रावण
आजकल हिन्दुओं में बड़ी चतुराई से यह तथ्य फैलाया गया है कि रावण ने किसी स्त्री का स्पर्श नहीं किया था, उसमें वासना थी तो संयम भी था, आदि आदि जिससे रावण को चरित्रवान साबित किया जा सके और लोगों को श्रीराम से दूर करके राक्षस रावण के समीप ले जाया जा सके। पर क्या ये वास्तव में सत्य है कि रावण ने किसी परस्त्री का स्पर्श नहीं किया? सीताजी का स्पर्श नहीं किया? तो जवाब है कि यह पूरी तरह झूठ है!!
श्रीराम के जीवन का सबसे प्रमाणिक ग्रन्थ है वाल्मीकि रामायण जो कि श्रीराम के समकालीन ऋषि वाल्मीकि द्वारा रचित है, श्रीराम के जीवन पर यही सबसे प्राचीन ग्रन्थ है। इसके बाद गोस्वामी तुलसीदास जी रचित श्रीरामचरितमानस व ऋषि कम्बन रचित तमिल ग्रन्थ कम्ब रामायण आती है। रामचरितमानस और कम्ब रामायण, दोनों के ही रचियताओं ने ग्रन्थ के शुरुआत में ही स्पष्ट रूप से कहा है कि हम यह ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण के आधार पर लिख रहे हैं। इसलिए इन तीनों में भी संस्कृत का ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण ही सबसे ज्यादा प्रमाणिक है।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण एक बहुत ही दुष्ट राक्षस था जो कि सभी अवगुणों की खान था, वह यज्ञों में मांस फिंकवाता था, ऋषियों की हत्याएं कराता था, स्त्रियों का बलात्कार जैसा जघन्यतम कर्म करता था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार वह कतई भी चरित्रवान नहीं था। जो लोग कहते हैं कि रावण ने सीताजी का स्पर्श तक नहीं किया था उन्होंने न तो रामायण का अध्ययन किया है न बुद्धि का उपयोग करते हैं। रावण ने परस्त्री को नहीं छुआ यह पूरी तरह गलत है, स्वयं रावण ने ही रामायण में इसका खण्डन किया है। देखिए वाल्मीकि रामायण से –
अरण्य कांड में अनेक श्लोकों में स्पष्ट वर्णन है कि माता सीता का अपहरण रावण ने काम के वशीभूत होकर किया था, कामवासना में अंधे होकर रावण ने माता सीता का अत्यंत अश्लील वर्णन किया जो मैं यहाँ नहीं रखना चाहता हूँ। माता सीता ने उस नीच को अनेक तरह से धिक्कारा-दुत्कारा और श्री राम के प्रताप और यश का वर्णन करके उसे डरा-धमकाकर दूर हट जाने को कहा। परन्तु उस दुष्ट ने माता को बड़ी ही निर्ममता से बालों से पकड़ा और अपने कुकर्मी हाथों से स्पर्श किया, तब माता सीता मर्माहत होकर घोर विलाप करने लगीं और दुःख से छटपटाती हुईं रावण को अनेक उलाहने देने लगीं। ऐसे पापात्मा को लोग महात्मा सिद्ध करने में बड़ी रूचि लेते हैं आजकल। यह पढ़िए आपका भी मन घृणा से न भर जाए तो..
इत्युक्त्वा मैथिलीं वाक्यं प्रियार्हां प्रियवादिनीम्।।
अभिगम्य सुदुष्टात्मा राक्षसः काममोहितः।
जग्राह रावणः सीतां बुधः खे रोहिणीम् इव।।
वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण सः।
ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना।।
– वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग 49, श्लोक 15-17
जो प्रियवचन सुनने के योग्य और सबसे प्रिय वचन बोलने वाली थीं, उन मिथिलेशकुमारी सीता से ऐसा अप्रिय वचन कहकर काम से मोहित हुए उस अत्यंत दुष्टात्मा राक्षस रावण ने निकट जाकर (माता के समान आदरणीया) सीता को पकड़ लिया, मानो बुद्ध ने आकाश में अपनी माता रोहिणी को पकड़ने का दुःसाहस किया हो। उसने बाएं हाथ से कमलनयनी सीता के केशों सहित मस्तक को पकड़ा तथा दाहिना हाथ उनकी दोनों जंघाओं के नीचे लगाकर उसके द्वारा उन्हें उठा लिया।
ततस्तां परुषैर्वाक्यैरभितर्ज्य महास्वनः।
प्रत्यदृश्यत हेमाङ्गो रावणस्य महारथः।।
– वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग 49, श्लोक 20
रथ के प्रकट होते ही जोर जोर से गर्जना करने वाले रावण ने कठोर वचनों द्वारा विदेहनन्दिनी सीता को डांटा और पूर्वोक्त रूप से गोद में उठाकर तत्काल रथपर बिठा दिया।
देखिए रामायण में कितने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि रावण ने सीताजी को अपने हाथों से क्रूरतापूर्वक न केवल स्पर्श किया था बल्कि जंघाओं से उठाकर निर्लज्जता से उन्हें गोद में उठाकर अपहरण किया था। पुनः अगले श्लोक में देखिए कि लंका में प्रवेश करते समय भी दुष्ट रावण ने उन्हें अपनी गोद में उठा रखा था ताकि वे उनकी पकड़ से न छूट जाएं।
स तु सीतां विचेष्टन्तीमङ्केनादाय रावणः।
प्रविवेश पुरीं लङ्कां रुपिणीं मृत्युमात्मनः।।
– वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग 54, श्लोक 11
सीता छटपटा रही। रावण ने अपनी साकार मृत्यु की भाँती उन्हें अंक में लेकर लंकापुरी में प्रवेश किया।
यह श्लोक और अर्थ हमने गीताप्रेस से दो खंडों में प्रकाशित अर्थ सहित श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण से लिए हैं। प्रमाणों से स्पष्ट है कि रावण एक बेहद चरित्रहीन, स्त्रियों का शत्रु था। स्त्रियों का अपहरण करने वाला, उन्हें अपमानित, और उनपर अत्याचार करने वाला दुष्ट था व अपने काम के वशीभूत होकर उसने सीताजी का न सिर्फ स्पर्श किया था बल्कि जोर जबरदस्ती करके उन्हें बलात अपहृत किया था।
जब श्रीराम की जगह रावण लोगोंका आदर्श हो जाय , तब समझना चाहिये घोर कलियुग आ गया । आज लड़कियाँ रावण को आदर्श भाई और चरित्रवान् बता रही हैं , जिसने बहनके सम्मान के लिये श्रीराम से प्रतिशोध लिया लेकिन सीता को छुआ भी नहीं आदि-आदि । लेकिन क्या ये सत्य है , कि रावण महान् चरित्रवान् था ?
अब रावण चरित्रका परिशीलन करते हैं , सर्व प्रथम रावणके चरित्र को देखिये , रावण ने हरण से पूर्व माँ सीतासे स्वयं ही कहा था - "बह्वीनामुत्तमस्त्रीणामाहृतानामितस्तत: । सर्वासामेव भद्रं ते ममाग्रमहिषी भव ।।(वाल्मीकिरामायण ३/४७/२८) -
मैं इधर-उधर से बहुत सी सुन्दरी स्त्रियोंको हर लाया हूँ । उन सब में तुम मेरी पटरानी बनोगी । तुम्हारा भला हो ।" इसका स्पष्ट अर्थ है रावण जिस सुन्दर स्त्री को देखता था , मुग़लोंकी तरह हरण करके अपनी हरम (रनिवास) में डाल देता था , पर माँ सीता को पटरानी बनाना चाहता था । अनेक ऋषि-मुनि-देवताओं और राजाओं की पत्नी-पुत्री और बहनोंका हरण करके अपने रनिवास में रावण ने डाल दिया था ।
जिससे कुपित होकर साध्वी स्त्रियोंने रावण को श्राप दिया था । :-
"तस्माद् वै स्त्रीकृतेनैव वधं प्राप्स्यति दुर्मति" ।।(वाल्मीकिरामायण ७/२४/२ )
अर्थार्थ यह नीच निशाचर परायी परायी स्त्रियों के साथ रमण करता है , इसीलिए स्त्रीके कारण ही इस दुर्बुद्धि राक्षसका वध होगा ।
दुराचारी रावण मृत्यु के भय से ही माता जानकी के अनुमति के बिना स्पर्श नही करता था क्यो की माता जानकी स्वयं अग्निस्वरूपा थी। और अपने पातिव्रत के तेज से रावण को भस्म कर सकती थीं। परन्तु भगवान राम की लीला पूर्ति के उद्देश्य से रावण को उसके अभिमान में जीने दिया।
दूसरा कारण ब्रह्मा जी का श्राप उसका मृत्यु का कारण बनता ।
रावण अपने सचिव महापार्श्व से कहता है -
"अद्यप्रभृति यामान्यां बलान्नारीं गमिष्यसि । तदा ते शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशय: ।। इत्यहं तस्य शापस्य भीतः प्रसभमेव ताम् । नारोहये बलात् सीतां वैदेहीं शयने शुभे ।।" (वा०रा०६/९/१४-१५)
ब्रह्माजीने श्राप दिया -‘आज से यदि तू किसी दूसरी नारीके साथ बलपूर्वक समागम करेगा तो तेरे मस्तकके सौ टुकड़े हो जाएंगे , इसमें संशय नहीं है ।’ इस तरह मैं ब्रह्माजीके शाप से भयभीत हूँ । इसिलये अपनी शुभ -शय्यापर विदेहकुमारी सीताको हठात् एवं बलपूर्वक नहीं चढ़ाता हूँ । "
इसलिये यह कहना अधूरा ज्ञान ही है ,कि रावण चरित्रवान् था , इसीलिए भगवती सीता को नहीं छुआ । रावण ने रम्भा -पुञ्जिकस्थला आदि कई स्त्रियों का बलात्कार किया था इसीलिए कुबेर-ब्रह्माजी के द्वारा शापित हुआ था । भगवती सीता रावण को स्वेच्छा से पति स्वीकार कर लें इसलिये रावण ने साम,दाम ,दण्ड और भेद सभी नीतियों का प्रयोग किया था ।
यह तो रहा रावणका चरित्र और स्त्रियोंके प्रति उसका दृष्टिकोण , जो कि सङ्केत मात्र ही किया है , अब तथाकथित आदर्श भाई का प्रेम भी देखिये ।
रावणने अपनी बहन शूर्पणखा को अपने अहंकार में आकर विधवा बना दिया था, शूर्पणखा ने रोते हुए रावणसे कहा -
"सा बाष्पपरिरुद्धाक्षी रक्ताक्षी वाक्यमब्रवीत् ।।
कृतास्मि विधवा राजंस्त्वया बलवता बलात् ।
सोऽपि त्वया हतस्तात रिपुणा भ्रातृगन्धिना । (वा०रा०७/२४/२६ व २८)
शूर्पणखाके नेत्रों में अश्रु भरे थे , उसकी आँखे रोते-रोते लाल हो गयी थीं । वह बोली --- 'राजन ! तुम बलवान् हो , इसीलिए न तुमने मुझे बल पूर्वक विधवा बना दिया है ।तुम नाममात्र के भाई हो । वास्तव में मेरे शत्रु निकले ।"
यही नहीं रावण की लम्पटता के कारण रावण की दुसरी बहन कुम्भीनसी (रावण की मौसी और विमाता राका-विश्रवा की पुत्री) का हरण मधुपुरी (आधुनिक मथुरा) का राजा मधु ने कर लिया और रावण को कोई होश ही नहीं था , इसीलिए विभीषणजी ने रावण को फटकार लगाई थी ।
" ज्ञातींस्तान् धर्षयित्वेमास्त्वयाऽऽनीता वाराङ्गनाः ।
त्वामतिक्रम्य मधुना राजन् कुम्भीनसी हृता ।। (वा०रा०७/२५/१९)
महाराज ! इन बेचारी अबलाओं के बन्धु-बांधवों को मारकर आप इन्हे हर लाये हैं और इधर आपका उलङ्घन करके --- आपके सिर पर लात रखकर मधु ने बहन कुम्भीनसी का अपहरण कर लिया ।"
ये है रावण की भगिनी प्रेम और भगिनी का रक्षा और सम्मान , अब माँ सीताके हरण की चर्चा करते हैं । क्या रावणने श्रीराम से बहन का प्रतिशोध लेने के लिये हरण किया था ? उत्तर है नहीं , शूपर्णखाने न तो श्रीराम की निन्दा की न रावण ने शूपर्णखा का प्रतिशोध ही लिया । शूपर्णखा ने तो रावण से कहा - 'श्रीराम अकेले और पैदल थे , तो भी उन्होंने डेढ़ मुहूर्तके भीतर ही खर-दूषणसहित चौदह हजार भयंकर शक्तिशाली राक्षसों का तीखे बाणों से संहार कर डाला , ऋषियों को अभय दे दिया और समस्त दण्डकवन को राक्षसोंकी विघ्नसे रहित कर दिया ।' (रा०अ०३४/९-११)
"एका कथंचिन्मुक्ताहं परिभूय महात्मना ।
स्त्रीवधं शङ्कमानेन रामेण विदितात्मना ।।(वा०रा०३/३४/१२)
आत्मज्ञानी महात्मा श्रीरामने स्त्रीका वध हो जाने के भय से एकमात्र मुझे किसी तरह केवल अपमानित करके ही छोड़ दिया ।"
शूर्पणखा के वचन से दो बात सिद्ध हैं , पहली वह रावण से स्पष्ट कह रही है उसका अपराध वध के योग्य था । दूसरी वह आत्मज्ञानी महात्मा कहकर श्रीराम की प्रशंसा भी कर रही है और यह रामने उसे कोई दण्ड नहीं दिया , उदारता दिखाते हुए केवल अपमानित करके ही छोड़ दिया । इसलिये बहन का बदला लिया रावण ने ,तो किस बात का बदला लिया ? जब श्रीरामने शूर्पणखा का कोई अपराध नहीं किया । विभीषणजी ने सीता हरण का कारण रावण से पूछा था , तो उसमें बहन का बदला नहीं , खर-दूषण की मृत्युका बदला कहा था ( क्योकि रावण के साम्राज्य को दण्डकारण्य सहित सम्पूर्ण भारत से समाप्त कर दिया था- ज्यादा जानकारी के अरण्यकाण्ड का ३३ वां सर्ग पढ़ें , जिसमें शूपर्णखा ने रावण को उसके सिकुड़ते साम्राज्य पर फटकार लगाई थी ) ।
विभीषणजी रावण से कहते हैं -
"किं च राक्षसराजस्य रामेणापकृतं पुरा ।
आजहार जनस्थानाद् यस्य भार्यां यशस्विनः।।
खरो यद्यतिवृत्तस्तु स रामेण हतो रणे ।
अवश्यं प्राणिनां प्राणा रक्षितव्या यथाबलम् ।।(वा०रा०६/९/१३-१४)
श्रीरामचन्द्रजी ने पहले राक्षसराज रावणका कौन -सा अपराध किया था ,जिससे उन यशस्वी महात्मा श्रीराम की पत्नी को जनस्थान से हर लाये ?
यदि कहें कि उन्होंने खर को मारा था तो यह ठीक नहीं है ; क्योकि खर अत्याचारी था । उसन स्वयं ही उन्हें मार डालने के लिये उन पर आक्रमण किया था । इसलिए श्रीराम ने रणभूमि में उसका वध किया ; क्योकि प्रत्येक प्राणी यथाशक्ति अपने प्राणों की रक्षा अवश्य करनी चाहिये । "
उपरोक्त विवरण यह शङ्का तो मिट गयी होगी कि रावण महान् चरित्रवान् था , उसने बहन का बदला लिया आदि ।
यदि रावण को बहन का बदला लेना होता तो श्रीराम पर सेना सहित आक्रमण करता जैसे खर-दूषण ने किया । निर्दोष भगवती सीता का हरण करके कौन बदला लिया ? और ये कौन सा न्याय है जो बदला लेने के किसी की साध्वी स्त्री का बलात् अपहरण करना और उसे अपने अधीन रखना?
विद्वान ब्यक्ति कभी भी कुल को कलंकित करने वाला कार्य नही करता अपितु कुल की कीर्ति युगों युगों तक गायी जाय ऐसा आचरण विद्वानों का होता है ।
रावण ऋषि मुनियों को प्रताड़न करने वाला यज्ञ का बिध्वंसक करने वाला दुराचारी ब्यक्ति था ।
परन्तु वामी कामी गिरोह ने रावण को निर्दोष सिद्ध करने का जो प्रचार तंत्र चला रखा है उसमें वह सफल भी हो रहा है और सबसे बड़ा मूढ़ तो वह है जो वामिकामी गिरोह द्वरा लिखे हुए पुस्तको को पढ़ता तो है लेकिन रामायण ,महाभारत, गीता आदि ग्रन्थो को छूता तक नही ।
सनद रहे आप की पीढ़ी तभी तक सुरक्षित है जब तक आप अपने समृद्ध इतिहास और महानतम संस्कृति से जुड़े है आप का अपने इतिहास और संस्कृति का त्याग आप के अस्तित्व को नष्ट कर डालेगा ।
यह हमारी संस्कृति रही है कि दुराचारी पुरुष यदि किसी स्त्री को बिना अनुमति के स्पर्श भी करें यो वह बध योग्य है रावण ,और दुःशासन का क्या हस्र रहा इतिहास स्वयं साक्षी है ।
रावण तो ब्राह्मण ऋषियो का हत्यारा था।
वाल्मिकी रामायण उत्तरकांड सर्ग १८ श्लोक २०
तान् भक्षयित्वा तत्रस्थानम् महर्षीन् यज्ञमागतान् ।
वितृप्तो रुधिरैस्तेषां पुन: संप्रययौ महीम्।।
यज्ञ मे आकर बेठे हुए महर्षि को खाकर उनके रक्त से तृप्त होकर रावण फिर पृथ्वी पर विचरने लगा।
वाल्मिकी रामायण बालकाण्ड सर्ग १५ श्लोक ९
ऋषि यक्षान् सगाधर्वांन ब्राह्मणानसुरास्तदा।
अतिकामति दुर्धषो वरदानेन मोहित: ।।
वरदान से मोहित होकर वह रावण ईतना उदंड हो गया था की ऋषि यक्ष गांधर्व ब्राह्मण तथा देवता को पीडा देता था उनका अपमान करता था।
वाल्मिकी रामायण उतरकांड सर्ग १७ श्लोक ३१ ३२ ३३
ब्राह्मण कन्या एवं बृहस्पति की बेटी वेदवती के साथ रावण का दुर्व्यवहार पढे लेगे तो कभी रावण के भक्त नही बनोगे।
वाल्मिकी रामायण उतरकांड सर्ग २६ श्लोक ५९
अपने भाई कुबेर के पुत्र नलकुबेर की पत्नी रंभा के साथ दुर्व्यवहार का वर्णन है
वाल्मिकी रामायण उतरकांड सर्ग २६ श्लोक ५४ ५५
नलकुबेर ने अपनी पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करने पर रावण को श्राप दिया उसका वर्णन है।
वाल्मिकी रामायण उतरकांड सर्ग ३४ श्लोक २१ ३७ ३८,३९,४०
बाली ने रावण का क्या हाल किया था यह देख कर समझ आ जायेगा की कथित महाविद्धान कथित महाबलशाली रावण एक कपिराज के सामने क्या था???
वाल्मीकि रामायण उतरकांड सर्ग ३३ श्लोक १६
सहस्त्रार्जुन रावण को पिता पुलस्त्य की याचना करने पर छोडता है वरना सहस्त्रार्जुन ने भी रावण को पीटा था अौर कैद किया था।
अगर लिखने बेठ गया तो आपके सभी कुर्तक की धज्जियां केवल वाल्मिकी रामायणसे ही उडा सकता हु।
दुसरे तुलसीदास के रामचरितमानस को खोला तो अौर भी कचरा आप के दिमाग से निकाल सकता हु ।
लेकिन विवेक बुद्धी से सोच कर हदय मे सत्य रुप राम का शोधन करे
जय श्री राम
जय आदि गुरु भगवान शंकराचार्य ।
श्रीराम के जीवन का सबसे प्रमाणिक ग्रन्थ है वाल्मीकि रामायण जो कि श्रीराम के समकालीन ऋषि वाल्मीकि द्वारा रचित है, श्रीराम के जीवन पर यही सबसे प्राचीन ग्रन्थ है। इसके बाद गोस्वामी तुलसीदास जी रचित श्रीरामचरितमानस व ऋषि कम्बन रचित तमिल ग्रन्थ कम्ब रामायण आती है। रामचरितमानस और कम्ब रामायण, दोनों के ही रचियताओं ने ग्रन्थ के शुरुआत में ही स्पष्ट रूप से कहा है कि हम यह ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण के आधार पर लिख रहे हैं। इसलिए इन तीनों में भी संस्कृत का ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण ही सबसे ज्यादा प्रमाणिक है।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण एक बहुत ही दुष्ट राक्षस था जो कि सभी अवगुणों की खान था, वह यज्ञों में मांस फिंकवाता था, ऋषियों की हत्याएं कराता था, स्त्रियों का बलात्कार जैसा जघन्यतम कर्म करता था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार वह कतई भी चरित्रवान नहीं था। जो लोग कहते हैं कि रावण ने सीताजी का स्पर्श तक नहीं किया था उन्होंने न तो रामायण का अध्ययन किया है न बुद्धि का उपयोग करते हैं। रावण ने परस्त्री को नहीं छुआ यह पूरी तरह गलत है, स्वयं रावण ने ही रामायण में इसका खण्डन किया है। देखिए वाल्मीकि रामायण से –
अरण्य कांड में अनेक श्लोकों में स्पष्ट वर्णन है कि माता सीता का अपहरण रावण ने काम के वशीभूत होकर किया था, कामवासना में अंधे होकर रावण ने माता सीता का अत्यंत अश्लील वर्णन किया जो मैं यहाँ नहीं रखना चाहता हूँ। माता सीता ने उस नीच को अनेक तरह से धिक्कारा-दुत्कारा और श्री राम के प्रताप और यश का वर्णन करके उसे डरा-धमकाकर दूर हट जाने को कहा। परन्तु उस दुष्ट ने माता को बड़ी ही निर्ममता से बालों से पकड़ा और अपने कुकर्मी हाथों से स्पर्श किया, तब माता सीता मर्माहत होकर घोर विलाप करने लगीं और दुःख से छटपटाती हुईं रावण को अनेक उलाहने देने लगीं। ऐसे पापात्मा को लोग महात्मा सिद्ध करने में बड़ी रूचि लेते हैं आजकल। यह पढ़िए आपका भी मन घृणा से न भर जाए तो..
इत्युक्त्वा मैथिलीं वाक्यं प्रियार्हां प्रियवादिनीम्।।
अभिगम्य सुदुष्टात्मा राक्षसः काममोहितः।
जग्राह रावणः सीतां बुधः खे रोहिणीम् इव।।
वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण सः।
ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना।।
– वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग 49, श्लोक 15-17
जो प्रियवचन सुनने के योग्य और सबसे प्रिय वचन बोलने वाली थीं, उन मिथिलेशकुमारी सीता से ऐसा अप्रिय वचन कहकर काम से मोहित हुए उस अत्यंत दुष्टात्मा राक्षस रावण ने निकट जाकर (माता के समान आदरणीया) सीता को पकड़ लिया, मानो बुद्ध ने आकाश में अपनी माता रोहिणी को पकड़ने का दुःसाहस किया हो। उसने बाएं हाथ से कमलनयनी सीता के केशों सहित मस्तक को पकड़ा तथा दाहिना हाथ उनकी दोनों जंघाओं के नीचे लगाकर उसके द्वारा उन्हें उठा लिया।
ततस्तां परुषैर्वाक्यैरभितर्ज्य महास्वनः।
प्रत्यदृश्यत हेमाङ्गो रावणस्य महारथः।।
– वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग 49, श्लोक 20
रथ के प्रकट होते ही जोर जोर से गर्जना करने वाले रावण ने कठोर वचनों द्वारा विदेहनन्दिनी सीता को डांटा और पूर्वोक्त रूप से गोद में उठाकर तत्काल रथपर बिठा दिया।
देखिए रामायण में कितने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि रावण ने सीताजी को अपने हाथों से क्रूरतापूर्वक न केवल स्पर्श किया था बल्कि जंघाओं से उठाकर निर्लज्जता से उन्हें गोद में उठाकर अपहरण किया था। पुनः अगले श्लोक में देखिए कि लंका में प्रवेश करते समय भी दुष्ट रावण ने उन्हें अपनी गोद में उठा रखा था ताकि वे उनकी पकड़ से न छूट जाएं।
स तु सीतां विचेष्टन्तीमङ्केनादाय रावणः।
प्रविवेश पुरीं लङ्कां रुपिणीं मृत्युमात्मनः।।
– वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग 54, श्लोक 11
सीता छटपटा रही। रावण ने अपनी साकार मृत्यु की भाँती उन्हें अंक में लेकर लंकापुरी में प्रवेश किया।
यह श्लोक और अर्थ हमने गीताप्रेस से दो खंडों में प्रकाशित अर्थ सहित श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण से लिए हैं। प्रमाणों से स्पष्ट है कि रावण एक बेहद चरित्रहीन, स्त्रियों का शत्रु था। स्त्रियों का अपहरण करने वाला, उन्हें अपमानित, और उनपर अत्याचार करने वाला दुष्ट था व अपने काम के वशीभूत होकर उसने सीताजी का न सिर्फ स्पर्श किया था बल्कि जोर जबरदस्ती करके उन्हें बलात अपहृत किया था।
जब श्रीराम की जगह रावण लोगोंका आदर्श हो जाय , तब समझना चाहिये घोर कलियुग आ गया । आज लड़कियाँ रावण को आदर्श भाई और चरित्रवान् बता रही हैं , जिसने बहनके सम्मान के लिये श्रीराम से प्रतिशोध लिया लेकिन सीता को छुआ भी नहीं आदि-आदि । लेकिन क्या ये सत्य है , कि रावण महान् चरित्रवान् था ?
अब रावण चरित्रका परिशीलन करते हैं , सर्व प्रथम रावणके चरित्र को देखिये , रावण ने हरण से पूर्व माँ सीतासे स्वयं ही कहा था - "बह्वीनामुत्तमस्त्रीणामाहृतानामितस्तत: । सर्वासामेव भद्रं ते ममाग्रमहिषी भव ।।(वाल्मीकिरामायण ३/४७/२८) -
मैं इधर-उधर से बहुत सी सुन्दरी स्त्रियोंको हर लाया हूँ । उन सब में तुम मेरी पटरानी बनोगी । तुम्हारा भला हो ।" इसका स्पष्ट अर्थ है रावण जिस सुन्दर स्त्री को देखता था , मुग़लोंकी तरह हरण करके अपनी हरम (रनिवास) में डाल देता था , पर माँ सीता को पटरानी बनाना चाहता था । अनेक ऋषि-मुनि-देवताओं और राजाओं की पत्नी-पुत्री और बहनोंका हरण करके अपने रनिवास में रावण ने डाल दिया था ।
जिससे कुपित होकर साध्वी स्त्रियोंने रावण को श्राप दिया था । :-
"तस्माद् वै स्त्रीकृतेनैव वधं प्राप्स्यति दुर्मति" ।।(वाल्मीकिरामायण ७/२४/२ )
अर्थार्थ यह नीच निशाचर परायी परायी स्त्रियों के साथ रमण करता है , इसीलिए स्त्रीके कारण ही इस दुर्बुद्धि राक्षसका वध होगा ।
दुराचारी रावण मृत्यु के भय से ही माता जानकी के अनुमति के बिना स्पर्श नही करता था क्यो की माता जानकी स्वयं अग्निस्वरूपा थी। और अपने पातिव्रत के तेज से रावण को भस्म कर सकती थीं। परन्तु भगवान राम की लीला पूर्ति के उद्देश्य से रावण को उसके अभिमान में जीने दिया।
दूसरा कारण ब्रह्मा जी का श्राप उसका मृत्यु का कारण बनता ।
रावण अपने सचिव महापार्श्व से कहता है -
"अद्यप्रभृति यामान्यां बलान्नारीं गमिष्यसि । तदा ते शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशय: ।। इत्यहं तस्य शापस्य भीतः प्रसभमेव ताम् । नारोहये बलात् सीतां वैदेहीं शयने शुभे ।।" (वा०रा०६/९/१४-१५)
ब्रह्माजीने श्राप दिया -‘आज से यदि तू किसी दूसरी नारीके साथ बलपूर्वक समागम करेगा तो तेरे मस्तकके सौ टुकड़े हो जाएंगे , इसमें संशय नहीं है ।’ इस तरह मैं ब्रह्माजीके शाप से भयभीत हूँ । इसिलये अपनी शुभ -शय्यापर विदेहकुमारी सीताको हठात् एवं बलपूर्वक नहीं चढ़ाता हूँ । "
इसलिये यह कहना अधूरा ज्ञान ही है ,कि रावण चरित्रवान् था , इसीलिए भगवती सीता को नहीं छुआ । रावण ने रम्भा -पुञ्जिकस्थला आदि कई स्त्रियों का बलात्कार किया था इसीलिए कुबेर-ब्रह्माजी के द्वारा शापित हुआ था । भगवती सीता रावण को स्वेच्छा से पति स्वीकार कर लें इसलिये रावण ने साम,दाम ,दण्ड और भेद सभी नीतियों का प्रयोग किया था ।
यह तो रहा रावणका चरित्र और स्त्रियोंके प्रति उसका दृष्टिकोण , जो कि सङ्केत मात्र ही किया है , अब तथाकथित आदर्श भाई का प्रेम भी देखिये ।
रावणने अपनी बहन शूर्पणखा को अपने अहंकार में आकर विधवा बना दिया था, शूर्पणखा ने रोते हुए रावणसे कहा -
"सा बाष्पपरिरुद्धाक्षी रक्ताक्षी वाक्यमब्रवीत् ।।
कृतास्मि विधवा राजंस्त्वया बलवता बलात् ।
सोऽपि त्वया हतस्तात रिपुणा भ्रातृगन्धिना । (वा०रा०७/२४/२६ व २८)
शूर्पणखाके नेत्रों में अश्रु भरे थे , उसकी आँखे रोते-रोते लाल हो गयी थीं । वह बोली --- 'राजन ! तुम बलवान् हो , इसीलिए न तुमने मुझे बल पूर्वक विधवा बना दिया है ।तुम नाममात्र के भाई हो । वास्तव में मेरे शत्रु निकले ।"
यही नहीं रावण की लम्पटता के कारण रावण की दुसरी बहन कुम्भीनसी (रावण की मौसी और विमाता राका-विश्रवा की पुत्री) का हरण मधुपुरी (आधुनिक मथुरा) का राजा मधु ने कर लिया और रावण को कोई होश ही नहीं था , इसीलिए विभीषणजी ने रावण को फटकार लगाई थी ।
" ज्ञातींस्तान् धर्षयित्वेमास्त्वयाऽऽनीता वाराङ्गनाः ।
त्वामतिक्रम्य मधुना राजन् कुम्भीनसी हृता ।। (वा०रा०७/२५/१९)
महाराज ! इन बेचारी अबलाओं के बन्धु-बांधवों को मारकर आप इन्हे हर लाये हैं और इधर आपका उलङ्घन करके --- आपके सिर पर लात रखकर मधु ने बहन कुम्भीनसी का अपहरण कर लिया ।"
ये है रावण की भगिनी प्रेम और भगिनी का रक्षा और सम्मान , अब माँ सीताके हरण की चर्चा करते हैं । क्या रावणने श्रीराम से बहन का प्रतिशोध लेने के लिये हरण किया था ? उत्तर है नहीं , शूपर्णखाने न तो श्रीराम की निन्दा की न रावण ने शूपर्णखा का प्रतिशोध ही लिया । शूपर्णखा ने तो रावण से कहा - 'श्रीराम अकेले और पैदल थे , तो भी उन्होंने डेढ़ मुहूर्तके भीतर ही खर-दूषणसहित चौदह हजार भयंकर शक्तिशाली राक्षसों का तीखे बाणों से संहार कर डाला , ऋषियों को अभय दे दिया और समस्त दण्डकवन को राक्षसोंकी विघ्नसे रहित कर दिया ।' (रा०अ०३४/९-११)
"एका कथंचिन्मुक्ताहं परिभूय महात्मना ।
स्त्रीवधं शङ्कमानेन रामेण विदितात्मना ।।(वा०रा०३/३४/१२)
आत्मज्ञानी महात्मा श्रीरामने स्त्रीका वध हो जाने के भय से एकमात्र मुझे किसी तरह केवल अपमानित करके ही छोड़ दिया ।"
शूर्पणखा के वचन से दो बात सिद्ध हैं , पहली वह रावण से स्पष्ट कह रही है उसका अपराध वध के योग्य था । दूसरी वह आत्मज्ञानी महात्मा कहकर श्रीराम की प्रशंसा भी कर रही है और यह रामने उसे कोई दण्ड नहीं दिया , उदारता दिखाते हुए केवल अपमानित करके ही छोड़ दिया । इसलिये बहन का बदला लिया रावण ने ,तो किस बात का बदला लिया ? जब श्रीरामने शूर्पणखा का कोई अपराध नहीं किया । विभीषणजी ने सीता हरण का कारण रावण से पूछा था , तो उसमें बहन का बदला नहीं , खर-दूषण की मृत्युका बदला कहा था ( क्योकि रावण के साम्राज्य को दण्डकारण्य सहित सम्पूर्ण भारत से समाप्त कर दिया था- ज्यादा जानकारी के अरण्यकाण्ड का ३३ वां सर्ग पढ़ें , जिसमें शूपर्णखा ने रावण को उसके सिकुड़ते साम्राज्य पर फटकार लगाई थी ) ।
विभीषणजी रावण से कहते हैं -
"किं च राक्षसराजस्य रामेणापकृतं पुरा ।
आजहार जनस्थानाद् यस्य भार्यां यशस्विनः।।
खरो यद्यतिवृत्तस्तु स रामेण हतो रणे ।
अवश्यं प्राणिनां प्राणा रक्षितव्या यथाबलम् ।।(वा०रा०६/९/१३-१४)
श्रीरामचन्द्रजी ने पहले राक्षसराज रावणका कौन -सा अपराध किया था ,जिससे उन यशस्वी महात्मा श्रीराम की पत्नी को जनस्थान से हर लाये ?
यदि कहें कि उन्होंने खर को मारा था तो यह ठीक नहीं है ; क्योकि खर अत्याचारी था । उसन स्वयं ही उन्हें मार डालने के लिये उन पर आक्रमण किया था । इसलिए श्रीराम ने रणभूमि में उसका वध किया ; क्योकि प्रत्येक प्राणी यथाशक्ति अपने प्राणों की रक्षा अवश्य करनी चाहिये । "
उपरोक्त विवरण यह शङ्का तो मिट गयी होगी कि रावण महान् चरित्रवान् था , उसने बहन का बदला लिया आदि ।
यदि रावण को बहन का बदला लेना होता तो श्रीराम पर सेना सहित आक्रमण करता जैसे खर-दूषण ने किया । निर्दोष भगवती सीता का हरण करके कौन बदला लिया ? और ये कौन सा न्याय है जो बदला लेने के किसी की साध्वी स्त्री का बलात् अपहरण करना और उसे अपने अधीन रखना?
विद्वान ब्यक्ति कभी भी कुल को कलंकित करने वाला कार्य नही करता अपितु कुल की कीर्ति युगों युगों तक गायी जाय ऐसा आचरण विद्वानों का होता है ।
रावण ऋषि मुनियों को प्रताड़न करने वाला यज्ञ का बिध्वंसक करने वाला दुराचारी ब्यक्ति था ।
परन्तु वामी कामी गिरोह ने रावण को निर्दोष सिद्ध करने का जो प्रचार तंत्र चला रखा है उसमें वह सफल भी हो रहा है और सबसे बड़ा मूढ़ तो वह है जो वामिकामी गिरोह द्वरा लिखे हुए पुस्तको को पढ़ता तो है लेकिन रामायण ,महाभारत, गीता आदि ग्रन्थो को छूता तक नही ।
सनद रहे आप की पीढ़ी तभी तक सुरक्षित है जब तक आप अपने समृद्ध इतिहास और महानतम संस्कृति से जुड़े है आप का अपने इतिहास और संस्कृति का त्याग आप के अस्तित्व को नष्ट कर डालेगा ।
यह हमारी संस्कृति रही है कि दुराचारी पुरुष यदि किसी स्त्री को बिना अनुमति के स्पर्श भी करें यो वह बध योग्य है रावण ,और दुःशासन का क्या हस्र रहा इतिहास स्वयं साक्षी है ।
रावण तो ब्राह्मण ऋषियो का हत्यारा था।
वाल्मिकी रामायण उत्तरकांड सर्ग १८ श्लोक २०
तान् भक्षयित्वा तत्रस्थानम् महर्षीन् यज्ञमागतान् ।
वितृप्तो रुधिरैस्तेषां पुन: संप्रययौ महीम्।।
यज्ञ मे आकर बेठे हुए महर्षि को खाकर उनके रक्त से तृप्त होकर रावण फिर पृथ्वी पर विचरने लगा।
वाल्मिकी रामायण बालकाण्ड सर्ग १५ श्लोक ९
ऋषि यक्षान् सगाधर्वांन ब्राह्मणानसुरास्तदा।
अतिकामति दुर्धषो वरदानेन मोहित: ।।
वरदान से मोहित होकर वह रावण ईतना उदंड हो गया था की ऋषि यक्ष गांधर्व ब्राह्मण तथा देवता को पीडा देता था उनका अपमान करता था।
वाल्मिकी रामायण उतरकांड सर्ग १७ श्लोक ३१ ३२ ३३
ब्राह्मण कन्या एवं बृहस्पति की बेटी वेदवती के साथ रावण का दुर्व्यवहार पढे लेगे तो कभी रावण के भक्त नही बनोगे।
वाल्मिकी रामायण उतरकांड सर्ग २६ श्लोक ५९
अपने भाई कुबेर के पुत्र नलकुबेर की पत्नी रंभा के साथ दुर्व्यवहार का वर्णन है
वाल्मिकी रामायण उतरकांड सर्ग २६ श्लोक ५४ ५५
नलकुबेर ने अपनी पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करने पर रावण को श्राप दिया उसका वर्णन है।
वाल्मिकी रामायण उतरकांड सर्ग ३४ श्लोक २१ ३७ ३८,३९,४०
बाली ने रावण का क्या हाल किया था यह देख कर समझ आ जायेगा की कथित महाविद्धान कथित महाबलशाली रावण एक कपिराज के सामने क्या था???
वाल्मीकि रामायण उतरकांड सर्ग ३३ श्लोक १६
सहस्त्रार्जुन रावण को पिता पुलस्त्य की याचना करने पर छोडता है वरना सहस्त्रार्जुन ने भी रावण को पीटा था अौर कैद किया था।
अगर लिखने बेठ गया तो आपके सभी कुर्तक की धज्जियां केवल वाल्मिकी रामायणसे ही उडा सकता हु।
दुसरे तुलसीदास के रामचरितमानस को खोला तो अौर भी कचरा आप के दिमाग से निकाल सकता हु ।
लेकिन विवेक बुद्धी से सोच कर हदय मे सत्य रुप राम का शोधन करे
जय श्री राम
जय आदि गुरु भगवान शंकराचार्य ।
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