बालविवाह

भारतीय बाल-विवाह  #बनाम कुरीति : एक समीक्षा


समाजिक कुरीति किसे कहते हैं ? कुत्सिता रीतिर्या सा कुरीतिः । जो निन्दनीय पद्धति हो , वह कुरीति कहलाती है ।
क्या भारतीय बाल-विवाह की परम्परा कुरीति थी ?
बाल विवाह का अर्थ होता है एक उत्तम कुल परिवार को  कन्या का दान करना ।
बाल-विवाह के सम्बन्ध में ये भ्रान्ति समाज में फैलायी गयी है कि  गर्भ धारण  की सही आयु सोलह या अठारह के पश्चात् होती है उससे  पूर्व अनुचित होने से बाल विवाह  गलत है  किन्तु ये आक्षेप उन लोगों ने लगाये हैं  , जिनकी दृष्टि में विवाह का अर्थ सम्भोग होता है  ।  ये लोग भारतीय समाज की  परम्परा यथार्थता नहीं जानते । ये लोग नही जानते कि भारतीय परम्परा में विवाह  एक संस्कार है , एक धार्मिक व्रत होता है। यथार्थता यह है कि भारतीय समाज में जो  बाल विवाह की परम्परा रही है , उसमें बाल्यकाल में बच्चे पैदा किये ही नही जाते थे । अपितु  आयुर्वेद मनीषी ऋषि- मुनियों के नियमानुसार ही जब गर्भ परिपक्व होता है , तभी सन्तानोत्पत्ति  होती थी ।
अतः अनर्गल आरोप लगाकर भारतीय परम्परा को बदनाम किया गया ।
दूसरी बात ये है कि भारतीय बाल विवाह की परम्परा में  कन्या को चयन की स्वतन्त्रता थी , जिसे स्वयम्वर कहा जाता था । अर्थात् कन्या अपना वर स्वयं वरण करती थी ।
अतः जो लोग ये आरोप करते हैं कि इससे कन्या की मनोभावनाओं का दमन होता था , ये स्पष्ट श्वेत असत्य है ।
जो ये तर्क दिया गया कि बाल्यकाल में कन्या को अपने हित- अहित /भले- बुरे के ध्यान नहीं होता था सो भी निर्थक  है क्योंकि  कन्या के भले बुरे का सारा ध्यान उसके माता - पिता स्वयं रखते थे , जो कि स्वयं सबसे अधिक अनुभवी घटक हैं ।  वह अपने अनुभव के आधार पर सर्वश्रेष्ठ वरों को ही निमन्त्रित करते थे , ताकि कन्या उसमें से अपने मनोनुरूप चयन कर सके ।
जो पूछते हैं कि कन्या क्या दान की वस्तु है ?  उनसे ये पूछना चाहिये कि दान क्या  किसी भी वस्तु का किया जाता है ? दान क्या हेय( निन्दनीय/नीच) वस्तु का होता है ?   दान क्या हेय को दिया जाता  है ?  आप पहले दान का क ख पढिये कि दान कहते किसे हैं ।

विवाह संस्कार का महत्त्व

हमारे सनातन वैदिक धर्म की विहित  विवाह संस्कार. की प्राचीन     परम्परा  में जो   आज विकृति आयी है, उस कारण प्रायः-  प्रायः  सारे युवा   आजकल के  परस्त्री -लम्पट हो गये हैं ।
वैदिक परम्परा में बहुत शीघ्र   ही यह संस्कार  सम्पन्न कर लिया जाता था ।  क्यों?    परिणाम स्वयं चीख चीख कर कारण बता रहे हैं !
सही समय पर  शास्त्रीय संस्कारों  का कितना गम्भीर महत्त्व है, ये स्पष्ट है ।
ऋषि-मुनियों से ज्यादा समझदार समझने का   कुछ कलिग्रसित   अज्ञानियों का अभिमान सारे  मानव -समाज को ले डूबा ।
कहते हैं , // अपना जीवनसाथी चुनने का  अधिकार हमको स्वयं होना चाहिये, जिन्दगी हमने बितानी है , मॉ बाप को नहीं ///
अरे   अज्ञानी बालक !    जीवनसाथी  जिन्दगी बिताने के लिये नहीं चुनते , अपितु जीवन और मृत्यु के चक्रव्यूह  से पार उतर कर  आत्मकल्याण पाने के लिये  चुनते हैं !
और तेरे शरीर पर तो तुझसे पहले तेरे माता पिता का अधिकार है !  क्योंकि तू उनका ऋणी है !  तुझे ऐसा क्यों लगता है कि तेरे माता पिता का निर्णय तेरा निर्णय नहीं ?  यही तो है  तेरे सिर पर चढा हुआ  कलियुग !   तू तो  उनका ही अधिकार   कुचल गया!
।। जय श्री राम ।।

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