क्या मनुस्मृति में ऐसा लिखा है ब्राह्मण शुद्र और शुद्र ब्राह्मण हो सकता है?
*आक्षेप : क्या मनुस्मृति में ऐसा लिखा है ब्राह्मण शुद्र और शुद्र ब्राह्मण हो सकता है?*
खंडन:
इस जन्म में अंत तक ज्यो की त्यों ही जाती रहती है, इस श्लोक के विवेचन हेतु हम साथ मे अगले श्लोक की विवेचना करेंगे
मनुस्मृति अनुसार सप्तम जन्ममें नीच सन्तानको ब्राह्मणत्वादिकी प्राप्ति-
शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातः श्रेयसा चेत्प्रजायते ।
अश्रेयान् श्रेयसी जातिं गच्छत्यासप्तमाद् युगात् ॥ ६४॥
ब्राह्मणसे शूदामें उत्पन्न (पारशव-१०८) जातिकी कन्या ब्राह्मणसे विवाह
कर कन्या उत्पन्न करे ( इस प्रकार ) वह सप्तम जन्म (पीढ़ी) में श्रेष्ठ जातिको
प्राप्त करती है ॥ ६४ ॥
विमर्श-इस श्लोकका विशद आशय यह है कि पारशव (१०८) जातिकी कन्या ब्राह्मणसे विवाहकर कन्या उत्पन्न करे, वह उत्पन्न हुई कन्या पुनः, ब्राह्मणसे विवाह कर पुनः कन्या ही उत्पन्न करे; इसी क्रमसे छः जन्मतक उत्पन्न होती हुए कन्याएं ब्राह्मणसे विवाह करती हुई कन्याओंको उत्पन्न करती रहें तो वह कन्या सप्तम जन्म (सातवी पीढ़ी) में ब्राह्मणसे जिस सन्तान (पुत्र या पुत्री) को सत्पन्न करती है, वह सन्तान नीच क्षेत्रज होकर भी वीर्यकी प्राधान्यतासे सप्तम जन्ममें उच्च वर्ण (ब्राह्मण) को प्राप्त करती है।
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् ।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥६५॥
( पूर्व (१०६४ ) श्लोकके अनुसार सातवें जन्ममें ) शुद्ध ब्राह्मण ('पारशव' १०८) शूदत्वको प्राप्त करता है। इसी प्रकार क्षत्रिय तथा वैश्यसे शूद्राम उत्पन्न सन्तान (पुत्र या पुत्री ) क्रमशः क्षत्रियत्व तथा वैश्यत्व रूप उत्कर्षको तथा इसी क्रमसे अपकर्षको प्राप्त करती है ॥६५॥
विमर्श-शूद्रको सप्तम जन्ममें ब्राह्मणत्व प्राप्त करनेका क्रम पहले (२०६४) श्लोकके 'विमर्श' में स्पष्ट कर दिया गया है, अब यहाँपर ब्राह्मणको शुद्धत्व पानेका क्रम कहते हैं-यदि ब्राह्मण केवल शूद्राके साथ विवाहकर पुरुषको ही उत्पन्न करे, वह पुरुष भी केवल शूद्राके साथ विवाहकर पुरुषको ही उत्पन्न करे, इस प्रकार वह ब्राह्मण पुरुष सप्तम जन्म (पीढ़ी) में केवल शुद्धत्वको प्राप्त करता है। इसी प्रकार क्षत्रिय तथा वैश्यसे शूद्रामें उत्पादित सन्तानको उत्कर्ष तथा अपकर्ष की प्राप्ति को जानना चाहिये, किन्तु 'जातिका उत्कर्ष सप्तम या पञ्चम जन्ममें जानना चाहिये' ('जात्युत्कर्षों युगे ज्ञेयः पञ्चमे सप्तमेऽपि वा-या० स्मृ० १।९६) ऐसा महर्षि याज्ञवल्क्यके कहनेसे क्षत्रियसे (शदामें) उत्पन्न सन्तानका पञ्चम जन्म (पीढ़ी) में जातिके उत्कर्ष तथा अपकर्षकी प्राप्ति को जानना चाहिये। और महर्षि याज्ञवल्क्यके उक्त वचनमें 'वा' शब्दके द्वारा पक्षान्तरका संग्रह होनेसे वृद्ध व्याख्याके अनुरोधसे वैश्यसे शुद्रामै उत्पन्न सन्तानके तीसरे जन्ममें ही उत्कर्ष तथा अपकर्षकी प्राप्ति को समझना चाहिये। इसी न्यायसे ब्राह्मणसे वैश्यामें उत्पन्न सन्तानके पञ्चम जम्ममें, ब्राह्मणसे क्षत्रियामें उत्पन्न सन्तानका तृतीय जन्ममें और क्षत्रियसे वैश्यामें उत्पन्न सन्तानका भी तृतीय जन्म में उत्कर्ष तथा अपकर्षकी प्राप्ति को जानना चाहिये। यह सब मनुस्मृतिके इसी श्लोककी मन्वर्थमुक्तावली' व्याख्यामें कुलुकभट्टने स्पष्ट किया है। यह जातिके उत्कर्ष तथा अपकर्षकी प्राप्ति उन-उन वर्गों में उत्पन्नकर अनापत्तिकालमें भी उन्हीं की जीविका करते रहनेपर होती है, यह 'जात्युत्कर्षो युगे ज्ञेयः (या० स्मृ० ११९६), श्लोककी वीरमिनोदय तथा मिताक्षरा व्याख्याओं में सविस्तर प्रतिपादित है, उसे वहीं देखना चाहिये।
-हिरेन त्र
खंडन:
इस जन्म में अंत तक ज्यो की त्यों ही जाती रहती है, इस श्लोक के विवेचन हेतु हम साथ मे अगले श्लोक की विवेचना करेंगे
मनुस्मृति अनुसार सप्तम जन्ममें नीच सन्तानको ब्राह्मणत्वादिकी प्राप्ति-
शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातः श्रेयसा चेत्प्रजायते ।
अश्रेयान् श्रेयसी जातिं गच्छत्यासप्तमाद् युगात् ॥ ६४॥
ब्राह्मणसे शूदामें उत्पन्न (पारशव-१०८) जातिकी कन्या ब्राह्मणसे विवाह
कर कन्या उत्पन्न करे ( इस प्रकार ) वह सप्तम जन्म (पीढ़ी) में श्रेष्ठ जातिको
प्राप्त करती है ॥ ६४ ॥
विमर्श-इस श्लोकका विशद आशय यह है कि पारशव (१०८) जातिकी कन्या ब्राह्मणसे विवाहकर कन्या उत्पन्न करे, वह उत्पन्न हुई कन्या पुनः, ब्राह्मणसे विवाह कर पुनः कन्या ही उत्पन्न करे; इसी क्रमसे छः जन्मतक उत्पन्न होती हुए कन्याएं ब्राह्मणसे विवाह करती हुई कन्याओंको उत्पन्न करती रहें तो वह कन्या सप्तम जन्म (सातवी पीढ़ी) में ब्राह्मणसे जिस सन्तान (पुत्र या पुत्री) को सत्पन्न करती है, वह सन्तान नीच क्षेत्रज होकर भी वीर्यकी प्राधान्यतासे सप्तम जन्ममें उच्च वर्ण (ब्राह्मण) को प्राप्त करती है।
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् ।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥६५॥
( पूर्व (१०६४ ) श्लोकके अनुसार सातवें जन्ममें ) शुद्ध ब्राह्मण ('पारशव' १०८) शूदत्वको प्राप्त करता है। इसी प्रकार क्षत्रिय तथा वैश्यसे शूद्राम उत्पन्न सन्तान (पुत्र या पुत्री ) क्रमशः क्षत्रियत्व तथा वैश्यत्व रूप उत्कर्षको तथा इसी क्रमसे अपकर्षको प्राप्त करती है ॥६५॥
विमर्श-शूद्रको सप्तम जन्ममें ब्राह्मणत्व प्राप्त करनेका क्रम पहले (२०६४) श्लोकके 'विमर्श' में स्पष्ट कर दिया गया है, अब यहाँपर ब्राह्मणको शुद्धत्व पानेका क्रम कहते हैं-यदि ब्राह्मण केवल शूद्राके साथ विवाहकर पुरुषको ही उत्पन्न करे, वह पुरुष भी केवल शूद्राके साथ विवाहकर पुरुषको ही उत्पन्न करे, इस प्रकार वह ब्राह्मण पुरुष सप्तम जन्म (पीढ़ी) में केवल शुद्धत्वको प्राप्त करता है। इसी प्रकार क्षत्रिय तथा वैश्यसे शूद्रामें उत्पादित सन्तानको उत्कर्ष तथा अपकर्ष की प्राप्ति को जानना चाहिये, किन्तु 'जातिका उत्कर्ष सप्तम या पञ्चम जन्ममें जानना चाहिये' ('जात्युत्कर्षों युगे ज्ञेयः पञ्चमे सप्तमेऽपि वा-या० स्मृ० १।९६) ऐसा महर्षि याज्ञवल्क्यके कहनेसे क्षत्रियसे (शदामें) उत्पन्न सन्तानका पञ्चम जन्म (पीढ़ी) में जातिके उत्कर्ष तथा अपकर्षकी प्राप्ति को जानना चाहिये। और महर्षि याज्ञवल्क्यके उक्त वचनमें 'वा' शब्दके द्वारा पक्षान्तरका संग्रह होनेसे वृद्ध व्याख्याके अनुरोधसे वैश्यसे शुद्रामै उत्पन्न सन्तानके तीसरे जन्ममें ही उत्कर्ष तथा अपकर्षकी प्राप्ति को समझना चाहिये। इसी न्यायसे ब्राह्मणसे वैश्यामें उत्पन्न सन्तानके पञ्चम जम्ममें, ब्राह्मणसे क्षत्रियामें उत्पन्न सन्तानका तृतीय जन्ममें और क्षत्रियसे वैश्यामें उत्पन्न सन्तानका भी तृतीय जन्म में उत्कर्ष तथा अपकर्षकी प्राप्ति को जानना चाहिये। यह सब मनुस्मृतिके इसी श्लोककी मन्वर्थमुक्तावली' व्याख्यामें कुलुकभट्टने स्पष्ट किया है। यह जातिके उत्कर्ष तथा अपकर्षकी प्राप्ति उन-उन वर्गों में उत्पन्नकर अनापत्तिकालमें भी उन्हीं की जीविका करते रहनेपर होती है, यह 'जात्युत्कर्षो युगे ज्ञेयः (या० स्मृ० ११९६), श्लोककी वीरमिनोदय तथा मिताक्षरा व्याख्याओं में सविस्तर प्रतिपादित है, उसे वहीं देखना चाहिये।
-हिरेन त्र
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