विश्वामित्र के जन्म की कथा

विश्वामित्र के जन्म की कथा महाभारत अनुशासन पर्व के दानधर्म पर्व के अंतर्गत अध्याय 4 में विश्वामित्र के जन्म की कथा का वर्णन हुआ है[1]- विषय सूची 1 ऋचीक द्वारा गाधि को एक हजार घोड़े देना 2 ऋचीक एवं सत्‍यवती का विवाह 3 सत्‍यवती को ऋचीक द्वारा वरदान प्राप्त होना 4 विश्वामित्र के जन्म की कथा 5 टीका टिप्पणी और संदर्भ 6 संबंधित लेख 6.1 महाभारत अनुशासन पर्व में उल्लेखित कथाएँ ऋचीक द्वारा गाधि को एक हजार घोड़े देना वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय! ऋचीक ने पूछा- राजेन्‍द्र! मैं आपकी पुत्री के लिये आपको क्‍या शुल्‍क दूं? आप निस्‍संकोच होकर बताइये। नरेश्‍वर! इसमें आपको कोई अन्‍यथा विचार नहीं करना चाहिए। गाधि ने कहा- भृगुनन्‍दन! आप मुझे शुल्‍क रूप में एक हजार ऐसे घोड़े ला दीजिये जो चन्‍द्रमा के समान कान्तिमान और वायु के समान वेगवान हों तथा जिनका एक-एक कान श्‍याम रंग का हो। भीष्‍म जी कहते हैं- राजन! तब भृगु श्रेष्‍ठ च्‍यवन पुत्र शक्तिशाली महर्षि ऋचीक ने जल के स्‍वामी अदितिनन्‍दन वरुण देव के पास जाकर कहा- देवशिरोमणे! मैं आप से चंद्रमा के समान कांतिमान तथा वायु के समान वेगवान एक हजार ऐसे घोड़ों की भिक्षा मांगता हूँ जिनका एक ओर का कान श्‍याम रंग का हो। तब अतितिनन्‍दन वरुण देव ने उन भृगुश्रेष्‍ठ ऋचीक से कहा- बहुत अच्‍छा, जहाँ आपकी इच्‍छा होगी, वहीं से इस तरह के घोड़े प्रकट हो जायेंगे। तदनन्‍तर ऋचीक के चिन्‍तन करते ही गंगा जी के जल से चन्‍द्रमा के समान कान्ति वाले एक हजार तेजस्‍वी घोड़े प्रकट हो गये। कन्‍नौज के पास ही गंगा जी का वह उत्‍तम तट आज भी मानवों द्वारा अश्‍वतीर्थ कहलाता है। तात! तब तपस्‍वी मुनियों में श्रेष्‍ठ ऋचीक मुनि ने प्रसन्‍न होकर शुल्‍क के लिये राजा गाधि को वे एक हजार सुन्‍दर घोड़े दे दिये। ऋचीक एवं सत्‍यवती का विवाह तब आश्‍चर्यचकित हुए राजा गाधि ने शाप के भय से डरकर अपनी कन्‍या को वस्‍त्राभूषणों से विभूषित करके भृगुनन्‍दन ब्रह्मार्शिरोमणि ऋचीक ने उसका विधिवत पाणिग्रहण किया। वैसे तेजस्‍वी पति को पाकर उस कन्‍या को भी बड़ा हर्ष हुआ। सत्‍यवती को ऋचीक द्वारा वरदान प्राप्त होना भरतनन्‍दन! अपनी पत्‍नी के सद्व्‍यवहार से ब्रह्मार्षि बहुत संतुष्‍ट हुए। उन्‍होनें उस परम सुन्‍दरी पत्‍नी को मनोवांछित वर देने की इच्‍छा प्रकट की। नृपश्रेष्‍ठ! तब उस राजकन्‍या ने अपनी माता से मुनि की कही हुई सब बातें बतायीं। वह सुनकर उसकी माता ने संकोच सिर नीचे करके पुत्री से कहा-बेटी! तुम्‍हारे पति को पुत्र प्रदान करने के लिये मुझ पर भी कृपा करनी चाहिए, क्‍योंकि वे महान तपस्‍वी और समर्थ हैं। राजन्! तदनन्‍तर सत्यवती ने तुरंत जाकर माता की वह सारी इच्‍छा ऋचीक से निवेदन की। तब ऋचीक ने उससे कहा- कल्‍याणि! मेरे प्रसाद से तुम्‍हारी माता शीघ्र ही गुणवान पुत्र को जन्‍म देगी। तुम्‍हारा प्रेमपूर्ण अनुरोध असफल नहीं होगा। तुम्‍हारे गर्भ से भी एक अत्‍यन्‍त गुणवान और महान तेजस्‍वी पुत्र उत्‍पन्‍न होगा, जो हमारी वंशपरम्‍परा को चलायेगा। मैं तुम से यह सच्‍ची बात कहता हूँ। कल्‍याणि! तुम्‍हारी माता ऋतुस्‍नान के पश्‍चात पीपल के वृक्ष का आलिंगन करे और तुम गूलर के वृक्ष का। इससे तुम दोनों को अभीष्‍ट पुत्र की प्राप्ति होगी। पवित्र मुस्‍कानवाली देवि! मैंने ये दो मंत्रपूत चरू तैयार किये हैं इन में से एक को तुम खा लो और दूसरे को तुम्‍हारी माता। इससे तुम दोनों को पुत्र प्राप्‍त होंगे। तब सत्‍यवती ने हर्षमग्‍न होकर ऋचीक ने जो कुछ कहा था, वह सब अपनी माता को बताया और दोनों के लिये तैयार किये हुए पृथक-पृथक चरूओं की भी चर्चा की। उस समय माता ने अपनी पुत्री सत्‍यवती से कहा- बेटी! माता होने के कारण पहले से मेरा तुम पर अधिकार है, अत: तुम मेरी बात मानो। तुम्‍हारें पति ने जो मंत्रपूत चरू तुम्‍हारे लिये दिया है, वह तुम मुझे दे दो और मेरा चरू तुम ले लो। पवित्र हास्‍यवाली मेरी अच्‍छी बेटी! यदि तुम मेरी बात मानने योग्‍य समझों तो हम लोग वृक्षों में भी अदल-बदल कर लें। प्राय: सभी लोग अपने लिये निर्मल एवं सर्वगुणसम्‍पन्‍न श्रेष्‍ठ पुत्र की इच्‍छा करते हैं। अवश्‍य ही भगवान ऋचीक ने भी चरू निर्माण करते समय ऐसा तारतम्‍य रखा होगा। सुमध्‍य में! इसीलिये तुम्‍हारे लिये नियत किये गये चरू और वृक्ष में मेरा अनुराग हुआ है। तुम भी यही चिन्‍तन करो कि मेरा भाई किसी तरह श्रेष्‍ठ गुणों से सम्‍पन्‍न हो। युधिष्ठिर! इस तरह सलाह करके सत्‍यवती और उसकी माता ने उसी तरह उन दोनों वस्‍तुओं का अदल-बदलकर उपयोग किया। विश्वामित्र के जन्म की कथा फिर तो वे दोनों गर्भवती हो गयीं। अपनी पत्‍नी सत्‍यवती को गर्भवती अवस्‍था में देखकर भृगुश्रेष्‍ठ महर्षि ऋचीक का मन खिन्‍न हो गया। उन्‍होनें कहा- शुभे! जान पड़ता है तुमने बदलकर चरू का उपयोग किया है। इसी तरह तुम लोगों ने वृक्षों के आलिंगन में भी उलट-फेर कर दिया है- ऐसा स्‍पष्‍ट प्रतीत हो रहा है। मैंने तुम्‍हारे चरू में सम्‍पूर्ण ब्रह्मातेज का संनिवेश किया था और तुम्‍हारी माता के चरू में समस्‍त क्षत्रियोचित शक्ति की स्‍थापना की थी। मैनें सोचा था कि तुम त्रिभुवन में विख्‍यात गुणवाले ब्राह्मण को जन्‍म दोगी और तुम्‍हारी माता सर्वश्रेष्‍ठ क्षत्रिय की जननी होगी। इसलिये मैंने दो तरह के चरूओं का निर्माण किया था। शुभे! तुमने और तुम्‍हारी माता ने अदला-बदली कर ली है, इसलिये तुम्‍हारी माता श्रेष्‍ठ ब्राह्मण पुत्र को जन्‍म देगी और भद्रे! तुम भयंकर कर्म करने वाले क्षत्रिय की जननी होओगी। भाविनि! माता के स्नेह में पड़कर तुमने यह अच्‍छा काम नहीं किया।[2] राजन! पति की यह बात सुनकर सुन्‍दरी सत्‍यवती शोक से संतप्‍त हो वृक्ष से कटी हुई मनोहर लता के समान मूर्च्छित होकर पृथ्‍वी पर गिर पड़ी। थोड़ी देर में जब उसे चेत हुआ, तब वह गाधिकुमारी अपने स्‍वामी भृगुभूषण ऋचीक के चरणों में सिर खाकर प्रणाम पूर्वक बोली- 'ब्रह्मावेत्‍ताओं में श्रेष्‍ठ ब्रह्मर्षे! मैं आपकी पत्‍नी हूं, अत: आपसे कृपा-प्रसाद की भीख चाहती हूँ। आप ऐसी कृपा करें जिससे मेरे गर्भ से क्षत्रिय पुत्र उत्‍पन्‍न न हो। मेरा पौत्र चाहे उग्रकर्मा क्षत्रियस्‍वभाव का हो जाय, परंतु मेरा पुत्र वैसा न हो। ब्रह्मान! मुझे यही वर दीजिये। तब उन महातपस्‍वी ऋषि ने अपनी पत्‍नी से कहा, 'अच्‍छा, ऐसा ही हो' तदनन्‍तर सत्‍यवती ने जमदग्निनामक शुभगुणसम्‍पन्‍न पुत्र को जन्‍म दिया। राजेन्‍द्र! उन्‍हीं ब्रह्मार्षि के कृपा-प्रसाद से गाधि की यशस्विनी पत्‍नी ने ब्रहावादी विश्वामित्र को उत्‍पन्‍न किया। इसीलिये महातपस्‍वी विश्वामित्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणत्‍व को प्राप्‍त हो ब्राह्मणवंश के प्रवर्तक हुए।

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