पतिव्रता
#पतिव्रता_स्त्रियों_के_कर्तव्य_का_वर्णन
महाभारत अनुशासन पर्व के दानधर्म पर्व के अंतर्गत अध्याय 123 में पतिव्रता स्त्रियों के कर्तव्य का वर्णन हुआ है।[1]
युधिष्ठिर का प्रश्न-
वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय! युधिष्ठिर ने पूछा- सम्पूर्ण धर्मज्ञों में श्रेष्ठ पितामह! साध्वी स्त्रियों के सदाचार का क्या स्वरूप है? यह मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ। उसे मुझे बताइये।
भीष्म द्वारा शाण्डिली और सुमना का संवाद का वर्णन करना-
भीष्म जी कहते हैं- राजन! देवलोक की बात है- सम्पूर्ण तत्त्वों को जानने वाली सर्वज्ञा एवं मनस्विनी शाण्डिली देवी से केकयराज की पुत्री सुमना ने इस प्रकार प्रश्न किया- ‘कल्याणि! तुमने किस बर्ताव अथवा किस सदाचार के प्रभाव से समस्त पापों का नाश करके देवलोक में पदार्पण किया है? ‘तुम अपने तेज से अग्नि की ज्वाला के समान प्रज्वलित होे रही हो और चन्द्रमा की पुत्री के समान अपनी उज्ज्वल प्रभा से प्रकाशित होती हुई स्वर्ग-लोक में आयी हो। निर्मल वस्त्र धारण किये थकावट और परिश्रम से रहित होकर विमान पर बैठी हो। तुम्हारी मंगलमयी आकृति है, तुम अपने तेज से सहस्रगुनी शोभा पा रही हो। ‘थोड़ी- सी तपस्या थोड़े-से दान या छोटे-मोटे नियमों का पालन करके तुम इस लोक में नहीं आयी हो। अतः अपनी साधना के सम्बन्ध में सच्ची-सच्ची बात बताओ’।
सुमना के इस प्रकार मधुर वाणी में पूछने पर मनोहर मुस्कान वाली शाण्डिली ने उससे नम्रतापूर्ण शब्दों में इस प्रकार कहा। देवि! मैंने गेरूआ वस्त्र नहीं धारण किया वल्कलवस्त्र नहीं पहना, मूँड़ नहीं मुड़ाया और बड़ी.बड़ी जटाएँ नहीं रखायी। वह सब करके मैं देवलोक में नहीं आयी हूँ। मैंने सदा सावधान रहकर अपने पतिदेव के प्रति मुँह से कभी अहित कर और कठोर वचन नहीं निकाले हैं। मैं सदा सास-ससुर की आज्ञा में रहती और देवता पितर तथा ब्राह्मणों की पूजा में सदा सावधान होकर संलग्न रहती थी। किसी की चुगली नहीं खाती थी। चुगली करना मेरे मन को बिलकुल नहीं भाता था। मैं घर का दरवाजा छोड़कर अन्यत्र नहीं खड़ी होती और देर तक किसी से बात नहीं करती थी। मैंने कभी एकान्त में या सबके सामने किसी के साथ अश्लील परिहास नहीं किया तथा मेरी किसी क्रिया द्वारा किसी का अहित भी नहीं हुआ। मैं ऐसे कार्यों में कभी प्रवृत नहीं होती थी। यदि मेरे स्वामी किसी कार्य से बाहर जाकर फिर घर को लौटते तो मैं उठकर उन्हें बैठने के लिये आसन देती और एकाग्रचित्त हो उनकी सेवा करती थी। मेरे स्वामी जिस अन्न को ग्रहण करने योग्य नहीं समझते थे तथा जिस भक्ष्य भोज्य या लेह्य आदि को वे नहीं पसंद करते थे उन सबको मैं भी त्याग देती थी। सारे कुटुम्ब के लिये जो कुछ कार्य आ पड़ता, वह सब मैं सबेरे ही उठकर कर लेती थी।
पतिव्रता स्त्रियों के कर्तव्य का वर्णन-
मैं अग्निहोत्र की रक्षा करती और घर को लीप पोतकर शुद्ध रखती थी। बच्चों का प्रतिदिन पालन करती और कन्याओं को नारी धर्म की शिक्षा देती थी। अपने को प्रिय लगने वाली खाद्य वस्तुएँ त्यागकर भी गर्भ की रक्षा में ही सदा संलग्न रहती थी। बच्चों को शाप गाली देना उन पर क्रोध करना अथवा उन्हें सताना आदि मैं सदा के लिये त्याग चुकी थी। मेरे घर में कभी अनाज छीटे नहीं जाते थे। किसी भी अन्न को विखेरा नहीं जाता था। मैं अपने घर में गौओं को घास-भूसा खिलाकर पानी पिलाकर तृप्त करती थी और रत्न की भाँति उन्हें सुरक्षित रखने की इच्छा करती थी तथा शुद्ध अवस्था में आगे बढ़कर ब्राह्मणों को भिक्षा देती थी। यदि मेरे पति किसी आवश्यक कार्यवश कभी परदेश जाते तो मैं नियम से रहकर उनके कल्याण के लिये नाना प्रकार के मांगलिक कार्य किया करती थी।[1]
स्वामी के बाहर चले जाने पर मैं आँखों में आँजन लगाना ललाट में गोरोचन का तिलक करना तैलाभ्यंगपूर्वक स्नान करना फूलों की माला पहनना अंगों में अंगराग लगाना तथा श्रृंगार करना पंसद नहीं करती थी।[2] जब स्वामी सुखपूर्वक सो जाते उस समय आवश्यक कार्य आ जाने पर भी मैं उन्हें कभी नहीं जगाती थी। इससे मेरे मन को विशेष संतोष प्राप्त होता था। परिवार के पालन-पोषण के कार्य के लिये भी मैं उन्हें कभी नहीं तंग करती थी। घर की गुप्त बातों को सदा छिपाये रखती और घर-आँगन को सदा झड़ बुहारकर साफ रखती थी। जो स्त्री सदा सावधान रहकर इस धर्म मार्ग का पालन करती है वह नारियों में अरुन्धती के समान आदणीय होती है और स्वर्गलोक में भी उसकी विशेष प्रतिष्ठा होती है।
स्त्रियों को तो पति के सिवा अन्य पुरुष का स्पर्श करना भी पाप है | वाल्मीकीय रामायण में कथा आती है कि जब श्रीहनुमानजी ने अशोकवाटिका में श्रीसीताजी को अत्यन्त व्याकुल देखा, तब उन्होंने सीताजी से कहा कि ‘माता ! आप मेरी पीठपर सवार हो जायँ | मैं आपको अभी यहाँ से ले चलता हूँ |’ परन्तु श्रीसीताजी ने यह स्वीकार नहीं किया | वे बोलीं—
भर्तुर्भक्तीं पुरस्कृत्य रामादन्यस्य वानर |
नाहं स्प्रष्टुं स्वतो गात्रमिच्छेयं वानरोत्तम ||
(वा० रा० ५ | ३७ | ६२ )
‘वानरश्रेष्ठ हनुमान ! पतिभक्ति की ओर दृष्टि रखकर मैं भगवान् श्रीराम के सिवा दूसरे किसी पुरुष के शरीर का स्वेच्छा से स्पर्श करना नहीं चाहती |’
यद्यपि सीताजी उस समय विपत्ति में पड़ी थीं ! किन्तु उन्होंने पति के पास जाने के लिए भी पातिव्रत-धर्मकीरक्षाकी दृष्टि से मातृभाव रखनेवाले हनुमान-सरीखे सेवक का भी स्पर्श करना उचित नहीं समझा | इससे यह शिक्षा लेनी चाहिए कि भारी विपत्ति के समय भी स्त्री को यथासाध्य परपुरुष का स्पर्श नहीं करना चाहिए |
प्रश्न - पति और पत्नीका आपसमें कैसा व्यवहार होना चाहिये ?
उत्तर - पतिका यही भाव रहना चाहिये कि यह अपने माता-पिता, भाई आदि सबको छोड़कर मेरे पास आयी है तो इसने कितना बड़ा त्याग किया है। अतः इसको किसी तरहका कष्ट न हो, शरीर-निर्वाहके लिये इसको रोटी, कपड़े, स्थान आदिकी कमी न हो, मेरी अपेक्षा इसको ज्यादा सुख मिले। ऐसा भाव रखनेके साथ-साथ उसके पातिव्रत-धर्मका भी ख्याल रखना चाहिये, जिससे वह उच्छृंखल न बने और उसका कल्याण हो जाय।
पत्नीका यही भाव रहना चाहिये कि मैं अपने गोत्र और सब कुटुम्बियों आदिका त्याग करके इनके पास आयी हूँ तो समुद्र लाँघकर अब किनारे आकर मैं डूब न जाऊँ अर्थात मैं इतना त्याग करके आयी हूँ तो अब मेरे कारण इनको दुःख न हो, इनका अपमान, निन्दा, तिरस्कार न हो। अगर मेरे कारण इनकी निन्दा होगी तो बड़ी अनुचित बात हो जायगी। मैं चाहे कितना कष्ट पा लूँ, पर इनको किंचिन्मात्र भी कष्ट न हो। इस तरह वह अपने सुख-आरामका त्याग करके पतिके सुख-आरामका ख्याल रखे; उनका लोक-परलोक कैसे सुधरे - इसका ख्याल रखे।
महाभारत अनुशासन पर्व के दानधर्म पर्व के अंतर्गत अध्याय 123 में पतिव्रता स्त्रियों के कर्तव्य का वर्णन हुआ है।[1]
युधिष्ठिर का प्रश्न-
वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय! युधिष्ठिर ने पूछा- सम्पूर्ण धर्मज्ञों में श्रेष्ठ पितामह! साध्वी स्त्रियों के सदाचार का क्या स्वरूप है? यह मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ। उसे मुझे बताइये।
भीष्म द्वारा शाण्डिली और सुमना का संवाद का वर्णन करना-
भीष्म जी कहते हैं- राजन! देवलोक की बात है- सम्पूर्ण तत्त्वों को जानने वाली सर्वज्ञा एवं मनस्विनी शाण्डिली देवी से केकयराज की पुत्री सुमना ने इस प्रकार प्रश्न किया- ‘कल्याणि! तुमने किस बर्ताव अथवा किस सदाचार के प्रभाव से समस्त पापों का नाश करके देवलोक में पदार्पण किया है? ‘तुम अपने तेज से अग्नि की ज्वाला के समान प्रज्वलित होे रही हो और चन्द्रमा की पुत्री के समान अपनी उज्ज्वल प्रभा से प्रकाशित होती हुई स्वर्ग-लोक में आयी हो। निर्मल वस्त्र धारण किये थकावट और परिश्रम से रहित होकर विमान पर बैठी हो। तुम्हारी मंगलमयी आकृति है, तुम अपने तेज से सहस्रगुनी शोभा पा रही हो। ‘थोड़ी- सी तपस्या थोड़े-से दान या छोटे-मोटे नियमों का पालन करके तुम इस लोक में नहीं आयी हो। अतः अपनी साधना के सम्बन्ध में सच्ची-सच्ची बात बताओ’।
सुमना के इस प्रकार मधुर वाणी में पूछने पर मनोहर मुस्कान वाली शाण्डिली ने उससे नम्रतापूर्ण शब्दों में इस प्रकार कहा। देवि! मैंने गेरूआ वस्त्र नहीं धारण किया वल्कलवस्त्र नहीं पहना, मूँड़ नहीं मुड़ाया और बड़ी.बड़ी जटाएँ नहीं रखायी। वह सब करके मैं देवलोक में नहीं आयी हूँ। मैंने सदा सावधान रहकर अपने पतिदेव के प्रति मुँह से कभी अहित कर और कठोर वचन नहीं निकाले हैं। मैं सदा सास-ससुर की आज्ञा में रहती और देवता पितर तथा ब्राह्मणों की पूजा में सदा सावधान होकर संलग्न रहती थी। किसी की चुगली नहीं खाती थी। चुगली करना मेरे मन को बिलकुल नहीं भाता था। मैं घर का दरवाजा छोड़कर अन्यत्र नहीं खड़ी होती और देर तक किसी से बात नहीं करती थी। मैंने कभी एकान्त में या सबके सामने किसी के साथ अश्लील परिहास नहीं किया तथा मेरी किसी क्रिया द्वारा किसी का अहित भी नहीं हुआ। मैं ऐसे कार्यों में कभी प्रवृत नहीं होती थी। यदि मेरे स्वामी किसी कार्य से बाहर जाकर फिर घर को लौटते तो मैं उठकर उन्हें बैठने के लिये आसन देती और एकाग्रचित्त हो उनकी सेवा करती थी। मेरे स्वामी जिस अन्न को ग्रहण करने योग्य नहीं समझते थे तथा जिस भक्ष्य भोज्य या लेह्य आदि को वे नहीं पसंद करते थे उन सबको मैं भी त्याग देती थी। सारे कुटुम्ब के लिये जो कुछ कार्य आ पड़ता, वह सब मैं सबेरे ही उठकर कर लेती थी।
पतिव्रता स्त्रियों के कर्तव्य का वर्णन-
मैं अग्निहोत्र की रक्षा करती और घर को लीप पोतकर शुद्ध रखती थी। बच्चों का प्रतिदिन पालन करती और कन्याओं को नारी धर्म की शिक्षा देती थी। अपने को प्रिय लगने वाली खाद्य वस्तुएँ त्यागकर भी गर्भ की रक्षा में ही सदा संलग्न रहती थी। बच्चों को शाप गाली देना उन पर क्रोध करना अथवा उन्हें सताना आदि मैं सदा के लिये त्याग चुकी थी। मेरे घर में कभी अनाज छीटे नहीं जाते थे। किसी भी अन्न को विखेरा नहीं जाता था। मैं अपने घर में गौओं को घास-भूसा खिलाकर पानी पिलाकर तृप्त करती थी और रत्न की भाँति उन्हें सुरक्षित रखने की इच्छा करती थी तथा शुद्ध अवस्था में आगे बढ़कर ब्राह्मणों को भिक्षा देती थी। यदि मेरे पति किसी आवश्यक कार्यवश कभी परदेश जाते तो मैं नियम से रहकर उनके कल्याण के लिये नाना प्रकार के मांगलिक कार्य किया करती थी।[1]
स्वामी के बाहर चले जाने पर मैं आँखों में आँजन लगाना ललाट में गोरोचन का तिलक करना तैलाभ्यंगपूर्वक स्नान करना फूलों की माला पहनना अंगों में अंगराग लगाना तथा श्रृंगार करना पंसद नहीं करती थी।[2] जब स्वामी सुखपूर्वक सो जाते उस समय आवश्यक कार्य आ जाने पर भी मैं उन्हें कभी नहीं जगाती थी। इससे मेरे मन को विशेष संतोष प्राप्त होता था। परिवार के पालन-पोषण के कार्य के लिये भी मैं उन्हें कभी नहीं तंग करती थी। घर की गुप्त बातों को सदा छिपाये रखती और घर-आँगन को सदा झड़ बुहारकर साफ रखती थी। जो स्त्री सदा सावधान रहकर इस धर्म मार्ग का पालन करती है वह नारियों में अरुन्धती के समान आदणीय होती है और स्वर्गलोक में भी उसकी विशेष प्रतिष्ठा होती है।
स्त्रियों को तो पति के सिवा अन्य पुरुष का स्पर्श करना भी पाप है | वाल्मीकीय रामायण में कथा आती है कि जब श्रीहनुमानजी ने अशोकवाटिका में श्रीसीताजी को अत्यन्त व्याकुल देखा, तब उन्होंने सीताजी से कहा कि ‘माता ! आप मेरी पीठपर सवार हो जायँ | मैं आपको अभी यहाँ से ले चलता हूँ |’ परन्तु श्रीसीताजी ने यह स्वीकार नहीं किया | वे बोलीं—
भर्तुर्भक्तीं पुरस्कृत्य रामादन्यस्य वानर |
नाहं स्प्रष्टुं स्वतो गात्रमिच्छेयं वानरोत्तम ||
(वा० रा० ५ | ३७ | ६२ )
‘वानरश्रेष्ठ हनुमान ! पतिभक्ति की ओर दृष्टि रखकर मैं भगवान् श्रीराम के सिवा दूसरे किसी पुरुष के शरीर का स्वेच्छा से स्पर्श करना नहीं चाहती |’
यद्यपि सीताजी उस समय विपत्ति में पड़ी थीं ! किन्तु उन्होंने पति के पास जाने के लिए भी पातिव्रत-धर्मकीरक्षाकी दृष्टि से मातृभाव रखनेवाले हनुमान-सरीखे सेवक का भी स्पर्श करना उचित नहीं समझा | इससे यह शिक्षा लेनी चाहिए कि भारी विपत्ति के समय भी स्त्री को यथासाध्य परपुरुष का स्पर्श नहीं करना चाहिए |
प्रश्न - पति और पत्नीका आपसमें कैसा व्यवहार होना चाहिये ?
उत्तर - पतिका यही भाव रहना चाहिये कि यह अपने माता-पिता, भाई आदि सबको छोड़कर मेरे पास आयी है तो इसने कितना बड़ा त्याग किया है। अतः इसको किसी तरहका कष्ट न हो, शरीर-निर्वाहके लिये इसको रोटी, कपड़े, स्थान आदिकी कमी न हो, मेरी अपेक्षा इसको ज्यादा सुख मिले। ऐसा भाव रखनेके साथ-साथ उसके पातिव्रत-धर्मका भी ख्याल रखना चाहिये, जिससे वह उच्छृंखल न बने और उसका कल्याण हो जाय।
पत्नीका यही भाव रहना चाहिये कि मैं अपने गोत्र और सब कुटुम्बियों आदिका त्याग करके इनके पास आयी हूँ तो समुद्र लाँघकर अब किनारे आकर मैं डूब न जाऊँ अर्थात मैं इतना त्याग करके आयी हूँ तो अब मेरे कारण इनको दुःख न हो, इनका अपमान, निन्दा, तिरस्कार न हो। अगर मेरे कारण इनकी निन्दा होगी तो बड़ी अनुचित बात हो जायगी। मैं चाहे कितना कष्ट पा लूँ, पर इनको किंचिन्मात्र भी कष्ट न हो। इस तरह वह अपने सुख-आरामका त्याग करके पतिके सुख-आरामका ख्याल रखे; उनका लोक-परलोक कैसे सुधरे - इसका ख्याल रखे।
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