क्या शास्त्रो मे मिलावट है ??

#क्या_हिन्दू_शास्त्रों_में_मिलावट_है आजकल एक नया फैशन चला है धर्मग्रन्थों को गरियाने और उन्हें नीचा दिखाने का और वह है ‘प्रक्षेप’ या ‘मिलावट’। हिंदुओं में एक ऐसी प्रजाति उग आई है जो हर ग्रन्थ के बारे में ऐसा बोलती मिलेगी की यह तो प्रक्षेप है, मिलावट है, इस ग्रन्थ की फलानी चीज बाद में मिला दी गई है, यह किसी और ने जोड़ दिया है। कोई इन ‘विद्वानों’ से पूछे की आप कौन हो हमारे ग्रन्थों की बातों को गलत कहने वाले? धर्मग्रन्थों में क्या सही है क्या गलत है यह तय करने वाले आप हो कौन? क्या असली है क्या मिलावट है यह तय करने का स्पेशल कोर्स कौन कराता है? अरे हो कौन आप? कोई वेदव्यास हो क्या शंकराचार्य हो? या कोई ठेकेदार हो शास्त्रों के? या कोई जज हो जो जजमेंट पास कर देते हो? ब्राह्मण ग्रन्थों, वेदांगों, उपनिषद से लेकर रामायण, गीता, पुराणों तक में ऐसे लोग हर जगह प्रक्षेप प्रक्षेप और मिलावट मिलावट का शोर मचाते रहते हैं- ये कुछ इस तरह कहते मिलेंगे- 1) ग्रन्थ का अमुक अंश प्रक्षेप है। 2) ग्रन्थ का अमुक अंश मिलावट है। 3) अमुक अंश बाद में जोड़ दिया गया है।4) यह तो असम्भव है, अवैज्ञनिक है, हो ही नहीं सकता है। 5) यह ग्रन्थ ही अप्रमाणिक है। वैदिक ग्रन्थों में रहस्यमय शैली में अलौकिक ज्ञान छिपा है इसलिए वे विलक्षण हैं पर इस वैदिक मणि मंजूषा के रत्नों का आहरण वे ही कर पाते हैं जो उसके अधिकारी होते हैं। इस अनधिकार के कारण ही मूर्खों को शास्त्रों में प्रक्षेप और मिलावट ही मिलावट नजर आती है। ऐसे ऐसे मूर्ख इकट्ठे हो गए हैं जो महाभारत में 90% और रामायण में 50% मिलावट बताते घूमते हैं, वास्तव में ये असुर शास्त्रों का नाश करने पर तुले हैं। ये निम्न कारणों से शास्त्र के अंशों को प्रक्षेप कहते हैं :- 1) वह अलौकिक बातें इनकी सुईं की नोंक से भी महीन बुद्धि में घुसतीं नहीं। बुद्धि मन्द और कुन्द होती है। 2) अनधिकारी यदि ग्रन्थ पढ़ भी लें तो तत्व नहीं जान पाएंगे। ऊपर कह आए हैं। 3) इन्होंने अपने कुछ सिद्धान्त निश्चित कर रखे होते हैं, उनपर ये ठेस लगने देना नहीं चाहते इसलिए नकार देते हैं। 4) मलेच्छ हिन्दू ग्रन्थों की जिन बातों को मजाक उड़ाने की कोशिश करते हैं उनका उत्तर देने की सामर्थ्य न होने के कारण अपने धर्म की उन बातों को नकार देते हैं। 5) पारलौकिक बातों को लौकिक तर्कों(?) में तोलते हैं, क्या हाथी को तराजू में तोला जा सकता है क्या? 6) खुद किसी गुरुघन्टाल की फसल होते हैं तो दूसरों की नैया डुबोने में ही धर्म समझते हैं। अपने मूर्खतापूर्ण तर्कों को ये लोग, “सैद्धान्तिक बात” कहते हैं। इन नमूनों को सिद्धान्त का कुछ भी ज्ञान नहीं, न ही इन्होंने अपने पंथों से इतर अन्य शास्त्रों को सम्यक दृष्टि से पढ़ा होता है, बस कुछ कारणों से शास्त्रों और परंपराओं के विरुद्ध मूर्खतापूर्ण तर्क गढ़ लिए, उन्हें ही यहाँ वहाँ छापकर बुद्धिदार बने फिरते हैं। अब छोटी बुद्धि का मनुष्य किसी सिद्धान्त को न समझ पाए और उसका खंडन करने की इच्छा रखता हो तो पहले वो उस उच्च-सिद्धान्त को अपनी बुद्धि के स्तर तक लाएगा, तभी वो इसपर जीभ हिला पाएगा, यही इनका हाल होता है और उसका सबसे सरल तरीका है जो भी बात अपने एंगल में फिट न बैठे उसे प्रक्षेप या मिलावट कह दो। अगर शास्त्रों की बात किसी के समझ नहीं आती है तो यह उसकी बुद्धि का दोष है, यह उसकी अयोग्यता है, उसके बुरे संस्कार कटे नहीं हैं, उसको अभी अधिकार हुआ नहीं है। हर शास्त्रीय बात को लौकिक तर्क पर नहीं तोला जा सकता। सम्भवतया शास्त्रों में थोड़ी मात्रा में कुछ मिलावट हो सकती है, पर उसपर केवल प्रामाणिक आचार्यों की टिप्पणी ही स्वीकार करनी चाहिए। पर यदि कोई शास्त्रों के बहुत बड़े भाग को नकार दे रहा है, बात बात में मिलावट और प्रक्षेप बताता है तो वह वास्तव में या तो मूर्ख है या धूर्त, ऐसे लोग खुद का तो नाश करते हैं पर दूसरों की भी शास्त्रों और ऋषियों में अश्रद्धा और संशय का कारण बनते हैं, उनका जीवन भी नष्ट करते हैं। ऐसे अनधिकारी ‘उपदेशक’ जनता के अमंगल के ही हेतु होते हैं। इसलिए लौकिक एवं परलौकिक कल्याण हेतु, सज्जन मनुष्यों को शास्त्रज्ञ महात्माओं से ही उपदेश ग्रहण करना चाहिए और इस तरह की भ्रामक बातें फैलाने वालों से विशेष सावधान रहना चाहिए। ।।जय श्री राम।। साभार: सत्यमार्ग

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