हम, दुनिया में, सन 1800 के आसपास तक करते रहे, (उसके बाद अंग्रेजो ने कृषि और शुद्रो के उद्योगों को नष्ट कर दिया जिससे सभी भूखे मरने लगे और इस प्रकार धीरे धीरे समाज में अंग्रेजों ने वैमनश्यता को बढ़ावा दिया जो आज भी जारी है), जबकि मुघल बहुत पहले आ चुकें थें इससे यह सिद्ध होता है कि जातियों से इस देश को कभी कोई खतरा नहीं रहा है बल्कि उलटा मजबूती ही रही है| आप पूछेंगे कि कैसे जातियों में मजबूत था भारत? तो इसे, इस प्रकार समझिये, जब मुघल युद्ध करते तो वो क्षत्रियों से युद्ध करते पर, धन तो वैश्यों के पास होता अतः उसके लिये उन्हें फिर वैश्यों से भी लड़ना पड़ता, और अगर वो वैश्य से लड़ कर एक बार धन छीन भी लेतें तो वैश्य के पास धन फिर आ जाता क्योंकि वैश्य तो केवल व्यापारी था, उत्पादन का सारा कार्य तो शूद्र करते थें अतः शुद्र व्यापार के लिये फिर से वैश्य को उत्पाद दे आता अतः उन्हें वैश्यों के बाद शुद्रों से लड़ना पड़ता और इतना आसानी से वो पुरे समाज से नहीं लड़ पातें क्योंकि ब्राह्मण स्वयं मुघलों से लड़ने के साथ साथ पुरे समाज को धर्म में बांध कर रखता था और सबका धर्मोचित कर्त्तव्य भी समझा देता था जिसे समाज चुपचाप स्वीकार कर लेता था| समाज ब्राह्मण के धर्मोचित ज्ञान को इसलिए मानता था क्योंकि ब्राहमण स्वयं इसे आचरण से दिखाता था, अपना गला कटा लेता था पर सिखा सूत्र नहीं कटाता, अतः इसे देख कर हिन्दू समाज भी ब्राह्मण, साधु, सन्त, आचार्यों के धर्म ज्ञान को मान के जीवन जीता, फिर ब्राहमण को सबसे अधिक, धर्म कार्य करने के लिये, वैश्य धन देता जिससे गुरुकुल, मंदिर इत्यादि के सभी प्रकल्प चलते अतः कुछ ही समय में पूरा समाज फिर खड़ा हो जाता, लेकिन प्रायः इसकी नौबत नहीं आती क्योंकि मुस्लिम, क्षत्रियों से जीत भी जातें थें तो भी वो इतना कमजोर हो जातें थें कि पुरे समाज से लड़ नहीं पातें अतः इस प्रकार कई सौ वर्षों में भी वो हिंदुत्व को समाप्त नहीं कर पाए क्योंकि ज्ञान के मूल में ब्राह्मण था तो इधर उद्योग के मूल में शुद्र था, और मध्य में क्षत्रिय और वैश्य मिलकर रक्षा और अर्थ के प्रकल्प सम्भाल लेतें| फिर आप कहेंगे कि आखिर भारत पराधीन कैसे हुआ? तो इसका उत्तर है कि हमने शत्रु के साथ कई बार अत्याधिक उदारता दिखाई जैसे पृथ्वीराज चौहान ने दीखाई, कुछ राजा अपने ही लोगो द्वारा धोखा देने के कारण हारे और कुछ सेना की संख्या कम होने कारण तो, कुछ आधुनिक हथियारों के न होने के कारण हारे पर कोई राजा जाति के कारण नहीं हारा, आप एक भी उदाहरण मुझे दिखा दीजिये जिसमें कोई राजा मात्र जाति व्यवस्था के कारण युद्ध हारा हो तो मै मान जाऊंगा और वैसे भी युद्ध तो प्रायः क्षत्रिय ही लड़तें थें, फिर किस हिसाब से जातिवाद उनके हारने में कारण बनेगी भला, फिर आप मुझसे पूछेंगे कि आखिर जातियों के होने से समाज को खतरा क्या है? और आज आर्यसमाजी, संघी सहित अनेक लोग इसे मिटाना क्यों चाहते है? तो इसका उत्तर मै यह देना चाहता हूँ कि जब अंग्रेज यहाँ आये और कुछ समय बिताने के बाद उन्होंने देखा कि आखिर ऐसी क्या बात है, भारत में, जो कई सौ वर्ष लगातार आक्रमण और शासन करने के पश्चात भी मुसलमान भारत को पूरी तरह से इस्लामिक नहीं बना पाए? इस्लामिक बनाने की बात तो छोडिये वो यहाँ के धर्म संस्कृति और परम्पराओं में रत्ती भर भी बदलाव नहीं कर सकें, जबकि अनेक राष्ट्रों को मुसलमानों ने तो मात्र 100 वर्ष के भीतर ही समाप्त कर इस्लामिक बना लिया, ये सोचने में अंग्रेजों ने कई वर्ष लगाये और इसके लिये अनेक अंग्रेज विद्वान भेजें, जिसको यहाँ रहकर ये पता लगाना था कि आखिर ऐसी कौन सी बात है भारतीयों में, जो भारत की हस्ती मिटती नहीं है इसके पीछे का कारण क्या है? उन्होंने मैकाले, मैक्समुलर सहित अनेक लोगों को भेजा जिनमे कुछ गुप्त रूप से भी यहाँ अध्ययन कियें और अन्त में ये पता लगाया की भारत के मजबूती का कारण है, यहाँ की वर्ण और जाति व्यवस्था | जैसा कि मैंने ऊपर बताया युद्ध की बात जिसमे सभी जातियाँ एक दुसरे की सहयोगी सिद्ध होती थीं, अतः जाति व्यवस्था के आधार पर कर्म व्यवस्था भी थीं, जो की शास्त्र सम्मत है, जिसमे प्रत्येक व्यक्तियों के कार्य अर्थात रोजगार के साधन जन्म से उपलब्ध अर्थात आरक्षित थीं, जो की निश्चित थीं और कोई भी जाति दुसरे के काम को कभी नहीं करती थीं, तो फिर आज के तरह धनवान लोगों द्वारा धन के बल पर सबके कार्यो को हडपना संभव ही नहीं हो पाता था, मित्रो आप जब अर्थशात्र पढेंगे तब आपको पता चलेगा कि भारतीय अर्थशास्त्र, जो की दुनियां में सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है, में जातियों की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है और जातियों के बिना कैसे पूरा समाज कुछ लोगों का आर्थिक गुलाम बन सकता है जैसे आज बन रहा है, अभी कुछ दिन पहले ही खबर आयी थीं की भारत के 70% संपत्ति पे मात्र 1% लोगों का कब्ज़ा है और यह आगे चलकर बढ़ता ही जायेगा अतः कुछ समय बाद भारत की लगभग 90% संपत्ति कुछ गिने चुने लोगों के पास चली जायेगी और ये होगा धनवान लोगों द्वारा दुसरे के कार्यों को हड़पने से जो कि पहले संभव नहीं था क्योंकि पहले कोई दुसरे जाति का कार्य हड़प नहीं सकता था, इसी बात को अंग्रेजो ने कई वर्ष के अध्ययन के पश्चात समझा और लग गये ऐसे लोगों की तलाश में जो इस देश की सारी व्यवस्थाओं को, जो की सनातन शास्त्र पर आधारित है, के स्वरुप को नष्ट करने में अंग्रेजों का सहयोगी सिद्ध हो सके और उन्हें इसकी सफलता तब मिली जब उन्होंने शंकर सन्यासी दयानंद सरस्वती को पा लिया, चूँकि दयानंद सरस्वती स्वयं एक ब्राह्मण और शंकर सन्यासी था तो ये सबसे तगड़ा हथियार सिद्ध हुआ, इसने तो ईश्वर के साकार स्वरुप का ही खण्डन कर दिया, भक्ति परम्परा जिसके कारण मुघलो के अत्याचार के कारण भी लोग भगवान पे भरोषा करके मुग़लों से लड़ते रहे, उस शास्त्र सम्मत पूरी परम्परा को ही गलत सिद्ध कर दिया, पुराणों जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ को फाड़ के फेकने लायक बता दिया और यहाँ तक कि हिन्दू शब्द जो की हमारी दुनिया में पहचान है उसे अरबियों का गाली बता के हिन्दुओं को अपमानित किया और आजतक ये यही करते आ रहे हैं, इसने राम कृष्ण शिव इत्यादि सभी देवी देवताओं को केवल मानव बता दिया और ये जानबूझ कर इसलिए किया क्योंकि भोला भाला भारतीय इन्ही देवी देवताओं के सहारे सदैव धर्म से जुड़ा रहता था अतः इसे मुर्खता बता देने से हिन्दू, ईश्वर और धर्म से विमुख होकर सरलता से ईसाई बन जायेगा| ये सभी अंग्रेजों के संगठन मिलकर हिन्दुओं के एक बड़े हिस्से को भ्रमित करके उनको पतन के ओर ढकेल दिए जिसमे उनकी सारी मर्यादाएं टूट गयीं, इसी प्रकार के कार्यों के लिये अंग्रेजों ने स्वामी विवेकानन्द, राजा राममोहन राय को भी खड़ा किया तथा इनको महिमामंडित करने के लिये दुनिया भर के झूठे साहित्य छपवायें जिससे की हिन्दुओं में इनके प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो जाये और हिन्दू अपने मूल स्वरुप को इनके माध्यम से छोड़ दें| ब्रिटिश राजघराने का अभी तक का सबसे सफल योजना संघ के रूप में है जो आजतक उन्हें लाभ पहुँचा रही है, संघ के निर्माण के पीछे उनके कई योजनाएँ थीं, एक तो जब कभी भारतीय लोगों का कांग्रेस के प्रति मोह भंग हो जाये, तो उसका विकल्प भी इनको राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में देना था जिससे कि सत्ता इनके हाथ में सदैव रहे, दूसरा सबसे महत्वपूर्ण विषय है की संघ के होने से इनको देश में ईसाईकरण करने में सफलता मिल जायेगी और वही हुआ जब से संघ बना तब से लेकर आजतक आप देखेंगे तो कई करोड़ हिन्दुओं का ईसाईकरण हो चूका है, आप इसे पढ़कर आश्चर्य करेंगे कि आखिर ये क्या बात हुयी संघ तो कहता है कि वो हिन्दुओं के ईसाईकरण से रोकने वाला संगठन है फिर मै ये क्या कह रहा हूँ, तो मै आपको बता देना चाहता हूँ कि जब चौकीदार ही भीतर से चोर हो और ऊपर से चौकीदारी करने का ढोंग करता हो तो चोरी तो शनै शनै हो हीं जायेगी, ठीक इसी प्रकार संघ हिन्दुओं के रक्षा का ढोंग करता रहा और हिन्दु इनपर विश्वास करके चुप रहा पर सच्चाई तो ये है की इन्होने कोई काम नहीं किया सिवाय दिखावे के, दिखावे के लिये ये सभी प्रकार के शाखाये बना लिये जिससे हिन्दुओं को भ्रमित करके उनकी शक्ति को क्षीण करते रहें और धीरे धीरे इनका असली काम होता रहे, अंग्रेज इस देश की प्रत्येक दैवीय विषयों को नष्ट करना चाहते थें जिनमे शिक्षा व्यवस्था, गौ की शुद्धता, भाषा की शुद्धता, कृषि की शुद्धता, राजतन्त्र का स्वरुप, मानव के शरीर और मन-बुद्धि की शुद्धता, धर्म और शास्त्र की शुद्धता इत्यादि, और ऐसे सभी क्षेत्रों में अंग्रेजो ने पर्याप्त सफलता पायी जिसमे उन्होंने गौ को नष्ट किया और आजतक भारत के शुद्ध देशी गायों को समाप्त करने में लगे है, भारत की देवभाषा को समाप्त कर अपनी भाषा थोपने में सफल हुए हैं, कृषि नष्ट करने में सफल रहे है, बालीवुड जैसे व्यवस्थाओं को बना कर समाज में व्यभिचार पैदा करने में सफल रहे, महिलावाद बना कर भारत की परिवार व्यवस्था को तोड़ने में सफल रहे, भारत की शिक्षा व्यवस्था जिसमे गुरुकुल परम्परा थी उसे समाप्त कर कान्वेंट व्यवस्था स्थापित करने में सफल रहे, भारत की राजतन्त्र वाली व्यवस्था समाप्त कर उसके जगह पर अपने यंहा जैसी काल्पनिक तंत्र जिसे लोकतंत्र कहते है, को स्थापित करने में सफल रहे और आप ध्यान से देखें तो संघ ने इन सभी विषयों के शाखा के नाम पर कोई न कोई संगठन बना रखा है पर कभी इनके लिये पर्याप्त कार्य नहीं करता बस उतना ही करता है जिससे दिखावा हो सकें | हिन्दू धर्म के मूल स्वरुप को स्वयं नष्ट संघ कर रहा है, गौ रक्षा के लिये इन्होने संगठन बना लिया है पर गायों के लिये कुछ नहीं कर रहे है, इनकी बहुमत में सरकार होते हुए भी गायें निरंतर कत्लखानों में जा रही हैं, संस्कृत के लिये इन्होने संगठन बना लिया पर 20 राज्यों में सरकार होने के पश्चात भी संस्कृत भाषा के लिये कुछ नहीं करते सिवाए दिखावा के, इसके अलावा धर्म के क्षेत्र में विश्व हिन्दू परिषद् बना लिया, पर धर्म को नष्ट करने के लिये कई सारे नकली शंकराचार्य, साधु संत भी बना दिए जिससे हिन्दुओ को इनके माध्यम से पथभ्रष्ट किया जा सके और मुसलमान, राम मंदिर, गौरक्षा के नाम पर न जाने कितने हिन्दुओं का बलिदान ले लिये पर आज सबको स्थिति पता है क्या हो रहा है| केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार होने के पश्चात भी इन्होने राम मंदिर, गौरक्षा के लिये कुछ नहीं किया बल्कि मुसलमानों से मेलजोल करने को कह रहे हैं, इसी प्रकार शिक्षा हो गई, कृषि हो गई इत्यादि सभी के विषय में इन्होने शाखासंगठन बनाया है पर आजतक सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस का राजनैतिक पार्टी के रूप में विकल्प खड़ा करने में ही सभी शाखासंगठनों का उपयोग किये, ये सब कहने के लिये है कि भारत और हिन्दुओं के भलाई के लिये ये काम करते हैं, पर वास्तविकता ये है की ब्रिटिश राजघराने के इशारे पे ये स्वयं नाचते है और राष्ट्र तथा धर्म के नाम पर मुर्ख हिन्दुओं के झुण्ड को तैयार कर उसे वोट में बदलते हैं, यदि आपको ये सबकुछ नहीं समझ में आ रहा है तो पिछले 90 साल में इनके द्वारा किये गए कार्यो का परिणाम देख लीजिये आपको पता चल जायेगा की ये हिन्दुओं को राष्ट्र धर्म जैसे भावनात्मक विषयों पर जोड़ तो लिया पर उनके शक्ति को लगातार सिर्फ नष्ट करने में ही लगे हैं न की धर्म के लिये उसका उपाय करने में | इसी प्रकार अंग्रेजो ने दयानन्द के माध्यम से आर्यनमाज संगठन बनवा कर, सनातनधर्म के भ्रष्ट स्वरुप को समाज में स्थापित करवाया जिसके कारण लाखों हिन्दू, धर्म से पथभ्रष्ट हुए, धर्म शास्त्रों की गलत व्याख्या सहित, शास्त्र में गलत श्लोक लिख कर मिलावट करने का पाप भी आर्यनमाजियों ने किया, जिसके कारण आज का आधुनिक हिन्दू, सनातन धर्म और शास्त्र का मजाक उड़ाने लगा और बड़ी मात्रा में नास्तिक होकर व्यभिचार में लिप्त हो गया साथ ही साथ बड़ी संख्या में वर्णसंकरता भी बढ़ी और इसी सब झूठे तथ्यों के आधार पर जो की आर्यनमाजियों का बनाया था, ईसाईयों ने हिन्दुओं का बड़ी संख्या में ईसाईकरण किया | अगर आप धरातल पर देखेंगे तो ये ऊपर जों मैंने कहा, जितने भी संगठन है सबके सब वैचारिक धरातल पर एक ही है और सबके सब हिन्दू धर्म के मूल स्वरुप को राष्ट्रवाद या धर्मसुधारवाद के नाम पर समाप्त करने में लगे है जिससे बड़ी संख्या में वर्णसंकरता बढे और वर्ण जाति के बंधन से मुक्त व्यक्ति व्यभिचार में लग जाये | भारत में आज जो बुराई दिख रही है वो ब्रिटिश ईसाई राजघराने के सैकड़ों साल के प्रयास का परिणाम है जिसमे ये संघी, आर्यनमाजी जैसे संगठन ईसाईयों के बहुत बड़े सहयोगी की भूमिका निभायें और आज भी निभा रहें हैं बाकी आप देखेंगे तो न्यायालय, जो की आजी भी अंग्रेज राजघराने के कब्जे में है, किस प्रकार सदैव सारे फैसले हिन्दुओं के परम्पराओं और संस्कृति के खिलाफ ही देता है, पर उसमे भी इन संगठनो का कोई प्रतिक्रिया नहीं होता, (ध्यान दें जब अर्थशात्र के दृष्टि से जाति व्यवस्था के बारे में लिखूंगा तो भारत में जाति व्यवस्था मिटाने का षड़यंत्र और भी सरलता से सबको समझ में आ जायेगा) => अब बात करते है आगे के बिंदु में जिसमे संघी और आर्यसमाजी सदैव इस बात पर बल देतें हैं कि यदि हिन्दुओं को एकता लाना है तो सभी हिन्दुओ को वर्ण जाति की मर्यादा हटा कर आपस में रोटी बेटी का सम्बन्ध करना चाहिए| मित्रों ये बात पूरी तरह से असत्य है कि हिन्दुओं में जाति मिटाने से एकता आ जायेगी बल्कि उलटा सभी जातियों में वैमनष्य बढेगा जो की आज दिख भी रहा है| मित्रों जब भी ये सभी संगठन जाति व्यवस्था को मिटाने की बात करते है तो उसके लिये प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ये कहते है कि ब्राह्मणों ने जातियाँ बनायीं, इसमे छुआछुत और भेदभाव बनाया जो की बिलकुल असत्य है, ये ब्राह्मणों पर अनेक गंभीर आरोप लगातें हैं | संघी और आर्यसमाजी स्वीकार करते हैं कि ब्राह्मणों के नेतृत्व में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों द्वारा शुद्रो पर हजारों वर्षों तक शोषण हुआ, अतः इन्ही आधारों पर ये आरक्षण और दलितों के सभी प्रकार के सुविधाओं का समर्थन करते है जिसमें द्विज अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य और कुछ उच्च कुलीन शुद्र जातियों को सरकार के माध्यम से प्रताड़ित किया जाता है, अब बताइए इस प्रकार क्या एकता आना संभव है?, ये जातियों के लिये ब्राह्मणों को दोष देतें हैं पर स्वयं भारत की राज्य सरकारें जाति का प्रमाण पत्र बाटतीं हैं अब जो कार्य स्वयं सरकार, कानून बना कर कर रही है उसके लिये ब्राह्मणों को क्यों दोषी ठहराना? मित्रों जातियाँ ईश्वर ने पूर्व जन्मों के कर्मो और गुणों (सत,रज,तम) के आधार पर बनायीं इसे आप ये समझ लीजिये कि जीवात्मा के स्वभाव के आधार पर 5 प्रकार का वर्गीकरण स्वयं ईश्वर ने किया है जिसमे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र आदि चार वर्ण और एक अन्त्यज कोटि के मनुष्य आते हैं, और इसी स्वाभाव के आधार पर कार्य भी बताएं गयें हैं जो की जन्म से तय है और इसे आप भागवत गीता के 18रवें अध्याय से समझ भी सकतें हैं, आप ये जान लीजिये कि जों व्यक्ति जन्म से जैसा स्वभाव लेकर आता है यदि उसे उस प्रकार का कार्य दिया जायेगा तो निश्चित ही वो समाज में अपने कार्य को भलीप्रकार करेगा और सुखी रहेगा अर्थात इस जन्म को सार्थक कर जिव आगे की यात्रा करेगा, यही कारण था कि यह भारत सदैव सोने की चिड़िया कहलाता था, क्योंकि यहाँ सबके कर्तव्य निश्चित थें और सब अपने अपने कार्यों को पूरी निष्ठा के साथ करते और आपस में प्रेम और सौहार्द के साथ रहतें, राजा के यहाँ भी न्याय के समय सभी जातियों के प्रतिनीधि भी रहते जिससे किसी के साथ अन्याय होने की दूर दूर तक सम्भावना ही नहीं बनती थीं | लोगों में उनके जन्मजात स्वभाव के कारण ही आचरण में भेद होता है और इसी भेद के भाव का सम्मान समाज के सभी लोग करते थें अतः जातियों मे रोटी या बेटी का सम्बन्ध करने से प्रकृति प्रदत्त भेद टूट जाता है, जिससे सभी की शुद्धता जो की कुल परमपरा के कारण श्रृष्टि के आदि से चली आ रही है, नष्ट हो जायेगी क्योंकि दो भिन्न जातियों के स्त्री पुरुष से जन्मा बच्चा संकरीत हो जायेगा इस प्रकार उसके पूर्वजों का जो बीज है वो भ्रष्ट हो जायेगा और इस कारण वो अध्यात्म और धर्म के क्षेत्र में भी उन्नति नहीं कर सकेगा, ये सारी बातें हमारे शास्त्रों के आधार पर सही सिद्ध होतीं है अतः बेटी का सम्बन्ध शास्त्र मर्यादा के विपरीत किसी भी मानव से कर देना महापाप है क्योंकि वो प्रकृति के नियमों के विपरीत होता है क्योंकि मानव केवल दिखाई देने वाला शरीर मात्र नहीं होता, इसी प्रकार रोटी अर्थात भोजन भी सबको सबके घर का नहीं खाना चाहिए क्योंकि भोजन भी इन्ही तीन गुणों से मिलकर बना है जिन तीन गुणों से मानव बना है और उसमे भेद है| दरअसल ये पूरी श्रृष्टि ही त्रिगुणात्मक है और इसी के आधार पर पूरी श्रृष्टि में कहीं समानता नहीं है सर्वत्र भेद ही भेद है, एक ही माँ के पेट से जन्मे दो जुड़वे बच्चे में भी प्रकृति या स्वभाव से भेद निश्चित ही होता है तो जातियों वर्णों की बात तो बहुत बड़ी हो गयीं| इन्ही भेद के कारण सभी जातियों के आचरण, आचार विचार, मान्यताओं, परम्पराओं और संस्कार इत्यादि में भी भेद होता है अतः सबके भेद के भाव का सम्मान करना चाहिए अर्थात भेदभाव का सम्मान करना चाहिए क्योंकि ये व्यक्ति के जन्म से प्राप्त स्वाभाव के कारण है न की घृणा या द्वेष के कारण| जब आप अन्त्यज या कुछ शुद्र जातियों के घरों में देखेंगे तो उनके भोजन के माध्यम का जो धन होता है वो समाज के अन्य लोगों के लिये वर्जित है, कुछ अन्त्यज जातियों में कुत्ता, सूअर, भैसा सहित अनेक प्रकार के मांस का प्रयोग होता है अतः इन सब कारणों से उनके घर भोजन नहीं कर सकते भले अपने घर किसी को भी भोजन करा दें इसके साथ ही शौच की मर्यादा, जूठन की मर्यादा, मांसाहार की मर्यादा, स्त्री के रजस्वला की मर्यादा, पाकशाला के पवित्रता की मर्यादा इत्यादि सभी मर्यादाओं का पालन सभी के घरों में नहीं होता अतः यही कारण है कि द्विज जातियाँ सबके घर का भोजन नहीं करती थी और आज भी नहीं करनी चाहिए क्योंकि सबके घर भोजन करने से अपनी प्रकृति, आचरण, स्वभाव के विपरीत जाना पड़ेगा जिससे आगे चलकर कई प्रकार की समस्याए उत्पन्न होंगी| (भोजन अर्थात अन्न संकरता के विषय पर शास्त्रीय, व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक आधार पर अलग से लेख लिखूंगा) सनातन धर्म में जाति का अर्थ आप यह समझ लीजिये की, प्रकार अर्थात कोटि अर्थात अंग्रेजी में टाइप्स अतः यदि कोई कहे कि श्रृष्टि में प्राणियों की कितनी जातियाँ है तो उत्तर होगा कि 84 लाख जातियाँ है अर्थात योनियाँ हैं, इसी प्रकार कोई पूछे लिंग के आधार पर मानव की कितनी जातियाँ है तो आप कहेंगे 3 और ये हैं स्त्री, पुरुष और नपुंसक इसी प्रकार शरीर के बनावट के आधार पर मानव की कितनी जातियाँ है तो ये भी आप कई प्रकार का बता सकतें हैं जिसे देख कर स्थूल शरीर अर्थात पार्थिव शरीर के आधार पहचान सकतें है उदाहरण के लिये काले नीग्रो, सफ़ेद लोग, लाल रंग के अंग्रेज, चीन के तरह नाटे लोग और एक प्रकार के हम भारतीय भी हैं अतः ये सारे भेद स्थूल शरीर अर्थात पार्थिव शरीर के आधार पर देख कर बताया जा सकता है और ये सभी जातियाँ या कोटियाँ ईश्वर प्रदत्त हैं, इसी प्रकार पूर्व जन्मों के गुण कर्म अर्थात स्वभाव के आधार पर मनुष्य को नया जन्म मिलता है जिसे मुख्यतः 5 भागों में बाटा गया है जिसमे चार वर्ण और एक अन्त्यज जाति होती है, जो की वर्ण व्यवस्था से भी बाहर होता है और ये सभी स्थूल शरीर से नहीं जाने जा सकते बल्कि सूक्ष्म शरीर के आधार पर जाने जा सकतें हैं, जिसे सामान्य मानव नहीं देख सकता अतः इसे कुल परम्परा से जानते हैं जो कि ईश्वरीय विधान द्वारा श्रृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न किये गये हैं जिसे स्वयं वेद में और गीता में भागवान कृष्ण ने कहा है, इन्ही पूर्व जन्मों के गुण कर्म अर्थात स्वाभाव के आधार पर वर्णों के भीतर भी कई कोटियाँ हैं जिन्हें आजकल जातियाँ कहते हैं जबकि ये सब जातियों के भीतर जातियाँ है अर्थात प्रजातियाँ है, दरअसल प्रत्येक मानव ही दुसरे मानव से भेद रखता है पर ईश्वर ने सनातन धर्म के पालन के लिये मानवों का 5 भागों में वर्गीकरण कर रखा है जों कि पिता के माध्यम से पुत्र को मिलता है जो की प्रत्येक मनुष्य के पूर्वजों द्वारा दिया हुआ पहचान होता है और ये बीज और कर्म की सुरक्षा के दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जिसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र और अन्त्यज कहतें हैं, अतः ईश्वर प्रद्दत भेद जो कि मानव सहित सभी प्राणियों में जन्म के पूर्व के गुण कर्म अर्थात स्वभाव से है, का सम्मान सभी मानवों को करना चाहिए | => मित्रों इसी क्रम में अगला बिन्दु है, जो ये संघी तब बोलते है जब इनसे आप पूछेंगे की भाईसाब आपने गौ के लिये क्या किया तब ये आपसे उलटा पूछ लेंगे कि संघ छोडिये आपने गाय के लिये क्या किया? फिर यदि कभी कोई इनसे पूछ लिया कि अरे भाई साब आप की केंद्र सहित 20 राज्यों में सरकारें हैं, आपका संगठन कई दशकों से भारत में कार्य कर रहा है अतः आपने संस्कृत के प्रसार के लिये क्या किया? तो ये उनसे बताने के बजाय उलटा पूछ लेंगे कि आप संघ की छोड़िये ये बताइए आपने संस्कृत के लिये क्या किया?, इसी प्रकार, कोई इनसे कृषि या राम मंदिर या हिन्दू धर्म या अन्य किसी भी विषय में कुछ पूछता है तो ये बड़े निर्लज्जता से बताने के बजाय उलटा प्रश्नकर्ता से ही पुछ लेतें हैं कि आप ने स्वयं क्या किया? इस विषय के लिये, या आप ज्यादा प्रश्न करेंगे तो ये आपको कहेंगे कि संघ कुछ नहीं करता, जो करता है स्वयंसेवक करता है, और कोई बाहरी व्यक्ति इनसे कुछ पूछेगा और ये बता नहीं पायेंगे तो कहेंगे की संघ समझना सरल नहीं है या कभी कहतें है संघ समझना नामुमकीन है इसलिए संघ को जानना है तो शाखा में आइये, मित्रों शाखा में केवल गीत, खेलकुद, व्यायाम इत्यादि कार्य होते है तो इससे नागपुर में बैठे चन्द लोग क्या फैसला लिये है? और प्रचारकों के माध्यम से क्या थोप रहें है समाज पे, ये क्या शाखा में जाने से पता चल जायेगा? संघ के लोगों से आप कितने भी प्रश्न कर दीजिये उन्हें जो अच्छा लगेगा, उसका उत्तर तो देंगे पर जो उत्तर वो नहीं दे सकते उसके लिये वो आपको दुसरे बातों में उलझा देंगे पर उत्तर कभी नहीं देंगे, अब प्रश्न ये है कि यदि ये समाज के सहयोग से चलने वाले एक सामाजिक संगठन है तो ये समाज का उत्तर क्यों नही देते? और किस प्रकार बड़े निर्लज्जता से एक सामान्य व्यक्ति से उलटा प्रश्न कर देतें है कि आपने क्या किया देश के लिये या शिक्षा के लिये या गाय के लिये या संस्कृत के लिये या अन्य किसी भी कार्य के लिये| मित्रों आप ये बताइए ये एक, 90 से अधिक वर्ष से देश में राष्ट्र-धर्म के नाम पर कार्य में लगने वाले संगठन है जो प्रायः सभी क्षेत्रों में शाखा संगठन बना रखें है, जिनके कई करोड़ कार्यकर्ता होने का दावा किया जाता है और जिसके केंद्र सहित 20 राज्यों में सरकारें हैं, क्या ऐसे संगठन की तुलना किसी सामान्य से व्यक्ति से की जा सकती है विशेषतः वो स्वयंसेवक जो 20-25 वर्ष की आयु का होता है जो इनसे जिज्ञासावश प्रश्न पूछता है, क्या इस सामान्य से स्वयंसेवक की तुलना संघ से की जा सकती है? यदि नहीं तो फिर संघ के अधिकारी किस हिसाब से बड़ी निर्लजता से हर समय कहते फिरते है जैसे कोई कामचोर कहता हो कि मैंने नहीं किया तो तुमने क्या किया ? इसी प्रकार ये कहते है कि संघ ने नहीं किया तो आपने क्या किया? आप स्वयं समझ सकतें है कि ये तभी तक सामाजिक संगठन है जब तक कि इनसे आप हर समय जी भाईसाब - जी भाईसाब करते रहिये, जैसे ही आपने इनसे कुछ कड़वे प्रश्न कियें, तो ये संघी, प्रचारक या अधिकारी महोदय तुरंत अपने पुरे अकड़ में आ जायेंगे और अंहकारवश आपको आपकी औकात दिखाने लगतें हैं, इसी प्रकार जो लोग कभी संघ के लिये कार्य करतें थें वो यदि इनके भ्रष्ट नीतियों के कारण या अन्य किसी कारण संघ छोड़कर अपना कोई नया संगठन बना लेते है तो उसे ये लालची या स्वार्थी कहते हैं और संघ की कोई निंदा करदे तो उसे ये संघी लोग देशद्रोही, राष्ट्रविरोधी, कान्ग्रेसी, वामपंथी, नक्सली, पाकिस्तानी और न जाने क्या क्या कहतें हैं, यहाँ तक कि ये साधु संतों को भी अपमानित करने से पीछें नहीं हटते स्वयं फर्जी साधु, सन्त, शंकराचार्य बनातें हैं और असली वाले सन्तों पर प्रश्न चिन्ह लगा देतें है और कोई जब इनपे प्रश्नचिन्ह लगाता है तो उसे ये संघी तुरंत अपमानित करना शुरू कर देते हैं, ये तो है इनकी सम्पूर्ण सच्चाई जिसे आप कुछ समय में ही इनसे जुड़ कर जान सकतें है जों की अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है| मित्रों प्रायः एक विषय आता है कि संघ का राममन्दिर पर क्या विचार है? या क्या योजना है? इत्यादि | इसे समझने के लिये मै आपको एक उदाहरण देता हूँ मान लीजिये कि यदि आप किसी निमंत्रण में जातें है जहाँ अन्य लोग भी आये हैं, पर आप मिठाई नहीं खाते क्योंकि ये आपके लिये वर्जित है, या आप मिठाई खाना उचित ही नहीं मानतें, अब यदि आपसे निमंत्रण में कोई पूछे, कि मिठाई बननी चाहिए की नहीं? या आप कौन सी मिठाई पसंद करते हैं? तो आप इसका क्या उत्तर देंगे? आप तो यही चाहेंगे कि मिठाई न बने तो अच्छा ही है क्योंकि ये आपको पसंद नहीं या आपको ये अनुचित लगता है, पर यदि अन्य लोग हैं जिनके लिये मिठाई अति प्रिय है तो उनको देख कर आप खुल कर मिठाई का विरोध भी नहीं करेंगे और न ही समर्थन करेंगे, अतः आप कोई उचित उत्तर ही नहीं देंगे मिठाई के विषय में, आपको कोई फर्क नहीं पड़ता की मिठाई बननी चाहिए या नहीं बननी चाहिए या कब बनेगी और यदि आपका कोई प्रिय मित्र है जिससे आपको अपना कोई कार्य कराना है तो उसे प्रसन्न करने के लिये आप उसकी राय पूछेंगे और वो जो कहेगा उसी बात का समर्थन करते हुए आप मिठाई के विषय में अपनी राय प्रकट करेंगे यदि यह मिठाई का विरोधी हुआ तो आप भी विरोध करेंगे पर यदि आपका कोई अन्य दूसरा मित्र है जिसे मिठाई बहुत प्रिय है और उससे आपको और भी परम आवश्यक कार्य कराना है, तो आप पूरा प्रयास इस बात को करने में लगायेंगे कि यद्यपि आपका पहला मित्र मिठाई बनने देना नही चाहता क्योंकि ये आपसे भी ज्यादा विरोधी है, तब भी ये आपकी बात मान कर मिठाई बनने में सहयोग करें जिससे आपका सभी कार्य पूर्ण हो सके, और आप लाभान्वित हो सकें, भले उसके लिये आपको अपने पहले मित्र की चाटुकारिता ही करनी पड़े, पर आप अपने लाभ के लिये करेंगे, किसी के विरोध में नहीं जायेंगे बल्कि दोनों को प्रसन्न करने का प्रयास करेंगे| मित्रों इस उदाहरण को यदि आप समझ जायेंगे तो आप ये भी समझ जायेंगे कि आखिर संघ का राममन्दिर को लेकर क्या विचार है? संघ चाहता क्या है राममंदिर के लिये?, आप यहाँ मिठाई के जगह मन्दिर रखकर और आपके स्थान पर संघ रखकर तथा पहले व्यक्ति के स्थान पर जो आपका मित्र है, जिसे आप प्रसन्न करना चाहतें है, के स्थान पर मुसलमान रखकर और दुसरे के स्थान पर हिन्दू रखकर सोचिये तो आपको सारी सच्चाई समझ में आ जायेगी | विचार करेंगे तो आपको पता चल जायेगा की संघ आखिर मंदिर को लेकर सोचता क्या है? और क्यों मन्दिर को लेकर व्याकुल नहीं है, जैसे बाकी हिन्दू हैं? और उसे क्यों कोई फर्क नहीं पड़ता मन्दिर बनने या न बनने से? तो इसका उत्तर आप ऊपर दिए मिठाई वाले उदाहरण से समझ सकतें है? फिर आप मुझसे पूछेंगे कि आखिर संघ को राममन्दिर से क्या समस्या हो सकती है वो क्यों चाहेगा कि राम मंदिर बने या न बने या कब बने और इसमे मुसलमानों को क्यों प्रसन्न करना चाहेगा तो उत्तर आपको मै देता हूँ, दरअसल संघ में जों ऊपर के अखिल भारतीय स्तर के कार्यकारिणी समिति के लोग हैं, जो पुरे संघ पर अपना निर्णय थोपतें है, जो संघ के सभी फैसलों को अपने हिसाब से लेतें हैं, उन कुछ लोगों की सनातन धर्म को लेकर वही विचारधारा या मान्यता है जो आर्यसमाजियों का है, जिस प्रकार आर्यसमाज ईश्वर के साकार स्वरुप को नहीं मानता तथा राम, कृष्ण शिव इत्यादि देवी देवताओं के पुजन को पाखण्ड कहता है और इनके पूजन का विरोधी है उसी प्रकार संघ भी है वो अलग बात है की ये खुल के कभी नहीं कहतें उलटा राजनीती के लिये पूजा भी कर लेते हैं| ये दिखावे के लिये, हिन्दुओं को भ्रमित करने के लिये, राजनीती करने के लिये, विश्व हिन्दू परिषद एवं अन्य द्वारा कई जगह मन्दिर बनवा दिए हैं, वो अलग बात है, क्योंकि उसमे भी इनका बस चले तो ये दलित पुजारी ही रखें, क्योंकि इनको मदिर की शास्त्रीय मर्यादा से मतलब नहीं है, ये तो मंदिर द्वारा धनउगाही और अपना एजेंडा चलाने के लिये ही मन्दिर बनवातें हैं, जिसप्रकार आर्यसमाजी राम को परम ब्रह्म परमात्मा ईश्वर नही मानतें बल्की एक व्यक्ति मानते हैं, जो मर्यादा में जीवन जीता था, जिसमे सामान्य मानवों से अधिक गुण थें बस, उसी प्रकार संघ के अखिलभारतीय, फैसले लेने वाले, उच्च अधिकारी राम को भगवान नहीं मानते, क्योंकि ये लोग अधिकतर तो नास्तिक हैं और कुछ आर्यसमाजी विचार के हैं जो ईश्वर के साकार रूप को नहीं स्वीकारतें अतः ये राम के न तो भक्त हैं और न ही इन्हें राममन्दिर का बनना कोई आवश्यक लगता है, पर चूँकि इस देश के हिन्दुओं का प्राण राम में बसता है इसलिए वो राममन्दिर का विरोध भी नहीं करते, बल्कि हिन्दुओं को राम के नाम पर गुमराह अवश्य करतें हैं, ये राम के नाम पर राजनैतिक लाभ लेने से पीछे कभी नहीं हटते, चूँकि ये आर्यसमाजी विचार के हैं इसलिए सनातन धर्म के स्वरुप, वर्णाश्रम, जातिव्यवस्था इत्यादि सभी विषयों पर इनके विचार वही है जो आर्यसमाजियों के हैं अतः सनातन धर्म की परिभाषा इनके हिसाब से भिन्न है और वो शास्त्रों से समनाता नहीं रखती जिसके कारण ये धर्म को शरीर से परिभाषित करतें हैं और भारत में जन्मे प्रत्येक मानव को शरीर के आधार पर हिन्दू कहतें हैं| ये हिन्दुओं में मुसलमानों के प्रति सहानुभूति और प्रेम प्रकट करने के लिये इस बात का निरंतर प्रयास करते रहते हैं कि अयोध्या में राम मंदिर बनने में मुसलमानों की विशेष भूमिका दिखाई जाये जिससे हिन्दुओं का सर मुसलमानों के प्रति सद्भावना से झुक जायें अतः ये इसी लिये, मुस्लिम मंच द्वारा पाखण्डी गौभक्षक मुस्लिम कारसेवक खड़ा करातें है जो कभी अयोध्या में ईटें ले जाने की नौटंकी करता है तो कभी कुछ और नौटंकी करतें है कभी ये सरयू के किनारे नमाज पढ़ने का नौटंकी करतें है तो कभी राम जी की टोपी और बुरखा में पूजा करने का दिखावा करतें हैं, कुल मिलाकर ये राममन्दिर के नाम पर मुसलमानों के उस इतिहास को छुपाना चाहतें है जो हम जानतें है, जिसमे मुसलमानों ने पिछले हजार वर्षों तक हमपर अत्याचार किया है, अब चूँकि हिन्दू समाज तो बहुत शीघ्र इतिहास भूल जाता है, अपने उपर हुए अत्याचार भूल जाता है? अतः जो कुछ लोग अपने हिंदुत्व को लेकर जागरूक है उन्ही को मुसलमानों की सच्चाई पता है और वही लोग हैं, जों अयोध्या में राम मन्दिर बनाने के लिये व्याकुल है, पर संघ और इसकी सरकार राममन्दिर के बनने में एक बहुत बड़ा क्रेडिट मुसलमानों को दिलवाना चाहतीं है जिससे हिन्दुओं का सर मुसलमानों के प्रति झुक जाये और जिससे हमें हत्यारें, बलात्कारी, मन्दिर भंजक, गौभक्षक संस्कृति वाले मुसलमान ही हमारे हितैषी दिखने लग जाएं और हिंदुत्व का कठोरता से पालन करने वाले हिन्दू मुसलमानों के साथ मेलजोल करले जिसमे आगे संघ की योजना है कि हिन्दू, मुसलमानों से रोटी बेटी का भी सम्बन्ध करने लग जाये | यदि आपको धर्म को लेकर संघ की राय जाननी है तो आप आर्यसमाज को जान लीजिये, और ऐसे भी ये सब एक ही ब्रिटिश राजघराने की पैदाइश हैं और धर्म की खाल ओढ़े धर्म के लिये भेड़िये की भूमिका निभातें हैं तो इनका विचार एक जैसा होगा ही| यदि आप किसी आर्यसमाजी से पूछेंगे की भाई राममन्दिर बननी चाहिए तो वो आपको प्रसन्न करने के लिये भले हा कह दे, पर भीतर से वो कभी नहीं चाहेगा और न कभी आपका सहयोग देगा और यदि कोई कट्टर आर्यसमाजी होगा तो वो एक बार कह भी देगा कि राम एक मनुष्य था तो उसका मंदिर बनने की क्या आवश्यकता है? उसके जगह अस्पताल या विद्यालय बनवा दो पर संघी कभी नहीं कहेगा, मंदिर के जगह अस्पताल या विद्यालय जैसी चीजे बनाने का सारा प्रोपेगेंडा भीतर से यही लोग चलातें हैं जिससे हिन्दुओं का ध्यान संघ से कही और चला जाये और इनपे प्रश्न चिन्ह न लगे| संघ के हिंदुत्व की पूरी अवधारणा आर्यसमाज की है जो सनातन धर्म को शरीर के आधार पर तय करता है इसलिए वो किसी के बेटी से किसी का ब्याह करने का पक्षधर होता है भले वो मुस्लिम या ईसाई बीज से उत्पन्न हुआ हो पर उसे भी ये 2 मिनट में हिन्दू बना देते हैं| संघ की सारी राजनीति इस बात पर है कि हिन्दू और मुसलमान आपस में घालमेल करके एक नए हिंदुत्व की रचना कर ले जो बाहर से नाम के लिये हिन्दू हो पर भीतर से हिंदुत्व पूरी तरह से समाप्त होकर कुछ और हो जाये और इसी प्रकार ये भारत में रहने वाले सभी लोगों को हिन्दू बनाना चाहतें है जो की संभव ही नहीं है और अन्त में गृहयुद्ध होगा और अनेक राष्ट्रों के दबाव में ब्रिटिश राजघराना 99 वर्ष पूरा होते ही भारत को फिर से अपने अधिकार में ले लेगा या कई खण्डों में खंडित करवा देगा जैसे 1947 में किया | और इनसब में संघ बहुत बड़ी भुमिका निभा रहा है जों संघी समर्थकों को तब पता चलेगा जब इनके पास कुछ भी नहीं बचेगा, सब लुट चूका होगा | संघ के पास आप जब भी मुसलमानों के द्वारा हो रहे दंगा फसाद या किसी अन्य झगड़ें के लिये जायेंगे तो संघ कभी आपका सहयोग नहीं करेगा क्योंकि संघ के अधकारियों को ऊपर से आदेश है कि चाहे कुछ भी हो जाये मुसलमानों में संघ की छवि ख़राब नहीं होनी चाहिए, और न ही संघ को और न ही इसके सरकार को इस बात का कोई फर्क पड़ता है की भारतीय न्यायालय किस प्रकार हिन्दुओं के मन्दिर, उनके परम्परा, संस्कृति, धर्म इत्यादि के खिलाफ जानबूझ कर खिलवाड़ कर रहा है क्योंकि संघ में निर्णय लेने वाले सभी अखिल भारतीय अधिकारी चुन चुन के वही बनाये गयें हैं जो कि घोर नास्तिक हैं या आर्यसमाजी हैं, जो की भीतर से अंग्रेजी संस्कृति को चाहतें हैं पर ऊपर से भारतीय संस्कृति की बात करतें हैं, पर कभी भारतीय संस्कृति के लिये कुछ भी नहीं करतें, अतः हम सब सच्चे भारतियों को संघ से अलग होकर सनातन धर्म और भारत राष्ट्र के विषय में सोचना पड़ेगा अन्यथा विनाश निश्चित है| आगे संघ के विषय में कुछ और लेखों में लिखूंगा जिसमे संघ के हिंदुत्व और असली हिंदुत्व अर्थात सनातन धर्म में अंतर सहित संघ से पूछे गयें मेरे प्रश्नों का उत्तर स्वयं मै ही दूंगा इत्यादि | जय जय श्री सीताराम #सनातनी

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