कुंभकर्ण
*कुम्भकर्ण रावण जैसा ही महान अधर्मी था इसीलिए देवता उसके वरदान मांगने की बात पर बोले कि यह तो बिना वरदान के ही बड़ा भारी आतंकी है, वरदान सहित तो कयामत ढा देगा, इसलिए सरस्वती मैय्या हमें बचाओ। ब्रह्मा जी भी निराश थे कि यह तो विश्रवा मुनि ने सृष्टि संहार को ही उत्पन्न किया है, उन्होंने पहले ही उसे सृष्टि बचाने को सोने का श्राप दे दिया था। प्रमाण :--
"इस महाकाय राक्षस ने जन्म लेते ही बाल्यावस्था में भूख से पीड़ित हो कई सहस्र प्रजाजनों को खा डाला था।"
●--- युद्धकाण्ड, सर्ग 61, श्लोक 13
"कुम्भकर्ण के द्वारा प्रजा के भक्षण, देवताओं के धर्षण, ऋषियों के आश्रमों के विध्वंस तथा पराई स्त्रियों को बार बार हरण करने की बात भी बताई।"
"इन्द्र ने कहा-- "भगवन्! यदि यह नित्यप्रति इसी प्रकार प्रजाजनों का भक्षण करता रहा तो थोड़े ही समय में संसार सूना हो जाएगा।"
●--- युद्धकाण्ड, सर्ग 61, श्लोक 20-21
"कुम्भकर्ण बड़ा ही उन्मत्त निकला। वह भोजन से कभी तृप्त नहीं होता था। वह तीनों लोकों में घूम घूमकर धर्मात्मा महर्षियों को खाता फिरता था।"
●--- उत्तरकाण्ड, सर्ग 9, श्लोक 38
"प्रभो! आप इस कुम्भकर्ण को वरदान न दीजिए। क्योंकि आप जानते हैं कि यह दुर्बुद्धि निशाचर किस प्रकार समस्त लोकों को त्रास देता है।"
"हे ब्रह्मन्! इसने नंदनवन की 7 अप्सराओं, इंद्र के दस अनुचरों को खा लिया और बहुत से ऋषियों व मनुष्यों को भी खा लिया है।"
●--- उत्तरकाण्ड, सर्ग 10, श्लोक 36-37
रावण से वार्ता के समय उसने वाल्मीकि रामायण में सीताजी को न तो जगदम्बा कहा है न श्रीराम को नारायण कहा है, यहाँ तक कि उसने रावण की तरह श्रीराम को मात्र "राम" ही कहा है। बस नीति धर्म का सामान्य उपदेश उसने किया है। स्वयं को पाप प्रकृति भी उसने विभीषण से कहा है। जगदम्बा आदि बात सीरियल वालों ने जोड़ दी है। व श्रीराम का सिर काटने की बात उसने जरूर कही है।
"महाबाहो! संग्राम भूमि में आज राम का सर काट लाऊंगा। उसे देखकर तुम सुखी होना और सीता दुःख में डूब जाएगी।"
●--- युद्धकाण्ड, सर्ग 63, श्लोक 36
क्या ऋषियों को खाने वाला और स्त्रियों का अपहरण करने वाला, श्रीराम का सिर काटने की चाह वाला राक्षस केवल रावण को थोड़ा सा प्रवचन देने के लिए पूज्य हो जाएगा। उस समय राक्षस व देव आदि सभी शास्त्र व धर्म पढा करते थे, पर पढ़ना और आचरण करना बिल्कुल अलग होता है। दुर्योधन भी कहता था कि -- "'धर्म और अधर्म मैं दोनों को समझता हूँ, लेकिन मेरी प्रवृत्ति अधर्म की ओर ही रहती है।" इसी तरह कुम्भकर्ण की स्थिति थी। महान तो विभीषण जी थे जो तामस देह में भी अपनी परम तपस्या से महान धर्म को जीते थे। पाकिस्तान जैसे अधर्मक्षेत्र में वैष्णव धर्म का पूर्ण पालन करते थे। वे धर्म के अवतार थे। धर्म के स्वरूप थे। कहा है "यतो धर्मस्ततो जयः", जहाँ धर्म है वहाँ जय है, यानी धर्मराज लंकेश विभीषण की जय ही शास्त्रसम्मत है। रावण के मांगने पर भी ब्रह्माजी ने उसे अमरता का वरदान न दिया पर विभीषण जी को ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर बिना मांगे स्वयं ही अमरता का वरदान दे दिया। (उ०का० सर्ग 10) ऐसे विभीषण जी की निंदा? पूजा योग्य हैं महात्मा विभीषण। आज भी गुप्तरूप से हनुमानजी की तरह ही रामकाज में लगे रहते हैं। रामेश्वरम में महात्मा विभीषण जी का मंदिर है।
*ज्यादा व पूरी जानकारी के लिए गीताप्रेस से 450₹ में वाल्मीकि रामायण खरीदकर पढ़ें।*
जय श्री राम
"इस महाकाय राक्षस ने जन्म लेते ही बाल्यावस्था में भूख से पीड़ित हो कई सहस्र प्रजाजनों को खा डाला था।"
●--- युद्धकाण्ड, सर्ग 61, श्लोक 13
"कुम्भकर्ण के द्वारा प्रजा के भक्षण, देवताओं के धर्षण, ऋषियों के आश्रमों के विध्वंस तथा पराई स्त्रियों को बार बार हरण करने की बात भी बताई।"
"इन्द्र ने कहा-- "भगवन्! यदि यह नित्यप्रति इसी प्रकार प्रजाजनों का भक्षण करता रहा तो थोड़े ही समय में संसार सूना हो जाएगा।"
●--- युद्धकाण्ड, सर्ग 61, श्लोक 20-21
"कुम्भकर्ण बड़ा ही उन्मत्त निकला। वह भोजन से कभी तृप्त नहीं होता था। वह तीनों लोकों में घूम घूमकर धर्मात्मा महर्षियों को खाता फिरता था।"
●--- उत्तरकाण्ड, सर्ग 9, श्लोक 38
"प्रभो! आप इस कुम्भकर्ण को वरदान न दीजिए। क्योंकि आप जानते हैं कि यह दुर्बुद्धि निशाचर किस प्रकार समस्त लोकों को त्रास देता है।"
"हे ब्रह्मन्! इसने नंदनवन की 7 अप्सराओं, इंद्र के दस अनुचरों को खा लिया और बहुत से ऋषियों व मनुष्यों को भी खा लिया है।"
●--- उत्तरकाण्ड, सर्ग 10, श्लोक 36-37
रावण से वार्ता के समय उसने वाल्मीकि रामायण में सीताजी को न तो जगदम्बा कहा है न श्रीराम को नारायण कहा है, यहाँ तक कि उसने रावण की तरह श्रीराम को मात्र "राम" ही कहा है। बस नीति धर्म का सामान्य उपदेश उसने किया है। स्वयं को पाप प्रकृति भी उसने विभीषण से कहा है। जगदम्बा आदि बात सीरियल वालों ने जोड़ दी है। व श्रीराम का सिर काटने की बात उसने जरूर कही है।
"महाबाहो! संग्राम भूमि में आज राम का सर काट लाऊंगा। उसे देखकर तुम सुखी होना और सीता दुःख में डूब जाएगी।"
●--- युद्धकाण्ड, सर्ग 63, श्लोक 36
क्या ऋषियों को खाने वाला और स्त्रियों का अपहरण करने वाला, श्रीराम का सिर काटने की चाह वाला राक्षस केवल रावण को थोड़ा सा प्रवचन देने के लिए पूज्य हो जाएगा। उस समय राक्षस व देव आदि सभी शास्त्र व धर्म पढा करते थे, पर पढ़ना और आचरण करना बिल्कुल अलग होता है। दुर्योधन भी कहता था कि -- "'धर्म और अधर्म मैं दोनों को समझता हूँ, लेकिन मेरी प्रवृत्ति अधर्म की ओर ही रहती है।" इसी तरह कुम्भकर्ण की स्थिति थी। महान तो विभीषण जी थे जो तामस देह में भी अपनी परम तपस्या से महान धर्म को जीते थे। पाकिस्तान जैसे अधर्मक्षेत्र में वैष्णव धर्म का पूर्ण पालन करते थे। वे धर्म के अवतार थे। धर्म के स्वरूप थे। कहा है "यतो धर्मस्ततो जयः", जहाँ धर्म है वहाँ जय है, यानी धर्मराज लंकेश विभीषण की जय ही शास्त्रसम्मत है। रावण के मांगने पर भी ब्रह्माजी ने उसे अमरता का वरदान न दिया पर विभीषण जी को ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर बिना मांगे स्वयं ही अमरता का वरदान दे दिया। (उ०का० सर्ग 10) ऐसे विभीषण जी की निंदा? पूजा योग्य हैं महात्मा विभीषण। आज भी गुप्तरूप से हनुमानजी की तरह ही रामकाज में लगे रहते हैं। रामेश्वरम में महात्मा विभीषण जी का मंदिर है।
*ज्यादा व पूरी जानकारी के लिए गीताप्रेस से 450₹ में वाल्मीकि रामायण खरीदकर पढ़ें।*
जय श्री राम
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