वैदिक वर्णव्यवस्था

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायत ॥ अर्थात् - इसका (विराट् पुरुष का) मुख ब्राह्मण था, बाहु से क्षत्रियों को उत्पन्न किया, जो वैश्य है वह इसके ऊरु से उत्पन्न हुए| और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुआ । अपि च मनु - लोकानां तु विवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरूपादतः । ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत् ॥ (मनुस्मृति, अ.1, 31) गीता में यथा - चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं... आदि से उसी वेदोक्त वर्ण व्यवस्था को विस्तर रूपेण गुण कर्म से प्रतिपादित किया | कुछ कहते है कि गुण माने शौर्यादि तथा कर्म माने विद्या आदि अध्ययन रुप क्रियमाण कर्म | ऐसा कहना उचित नहीं क्योकि यहां गुण पद से शौर्यक्रौर्यादि ग्रहण करने से मनुस्मृति के निम्न वचन की निरर्थकता सिद्ध होगी यथा - नामधेयं दशम्यां तु द्वादश्यां वाsस्य कारयेत् | मंगल्यं ब्राह्मणस्य स्यात् क्षत्रियस्य बलान्वितम्| यहां कहा है कि दसवें दिन ब्राह्मण का नामकरण करें ! बाहरवें दिन क्षत्रिय का आदि | अब मुझे बतावें कि यदि गुण से शौर्य आदि ग्रहण करेंगे तो मात्र दसवें दिन के शिशु में इन गुण का दर्शन कठिन होने से कैसे निश्चित किया जाऐगा कि यह क्षत्रिय है या ब्राह्मण ? और यदि क्रियमाण कर्म ग्रहण करेंगें तो ब्राह्मण युद्ध में जाने से क्षत्रिय कहलाऐगा तब उसे अपनी ही पत्नी से ब्राह्मणी गमन का दोष लग जाऐगा | अत: कर्मणा वर्ण व्यवस्था यह कपोल कल्पित मत है आपका, ऐसा सिद्ध होता है | वैदिक वर्ण/जाति व्यवस्था जन्मना (प्रारब्ध कर्मणा) ही है | जय श्री राम ब्राह्मण जन्म से पूजित यह वाह विचार है अंगत विचार नहीं ब्राह्मण सभा मे चूंकि सभी जन्म से ब्राह्मण ही होंगे अस्तु वहाँ पूज्यापूज्य का विचार गुण-कर्म से ही होता है अतः ब्राहाण सभा समूह आदि में यह वाक्य की ब्राह्मण जन्म से पूज्य है संगत नहीं अन्य वर्णो की सभा में ब्राह्मण विराजित हो और वहाँ जब पूज्यापूज्य का निर्णय देना हो तब यह कथन की ब्राह्मण जन्म से पूजनीय है संगत होगा ब्रहामण सभा में -- वय - स्वधर्मनिष्ठा - ज्ञान आदि क्रमशः पज्यापूज्य में प्रबल निर्णायक होते हैं आयुवृद्ध की अपेक्षा स्वधर्मनिष्ठा और स्वधर्मनिष्ठा से भी आगे ज्ञानी पूजनीय होगा ध्यान दें जो ज्ञानी होगा वह स्वधर्मनिष्ठा तो होगा ही इसमें संसय नहीं गुरू अथवा श्रेष्ठ पुरूषो के किसी वचन का अपने वचन से खंडन नहीं करना चाहिए । -आपस्तम्ब धर्म सूत्र। कलियुग में ब्राह्मण शरीर जन्म से ही प्राप्त होता है, तपस्या आदि से नहीं. -------------------------------'--'--------- श्रीमद्भागवत की कथा किसके मुख से सुनी जाये उसके भी नियम है, इस विषय में कौशिकी संहिता में लिखा है की जो वैष्णव नहीं, उनके मुख से कथा कदापि नहीं सुननी चाहिए. भागवत की कथा तो विशेष रूप से वैष्णव के मुख से ही सुननी चाहिए. पूर्वाचार्यों ने वैष्णव शब्द का अर्थ ब्राह्मण बताया है. ब्राह्म्नेतर से इसका कभी श्रवण न करे. गुरु भी ब्राह्मण को ही बनावे. अन्य जातीय को नहीं. 'पतिरेव गुरुह स्त्रीणाम' के अनुसार स्त्री पति से अतिरिक्त किसी को गुरु न बनावे. विधवा स्त्री भी पति का चित्र सामने रखकर गुरु बुद्धि से मस्की पूजा कर. अन्य किसी को गुरु न बनावे, अन्यथा उनका परलोक बिगड़ जाता है. कौशिकी संहिता में आगे लिखा है की लेटकर कथा सुननेवाले अजगर की योनी तथा कथावाचक व्यासजी को बिना प्रणाम किये कथा सुननेवाले वृक्ष की योनी को प्राप्त होते है, किन्तु यह नियम रोगी पर लागू नहीं होता. वक्ता के कथा स्थल पर पहुचने पर सबको उनका अभिवादन करना चाहिए. श्रोतागण कथा के मध्य में किसी प्रकार का संदेह होने पर वक्ता से प्रश्न न करे. जो कुछ भी प्रष्टव्य हो कथा के अंत में विनयपूर्वक पूछे. अन्यथा कथा रस भंग होने के साथ-साथ अनावासर पर पूछ्ने वाले पर सरस्वती देवी कुपित होती है, जिससे वह जन्मान्तर में गूगा होता है. तदनंतर तीन जन्मो तक मूर्ख रहकर अंत में कौए की योनी प्राप्त करता है. व्यास आसन पर आसीन आचार्य साक्षात् व्यासरूप माने गए है. वह ब्राह्मण, राजा, वृद्ध, पिता, पितामह, तथा गुरु से भी पूजनीय होते है. इसलिए वह किसी को प्रणाम न करे. न मुख से अमंगल शब्द का उच्चारण करे और न किसी का अभ्युत्थान ही करे . ऐसा करने से उनका धर्म नष्ट नहीं होता. ब्रह्माजी ने ब्राहमण में ही आचार्यत्व की स्थापना की है, अन्य वर्णों में नहीं. तपश्चर्या आदि के द्वारा भी अन्य वर्ण ब्रह्मण नहीं हो सकते. केवल चिन्ह मात्र धारण करने से जाती की निवृत्ति अथवा प्राप्ति नहीं हो सकती. न नापितो ब्रह्मनतम याति सूत्रादिधार्नात. अर्थात नापित यज्ञोपवीत आदि धारण कर लेने से कदापि ब्राह्मण नहीं हो सकता. कलियुग में ब्राह्मण शरीर जन्म से ही प्राप्त होता है, तपस्या आदि से नहीं. कलौ ब्रह्मंता याति वीर्यात्त्पश्चार्यादिना नहीं . जो मोह से, स्नेह से अथवा हाथ से अग्रभोजी ब्राह्मण को उच्छिस्ट भोजन कराता है, वह मूढ़ लालाभक्ष नामक नरक में गिरता है, जो स्वयं हीन वर्ण होकर उत्तमवर्ण ब्राह्मण को शिष्य बनाने की कुचेष्टा करता है, वह प्रलय पर्यंत मल भक्षण करता रहता है, और क्रम से शूकर गर्दभ आदि पाप योनिय भोगकर चंडाल योनी को प्राप्त करता है, उच्छिष्ट्भोजी पुरुष कुत्ते की योनी प्राप्त करता हैl - उच्छिष्ट भोजिनः श्वानः वैदिक जाति व्यवस्था : आक्षेप और समाधान - #आक्षेप- एक पण्डित व्यक्ति शूद्र का दिया पानी तो नहीं पी रहा पर उसका बनाया घड़ा प्रयोग कर रहा है । कितनी नकारात्मक बात है ! इससे सिद्ध है कि पण्डित द्वेषी , लोभी और अभिमानी होते हैं । #उत्तर - एक पंडित व्यक्ति शूद्र का दिया पानी तो नहीं पी रहा पर उसका बनाया घड़ा प्रयोग कर रहा है । इसी बात को सकारात्मक भी लिया जा सकता है नकारात्मक भी । ये सामने वाले व्यक्ति की निजी मानसिकता पर निर्भर करता है कि वो इसे कैसे व्यवहार में लाता है । हिन्दू धर्म में जाति की व्यवस्था गलत नहीं है , वरन् वे लोग गलत हैं जो इस व्यवस्था को नकारात्मक बना देते हैं । तर्क दिया जाता है कि पंडित शोषक है जो बस अपना काम निकालता है दूसरे की मेहनत पर और फिर उन्हें नीच कह कर औकात दिखाता है, इस पर आक्षेपकर्ता विधर्मियों से हमारा कहना यह है कि पानी लाना तो सबसे बडी मेहनत है, पूरा कुंआ खोदना पड़ता है पानी को पाने के लिये, आरम्भ से ही श्रम है । और उस कुंए का संरक्षण भी तो करना है अनवरत , क्योंकि प्यास तो पूरे दिन में कईं बार लगती है ! पानी पिलाना इतना सरल काम नहीं है । और दूसरी बात ये है कि यदि मेहनत शूद्र करता है तो उसका फल भी तो वही ले जाता है ! फ्री में थोडे न पंडित घड़ा लेता है उससे! यहॉ पर पण्डित उससे घड़ा लेकर उसे उसकी कला का पारितोषिक व एक आधिकारिक रोजगार ही तो प्रदान कर रहा है ! सामाजिक सहयोग सद्भाव का कितना सुन्दर उदाहरण है यह ! विचार कीजिये - १. अगर जातिगत द्वेष कारण होता तो पंडित घड़ा भी क्यों प्रयोग करता ? २.यदि पण्डित लोभी होता तो पानी भी क्यों छोड़ता ? ३. और यदि पण्डित अभिमानी होता तो पानी और घड़ा दोनों ही एक साथ क्यों न छोड़ता ! इससे सिद्ध है कि ना तो पण्डित द्वेषी है , ना लोभी और ना ही अभिमानी ! वरन् वो अवश्य किसी मर्यादा में , व्यवस्था में अनुशासित और व्यवस्थित है । ~~~~~ शास्त्र व्यवस्था का ही नाम है, अनुशासन का ही नाम है । ईश्वर का दिया हुआ अनुशासन , ईश्वर की दी हुई व्यवस्था पर चलना - यही एक धार्मिक की पहचान होती है । जो लोग धार्मिक होते हैं, वे तो कभी आपस में झगड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते! ना ही वे निजी स्वार्थ नें बह सकते हैं ! ये परस्पर झगड़े और वैमनस्यता को खड़ा करना तो अधार्मिकों के काम हैं । ।। जय श्री राम ।। वेद में ही चारो वर्णों की उत्पत्ति इस प्रकार कही गई है - ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्य: कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्या शूद्रो अजायत !! (यजुर्वेद०३१/११) 👆स्पष्टार्थ है | मनु जी भी ऐसा कहते हैं-मुखबाहूरूपज्जानां ० १/८७ - मुख ,बाहू आदि से ही उत्पन्न कह रहे हैं । भगवान् पतञ्जलि का वचन है - तपः श्रुतं च योनिश्चेत्येतद् ब्राह्मणकारणम् !(महाभाष्य २/२/६) अर्थात् - जो ब्राह्मण से ब्राह्मणी में उत्पन्न और उपनयनपूर्वक वेदाध्यन ,तप,विद्यादिसे युक्त होता है ,वही मुख्य ब्राह्मण होता है ! तप: श्रुताभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव स: अर्थात् -जो तप और विद्यासे हीन है वह जाति ब्राह्मण होता है । गीता - चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं .. चार वर्णों को मैंने ही वनाया है गुण कर्म के विभाग से | यहां गुण सत्त्वादि जानना चाहिए कर्म से प्रारब्ध जानना चाहिए | वेद वर्ण प्रतिपादन के लिए ही प्रवृत्त नहीं हुए है अत: समृत्यादियों से उनका मर्म समझना चाहिए | वर्ण देहाश्रित है। देह जन्माश्रित है। वर्ण कर्माश्रित नहीं है क्योंकि कर्म देह की अपेक्षा चिरस्थाई नहीं। वर्ण भौतिक अस्तित्व का परिचायक है और कर्म का आधार। इसीलिए कर्म वर्णाश्रित है, न कि वर्ण कर्माश्रित। कर्म बदलने से यदि वर्ण बदलेगा तो पूजा कराने वाला ब्राह्मण यदि धर्मरक्षा के लिए शस्त्र उठाये तो उसकी क्षत्रिय संज्ञा हो जाती, तो उसे अपनी पत्नी से ही ब्राह्मणीगमन का पाप लग जाता। कर्म वर्ण के ऊपर आश्रित है इसीलिए द्रोणाचार्य और युधिष्ठिर का कर्म उनके वर्ण पर प्रभाव न डाल सका। पहले वर्ण मिलता है, तब उसके अनुरूप कर्म करने का अधिकार। कोई भी कर्म करके उसके अनुरूप वर्ण चयन करने का अधिकार नहीं है। उदाहरण :- पहले व्यक्ति आरबीआई का गवर्नर बनेगा फिर नोट छापेगा। पहले पद तब अधिकार। कोई भी व्यक्ति नोट छाप कर ये नहीं कह सकता है कि चूंकि मैं आरबीआई के गवर्नर का काम कर रहा हूँ तो मुझे वही पद दे दो। इसी प्रकार पूर्वजन्म की योग्यता के आधार पर इस जन्म का वर्ण मिलता है, फिर उसके अनुरूप कर्म करने का अधिकार। कर्म चुनने की स्वतंत्रता किसी को भी नहीं है। यदि ऐसा होता तो भिक्षाटन करने (ब्रह्मवृत्ति) के लिए उत्सुक अर्जुन को भगवान नहीं रोकते। इज्याध्ययनदानानि विहितानि द्विजन्मनाम्। जन्मकर्मावदातानां क्रियाश्चाश्रमचोदिताः॥ ( श्रीमद्भागवत 7-11-13 ब्राह्मण की संतान जन्म से ही ब्राह्मण होती है देखते है कुछ शास्त्रोक्त प्रमाण ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान् सर्वेषां प्राणिनामिह । तपसा विद्यया तुष्ट्या किमु मत्कलया युतः ॥ ~ श्रीभगवान् , भागवत , स्कन्ध १० , अध्याय ८६ , श्लोक ५३ " जन्मगतरूप से ब्राह्मण सभी जीवों में श्रेष्ठ है । इसके साथ तपस्या , विद्या , आत्मसन्तुष्टियुक्त होनेपर और भी उन्नत है । और यदि मद्भक्तिसंपन्न भी हो तो कहना ही क्या ! " जन्मना ब्राह्मणों ज्ञेय: संस्कारैर्द्विज उच्चते । विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभि: श्रोत्रिय लक्षणम् ॥ ~ अत्रिसंहिता श्लोक १४० " ब्राह्मण के बालक को जन्म से ही ब्राह्मण समझना चाहिए संस्कारों से "द्विज" संज्ञा होती है तथा विद्याध्ययन से "विप्र" नाम धारण करता है । " विद्या तपश्च योनिश्च एतद् ब्राह्मणकारकम् । विद्यातपोभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव स:॥ ~ पतंजलि भाष्य, ५१.११५ अर्थात् - '' विद्या, तप और ब्राह्मण-ब्राह्मणी से जन्म ये तीन बातें जिसमें पाई जायँ वही पक्का ब्राह्मण है, पर जो विद्या तथा तप से शून्य है वह जातिमात्र के लिए ब्राह्मण है, पूज्य नहीं हो सकता । '' ब्राह्मण्यं कुलगोत्रे च नामसौन्दर्यजातयः । स्थूलदेहगता एते स्थूलाद्भिन्नस्य मे नहि ॥ ~ आत्मबोधोपनिषत् २२ " ब्राह्मणत्व. कुल-गोत्रादि, सौन्दर्य-कदर्य स्थूल देह का धर्म हैं । " तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ ~ छान्दोग्योपनिषद् ५.१०.७ " अपने पूर्व कर्म के अनुसार ब्राह्मण योनि, क्षत्रिययोनि , वैश्ययोनि में जन्म लेता है , किन्तु बुरे कर्म वाला कुत्तायोनि, सुकर योनि, चंडालयोनि, में जाता है । '' योनि शब्द जन्मवाचक है । यहाँ कुत्ते, सुकरादि योनि के समान ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के लिए भी योनिशब्द प्रयुक्त हुआ है । यहां खास यह समझना जरूरी है कि ब्राह्मण और अन्य जाती की संयोग जन्मी हुई संतान वर्णसंकर ही कहलाती है। और वर्णसंकर प्रत्येक धार्मिक विधि में बाध्य होते है, उसके सोलह संस्कारों का कोई महत्व नही होता अगर उसका उपनयन भी होता तो वह भी एक सामाजिक विधि के तौर पर मानी जायेगी शास्त्रसम्मत नही।। वर्णसंकर संतान से जाति धर्म एवं कुल धर्म दूषित होता है शास्त्र में वर्णसंकर संतान को घोर नरक का द्वार बताया गया है, एवं वर्णसंकर संतानों को पितरों का तर्पण पिंड दान आदि के अधिकारी भी नहीं माना गया है इनके द्वारा किया गया तर्पण पिंड दान पितरों स्वीकार नहीं करते। एवं शुभ कर्मों और यज्ञ आदि में उनके द्वारा दी गई आहूति देवताओं तक पहुंचती नहीं है क्योंकि वैसे लोग कहते हैं कि मंत्र के आधीन देवता होते हैं किंतु वर्णसंकर संताने विशुद्ध गोत्र कि ना होने के कारण देवता उसका आह्वान स्वीकार नहीं करते। पुराणों में कहा गया है --- #विप्राणांयत्रपूज्यंतेरमन्तेतत्र_देवता । जिस स्थान पर #ब्राह्मणों का पूजन हो वहाँ देवता भी निवास करते हैं। अन्यथा #ब्राह्मणोंकेसम्मान के बिना #देवालय भी #शून्य हो जाते हैं । इसलिए ....... #ब्राह्मणातिक्रमोनास्तिविप्रावेदविवर्जिताः ।। #श्री_कृष्ण ने कहा - #ब्राह्मण यदि वेद से हीन भी हो, तब पर भी उसका #अपमान नही करना चाहिए। क्योंकि #तुलसी का पत्ता क्या छोटा क्या बड़ा वह हर अवस्था में #कल्याण ही करता है। #ब्राह्मणोस्य_मुखमासिद्...... वेदों ने कहा है की #ब्राह्मणविराटपुरुष_भगवान के मुख में निवास करते हैं। इनके मुख से निकले हर शब्द भगवान का ही शब्द है, जैसा की स्वयं भगवान् ने कहा है कि , #विप्रप्रसादात्धरणी_धरोहमम्। #विप्रप्रसादात्कमला_वरोहम। #विप्रप्रसादात्अजिता_जितोहम्। #विप्रप्रसादात्मम्रामनामम् ।। #ब्राह्मणों_के आशीर्वाद से ही मैंने धरती को धारण कर रखा है। अन्यथा इतना भार कोई अन्य पुरुष कैसे उठा सकता है, इन्ही के आशीर्वाद से #नारायण हो कर मैंने लक्ष्मी को वरदान में प्राप्त किया है, इन्ही के आशीर्वाद से मैं हर युद्ध भी जीत गया और #ब्राह्मणोंकेआशीर्वाद से ही मेरा नाम #रामअमर हुआ है, अतः #ब्राह्मणसर्वपूज्यनीय है। और #ब्राह्मणोंकाअपमान ही कलियुग में पाप की वृद्धि का मुख्य कारण है। #सर्वब्राह्मणानांजयते जो धर्मशास्त्र ब्राह्मण को श्रेष्ठ सिद्ध करते हैं, ब्राह्मण के कर्तव्यच्युत होने की स्थिति में उन्हीं धर्मशास्त्रों के अनुसार जो दंड ब्राह्मण हेतु निहित है, उसे यदि जान जायें तो पांव तले की जमीन खिसक जाए। शराबी, अभक्ष्यभक्षण करने वाले, राजनीतिक व्यक्तियों की जूतियां उठाने वाले ब्राह्मण जिन मंचो पर ब्राह्मण एकता और जय परशुराम के नारे लगाते हैं, उनके लिए इस लोक और परलोक में स्पेशल व्यवस्था कर रखी है धर्मराज ने। शायद ये पतित ब्राह्मण जो फरसा उठा कर भगवान् परशुराम जी के प्रतिनिधि बनने का प्रयास करते हैं, उनका सामर्थ्य इतना भी नही कि कभी धोखे से ही चिरंजीवी भगवान् परशुराम दर्शन दे तो उनके तेज का एक अंश भी संभाल पाने लायक ब्राह्मणत्व इनमें शेष हो। आद्य जगद्गुरु भगवान श्रीशंकराचार्य जी श्रीमद्भगवद्गीता पर भाष्य लिखने से पूर्व उपोद्घात में लिखते हैं----- "ब्राह्मणत्वस्य हि रक्षणेन रक्षितः स्याद् वैदिको धर्म: तदधीनत्वाद् वर्णाश्रमभेदानाम्।" 'ब्राह्मणत्व के रक्षा से ही वैदिक धर्म रक्षित है, सभी वर्णाश्रम उसीके अधीन है।' इसीलिए कहता हूँ ब्राह्मणत्व की रक्षा कीजिये, क्योंकि ब्राह्मणत्व के रक्षा से ही ब्राह्मण सहित सभी वर्णाश्रमों की रक्षा सम्भव है, और वर्णाश्रम-धर्म की रक्षा ही सनातन धर्म की रक्षा है। विदेशी आक्रांताओं द्वारा मन्दिरें तोड़ दिये जाने से, ग्रन्थागार जला दिये जाने से भी जितना सनातन धर्म को हानि नहीं हुआ, उससे करोड़ो-अरबों गुणा अधिक हानि अधुना समाज में वर्णाश्रमधर्म त्याग से हो रहा है। बहुतेरे लोग शायद गालियां देते हुए आ सकते है। कुछ असमर्थ होने की दशा में मन ही मन हमको समाज विरोधी, जाति घाती या नवीन विचारों के साथ सामंजस्य स्थापित ना करने वाला बोल सकते है। किन्तु हमारे लिए मनु जी महाराज द्वारा स्थापित ये उपदेश ही सिरोधार्य है ----- "आचारः परमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त एव च । तस्मादस्मिन्सदा युक्तो नित्यं स्यादात्मवान्द्विजः।। 【मनुस्मृति १/१०८】 नाममात्र के ब्राह्मण नही प्रत्युत ब्राह्मणत्व होना चाहिए।। सिद्धांत। हमें व्यक्तिवादी नहीं सिद्धांतवादी बनना चाहिए....। शास्त्र और सिद्धान्त ही मुख्य है । तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ गन्नार्थे ब्राह्मण अर्थ वा वर्णानां वापि सङ्करे। गृहीबातां विप्रविश शस्त्रं धर्मव्यपेक्षया ।।(बौधायन स्मृति २। २। ८०) गाय और ब्राह्मण की रक्षा के लिये और वर्णसंकरता से प्रजा को बचाने के लिये ब्राह्मण और वैश्य को भी शस्त्र ग्रहण कर लेना चाहिये।' जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिम् । क्रियमाण कर्म के आधार पर वर्ण नहीं तय होता, वरन् वह क्रियमाण कर्म जब फलित होता है, उस कर्मफल के आधार पर वर्ण तय होता है । सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः । [ पा०यो०सू०२।१३] बिना वर्णनिर्धारण किये ही क्रियमाण कर्म में सामान्य विशेष का विभाग भी हास्यास्पद् है क्योंकि कोई भी कर्म विहितदशा को प्राप्त होने हेतु तदनुकूल वर्णनिर्धारण की पूर्व में अपेक्षा रखता है । वर्णानुकूल होने पर ही कर्म विहित कहलाता है, अन्यथा वह प्रतिषिद्ध कोटि में चला जाता है , फलतः वर्णानुकूल होने पर ही सामान्य विशेष का विभाग भी व्यावहारिक हो पाता है । यही कारण है कि //अमुक वर्ण अमुक कार्य न करे // इत्यादि जो शास्त्र वचन हैं, वे आप स्वयं आर्ष स्वीकार कर पाठ करते हुए स्वयं ही ' उल्टे बांस बरेली को ' की कहावत चरितार्थ करते हो । मनुष्य जाति का मुल संविधान मनुस्मृतिः न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः | ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ||१५४|| अर्थात कोई भी व्यक्ति न तो अधिक आयु से, न श्वेत बालों से, न धन से, और न ही अनेक बंधुओं से महान होता है, अपितु ऋषियों ने यही नियम बनाया हुआ है की हमारे बीच में जो वेदों का सर्वोत्क्रुत्ष्ट विद्वान है, वही महान है | . विप्राणां ज्ञानतो जैष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः | *वैश्यानां धान्यधनतः शूद्राणामेव जन्मतः ||१५५|| अर्थात ब्राह्मणों की ज्ञान से, क्षत्रियों की पराक्रम से, वैश्यों की धन-धान्य से, जबकि शूद्रों की जन्म से ही श्रेष्ठता सिद्ध होती है | *आत्मज्ञान की दैवीगुण न हो तो , कोई भी सनातन ब्राह्मण कहलाने की सर्मिन्दा करना चाइये . ब्राह्मण तत्त्व एक उपलब्ध किया हुआ गुण , एक पवित्र बिचार धारा स्वरूप मानसिक अबस्था है, जो मानव जाती को कल्याण के और ले जाता है . किसी देश का साशन कर्ता की जाती पन्थ या भेद - भाव नहीं है , जिस को परम प्रभु "श्री कृष्णा " ने " दैवी गुण सम्पदा मनुस्य " के नाम पर ब्याख्या की है .भगवान की कहना है , कोई भी ब्राह्मण धर्म ( शास्वत सनातन धर्म ) अबलम्बन कर सकता है . सनातन ब्राह्मण कुल में जन्म लेनेवालों के यदि आत्मा तत्त्व दैवी गुण न हो तो वो सनातन ब्राह्मण कहलाने की योग्य नहीं रहे ...।। उपाध्यात् दश आचार्य: आचार्याणां शतं पिता | सहस्रं तु पितॄन् माता गौरवेण अतिरिच्यते || व्यक्ति के निर्माण में, एक आचार्य (आध्यात्मिक गुरु और वेदों-शास्त्रों का मर्मज्ञ) उपाध्याय (वेदों को जानने वाला) से दस गुना श्रेष्ठ होता है। पिता सौ आचार्यों के बराबर, और माता हज़ार पिताओं से श्रेष्ठ होती है ब्राह्मणाे जायमानाे हि पृथिव्यामधिजायते । ईश्वरः सर्वभूतानां धर्मकाेशस्य गुप्तये ।। अज्ञस्य दुःखौघमयं,ज्ञस्यानन्दमयं जगत्।अन्धंभुवनमन्धस्य,प्रकाशं तु सुचक्षुषाम्।।वराहोपनिषद्२२ जैसे अंधे के लिये संसार अंधकारमय है और अच्छी आँखोंवाले के लिये प्रकाशमय है,उसीप्रकार अज्ञानी(विषयात्मिकाबुद्धिमान्) के लिये यह जगत् दुःखों का आगार है। परन्तु जो ज्ञानवान(इसजगत को भगवान की क्रीडा का केन्द्र मानने वाले)हैं,उनके लिये यही वह जगत आनन्दमय हो जाता है।। भूदेव (ब्राह्मण) सभी वर्णों का गुरु है सदा वन्दनीय है| उसके प्रति धार्मिक सज्जनों की खूब आस्था है | पर शास्त्र से पूज्य वही जानिए जो विशुद्ध ब्राह्मण हो अर्थात् जो वर्णसंकर न हो यथाकाल संस्कार हुआ हो और नित्य सन्ध्यावन्दनशील हो, भक्ष्य का विधिवत् सेवी हो, वेदाध्ययन आदि शास्त्रोक्त कर्म करता हो | इसका अर्थ कदापि ये नहीं हुआ कि व्रात्य पतित आदि दोषयुक्त ब्राह्मण का अपमान करो! और न ही यह समझना चाहिए कि ब्राह्मणेतर का भी अपमान करो! सभी यथास्थान यथायोग्य मान्य व अपेक्षित है | वैदिक धर्म में किसी की उपेक्षा नहीं होती सभी को यथायोग्य कार्य निर्धारित है| अपना निर्दिष्ट कार्य भले अल्प ही सही पर करो! तो दोष नहीं प्रत्युत् धर्म है, पर दूसरे के धर्म का आचरण पूरी निष्ठा व लगन से करने पर भी अधर्म ही होगा और कर्ता अधर्मी व दण्डनीय होता है फिर चाहे वह कोई हो! हो क्या रहा है जगत् में कि व्रात्य व पतित ब्राह्मण विशुद्ध ब्राह्मणों की नकल करके मलाई खा रहें है| वृत्तिचौर्य कर रहें है| यह अपराध है वैदिक धर्म में इन अधर्मियों को राजा के अभाव में प्रभु स्वयं दण्ड देतें है इहलोक में कुलनाश के रुप में तथा परलोक में नियत काल तक नरकादि पतन के रुप में | ये जिसे मलाई समझ कर खा रहें है वह हलाहल विष ही है| और इन्हीं लोगों के कारण विशुद्ध ब्राह्मण व धर्म भी अपमानित हो रहे हैं| जो सन्ध्या नहीं करते, वेदाध्ययन नहीं करते, अभक्ष्य भक्षण करतें है, सुमुद्रोल्लंघन करतें है, शाखारण्ड दोष से व्रात्य हो चुकें है, पतितों का याजन करतें है वे व्रात्य पतित विशुद्ध ब्राह्मण वनकर घूम रहें है अपने को श्रेष्ठ कह रहें है, कथा वांच रहें है | अधर्म मार्ग पर चलकर धर्म प्रचार व धर्मरक्षा की बडी बडी बातें करतें है| कीचड में धंसा कीचड से कीचड को स्वच्छ करने की बात करे तो उसे कोई मूर्ख ही मान सकता है| सार ये है कि - लोभ मुख्य व धर्म गौण वना दिया है कलिचेलों ने| लोभ: पापस्य कारणं अत: पाप की वृद्धि हो रही है चूंकि धर्म गौण होने से अभ्युदय व नि:श्रेयस भी गौण रहेंगे| जय श्री राम वर्तमान दौर में ‘मनुवाद’ शब्द को नकारात्मक अर्थों में लिया जा रहा है। ब्राह्मणवाद को भी मनुवाद के ही पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है। वास्तविकता में तो मनुवाद की रट लगाने वाले लोग मनु अथवा मनुस्मृति के बारे में जानते ही नहीं है या फिर अपने निहित स्वार्थों के लिए मनुवाद का राग अलापते रहते हैं। दरअसल, जिस जाति व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराया जाता है, क्या है मनुवाद : जब हम बार-बार मनुवाद शब्द सुनते हैं तो हमारे मन में भी सवाल कौंधता है कि आखिर यह मनुवाद है क्या? महर्षि मनु मानव संविधान के प्रथम प्रवक्ता और आदि शासक माने जाते हैं। क्रमशः

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