जाति बहिष्कार के नियम

कृते सम्भाषणात् पापं त्रेतायां स्पर्शनेन तु। द्वापरे त्वन्नमादाय कलौ पतति कर्मणा।। (पराशर स्मृति) कृतयुग मे पतित से संभाषण करने से पाप लिप्त होता है।त्रेतांयुग मे पतित के स्पर्श से द्धापर मे पतित का अन्न खाने से पाप लिप्त होता है कलियुग मे कर्म से ही पतित होते है।(किसी भी युग मे पतित से जितना संभव हो संभाषण स्पर्श या अन्नजल से बचना चाहिए ।) त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत्। द्वापरे कुलमेकं तु कर्त्तारं तु कलौयुगे ।। (पराशर स्मृति) कृतयुग मे पतित हो ऐसा देश त्याग करना चाहिए त्रेतायुग मे ग्राम का त्याग करना चाहिए द्धापर मे कुल का त्याग करना चाहिए कलियुग मे कर्ता व्यक्ति को जाति से बहिष्कृत करना चाहिए । अथ जाति बहिष्कृतं नरं शीध्रं जाति मध्ये आनये दित्याह स्कन्दे। ज्ञातित्यक्तो हि कुरुते पापं ज्ञातिविवर्जित:।। तत्पापं ज्ञातिबन्धुनां जायते मनुब्रवीत्।। ज्ञात्वापि विहितं कर्म जातिभि परिवर्जितम् ।। प्रायश्चिते पुनजार्तिमानयेन्मनुरब्रवीत् ।। ज्ञाति त्यक्तं तु पुरुषं ज्ञातिमध्ये समानयेत्।। प्रायश्चितेन् विधिना नोचे-भ्द्धांति व्रजत्यपि।। जाति से बहार किये मनुष्य को शीघ्र जाति मे लेना चाहिए ईस बात को स्कन्दपुराण से कहते है जाति से त्यागा हुआ मनुष्य जो फिर स्वछंद होकर पाप करता है वह पाप ज्ञातिबंधु को लगता है ऐसा मनुने कहा है। जानकर जो कर्म छिपाया गया है ईससे वह ज्ञातियो द्धारा वर्जित किया गया है मनुजी कहते है प्रायश्चित से उसे पुनः जाति मे ले लेना चाहिए । जाति से त्यागे हुए पुरुष को पुनः जाति के मध्य लेना चाहिए अौर उससे प्रायश्चित करवाना चाहिए अगर प्रायश्चित विधि से जाति मे ग्राह्य हो तभी ग्रहण करना चाहिए अन्यथा वो सबको पतित करेगा ईस लिए त्याग करना चाहिए ।

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