यज्ञोपवीत मे अधिकृत वर्ण
👉 व्रतबन्ध, यज्ञोवीत, जनेऊधारण, मौञ्जीबन्धन आदि इसके नाम प्रसिद्ध है।
👉 यह मुख्य व उत्तम वैदिकदीक्षा है।
👉 इस संस्कार से संस्कृत शरीर इस लोक व परलोक में क्रमश: वेदाध्ययनादि व कर्म्मफलोपयोग से पावन होता है।
👉 यह संस्कार द्विजत्व का कारण है।
👉 श्रौत स्मार्त्त कर्म प्रसाधनभूत यह कर्म है।
👉 ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इसके अधिकारी है।
👉 शूद्र व किसी भी जाति की स्त्री को इसका अधिकार शास्त्रोक्त नहीं हैं।
👉 यह मुख्य व उत्तम वैदिकदीक्षा है।
👉 इस संस्कार से संस्कृत शरीर इस लोक व परलोक में क्रमश: वेदाध्ययनादि व कर्म्मफलोपयोग से पावन होता है।
👉 यह संस्कार द्विजत्व का कारण है।
👉 श्रौत स्मार्त्त कर्म प्रसाधनभूत यह कर्म है।
👉 ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इसके अधिकारी है।
👉 शूद्र व किसी भी जाति की स्त्री को इसका अधिकार शास्त्रोक्त नहीं हैं।
#कालनिर्णय :-- "तस्य कालस्त्रिविध: - नित्य: काम्यो गौणश्च।" अर्थात् उपनयन काल तीन प्रकार का है। १. नित्य, २. काम्य, ३. गौण ।
१. #नित्यकाल :- अत्र नित्यं तावदुच्यते। विप्राणां ब्राह्मणानां गर्भाष्टमे...........।
अर्थात् ब्राह्मणों के गर्भाधान अथवा जन्मकाल से 8 वें वर्ष, क्षत्रियों के 11 वें वर्ष, तथा वैश्यों के 12 वें वर्ष #उपनयन का #नित्यकाल है।
२. #काम्यकाल :- अथ काम्यं - विप्राणामेव पञ्चमे गर्भाज्जनेर्वा वर्षे.............।
#ब्रह्मवर्चसकामस्य_कार्यं_विप्रस्य_पञ्चमे।
#राज्ञो_बलार्थिन: #षष्ठे_वैश्यस्यार्थार्थिनोsष्टमे।।
____ मनु २/३७
अर्थात् ब्रह्मवर्च्चस् (स्वाध्यायतप से उत्पन्न तेज )कामना करने बाले ब्राह्मण को 5वें वर्ष, बलार्थि क्षत्रिय को 6वें वर्ष, अर्थार्थि वैश्य को 8वें वर्ष उपनयन करना उचित है।
#राज्ञो_बलार्थिन: #षष्ठे_वैश्यस्यार्थार्थिनोsष्टमे।।
____ मनु २/३७
अर्थात् ब्रह्मवर्च्चस् (स्वाध्यायतप से उत्पन्न तेज )कामना करने बाले ब्राह्मण को 5वें वर्ष, बलार्थि क्षत्रिय को 6वें वर्ष, अर्थार्थि वैश्य को 8वें वर्ष उपनयन करना उचित है।
३. #गौणकाल :- निगदिते "गर्भाज्जनेर्वाष्टमे.." इत्यादिके काले तस्मिन् #द्विगुणिते....।
#आषोडशाद्ब्राह्मणस्य_सावित्री_नातिवर्त्तते।
#आद्वाविंशात्_क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विश:।।
___ मनु २/३८
अर्थात् नित्यकाल में यदि संस्कार न हुआ हो तो उससे द्विगुणित काल में उपनयन कर ही देना चाहिए। यथा ब्राह्मण का नित्यकाल 8 है तो 16 वर्ष द्विगुणित हुआ अत: 16वें वर्ष में उपनयन विप्र को कर देना चाहिए। अन्य क्षत्रियादि में भी ऐसा ही समझे। इससे अधिक आयु में उपनयन नहीं होता।
#आषोडशाद्ब्राह्मणस्य_सावित्री_नातिवर्त्तते।
#आद्वाविंशात्_क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विश:।।
___ मनु २/३८
अर्थात् नित्यकाल में यदि संस्कार न हुआ हो तो उससे द्विगुणित काल में उपनयन कर ही देना चाहिए। यथा ब्राह्मण का नित्यकाल 8 है तो 16 वर्ष द्विगुणित हुआ अत: 16वें वर्ष में उपनयन विप्र को कर देना चाहिए। अन्य क्षत्रियादि में भी ऐसा ही समझे। इससे अधिक आयु में उपनयन नहीं होता।
👉 यदि उपरोक्त नित्य, काम्यादि काल में ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि का उपनयन न हुआ हो तो वह असंस्कृत सावित्रीपतित #व्रात्य होतें हैं। इन व्रात्यों के साथ वेदाध्ययनादि कार्य, कन्यादान एवं पाक-सम्बन्ध आपत्तिकाल में भी नहीं करना चाहिए। जैसे याज्ञवल्क्य ने कहा :--
#अत_ऊर्ध्व_पतन्त्येते_सर्वधर्मबहिष्कृता:।
#सावित्रीपतिता_व्रात्या_व्रात्यस्तोमादृते_क्रतो:।।
#सावित्रीपतिता_व्रात्या_व्रात्यस्तोमादृते_क्रतो:।।
..........यदि व्रात्य उपनयनादि चाहे तो #व्रात्यस्तोम यज्ञ द्वारा यह सम्भव है। अन्यथा नहीं।
जय श्री राम
વ્રાત્ય પ્રાયશ્ચિત
जिस ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य -- अनुपनीत के पिता, पितामह अनुपनीत(कालक्रम से जनेऊ-संस्कार रहित)हो, #तेषामिच्छतां_प्रायश्चितम् = ( तेषां = माणवकानाम् ) #इच्छतामित्यनेन_बलात्कारो_नेति_सूचयति ||व्रात्य प्रा०निर्णये || अर्थात् संस्कार की इच्छा रखनेवालें बटु, पिता और पितामह आदि का प्रायश्चित्त किया जाय | यहाँ "तेषां" शब्द से (बटु, बटु के पिता और पितामह आदि ) "इच्छतां" शब्द से बलात्कार किये बिना जानना चाहिये |
उन्हें बटु को (पिता पितामह को नहीं) "एकवर्ष पर्यन्त" उपनीत-द्विजों के घर से "मैं व्रात्य हूँ मुजे भिक्षा दो" कहकर भिक्षा माँगकर गुरु(आचार्य) की आज्ञा से भिक्षा का एक-समय (केवल दिन में) भोजन करना चाहिये, गुरु की अनन्य भाव से सेवा करनी चाहिये ( हाथ पैर दबाना, गुरु के सोने के बाद सोना, गुरु के शयन से उठने के पहले उठकर शौच,स्नान आदि से पवित्र होकर गुरु के लिये उपयोगी सन्ध्योपासना, अग्निकार्य , गुरु के गृह का सम्मार्जन, सफाई आदि जो गुरु धर्माश्रय द्वारा आज्ञा करे वह सभी कार्य करने चाहिये) और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये (यहाँ ब्रह्मचर्य व्रत का तात्पर्य गुरुगृह गुरु के समीप में रहकर ही पतित, व्रात्य, शूद्र,चांडाल आदि के स्पर्श होने से स्नान करना और स्वयंपाकी बनकर रहने से हैं) | बाद में वर्ष बितजाने के बाद उपनयन के योग्य उचित मुर्हूत में उपनयन करवाना चाहिये ( यहाँ यदि पिता स्वयं इच्छा से अपने उपनयन संस्कार प्रायश्चित्त पूर्वक न करवाना चाहता हो तो उपनेतृत्व आचार्य का ही रहैगा अर्थात् यजमानरूप से सपत्नीक-आचार्यस्वयं धर्मके #माता_पिता बनकर उपनयन देने के अधिकारी बनैंगे) और जातकर्मादि समस्त संस्कारों के साथ उपनयन के समय कामाचार कामावाद कामभक्षण(वर्णाश्रम विपरित आचार, अशिष्ट भाषण और गाजर,सलगम, प्याज,लहसुन,मशरुम मदिरा आदि ग्रहण) के दोष निवृत्ति हेतु तीन #कृच्छ्रव्रत, आचार्य को उपनेतृत्वाधिकार के लिये तीन #कृच्छ्रव्रत, तथा आचार्य को गायत्री के तथा व्रतादेश के उपदेशाधिकार हेतु #दशहजार गायत्री जप करना चाहिये ------> #कृच्छ्रत्रयं_चोपनेता_त्रीन्कृच्छ्रांश्च_बटुश्चरेत् #आचार्यो_दशसाहस्रं_गायत्रीं_प्रजपेत्तथा ||
जय श्री राम
વ્રાત્ય પ્રાયશ્ચિત
जिस ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य -- अनुपनीत के पिता, पितामह अनुपनीत(कालक्रम से जनेऊ-संस्कार रहित)हो, #तेषामिच्छतां_प्रायश्चितम् = ( तेषां = माणवकानाम् ) #इच्छतामित्यनेन_बलात्कारो_नेति_सूचयति ||व्रात्य प्रा०निर्णये || अर्थात् संस्कार की इच्छा रखनेवालें बटु, पिता और पितामह आदि का प्रायश्चित्त किया जाय | यहाँ "तेषां" शब्द से (बटु, बटु के पिता और पितामह आदि ) "इच्छतां" शब्द से बलात्कार किये बिना जानना चाहिये |
उन्हें बटु को (पिता पितामह को नहीं) "एकवर्ष पर्यन्त" उपनीत-द्विजों के घर से "मैं व्रात्य हूँ मुजे भिक्षा दो" कहकर भिक्षा माँगकर गुरु(आचार्य) की आज्ञा से भिक्षा का एक-समय (केवल दिन में) भोजन करना चाहिये, गुरु की अनन्य भाव से सेवा करनी चाहिये ( हाथ पैर दबाना, गुरु के सोने के बाद सोना, गुरु के शयन से उठने के पहले उठकर शौच,स्नान आदि से पवित्र होकर गुरु के लिये उपयोगी सन्ध्योपासना, अग्निकार्य , गुरु के गृह का सम्मार्जन, सफाई आदि जो गुरु धर्माश्रय द्वारा आज्ञा करे वह सभी कार्य करने चाहिये) और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये (यहाँ ब्रह्मचर्य व्रत का तात्पर्य गुरुगृह गुरु के समीप में रहकर ही पतित, व्रात्य, शूद्र,चांडाल आदि के स्पर्श होने से स्नान करना और स्वयंपाकी बनकर रहने से हैं) | बाद में वर्ष बितजाने के बाद उपनयन के योग्य उचित मुर्हूत में उपनयन करवाना चाहिये ( यहाँ यदि पिता स्वयं इच्छा से अपने उपनयन संस्कार प्रायश्चित्त पूर्वक न करवाना चाहता हो तो उपनेतृत्व आचार्य का ही रहैगा अर्थात् यजमानरूप से सपत्नीक-आचार्यस्वयं धर्मके #माता_पिता बनकर उपनयन देने के अधिकारी बनैंगे) और जातकर्मादि समस्त संस्कारों के साथ उपनयन के समय कामाचार कामावाद कामभक्षण(वर्णाश्रम विपरित आचार, अशिष्ट भाषण और गाजर,सलगम, प्याज,लहसुन,मशरुम मदिरा आदि ग्रहण) के दोष निवृत्ति हेतु तीन #कृच्छ्रव्रत, आचार्य को उपनेतृत्वाधिकार के लिये तीन #कृच्छ्रव्रत, तथा आचार्य को गायत्री के तथा व्रतादेश के उपदेशाधिकार हेतु #दशहजार गायत्री जप करना चाहिये ------> #कृच्छ्रत्रयं_चोपनेता_त्रीन्कृच्छ्रांश्च_बटुश्चरेत् #आचार्यो_दशसाहस्रं_गायत्रीं_प्रजपेत्तथा ||
बाद में जितने पुरुष अपने कुल में (पिता, पितामह, प्रपितामह आदि) का उपनयन न हुआ हो उतने वर्षतक (पिता के अनुपनीत होने में एकवर्ष, पितामह के उपनीत न होने में दो वर्ष आदि) प्रायश्चित्त के लिये वेदपाठीयों द्वारा ऋग्वेद के #यदन्ति_यच्च_दूरके ००|| इत्यादि सात पावमानीयमंत्रो, यजुर्वेद के जिसका (देवप्रतिष्ठाओं में अर्चाशुद्धि के विधान हेतु स्नपन के पवित्र मंत्र तथा ब्राह्मण-मंत्रोसे, #कया_नश्चित्र आदि सामवेद के पवित्र अभिषेक के मंत्रों से और ऋग्वेदीय हंसावती ऋचा #हंसः_शुचिषद् ०० | इत्यादि मंत्रो से स्नान करवाकर स्वशाखा-वेद का अध्यापन होगा, प्रतिदिन षट्कर्मो का अधिकार हैं | उपनीत द्विजों के साथ व्यवहार योग्य हैं..
#निन्दितम_व्रात्य=- जिसके #प्रपितामह आदि पूर्वजों के उपनयन हुआ हैं कि नहीं यह स्मरण न हो तो उस संस्कार्य बटुक को बारहवर्षतक (पहले कहानुसार) ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करने के बाद जातकर्मादि संस्कारों के साथ पूर्वोक्त प्रकार से (कामाचार आदि, उपनेतृत्वाधिकार तथा आचार्य स्वयं उपदेशाधिकार के) प्रायश्चित्त करने के बाद उपनयन-संस्कार कराएँ... बाद में ( पिता, पितामह, प्रपितामह आदि जितनी पैढ़ी उपनयन संस्कार से वंचित हो उतने वर्षतक पूर्वोक्त मंत्रो से स्नान करें अर्थात् सदाचारी-वेदपाठीयों के द्वारा मंत्रपूर्वक स्नान करायें.. इनके प्रपितामहादि पूर्वजों अनुपनीतों होने के कारण इन्हें गार्हस्थ्य-धर्म मात्र ( वैदिक समंत्र -- > स्नान, सन्ध्योपासना,नाममंत्रो वा पुराण मंत्रो से देवपूजा,ब्रह्मयज्ञ के अभाव में तीनगायत्री जप, क्रियामात्र वैदिकमंत्र रहित तर्पण,वैश्वदेव के अभाव में कच्चे सघृत-अन्न का दान आदि) अधिकार हैं परंतु वेदाध्ययन का अधिकार नहीं.. और वैदिक यज्ञ-यागादि में याजन का तथा पुत्र पुत्री आदि लेना-देना विवाह के सम्बन्ध (कालक्रम से उपनीत द्विजों के पुत्र-पुत्री के साथ) व्यवहार नहीं होगा यही शास्त्रीय व्यवहार हैं ----> अर्थात्
(१) यदि व्रात्य ने विवाह से पहले इस प्रकार प्रायश्चित्त पूर्वक उपनयन धारण किया हो तो व्रात्यप्रायश्चित्त से शुद्ध उपनीतों के पुत्री से विवाह करें | पुत्रादि का कालावधि में उपनयन और अध्यापन होगा | इनके पुत्र-पुत्री का विवाह भी व्रात्यप्रायश्चित्त से शुद्ध उपनीतों के पुत्री-पुत्र से विवाह-सम्बन्ध करें |
(२) व्रात्य यदि विवाह पश्चात् संतानोत्पत्ति के बाद व्रात्यप्रायश्चित्त पूर्वक उपनयन से संस्कृत हुआ हो तो उत्पन्न पुत्र का स्वकालातिक्रम-प्रायश्चित्त करवाँकर उक्तकालावधि में #उपनयन करके वेदाधिकार रहैगा | परंतु व्रात्यदोष के कारण गर्भाधान से उत्पन्न व्रात्या-पुत्री के साथ व्रात्य का विवाह होगा..
व्रात्यप्रायश्चित्त पूर्वक प्राप्त जनेऊ-संस्कार से उपनीतों को #व्रात्यों का अन्न भक्षण नहीं करना चाहिये..
जिस (कालक्रम से उपनीत द्विजों के पुत्रों ) का उपनयन के लिये जो अन्त्यकाल कहा हैं -- ब्राह्मण के १६, क्षत्रिय के २२, वैश्य के २४ वर्षों में उपनयन न हुआ हो तो अतिक्रान्तदोष की निवृत्ति के लिए #उक्त_पतितसावित्रिक
( https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1723003361308211&id=1632217650386783 )
के व्रतादि करने के बाद में उपनयन होगा...
( https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1723003361308211&id=1632217650386783 )
के व्रतादि करने के बाद में उपनयन होगा...
उपनयन आदि में ध्यातव्य बातें
जन्मपूर्व व जन्म के बाद चूडा़करण का अनादिष्ट प्रायश्चित्त होम - अतिक्रान्त प्रतिसंस्कार के उद्देश से विट् नामाग्नि मे - स्वस्व शाखानुसार व्यस्त या समस्तव्याहृति होम , तथा प्रायश्चित्ताहुतियाँ देकर , लोप हुए अन्नप्राशन तककें प्रतिसंस्कार के पादकृच्छ्र(दूसरे दूसरे उत्तरोत्तर संस्कार करतें समय) और जानबूझकर लोप करने में अन्नप्राशन तककें द्विगुण यथा अर्धकृच्छ्र तथा चूडाकरण(शिखास्थापन) के अतिक्रांत का अर्धकृच्छ्र जानबूझ कर एकप्राजापत्य , शिखाछेदन में तप्तकृच्छ्र जानबूझकर शिखा छेदन में दोतप्तकृच्छ्र अथवा इन सभी कृच्छों के प्रत्याम्नाय रूप गायत्रीजप(पादकृच्छ्र के १००० , कृच्छ्र के ४००० तद्गुणित जितने संस्कार लोप हो उतने) प्रायश्चित्तसंकल्प करकें उपनयन होजाने के बाद कृतसंकल्प के प्रायश्चित्त को आचरना चाहिये - यहाँ "(व्रत या प्रायश्चित्त सत्र का प्रारंभ -- " संकल्पं व्रतसत्रयोः)" से माना हैं..
जनेऊ में -- कामाचार कामावादकामभक्षण के तीनप्राजापत्य, नेतृत्वाधिकारीयों के लिए तीन प्राजापत्य वा प्रत्याम्नाय और दिक्षादाता-आचार्य स्वयं १२००० गायत्रीजप करें ..
तब पूर्वकार्य पूर्वक स्वशाखा विधिप्रदत्त उचितकाल में जनेऊ विधिवत् पूर्ण माना गया हैं,
ये सब - छपी हुई पद्धति के ग्रन्थों में नहीं होता कुछ में होता हैं वह भी ज्ञानतः द्विगुणं प्रायश्चित्त की परिभाषा में अच्छे अच्छो पंडित - भूल जातें हैं..
और भी यह सब प्रायश्चित्त और यज्ञोपवीत के विधान समूह में नहीं हो सकतें -- क्योंकि -- एकोदर प्रसूतों का एकदिन एक मंडप में नहीं हो सकता -- सभी के लिए मंडप भिन्न होना चाहिये, यजमान के हाथ ऊंचा कर सीधी मध्यमा अगूली के माप से जितना ऊंचा हो - उनसे तीन गुने विस्तार में मंडपवेध होता हैं - यथा सामान्यतः -- ८ हाथ= १ पुरुष
अब ८ हाथ का मंडप हैं तो ८ हाथ जगह तो रुकगई तथा + ८×३ २४+८ हाथ = ३२ हाथ छोड़कर दूसरा मंडप +८ हाथ ४० हाथ का क्षेत्र हो तो दूसरे का एकदिन में पृथक आचार्य से हो सकता हैं - नहीं तो ९ या मुर्हूत के हिसाब से ज्यादा दिन का अंतर आवश्यक हुआ
और भी यह सब प्रायश्चित्त और यज्ञोपवीत के विधान समूह में नहीं हो सकतें -- क्योंकि -- एकोदर प्रसूतों का एकदिन एक मंडप में नहीं हो सकता -- सभी के लिए मंडप भिन्न होना चाहिये, यजमान के हाथ ऊंचा कर सीधी मध्यमा अगूली के माप से जितना ऊंचा हो - उनसे तीन गुने विस्तार में मंडपवेध होता हैं - यथा सामान्यतः -- ८ हाथ= १ पुरुष
अब ८ हाथ का मंडप हैं तो ८ हाथ जगह तो रुकगई तथा + ८×३ २४+८ हाथ = ३२ हाथ छोड़कर दूसरा मंडप +८ हाथ ४० हाथ का क्षेत्र हो तो दूसरे का एकदिन में पृथक आचार्य से हो सकता हैं - नहीं तो ९ या मुर्हूत के हिसाब से ज्यादा दिन का अंतर आवश्यक हुआ
दूसरी बात समूह में - बालकों की वय सरीखी नहीं होती - ५ से ८ वर्ष उत्तम काल, ९ से १० मध्यम और ११ से १६ अधम काल ब्राह्मणों का हैं - तदनुसार प्रायश्चित्त भी कुछ लोग नहीं जानतें..
१६ से उपरी के लिए -- दुष्कर प्रायश्चित्त होतें हैं -
पतितसावित्रिकों के साथ - समयोचित बटुओं के संस्कार में संकरतादोष हैं
समूह में सभी यज्ञोपवीत के आचार्य व ब्राह्मण स्वशाखीय नहीं होतें व सन्ध्योपासना रहित भी कुछ होतें हैं तथा कुछ अभक्ष्य का सेवन भी करतें हैं,
तीसरी बात -- सभी अग्न्यायतन(स्थंडिलों) की पृथक कुशकंडिका नहीं होती- तथा सभी के -- शाखेश,वर्णेश,व गुरु का बल समान नहीं होता
सभी के लिए प्रमाणिक दंड(पालाश आदि के) नहीं होतें कुछ भी कोई भी लकड़ी रख देतें हैं
सचौल+उपनयन हो तो -- एक क्षुर से काम नहीं चलता क्योंकि - क्षुर का पृथक् पृथक् - वैकल्पकपदार्थावधारण कुशकंडिका में अनिवार्य हैं
उपनयन के लिए परीक्षनीय बिन्दु
उपनयन के लिए परिक्षण की आवश्यकता
#नापरिक्षितं_याजयेत्_नाध्यापयेन्नोपनयेत्।।विष्णुधर्मे।।
(1) कुमार के माता पिता के गोत्र प्रवर को जानना (समानगोत्र समानप्रवर के माता-पिता से जनित संतान त्याज्य हैं)
(2)मातृकुल और पितृकुल में किसीने असवर्ण विवाह किए हैं कमसे कम तीनपिढी़ की जाँच (कलियुग में असवर्णविवाह त्याज्य हैं, तज्जनित संतान वर्णसंकर होती हैं)
(3)पिता पितामह प्रपितामह के जनेऊ की जाँच वेद-शाखा सहित (परशाखा में किया उपनयन से द्विजत्व की सिद्धि न होने के कारण स्वशाखीयोपनयनकाल 16वर्षव्यतिक्रान्ते व्रात्य हो जाते हैं और व्रात्य से जनित संतान भी व्रात्य ही हैं..
(4) पिता पितामहादि पूर्वजो की परम्परा विवाहकालिक उपनयन की है या नहीं, यदि विवाह काल 16 से पहिले हो तो ठिक परंतु 16 से अधिक उम्रमें विवाहसमय हुए जनेऊ-संस्कार व्रात्यता सूचक ही हैं..
(4) कोई परिवार के सदस्य ने विदेशगमन किया हैं,यदि किया हो तो वह संयुक्तपरिवार में साथ में रहता हैं?(पतितोत्पन्नः पतितो भवतीत्याहुः।। बौधायनधर्मे स्मृतिवचन।। पितुर्वा भजते शीलं मातुर्वोभयमेव वा ।।मनुः।।)
(5)पिता को यदि अयाज्ययाजक दोष लगगया हो तो प्रायश्चित्तपूर्वक पुनरुपनयन के बिना पिता भी अयाज्य हैं, कुमार का उपनयन स्वयं नहीं करवा सकते..
(6) अनाथालय या असवर्ण से दत्तक परिग्रह किया हुआ कुमार न हो..
#नापरिक्षितं_याजयेत्_नाध्यापयेन्नोपनयेत्।।विष्णुधर्मे।।
(1) कुमार के माता पिता के गोत्र प्रवर को जानना (समानगोत्र समानप्रवर के माता-पिता से जनित संतान त्याज्य हैं)
(2)मातृकुल और पितृकुल में किसीने असवर्ण विवाह किए हैं कमसे कम तीनपिढी़ की जाँच (कलियुग में असवर्णविवाह त्याज्य हैं, तज्जनित संतान वर्णसंकर होती हैं)
(3)पिता पितामह प्रपितामह के जनेऊ की जाँच वेद-शाखा सहित (परशाखा में किया उपनयन से द्विजत्व की सिद्धि न होने के कारण स्वशाखीयोपनयनकाल 16वर्षव्यतिक्रान्ते व्रात्य हो जाते हैं और व्रात्य से जनित संतान भी व्रात्य ही हैं..
(4) पिता पितामहादि पूर्वजो की परम्परा विवाहकालिक उपनयन की है या नहीं, यदि विवाह काल 16 से पहिले हो तो ठिक परंतु 16 से अधिक उम्रमें विवाहसमय हुए जनेऊ-संस्कार व्रात्यता सूचक ही हैं..
(4) कोई परिवार के सदस्य ने विदेशगमन किया हैं,यदि किया हो तो वह संयुक्तपरिवार में साथ में रहता हैं?(पतितोत्पन्नः पतितो भवतीत्याहुः।। बौधायनधर्मे स्मृतिवचन।। पितुर्वा भजते शीलं मातुर्वोभयमेव वा ।।मनुः।।)
(5)पिता को यदि अयाज्ययाजक दोष लगगया हो तो प्रायश्चित्तपूर्वक पुनरुपनयन के बिना पिता भी अयाज्य हैं, कुमार का उपनयन स्वयं नहीं करवा सकते..
(6) अनाथालय या असवर्ण से दत्तक परिग्रह किया हुआ कुमार न हो..
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