गायत्री साधना

#गायत्रीसाधनाऔर_सिद्धि।। ।।१।। गायत्री प्रब्रह्म का मातृ स्वरूप है। समस्त पापों के शमन के लिए गायत्री जप अत्यंत महत्वपूर्ण है। गायत्री मंत्र में 3 विभाग हैं-- प्रणव,महाव्याहृति और मंत्र। इनको त्रिपदा भी कहा जाता है। यह जप करने वालों कि पाप से रक्षा करती हैं अतएव गायत्री कहलाती हैं। गायत्री को वेदों का सार कहा गया है--#सर्ववेदानांगायत्रीसारउच्यते। गायत्री के तीनों भाग तीन वेदों से संग्रहित किए गए हैं-- #त्रिभ्यएववेदेभ्यपादं_पादमुदाहृतम्। गायत्री की उपासना वैदिक उपासना है और यह समस्त देवताओं को प्रसन्न करने वाली और परब्रह्म की विशुद्ध उपासना है। इससे ज्ञात अज्ञात समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। वेदों का सार होने के कारण यह वेदों से भी श्रेष्ठ है।--#चतुर्वेदात्परागुर्वीगायत्रीमोक्षदास्मृता। 3 वर्णों के लिए गायत्री अमृत के समान है और ब्राह्मणों के लिए तो कामधेनु कहीं गई है। गायत्री जप के बिना ब्राह्मण ब्राह्मण कहलाने के लायक नहीं है। वेद का अध्ययन जो करता है लेकिन गायत्री को जो नहीं भजता वह ब्राह्मण भी यथार्थ ब्राह्मण नहीं है।-- #किं_वेदै: पठितै: सर्वै: सेतिहासपुराणकै:। सांगै: सावित्रीहीनो यो न स विप्रत्वमवाप्नुयात्।। ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य ये तीन वर्ण ही गायत्री के अधिकारी हैं। स्त्री एवं शूद्रों के लिए त्रिपदा गायत्री का निषेध किया है। ब्राह्मण के लिए #त्रिपदागायत्री, क्षत्रियों के लिए #त्रिष्टुपब्गायत्री और वैश्यों के लिए #जगतीगायत्री अथवा तीनों के लिए त्रिपदागायत्री प्रशस्त मानी गई है।--- #गायत्र्याछंदसाब्राह्मणमसृजद्,#त्रिष्टुभाराजन्यं,#जगत्यावैश्यं,#नकेनचिच्छंदसाशूद्रम्। स्त्री और शूद्र #गायत्रीप्रणवओंकार और #वेदमंत्र #लक्ष्मीमंत्र में अधिकार नहीं रखते यदि कोई ऐसा करता है तो वह मृत्यु के बाद नर्कगामी होता है ।और जो आचार्य उनको इनका अध्ययन करवाता है वह भी मृत्यु के बाद आधोलोक में जाता है।--- #सावित्रींप्रणवंयजुर्लक्ष्मींस्त्रीशूद्रायनेच्छन्ति।#यदिजानीयात्स्त्रीशूद्र: #स_मृतोऽधोगच्छति।..नृ०उप० ऐसा किसी द्वेष के कारण नहीं कहा गया है बल्कि परमविशुद्धि की मर्यादा के कारण कहा गया है। जो स्त्रियां और शूद्र गायत्री मंत्र के ग्रहण करने और जप करने में #अनधिकारी हैं वे गायत्री की महिमा सुने और अपने मुख से #गायत्री #गायत्री इस शब्द को भी यदि उच्चारण करें तो भी वे सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्म लोक को प्राप्त होंगे--- #गायत्रीतिपदावृत्यातत्फलं_प्रानुवन्नर:। #सर्वपापविनिर्मुक्तोब्रह्मलोकंस_गच्छति।। अतः गायत्री की #कथाश्रवण #स्मरण और #ध्यान में सब लोग अधिकारी हैं।..... .. (क्रमश:) #गायत्रीसाधनाएवं_सिद्धि ।।२।। जिनका वेदों और गायत्री मंत्र में अधिकार नहीं है । जो यज्ञोपवीत पहने हुए नहीं है।वह निम्न मंत्र का जप करके गायत्री मां का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं-- #ह्रीं_यो देव: सविताऽस्माकं मनः प्राणेन्द्रियक्रिया:। प्रचोदयति तद् भर्गं वरेण्यं समुपास्महे।। वेदों के अध्ययन की अपेक्षा गायत्री मंत्र के जप को अधिक फलप्रद माना गया है। गायत्री को ही ब्रह्मा विष्णु और शिव माना गया है-- #गायत्र्येव परोविष्णुर्गायत्र्येव पर: शिव:। गायत्र्येव परो ब्रह्मा गायत्र्येव त्रयी तत:।। समस्त पापों के शमन के लिए और प्रायश्चित के लिए गायत्री जप प्रशस्त माना गया है-- #गायत्र्यास्तुपरंनास्तिशोधनंपापकर्यणाम्। चारों वेदों ब्राह्मण ग्रंथों आरण्यक उपनिषद ग्रंथों में और स्मृतियों तथा पुराणों में गायत्री की महिमा विविध स्थानों पर गाई गई है। गायत्री का नियमित जप करने वाला ही दानादि प्रतिग्रह को पचा सकता है। पद्मपुराण में मां गायत्री स्वयं को वेदों की जननी कहा है-- #माताहं_सर्ववेदानाम्। गायत्री जप से रहित ब्राह्मण से वैदिक कर्म नहीं करवाने चाहिएं-- #गायत्र्याजपहीनस्तुवेदकार्येनयोजयेत्। ब्राह्मण को प्रतिदिन एक हजार जप करना उत्तम, शत जप करना मध्यम और कम से कम 10 बार जप करना सामान्य विधान है यदि में ऐसा करता है तो पाप से लिप्त नहीं होता -- #सहस्रपरमांदेवीं शतमध्यां दशावराम्। गायत्रीं च जपन् विप्रो न स स पापेन लिप्यते।। गायत्री का जाप सुबह, शाम कभी भी सर्व काल में किया जा सकता है कुछ है यह कहते हैं कि शाम को या रात को जप प्रशस्त नहीं है किंतु ऐसी धारणा बिल्कुल मिथ्या है। क्योंकि जो लोग त्रिकाल या तुरीय संध्या करते हैं वह भी निसंदेह गायत्री जप में संलग्न है। #गायत्रीं जपते यस्तु द्वौ कालौ ब्राह्मण: सदा। तया राजन् स विज्ञेय पंक्तिपावनपावन:।। #संध्यायां च प्रभाते मध्याह्ने च तत: पुनः। गायत्री जप से समस्त सूर्यशनि आदि ग्रह व्यक्ति के लिए मंगलकारी हो जाते हैं-- #ये चास्या दारुणा: केचिद् ग्रहा: सूर्यादयो दिवि। ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवा: शिवतरा: सदा। ( क्रमशः) #गायत्रीसाधनाऔरसिद्धि। ।। ३।। मां गायत्री के जप के बिना द्विज को अन्य मंत्रों की सिद्धि नहीं हो सकती । अतः यदि किसी भी देवता की उपासना में सफलता चाहते हैं तो वे नित्य गायत्रीजप संध्या अवश्य करें---- #गायत्रीं_य: परित्यज्य चान्यमंत्रमुपासते न साफल्यमवाप्नोति कल्पकोटिशतैरपि। गायत्री उपासना से ही वैदिक महावाक्यों का अर्थज्ञान एवं परम तत्व का साक्षात्कार हो पाता है। गायत्री की समर्थ उपासना से ही आत्म शक्ति प्राप्त होती है-- #गायत्र्युपासनाकरणादात्मशक्तिस्तु_लभ्यते जो गायत्री मंत्र का 12 लाख जप कर लेता है वहीं पूर्ण ब्राह्मण कहलाने योग्य है। अतः ब्राह्मणों को तो गायत्री की उपासना विशेष रूप से करनी चाहिए--- #लक्षद्वादशयुक्तस्तुपूर्णब्राह्मणइंङ्गितः। तीन व्याहृतियों से युक्त गायत्री मंत्र अपने आप में परिपूर्ण है। गायत्री मंत्र में #सातव्याहृतियां #प्रणव आदि विनियोग और अन्य मंत्रों के संयोग से विविध शस्त्रास्त्र मंत्रों का निर्माण होता है। लेकिन उनका प्रयोग सर्वसाधारण के लिए उपयुक्त नहीं है। क्योंकि मंत्र व्यक्तिगत आध्यात्मिक स्तर के अनुसार ही गुरु मुख से प्राप्त करके जप करना प्रशस्त माना गया है। #देवीभागवत के अनुसार विभिन्न रोगों को दूर करने के लिए और विविध कामनाओं के लिए अलग-अलग सामग्री से हवन करके गायत्री मां की कृपा प्राप्त की जा सकती है। शनिवार के दिन पीपल वृक्ष के नीचे बाएं हाथ से पीपल का स्पर्श करते हुए गायत्री का निष्ठा पूर्वक जप करता हुआ व्यक्ति समस्त भौतिक रोग और अभिचार जनित रोग से मुक्त हो जाता है--- #जपेदश्वत्थालभ्य मंदवारे शतं द्विज:। भूतरोगाभिचारेभ्यो मुच्यते महतां भयात्। गायत्री आदि समस्त मंत्रों के ऋषि देवता और छंद का ध्यान/स्मरण रखना चाहिए अन्यथा पाप लगता है-- #अविदित्वा ऋषिं छंदो दैवतं योगमेव च। योऽध्यापयेज्जपेद्वापि पापीयाञ्जायते तु स:। #परम_रहस्य--- गायत्री मंत्र के 24 वर्णों में 24 देवता, 24 ऋषि ,24 छंद ,24 शक्तियां ,24 वर्ण,और 24 तत्व माने गए हैं अतः इनका ज्ञान गुरुमुख और सद्ग्रंथों से प्राप्त करें। जप के पूर्व की 24 मुद्राएं और जप के बाद की आठ मुद्राएं देवी को प्रसन्नता देने वाली कहीं गई हैं। मुद्राओं के ज्ञान के बिना भी जप निष्फल माना गया है। #एता_मुद्रा: न जानाति गायत्री निष्फला भवेत्। अतः विशेष फल चाहिए तो इन तत्वों का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त करें। गायत्री के 24 वर्ण के द्वारा शरीर का न्यास संपन्न करके ही जप में सफलता का आधान करें। क्योंकि न्यास के बिना भी आधा फल राक्षस ग्रहण कर लेते हैं-- #न्यासहीनं तु यत्कर्म अर्धं गृह्णन्ति राक्षसा:। #गायत्रीसाधनाऔर_सिद्धि ।।४।। गायत्री जप से पहले गायत्री शाप विमोचन करना अत्यावश्यक है। वास्तव में तो गायत्री दुर्गा आदि शक्तियां परब्रह्म स्वरूपा है अतः इन्हें शापित करना सर्वथा असंभव है । फिर भी ऋषियों ने इन महाशक्तियों को कीलित या शापित किया है तो वह कीलन इन महाशक्तियों का न होकर सामान्य साधकों का है । अर्थात् उन्होंने साधकों को कीलित किया है ताकि अनाधिकारी व्यक्ति उस मार्ग पर जा सके। ब्रह्मा वशिष्ठ विश्वामित्र और शुक्र यह चारों ऋषि अपने आप में अद्वितीय हैं। अतः इन्होंने सामान्य साधकों के प्रवेश को रोकने के लिए गायत्री के मार्ग को कीलित किया है, गायत्री को नहीं। जैसे मेघ का टुकड़ा हमारे नेत्रों को ही आच्छादित करता है सूर्य को नहीं। ठीक ऐसे ही गायत्री आदि महाशक्तियों का कीलन साधकों का ही कीलन है महाशक्ति का नहीं। अतः साधक साधना से पहले गायत्री साधना के मार्ग को शाप विमुक्त करके ही इस मार्ग में प्रवृत्त हो। तब सफलता प्राप्ति में सुगमता हो जाएगी। #जपयज्ञश्रेष्ठ_क्यों? ज्ञानयज्ञ, जपयज्ञ तथा अग्निहोत्र आदि से जपयज्ञ को श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में यह स्वीकार किया है कि यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूं। जपयज्ञ श्रेष्ठ होने के अनेक कारण हैं-- १. ज्यादा सामग्री की आवश्यकता नहीं रहती। २. इसमें जीव जंतुओं के भी आहत होने का डर नहीं है। ३. इसमें किसी विधि विधान में त्रुटि होने का भी डर नहीं है। ४. इसे गरीब से गरीब व्यक्ति भी कर सकता है। ५. इसमें पुरोहित आदि की भी आवश्यकता नहीं है। इसीलिए निम्न सूक्तियां जप की महत्ता को ही प्रतिपादित करते हैं-- #जपतोनास्तिपातकम् (जप करने वाले को पाप नहीं लगता) #यज्ञानां_जपयज्ञोऽस्मि(यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूं) #यावन्त: कर्मयज्ञा: स्यु: प्रदिष्टानि तपांसि च। सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्।। सब तप जप की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं है। जप को #स्वाध्याय भी कहा गया है--#स्वाध्याय_स्यान्मंत्रजाप:। #जपलक्षण मन के मध्य मंत्र स्थित हो और मंत्र के मध्य में मन स्थित हो। इस प्रकार मन और मंत्र के सम्मेलन की अवस्था ही जप है। #मनो मध्ये स्थितं मंत्रो मंत्रमध्ये स्थितं मन:। मनोमंत्रसमायुक्तं एतच्च जपलक्षणम्।। #जपकेशत्रु नासिका ध्वनि, थूकना ,जम्हाई लेना, क्रोध ,निद्रा ,आलस्य , हिचकी, मद, पतित मनुष्य को देखना, कुत्ते और पापी व्यक्ति को देखना, यह सब जप में बाधा माने गए हैं। इनसे बचें। अतः शांत चित्त से ही जप करें। आसन पर बैठकर और उचित दिशा में मुंह करके ही जप करें और जप के बाद आसन के नीचे की मिट्टी मस्तक पर लगाकर #ओम् शक्राय नमः ऐसा कहकर ही आसन छोड़ें। माला जप के दौरान वस्त्र से ढकी रहे और सुमेरू उल्लंघन न हो । गुरु के मार्गदर्शन से ही जप के रहस्य को समझें। जप से पूर्व माला का संस्कार अवश्य करें। संस्कारविधि ग्रंथों से या गुरु मुख से समझें। #अन्य मंत्र सिद्ध किए जा सकते हैं किंतु गायत्री और वेद के समस्त मंत्र स्वयं सिद्ध हैं। गायत्री मंत्र #चारों आश्रमों में स्थित व्यक्तियों के लिए उपयुक्त माना गया है। गृहस्थी और ब्रह्मचारी नित्य 108 बार अवश्य जपें। वानप्रस्थ और संन्यासी 1008 जप नित्य करें-- #गृहस्थो ब्रह्मचारी वा शतमष्टोत्तरं जपेत्। वानप्रस्थे यतिश्चैव जपेदष्टसहस्रकम्।। (जय मां वेदमाता) गायत्री शाप विमोचन जानकारी https://youtu.be/4FnS1tfNdms गायत्री शाप विमोचन विधि https://youtu.be/RPHMUr6GSsg गायत्री जप पाठ परायण प्रयोग वगेरा सभी जानकारियां इंटरनेट पर उपलब्ध है, लेकिन मंत्र दीक्षा केवल ब्रह्मनिष्ठ गुरु से ही ले और गुरु आदेश पर ही साधना पथ पर आगे बढ़े, और खास कर गायत्री साधना में बिना गुरु के आगे बढ़ना हितावह नही है।

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