श्रीमद्भगवद्गीता मे सनातन जन्मना वर्णव्यवस्था
"श्रीमद्भगवद्गीता" हमारी सनातन ''जन्मना'' वर्णव्यवस्था [ जातिव्यवस्था ] का डिण्डिम घोष करने वाला सर्वोत्कृष्ट शास्त्र है।।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-
चातुर्वण्यम् मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्त्तारमपि मां विद्ध्यकर्त्तारमव्ययम् ।।
अर्थात्-
चारोँ वर्णोँ का समूह , गुणविभाग और कर्मविभाग पूर्वक मेरे द्वारा विरचित है। इसका कर्त्ता होने पर
भी मुझ अविनाशी को तू अकर्त्ता ही जान ।
-गीता 4/13...................... (क्रमशः )
निष्कर्ष-
[1] चारोँ वर्ण स्वयं श्री भगवान द्वारा सृष्ट हैँ । [समाज द्वारा नहीँ।]
यथा-
ब्राह्मणस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः।
उरु तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्याम् शूद्रोऽजायत्।।
[-पुरुष सूक्त]
[2] भगवान ने ये चारोँ वर्ण गुणविभाग और कर्मविभाग से बनाये ।
गुणविभाग से रचना-
A.सत्त्वप्रधान वाला वर्ण ।
B.रजःप्रधान, सत्त्व गौण वाला वर्ण ।
C.रजःप्रधान, तम गौण वाला वर्ण ।
D.तमःप्रधान वाला वर्ण।
........सत्त्व , रज , तम इन तीन प्राकृतिक गुणो से जीव के शरीर बनते हैँ । अतः भगवान अपनी माया शक्ति द्वारा इन गुणोँ के विभाग से ही जीवोँ के शरीर बनाते हैँ।
जैसा कि स्वयं गीता 14/5 मेँ ही भगवान ने कहा है-
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृति सम्भवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।
- गीता 14/5
अर्थात्
हे अर्जुन ! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण- ये प्रकृति से उत्पन्न तीनोँ गुण अविनाशी "जीवात्मा" को "शरीर" मेँ बाँधते हैँ।
कर्मविभाग-
गीता मेँ "कर्म" का मतलब है - शास्त्रीय विधियोँ आदि का पालन करना !
जैसा कि गीता3/15 मेँ स्वयं भगवान ने कहा है-
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि॰-गीता3/15
अर्थात्
"कर्म" को तुम "वेद" से उत्पन्न जानो ।
अतः शास्त्रीय विधि -निषेधादि [कर्म] का जीव जिस भाव से पालन करता है, उसे श्री भगवान द्वारा
अगले जन्म के रुप मेँ वैसा ही फल मिलता है । जैसा कि श्री भगवान स्वयं गीता मेँ ही कहा गयाहै-
A. ज्ञानयुक्त[सात्विक] शास्त्रीय विधि -निषेधादि [कर्म] का पालन करने वाला B.ज्ञानयुक्त निर्मल फल प्राप्त करता है तथा C..स्वर्गादि उपरी लोकोँ मेँ अथवा उत्कृष्ट लोगोँ के बीच मेँ जन्म लेता है ।
A.सत्त्वात्संजायते ज्ञानं॰ -गीता14/17
B.कर्मणः सुकृतस्याऽऽहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । -गीता 14/16
C.उर्ध्वँ गच्छन्ति सत्त्वस्था ॰ -गीता 14/18 //यदा सत्त्वे प्रवृद्धे...तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते। -गीता 14/14
इसी प्रकार ,राजसिक कर्म करने से A. मध्य लोकोँ की प्राप्ति होती है और B.दुःख मिलता है और C.कर्मफल के अधिकारी मनुष्योँ मेँ जन्म लेताहै ।
A.मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः॰ -गीता 14/18
B.रजसस्तु फलं दुःखं॰ -गीता14/16
C.रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । -गीता 14/15
तथैव शास्त्रीय आदेशोँ से उपेक्षाभाव बरतनेवाला A.अधम लोकोँ को जाता है और B. वह अज्ञान मेँ भटकता है और C. हीन योनि मेँ पैदा होता है।
A.अधो गच्छन्ति तामसाः॰ -गीता14/18
B.अज्ञानं तमसः फलम्॰ -गीता 14/16
C.तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते । -गीता 14/15
ये हुआ कर्मविभाग , जिनसे चार वर्ण रचित हुए !...............(क्रमशः)
[3]. चारो वर्ण रच कर भी भगवान सदैव अकर्त्ता ही रहते हैँ । क्योँकि चारोँ वर्णोँ का निर्माण तो वस्तुतः भगवान की दिव्य गुणमयी मायाशक्ति [दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया ॰-गीता7/14] के द्वारा भगवान की अध्यक्षता मेँ ही किये जाते हैँ , -
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
-गीता9/10
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
-गीता3/27
अतः इस प्रकार भगवान कर्त्ता होकर भी वस्तुतः अकर्त्ता ही रहते हैँ ।
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जैसा कि,-
मानुष एव लोके वर्णाश्रमादिकर्माधिकारः । नान्येषु लोकेष्विति नियमः किंनिमित्तः ? इति । अथवा
वर्णाश्रमादिप्रविभागोपेता मनुष्या मम वर्त्मानुवर्तन्ते सर्वश [गीता ४.११] इत्युक्तं कस्मात्पुनः
कारणान्नियमेन तवैव वर्त्मानुवर्तन्ते, नान्यस्य किम् ? उच्यते
चातुर्वर्ण्यं चत्वार एव वर्णाश्चातुर्वर्ण्यं मयेश्वरेण सृष्टमुत्पादितं ब्राह्मणोऽस्य
मुखमासीत्[ऋक्८.४.१९.२, य़जुः ३२.११] इत्यादि श्रुतेः । गुणकर्मविभागशो गुणविभागशः
कर्मविभागशश्च । गुणाः सत्त्वरजस्तमांसि । तत्र सात्त्विकस्य सत्त्वप्रधानस्य ब्राह्मणस्य शमो
दमस्तपः [गीता १८.४२] इत्यादीनि कर्माणि । सत्त्वोपसर्जनरजःप्रधानस्य क्षत्रियस्य
शौर्यतेजःप्रभृतीनि कर्माणि । तमौपसर्जनरजःप्रधानस्य वैश्यस्य कृष्यादीनि कर्माणि ।
रजौपसर्जनतमःप्रधानस्य शूद्रस्य शुश्रूषैव कर्म । इत्येवं गुणकर्मविभागशश्चातुर्गुण्यं मया
सृष्टमित्यर्थः। तच्चेदं चातुर्वर्ण्यं नान्येषु लोकेषु । अतो मानुषे लोके इति विशेषणम् । हन्त तर्हि
चातुर्वर्ण्यसर्गादेः कर्मणः कर्तृत्वात्तत्फलेन युज्यसेऽतो न त्वं नित्यमुक्तो नित्येश्वरश्चेति । उच्यते
यद्यपि मायासंव्यवहारेण तस्य कर्मणः कर्तारमपि सन्तं मां परमार्थतो विद्ध्यकर्तारं,
अतएवाव्ययमसंसारिणं च मां विद्धि ॥
-श्रीश्रीमददाद्यशंकराचार्यः॥
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अतः श्रीभगवान द्वारा विनिर्मित जन्मना वर्णव्यवस्था [जातिव्यवस्था] ही हमारा सनातन (वैदिक) हिन्दू धर्म है ॥
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|| जय श्री राम ।|
-शंकर सन्देशजी ( की बहुत पुरानी पोस्ट)
*आधुनिक हिंदू मे वामपंथीयो द्धारा फैलाया गया झुठ का खंडन*
कुछ आधुनिक हिंदुओंका यह कहना है कि *“वर्णव्यवस्था”तो हम मानते है; क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् ने भी कहा है कि चातुर्वर्ण्य की सृष्टि मैने की है.पर चातुर्वर्ण्य से भगवान् का अभिप्राय ‘जन्मनाजाति’ माननेवाली वर्तमान व्यवस्था नहीं,किंतु वह व्यवस्था है जिसमें मनुष्य के गुण-कर्माननसार उसका वर्ण निश्चित होता है.भगवान् ने स्पष्ट ही ‘गुणकर्मविभागशः’ कहा है.”*
अतः इन लोगों का यह मत है कि “जन्मना-जाति माननेवाली वर्तमान पद्धति को उठा देना चाहिये और कोई नयी व्यवस्था तो क्या, वही प्राचीन व्यवस्था जिसका निर्देश भगवान् ने किया है अर्थात् मनुष्य के गुण और कर्म देखकर तदनुसार उसका वर्ण निश्चित करनेवाली व्यवस्था फिर से स्थापित की जानी चाहिये.तभी हमारे समाज के अंदर सच्चे और अच्छे लोग ब्राह्मण कहलायेंगे और ऐसी वर्णव्यवस्था से समाज का कल्याण होगा.
*वर्तमान व्यवस्था में केवल ब्राह्मणकुल में जन्म हो जाने से ही ऐसे ऐसे लोग ब्राह्मण कहलाते है,जिनमें जरा भी कोई योग्यता नहीं है.इससे बहुत हानि हुई है. हमलोगों का राजनीतिक दासत्व इसीका परिणाम है और इसी से वे सब बुराइयाँ उत्पन्न हुई है,जनसे आज हिंदू-समाज त्रस्त है.*
किंचित् विचार करने से यह समझ में आ जायगा कि भगवान् श्रीकृष्ण या श्रीमद्भगवद्गीताका यह अभिप्राय नहीं हैं कि किसी मनुष्य के गुण और कर्म देखकर उसका वर्ण निश्चित किया जाय; बल्कि उन्हें यही बतलाना है की
#किसीकी भी जाति उसके जन्म से ही जाननी चाहिये. जन्मना जाति की व्यवस्था पर जो अन्य आक्षेप किये जाते है,वे भी किस प्रकार निराधार है.यदि किसी मनुष्य की जाति उसकी #वृत्ति या कर्मपर निर्भर होती तो *द्रोणाचार्य क्षत्रिय कहलाते*,क्योंकि उनका व्यवसाय युद्ध करना था.पर *जन्म के कारण ही वे ब्राह्मण थे*.इसी प्रकार उनके #श्यालक *कृपाचार्य योद्धा होने पर भी ब्राह्मण थे* क्योंकि ब्राह्मण कुल में उनका जन्म हुआ था. #अश्वत्थामा में ब्राह्मण के न कोई गुण थे न कर्म ही.कर्म करते थे वे एक क्षत्रिय का.गुण में तो वे इतने क्रुर थे कि रात को पाण्डवों के शिविर में घुसकर सोये हुए द्रौपदी के बच्चों को उन्हों ने मार डाला.उत्तरा के गर्भस्थ अर्भकपर भी उन्हों ने अति भयंकर बाण चलाया.फिर भी जब वे पकड़े गये,तब यही निश्चय किया गया कि अश्वत्थामा का वध नहीं किया जा सकता;क्योंकि अश्वत्थामा ब्राह्मण है.उनका सिर मूँडा गया और वे निष्कासित किये गये.
*जित्वा_मुक्तो_द्रोणपुत्रो_ब्राह्मण्याद्_गौरवेन_च ||* महाभारत सौप्तिकपर्व १६/३२||
#युधिष्ठिर का स्वभाव ऐसा था कि चाहे कोई कितना ही अपराध करे,युधिष्ठिर उसे क्षमा करने को तैयार; और #भीम को देखिये तो जरा-सी बातपर लड़नेको तैयार! यदि गुणों को जाति का निर्णायक माना जाता तो दोनों की जाति अलग-अलग हो जाती.पर दोनों ही थे क्षत्रिय,क्योंकि जन्मसे ही वे क्षत्रिय थे.
गुण-कर्म के अनुसार किसी मनुष्य का वर्ण निश्चित करने में और एक बहुत बड़ी बाधा है.प्रायः ऐसा देखने में आता है कि किसी मनुष्य के गुण तो उसे एक वर्ण का बतलाते है,पर उस का कर्म किसी दूसरे ही वर्ण का होता है.ऐसी अवस्था में उसका वर्ण कैसे निश्चित किया जायगा?फिर किसी मनुष्य के असली गुणों की पहचान करने का काम भी तो बहुत कठिन है.
बाह्यरूप से ठीक पता नहीं चलता-- प्रायः धोखा हो जाता है.हो सकता है बाहर से देखने में कोई मनुष्य बहुत उग्र या रूखा हो,पर हृदय उसका अत्यन्त कोमल हो.यह भी असम्भव नहीं है कि किसी की वाणी बहुत मधुर हो,पर हृदय उतना ही कठोर.
किस मनुष्य में कौनसे गुण है,इस विषय में लोगों में मतभेद भी हो सकता है.मित्रलोग कहेंगे,अमुक मनुष्य सज्जन है; शत्रु कहेंगे,महादुर्जन है.
यह मान भी लिया जाय कि हर किसी के गुणों का पता लगाने से लग सकता है; पर इस बातका क्या भरोसा जो उसके गुण वैसे ही बने रहेंगे और बदलेंगे नहीं? *वाल्मिकी अपने प्रारम्भिक जीवन में दस्यु थे,पर पीछे महर्षि हो गये.असाधु पुरुष साधु हो सकतें है.इन सब बातों से यह अच्छी तरह स्पष्ट हो जाता है कि गुण-कर्मानुसार जाति निश्चित करने की व्यवस्था अव्यवहार्य है.*
कुरुक्षेत्र का महायुद्ध आरम्भ होने से पहले अर्जुन ने कहा था ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा, भिक्षा माँगकर जीऊँगा.’ गुण और कर्म से ही जाति निश्चित करनी होती तो उसकी इस बात का खण्डन करने की कोई आवश्यकता नहीं थी.अर्जुन में ब्राह्मणोचित वे सब गुण थे, जिन का गीता में उल्लेख हुआ है---
#शमो_दमस्तपः_शौचं_क्षान्तिरार्जवमेव_च ||
#ज्ञानं_विज्ञानमास्तिक्यं_ब्रह्मकर्म_स्वभावजम् ||गीता १७/४२|| शम,दम,तप,शुचिता,क्षमा, आर्जव,ज्ञान, विज्ञान, आस्तिकता--- ये सब ब्राह्मणों के स्वभावज गुण है.’
भिक्षावृत्ति ब्राह्मण की है; यदि अर्जुन उसे ग्रहण करता है तो गुण-कर्म के अनुसार ही जब वर्ण निश्चित करना है, तब उसे अबसे ब्राह्मण कहना चाहिये.क्षात्रधर्म छोड़कर यदि इस तरह वह ब्राह्मण धर्म ग्रहण करता है तो इससे उसे कोई पाप न लगना चाहिये.पर श्री कृष्ण तो उसे उलटा यह समझा रहे है कि ‘यदि तुम युद्ध न करोंगे तो तुम्हें पाप लगेगा.’
#अथ_चेत्त्वमिमं_धर्म्यं_संग्रामं_न_करिष्यसि ||
#ततः_स्वधर्मँ_कीर्तिं_च_हित्वा_पापमवाप्स्यसि ||गीता २/३३||
यदि तुम यह धर्मयुक्त संग्राम न करोंगे तो स्वधर्म(क्षत्रियधर्म) और कीर्तिसे हाथ धोकर पाप के भागी बनोगे.
यह कहना तो तभी युक्तियुक्त हो सकता है,जब #जन्मना-जाति मानने की ही व्यवस्था हो.
अर्जुन जन्म से क्षत्रिय है.क्षत्रिय का स्वधर्म है युद्ध करना.
यदि अर्जुन युद्ध नहीं करता है तो वह अपने धर्म की अवहेलना करता है और पापका भागी होता है.
*यदि जन्मजात वर्ण से धर्म निश्चित होता है तो कोई मनुष्य चाहे जो कर्म नहीं कर सकता.पर यदि कर्म से वर्ण निश्चित हो तो वह अपना कर्म अपनी इच्छा से चाहे जो निश्चित कर सकता है.*
फिर अर्जुन का युद्ध न करने का निर्णय बिलकुल भी गलत नही था।
गीता के १८वें अध्याय में भगवान् ने चारों वर्णों के कर्म बतलायें है और फिर कहा है कि यदि कोई मनुष्य अपने वर्ण का धर्म पालन करता है तो उसीसे वह परम उत्कर्ष को प्राप्त होता है.
#स्वे_स्वे_कर्मण्यभिरतः_संसिद्धिं_लभते_नरः||१८/४५||
अपने-अपने कर्म में अभिरत होने से मनुष्य संसिद्धि लाभ करता है.यह वचन #जन्मना-जाति की ही व्यवस्था देता है.यदि किसी का कर्म देखकर उसकी जाति निश्चित करनी हो तो कर्म के पीछे-पीछे जाति चलेगी और सबके कर्म स्वजाति के ही कर्म होने से सभी,गीता के उक्त वचन के अनुसार,मोक्ष के अधिकारी होंगे.परंतु यह तो एक ऐसी बात है,जिसका कुछ अर्थ नहीं.
गीता में श्रीकृष्ण बतलातें है कि कर्तव्याकर्तव्य के विषय में शास्त्र ही प्रमाण है--
#तस्माच्छास्त्रं_प्रमाणं_ते_कार्याकार्यव्यवस्थितौ ||१६/२४||
शास्त्रों में सब से पहले है वेद.ये ही सब शास्त्रों के आधार है.
#ऋग्वेद संहिता के १०/९०(पुरुषसूक्त)में तथा तैतरीय-संहिता के ७/१/१ में बतलाया है कि चार वर्ण प्रजापति ब्रह्माके चार अङ्गो से उत्पन्न हुए.
#छान्दोग्योपनिषद् के ५/१०/७ में यह वर्णन है कि जो लोग पुण्य कर्म करतें है,वे दूसरे जन्म में ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय अथवा वैश्य कुल में जन्म लेतें है और जो पापकर्म करतें है,वे चाण्डालादि योनियोंको प्राप्त होतें है.---
#रमणीयचरणा_रमणीयां_योनिमापद्येरन्_ब्राह्मणयोनिं_
#वा_क्षत्रिययोनिं_वा_वैश्ययोनिं_वा | #कपूयचरणाः_कपूयां_योनिमापद्येरन्_श्वयोनिं_वा_सूकरयोनिं_वा
#चण्डालयोनिं_वा ||
उपनीषद् वेदोंके ही भाग है.अतः वेदों के समान ही उनका प्रामाण्य है. #मनुस्मृति सुविख्यात धर्मशास्त्र है.महाभारत-काल से बहुत पहले इसकी रचना हुई थी.अतः गीता में जहाँ शास्त्र की बात आयी है-तस्माच्छास्त्रं...इत्यादि (१६/२४),वहाँ #वेदोपनिषदों के साथ मनुस्मृति भी अभिप्रेत होगी.
#मनुस्मृति_की_श्रेष्ठता-
इदं शास्त्रं तु कृत्वासौ मामेव स्वयमादितः।
विधिवद्ग्राहयामास मरीच्यादींस्त्वहं मुनीन्।।
एतद्वो$यं भृगुः शास्त्रं श्रावयिष्यत्यशेषतः।
एतद्धि मत्तो$धिजगे सर्वमेषो$खिलं मुनिः।।
ततस्तथा स तेनोक्तो महर्षिर्मनुना भृगुः।
तानब्रवीदृषीन्सर्वान्प्रीतात्मा श्रूयतामिति।।मनुः१/५८-६०।।
प्रजापतिने सृष्टिके पहले इस धर्मशास्त्रको बनाकर मुझे(मनुको)उपदेश दिया.फिर मैने(स्वायंभुव मनुने)मरीचि आदि मुनियोंको बताया.यह समग्र "धर्मशास्त्र" हे द्विजकुलनंदन भृगुजी आप लोगोको सुनायेंगे,जो मुजसे संपूर्ण पढा़ है.उसके बाद ब्रह्माजीके पुत्र स्वायंभुवमनु की आज्ञा पाकर महर्षि भृगुने ऋषियो को कहा.
"स्मर्यते इति स्मृतिः।। जो वेदार्थानुकुल स्मरण की जाय वह स्मृति है..कुल ६० स्मृतियाँ है.
स्मरण के न्यूनाधिक भावसे ही स्मृतियोंके प्रामाण्य में न्यूनाधिक भाव माना गया हैं.
इसलिए देवाचार्य-बृहस्पतिने कहा हैं कि -"वेदार्थोपनिबन्धत्वात्प्राधान्यं हि मनोः स्मृतम्।
मन्वर्थविपरिता तु या स्मृतिः सा न दृश्यते।।
वेदार्थके संकलन करनेसे मनुका प्राधान्य है और मनुस्मृति से विरुद्ध जो कोई स्मृति है वह प्रशंसनीय नहीं है.
पराशरने भी कहा हैं कि समस्तशास्त्रोंके जानकार मनुजी हैं-"मनुना चैवमेकेन सर्वशास्त्राणि जानता।।पाराशरस्मृ९/५१।।
ऋग्वेदमें- ऋग्वेदके प्रथम मण्डल के ८० वे सूक्तमें-"यामथर्वा मनुष्पिता दध्यङ् धियमत्नतः| तस्मिन् ब्रह्माणि पूर्वथेन्द्र उक्था समग्मतार्चन्ननु स्वराज्यम्||ऋग्वेद१/८०/१५|| यह प्रार्थना हैं कि हम मनुके मार्गसे कहीं गिर न जाएँ ।।
ब्राह्मणग्रन्थोमें-" यद् वै किंच मनुरवदत् तद् भेषजम्|| तै०सं०२/२/१०२|| मनुर्वै यत् किंचावदत् तत् भैषाज्यायै||ता०ब्रा०२३/१६/१७|| तैतरीय संहिता एवं तांड्य महाब्राह्मण के अनुसार मनुने जो कुछ कहा हैं,यह सब औषध हैं|"मानव्यो हि प्रजाः" मनुसे पैदा होनेके कारण हम मानव कहलातें हैं|
मनु कहतें है, एक ही जाति के माता-पिता से उत्पन्न सन्तान भी उसी जाति की होगी--
#सर्ववर्णेषु_तुल्यासु_पत्नीष्वक्षतयोनिषु ||
#आनुलोम्येन_सम्भूता_जात्या_ज्ञेयास्त_एव_हि ||१०/१५||
‘सब वर्णों की अक्षत-योनि तुल्य पत्नियों में गर्भाधान करने से जो सन्तान हो,उन्हें अनुलोमक्रमसे उन्हीं वर्णों की जानना चाहिये.अर्थात् ब्राह्मण पति-पत्नि से उत्पन्न सन्तान ब्राह्मण,क्षत्रिय पति-पत्नि से उत्पन्न सन्तान क्षत्रिय,वैश्य पति-पत्नि से उत्पन्न सन्तान वैश्य,शूद्र पति-पत्नि से उत्पन्न सन्तान शूद्र इस प्रकार जानना चाहिये.’
हारित संहिता में---
#ब्राह्मण्यां_ब्राह्मणेनैवमुत्पन्नो_ब्राह्मणः_स्मृतः ||१/१५||
‘ब्राह्मणी में ब्राह्मण से उत्पन्न सन्तान ब्राह्मण ही कहा गया है.’
अत्रि संहिता में--
#जन्मना_ब्राह्मणो_ज्ञेयः_संस्काराद्_द्विज_उच्यते||१/४०||
‘जन्म से ब्राह्मण जाना जाता है,संस्कार होनेपर उसकी द्विज-संज्ञा होती है.’
श्री कृष्ण ही जब अध्याय १६श्लोक २४ में शास्त्र को ही प्रमाण मानने को कहतें है, तब यह हो नहीं सकता कि अध्याय ४श्लोक १३ में वे जाति-निर्णय की कोई ऐसी व्यवस्था देते हों जो वेद,उपनिषद्, मनुस्मृति,अत्रिसंहिता,हारितसंहिता आदि शास्त्रग्रन्थो के वचनों के विरुद्ध हो.
अब प्रश्न होता है कि यदि श्रीकृष्ण का अभिप्राय यही है कि #जन्मसे ही वर्ण निश्चित है तो उन्हों ने अध्याय ४ श्लोक १३ में “गुणकर्मविभागशः" क्यों कहा है.यहाँ कर्म का अभिप्राय वृत्ति से नहीं है.कर्म का यहाँ अर्थ है कर्तव्य.कर्म-विभाग का अर्थ विभिन्न वर्णों के वे कर्तव्य है, जिन का उल्लेख गीता अध्याय १८ श्लोक ४२- ४४ “शमो_दमस्तपः ...इत्यादि से ...शूद्रस्यापि_स्वभावजम् || में हुआ है.
गुण का अभिप्राय है त्रिगुण अर्थात् सत्त्व,रज,तम--- इन तीन गुणों से. गुण विभाग का अर्थ है,जन्म के साथ ही लगे हुए इन गुणों के अनुसार मनुष्योंका वर्गीकरण .
#गीता अध्याय १८ श्लोक ४१ में भगवान् स्वयं यह गुण-कर्म विभाग क्या है,स्पष्ट करके बतलातें है---
#कर्माणि_प्रविभक्तानि_स्वभावप्रभवैर्गुणैः ||१८/४१|| ‘स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार कर्मों का विभाग हुआ है.’ “स्वभाव-प्रभव” शब्दों से ही यह प्रकट है कि #जन्मजात गुणों के द्वारा ही वर्ण निश्चित होता है.छान्दोग्योपनिषद् का जो वचन"(५/१०/७) के साथ भी इसकी ठीक संगति बैठती है.जो लोग पुण्यकर्म करतें है,उनमें मृत्यु के पश्चात् सत्त्वगुण का प्रभूत संचय होता है. अतः वे ब्राह्मण होकर जन्म लेतें है.गीता अध्याय १८ श्लोक ४८ में जो *‘सहजं_कर्म’* शब्द आयें है,उनसे भी जन्मना-जाति सूचित होती है.जन्मसे जाति और जातिसे धर्म निश्चित होता है.अर्थात् जन्म के साथ ही धर्म लगा हुआ है.यही ‘सहजं_कर्म’ है.
यह प्रश्न किया जा सकता है कि यदि जन्म से वर्ण निश्चित होता है तो विश्वामित्र ब्राह्मण कैसे हुए? इसका उत्तर यह है कि तप का अलौकिक प्रभाव होता है,उससे शरीर के परमाणुतक बदल सकते है और वर्ण का सम्बन्ध है जन्मजात शरीर से ही.यह प्रसिद्ध है कि विश्वामित्र ने महान् तप किया था.उनके तपःप्रभाव से उनका वर्ण बदला या नहीं,यह निश्चय करना भी वशिष्ठ जैसे महर्षिका ही काम था. तपःप्रभाव से वर्ण बदल जाने के और भी कुछ उदाहरण है.
अब महाभारत के कुछ ऐसे वचनोंपर हम विचार करै--- जो गुण देखकर वर्ण निश्चय करने की बात का समर्थन करते--- से मालूम होतें है. वनपर्व के १७९ वें अध्याय में सर्प ने प्रश्न किया है-- ब्राह्मण कौन है? युधिष्ठिर उत्तर देतें है-- ‘ब्राह्मण वह है,जिसमें सत्य,दानशीलता, क्षमा,सदाचार, मृदुता, और तप -- ये गुण हो.’ युधिष्ठिर आगे यह भी कहतें है कि ‘ ये गुण यदि किसी शूद्र में हों तो उसे ब्राह्मण कहना चाहिये और यदि ये गुण किसी ब्राह्मण में न हो तो वह ब्राह्मण नहीं है.’ ‘ब्राह्मण’ शब्द का प्रयोग स्पष्ट ही यहाँ दो विभिन्न अर्थों में हुआ है.यदि ऐसा न मानें तो यह कहना कि “जिस ब्राह्मण में ये गुण नहीं है,वह ‘ब्राह्मण’ नहीं है” ‘वदतो व्याघात’ होगा.उक्त वचन में ‘ब्राह्मण’ शब्द का प्रथम प्रयोग जन्मना ब्राह्मण के अर्थ में है.‘ब्राह्मण’ शब्द का दूसरा प्रयोग इस अर्थ में है कि जो गुण ब्राह्मण में होने चाहिये,वे उसमें नहीं है.यह वचन सत्य, क्षमा आदि गुणों की प्रशंसा कर ब्राह्मण को मिथ्या जात्यभिमान से बचाने के लिये आया है.इस वचन का अभिप्राय गुणोंको देखकर वर्ण कलित करना नहीं है.इसके विरुद्ध कई कारण है--(१) ‘वदतो_व्याघात’ होगा,जैसा कि--- (२)वेद,उपनिषद्, मनुसंहिता,अत्रिसंहिता,हारीतसंहिता आदि शास्त्र-ग्रन्थों के जो वचन पहले उद्धृत कर आयें है,जिन में #जन्मना-जाति की ही व्यवस्था है, उनके साथ इसका विरोध होगा.किसी वचन का ठीक अर्थ लगाते हुए हमें यह ध्यान में रखना चाहिये कि अन्य वचनों के साथ उसका कोई विरोध न हो.उपर्युक्त श्रृत्यादि के वचनों का इसके सिवा और कोई अर्थ नहीं है कि वर्ण या जाति जन्मपर ही निर्भर है.
#वनपर्व के उपर्युक्त वचन का सुसंगत अर्थ यही होता है कि सत्य, दान आदि गुण वरेण्य है.(३) किसी मनुष्य के असली गुणों को जान लेना बहुत ही कठीन है.(४) बहुत-से लोगों में सत्य,दानआदि गुण अत्यधिक परिमाण में होतें ही है.यह तो इस वचन में नहीं बतलाया गया है कि किस दर्जेतक कौन सा गुण हौने से कोई मनुष्य ब्राह्मण वर्ण का हो सकता है.(५) इस वचन में फिर दो ही वर्गों के नाम आये है-- ब्राह्मण और शूद्र.क्षत्रिय और वैश्य का कोई नाम नहीं है.फिर जिन में ये गुण है,वे यदि ब्राह्मण है और जिनमें ये गुण नहीं,वे ब्राह्मण नहीं,वे शूद्र,तो अखिल मानव-जाति के ब्राह्मण और शूद्र --- ये ही दौ वर्ण-विभाग हुए,चातुर्वर्ण्य नहीं रहा.अतः इन सब बातों से यही स्पष्ट होता है कि उक्त वचनका हेतु वर्ण-विभाग का सिद्धान्त बतलाना नहीं,बल्कि सत्य,सदाचारादि गुणों की श्रेष्ठता बतलाना ही है.वर्ण-विभाग का सिद्धान्त अन्य शास्त्र वचनों में निर्दिष्ट हो ही चुका है.ये शास्त्रवचन #जन्मना-जाति का ही निर्देश करतें है.अतः जो वचन ऐसे है,जिनसे गुणों और कर्मों के अनुसार जाति होने की बात सूचित होती है,उनका वास्तविक अभिप्राय कुछ और ही है.
#गुण या कर्म के अनुसार सब मनुष्यों की जाति निर्धारित करना व्यवहारतः संभव भी नहीं है.यह जो कहा जाता है कि जन्म नाम की आकस्मिक घटनापर किसी की जाति या वर्ण निश्चित करना ठीक नहीं,यह कहना भी युक्तियुक्त नहीं है. कारण,जन्म कोई आकस्मिक घटना नहीं,बल्कि हमारे पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है.कुछ लोग स्वस्थ और हट्टे-कट्टे पैदा होतें है और कुछ अंधे और रुग्ण,इसका यही तो कारण है.
यह कहना भी निराधार है कि हिंदुओं का चातुर्वर्ण्य ही हिंदू-समाज में पैदा हुई सब बुराईयों का कारण है.गीता में श्री भगवान् कहतें है--‘चातुर्वर्ण्य मैने उत्पन्न किया है’(४/१३)|| जो व्यवस्था भगवान् ने बना दी,वह किसी समाज के लिये कभी हानिकर नहीं हो सकती.हमारे राजनीतिक दासत्वमें हमारे ईर्ष्या-द्वेष,लड़ाई-झगड़े,भोग-विलास आदि अन्य कारण हो सकतें है.यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिये कि कोई भी राष्ट्र सदाके लिये अपनी स्वाधीनता बनाये नहीं रह सका है.ब्रिटेनपर रोमन और सैवसन दखल जमायें बैठे थे.सैवसनों को नार्मन लोगों ने जीता था.ग्रीस,रोम, कार्थेज-- पुरानी दुनिया के सभी देशों को कभी -न- कभी पराजित और पराधीन होकर रहना पड़ा था.फ्रांस,बेलजियम,जर्मनी और जापान का पराधीन होना अभी हालकी ही बात है.हिंदू सहस्रों वर्ष स्वाधीन रहने के बाद कुछ काल मुसल्मानों और ईसाइओं के अधीन भी होकर रहे.
अब फिर वे स्वाधीन है.
*प्राचीनों में एक हिंदू ही है,जो अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा किये हुए है,अब कि अन्य प्राचीन-सभ्यताएँ सब नष्ट हो गयीं.*
यह ईश्वर कृत वर्ण-व्यवस्था का ही सुपरिणाम है.इसी से हिंदूओं के धर्म,शौर्य, और श्रमशक्ति की रक्षा हुई है.यदि हम इस वर्ण-व्यवस्था को उठा देंगे तो महान् अनर्थ होगा---- वर्णसंकर होगा.भगवान् कहतें है--- "संकर से प्रजाओंका सब प्रकार से नाश होता है.(गीता ३/२४)||"
|| जय श्री राम || शेष पुनः
*साभार पुलकित शास्त्री जी*
*वैदिक ब्राह्मण ग्रुप गुजरात*
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-
चातुर्वण्यम् मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्त्तारमपि मां विद्ध्यकर्त्तारमव्ययम् ।।
अर्थात्-
चारोँ वर्णोँ का समूह , गुणविभाग और कर्मविभाग पूर्वक मेरे द्वारा विरचित है। इसका कर्त्ता होने पर
भी मुझ अविनाशी को तू अकर्त्ता ही जान ।
-गीता 4/13...................... (क्रमशः )
निष्कर्ष-
[1] चारोँ वर्ण स्वयं श्री भगवान द्वारा सृष्ट हैँ । [समाज द्वारा नहीँ।]
यथा-
ब्राह्मणस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः।
उरु तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्याम् शूद्रोऽजायत्।।
[-पुरुष सूक्त]
[2] भगवान ने ये चारोँ वर्ण गुणविभाग और कर्मविभाग से बनाये ।
गुणविभाग से रचना-
A.सत्त्वप्रधान वाला वर्ण ।
B.रजःप्रधान, सत्त्व गौण वाला वर्ण ।
C.रजःप्रधान, तम गौण वाला वर्ण ।
D.तमःप्रधान वाला वर्ण।
........सत्त्व , रज , तम इन तीन प्राकृतिक गुणो से जीव के शरीर बनते हैँ । अतः भगवान अपनी माया शक्ति द्वारा इन गुणोँ के विभाग से ही जीवोँ के शरीर बनाते हैँ।
जैसा कि स्वयं गीता 14/5 मेँ ही भगवान ने कहा है-
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृति सम्भवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।
- गीता 14/5
अर्थात्
हे अर्जुन ! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण- ये प्रकृति से उत्पन्न तीनोँ गुण अविनाशी "जीवात्मा" को "शरीर" मेँ बाँधते हैँ।
कर्मविभाग-
गीता मेँ "कर्म" का मतलब है - शास्त्रीय विधियोँ आदि का पालन करना !
जैसा कि गीता3/15 मेँ स्वयं भगवान ने कहा है-
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि॰-गीता3/15
अर्थात्
"कर्म" को तुम "वेद" से उत्पन्न जानो ।
अतः शास्त्रीय विधि -निषेधादि [कर्म] का जीव जिस भाव से पालन करता है, उसे श्री भगवान द्वारा
अगले जन्म के रुप मेँ वैसा ही फल मिलता है । जैसा कि श्री भगवान स्वयं गीता मेँ ही कहा गयाहै-
A. ज्ञानयुक्त[सात्विक] शास्त्रीय विधि -निषेधादि [कर्म] का पालन करने वाला B.ज्ञानयुक्त निर्मल फल प्राप्त करता है तथा C..स्वर्गादि उपरी लोकोँ मेँ अथवा उत्कृष्ट लोगोँ के बीच मेँ जन्म लेता है ।
A.सत्त्वात्संजायते ज्ञानं॰ -गीता14/17
B.कर्मणः सुकृतस्याऽऽहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । -गीता 14/16
C.उर्ध्वँ गच्छन्ति सत्त्वस्था ॰ -गीता 14/18 //यदा सत्त्वे प्रवृद्धे...तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते। -गीता 14/14
इसी प्रकार ,राजसिक कर्म करने से A. मध्य लोकोँ की प्राप्ति होती है और B.दुःख मिलता है और C.कर्मफल के अधिकारी मनुष्योँ मेँ जन्म लेताहै ।
A.मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः॰ -गीता 14/18
B.रजसस्तु फलं दुःखं॰ -गीता14/16
C.रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । -गीता 14/15
तथैव शास्त्रीय आदेशोँ से उपेक्षाभाव बरतनेवाला A.अधम लोकोँ को जाता है और B. वह अज्ञान मेँ भटकता है और C. हीन योनि मेँ पैदा होता है।
A.अधो गच्छन्ति तामसाः॰ -गीता14/18
B.अज्ञानं तमसः फलम्॰ -गीता 14/16
C.तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते । -गीता 14/15
ये हुआ कर्मविभाग , जिनसे चार वर्ण रचित हुए !...............(क्रमशः)
[3]. चारो वर्ण रच कर भी भगवान सदैव अकर्त्ता ही रहते हैँ । क्योँकि चारोँ वर्णोँ का निर्माण तो वस्तुतः भगवान की दिव्य गुणमयी मायाशक्ति [दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया ॰-गीता7/14] के द्वारा भगवान की अध्यक्षता मेँ ही किये जाते हैँ , -
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
-गीता9/10
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
-गीता3/27
अतः इस प्रकार भगवान कर्त्ता होकर भी वस्तुतः अकर्त्ता ही रहते हैँ ।
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जैसा कि,-
मानुष एव लोके वर्णाश्रमादिकर्माधिकारः । नान्येषु लोकेष्विति नियमः किंनिमित्तः ? इति । अथवा
वर्णाश्रमादिप्रविभागोपेता मनुष्या मम वर्त्मानुवर्तन्ते सर्वश [गीता ४.११] इत्युक्तं कस्मात्पुनः
कारणान्नियमेन तवैव वर्त्मानुवर्तन्ते, नान्यस्य किम् ? उच्यते
चातुर्वर्ण्यं चत्वार एव वर्णाश्चातुर्वर्ण्यं मयेश्वरेण सृष्टमुत्पादितं ब्राह्मणोऽस्य
मुखमासीत्[ऋक्८.४.१९.२, य़जुः ३२.११] इत्यादि श्रुतेः । गुणकर्मविभागशो गुणविभागशः
कर्मविभागशश्च । गुणाः सत्त्वरजस्तमांसि । तत्र सात्त्विकस्य सत्त्वप्रधानस्य ब्राह्मणस्य शमो
दमस्तपः [गीता १८.४२] इत्यादीनि कर्माणि । सत्त्वोपसर्जनरजःप्रधानस्य क्षत्रियस्य
शौर्यतेजःप्रभृतीनि कर्माणि । तमौपसर्जनरजःप्रधानस्य वैश्यस्य कृष्यादीनि कर्माणि ।
रजौपसर्जनतमःप्रधानस्य शूद्रस्य शुश्रूषैव कर्म । इत्येवं गुणकर्मविभागशश्चातुर्गुण्यं मया
सृष्टमित्यर्थः। तच्चेदं चातुर्वर्ण्यं नान्येषु लोकेषु । अतो मानुषे लोके इति विशेषणम् । हन्त तर्हि
चातुर्वर्ण्यसर्गादेः कर्मणः कर्तृत्वात्तत्फलेन युज्यसेऽतो न त्वं नित्यमुक्तो नित्येश्वरश्चेति । उच्यते
यद्यपि मायासंव्यवहारेण तस्य कर्मणः कर्तारमपि सन्तं मां परमार्थतो विद्ध्यकर्तारं,
अतएवाव्ययमसंसारिणं च मां विद्धि ॥
-श्रीश्रीमददाद्यशंकराचार्यः॥
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अतः श्रीभगवान द्वारा विनिर्मित जन्मना वर्णव्यवस्था [जातिव्यवस्था] ही हमारा सनातन (वैदिक) हिन्दू धर्म है ॥
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|| जय श्री राम ।|
-शंकर सन्देशजी ( की बहुत पुरानी पोस्ट)
*आधुनिक हिंदू मे वामपंथीयो द्धारा फैलाया गया झुठ का खंडन*
कुछ आधुनिक हिंदुओंका यह कहना है कि *“वर्णव्यवस्था”तो हम मानते है; क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् ने भी कहा है कि चातुर्वर्ण्य की सृष्टि मैने की है.पर चातुर्वर्ण्य से भगवान् का अभिप्राय ‘जन्मनाजाति’ माननेवाली वर्तमान व्यवस्था नहीं,किंतु वह व्यवस्था है जिसमें मनुष्य के गुण-कर्माननसार उसका वर्ण निश्चित होता है.भगवान् ने स्पष्ट ही ‘गुणकर्मविभागशः’ कहा है.”*
अतः इन लोगों का यह मत है कि “जन्मना-जाति माननेवाली वर्तमान पद्धति को उठा देना चाहिये और कोई नयी व्यवस्था तो क्या, वही प्राचीन व्यवस्था जिसका निर्देश भगवान् ने किया है अर्थात् मनुष्य के गुण और कर्म देखकर तदनुसार उसका वर्ण निश्चित करनेवाली व्यवस्था फिर से स्थापित की जानी चाहिये.तभी हमारे समाज के अंदर सच्चे और अच्छे लोग ब्राह्मण कहलायेंगे और ऐसी वर्णव्यवस्था से समाज का कल्याण होगा.
*वर्तमान व्यवस्था में केवल ब्राह्मणकुल में जन्म हो जाने से ही ऐसे ऐसे लोग ब्राह्मण कहलाते है,जिनमें जरा भी कोई योग्यता नहीं है.इससे बहुत हानि हुई है. हमलोगों का राजनीतिक दासत्व इसीका परिणाम है और इसी से वे सब बुराइयाँ उत्पन्न हुई है,जनसे आज हिंदू-समाज त्रस्त है.*
किंचित् विचार करने से यह समझ में आ जायगा कि भगवान् श्रीकृष्ण या श्रीमद्भगवद्गीताका यह अभिप्राय नहीं हैं कि किसी मनुष्य के गुण और कर्म देखकर उसका वर्ण निश्चित किया जाय; बल्कि उन्हें यही बतलाना है की
#किसीकी भी जाति उसके जन्म से ही जाननी चाहिये. जन्मना जाति की व्यवस्था पर जो अन्य आक्षेप किये जाते है,वे भी किस प्रकार निराधार है.यदि किसी मनुष्य की जाति उसकी #वृत्ति या कर्मपर निर्भर होती तो *द्रोणाचार्य क्षत्रिय कहलाते*,क्योंकि उनका व्यवसाय युद्ध करना था.पर *जन्म के कारण ही वे ब्राह्मण थे*.इसी प्रकार उनके #श्यालक *कृपाचार्य योद्धा होने पर भी ब्राह्मण थे* क्योंकि ब्राह्मण कुल में उनका जन्म हुआ था. #अश्वत्थामा में ब्राह्मण के न कोई गुण थे न कर्म ही.कर्म करते थे वे एक क्षत्रिय का.गुण में तो वे इतने क्रुर थे कि रात को पाण्डवों के शिविर में घुसकर सोये हुए द्रौपदी के बच्चों को उन्हों ने मार डाला.उत्तरा के गर्भस्थ अर्भकपर भी उन्हों ने अति भयंकर बाण चलाया.फिर भी जब वे पकड़े गये,तब यही निश्चय किया गया कि अश्वत्थामा का वध नहीं किया जा सकता;क्योंकि अश्वत्थामा ब्राह्मण है.उनका सिर मूँडा गया और वे निष्कासित किये गये.
*जित्वा_मुक्तो_द्रोणपुत्रो_ब्राह्मण्याद्_गौरवेन_च ||* महाभारत सौप्तिकपर्व १६/३२||
#युधिष्ठिर का स्वभाव ऐसा था कि चाहे कोई कितना ही अपराध करे,युधिष्ठिर उसे क्षमा करने को तैयार; और #भीम को देखिये तो जरा-सी बातपर लड़नेको तैयार! यदि गुणों को जाति का निर्णायक माना जाता तो दोनों की जाति अलग-अलग हो जाती.पर दोनों ही थे क्षत्रिय,क्योंकि जन्मसे ही वे क्षत्रिय थे.
गुण-कर्म के अनुसार किसी मनुष्य का वर्ण निश्चित करने में और एक बहुत बड़ी बाधा है.प्रायः ऐसा देखने में आता है कि किसी मनुष्य के गुण तो उसे एक वर्ण का बतलाते है,पर उस का कर्म किसी दूसरे ही वर्ण का होता है.ऐसी अवस्था में उसका वर्ण कैसे निश्चित किया जायगा?फिर किसी मनुष्य के असली गुणों की पहचान करने का काम भी तो बहुत कठिन है.
बाह्यरूप से ठीक पता नहीं चलता-- प्रायः धोखा हो जाता है.हो सकता है बाहर से देखने में कोई मनुष्य बहुत उग्र या रूखा हो,पर हृदय उसका अत्यन्त कोमल हो.यह भी असम्भव नहीं है कि किसी की वाणी बहुत मधुर हो,पर हृदय उतना ही कठोर.
किस मनुष्य में कौनसे गुण है,इस विषय में लोगों में मतभेद भी हो सकता है.मित्रलोग कहेंगे,अमुक मनुष्य सज्जन है; शत्रु कहेंगे,महादुर्जन है.
यह मान भी लिया जाय कि हर किसी के गुणों का पता लगाने से लग सकता है; पर इस बातका क्या भरोसा जो उसके गुण वैसे ही बने रहेंगे और बदलेंगे नहीं? *वाल्मिकी अपने प्रारम्भिक जीवन में दस्यु थे,पर पीछे महर्षि हो गये.असाधु पुरुष साधु हो सकतें है.इन सब बातों से यह अच्छी तरह स्पष्ट हो जाता है कि गुण-कर्मानुसार जाति निश्चित करने की व्यवस्था अव्यवहार्य है.*
कुरुक्षेत्र का महायुद्ध आरम्भ होने से पहले अर्जुन ने कहा था ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा, भिक्षा माँगकर जीऊँगा.’ गुण और कर्म से ही जाति निश्चित करनी होती तो उसकी इस बात का खण्डन करने की कोई आवश्यकता नहीं थी.अर्जुन में ब्राह्मणोचित वे सब गुण थे, जिन का गीता में उल्लेख हुआ है---
#शमो_दमस्तपः_शौचं_क्षान्तिरार्जवमेव_च ||
#ज्ञानं_विज्ञानमास्तिक्यं_ब्रह्मकर्म_स्वभावजम् ||गीता १७/४२|| शम,दम,तप,शुचिता,क्षमा, आर्जव,ज्ञान, विज्ञान, आस्तिकता--- ये सब ब्राह्मणों के स्वभावज गुण है.’
भिक्षावृत्ति ब्राह्मण की है; यदि अर्जुन उसे ग्रहण करता है तो गुण-कर्म के अनुसार ही जब वर्ण निश्चित करना है, तब उसे अबसे ब्राह्मण कहना चाहिये.क्षात्रधर्म छोड़कर यदि इस तरह वह ब्राह्मण धर्म ग्रहण करता है तो इससे उसे कोई पाप न लगना चाहिये.पर श्री कृष्ण तो उसे उलटा यह समझा रहे है कि ‘यदि तुम युद्ध न करोंगे तो तुम्हें पाप लगेगा.’
#अथ_चेत्त्वमिमं_धर्म्यं_संग्रामं_न_करिष्यसि ||
#ततः_स्वधर्मँ_कीर्तिं_च_हित्वा_पापमवाप्स्यसि ||गीता २/३३||
यदि तुम यह धर्मयुक्त संग्राम न करोंगे तो स्वधर्म(क्षत्रियधर्म) और कीर्तिसे हाथ धोकर पाप के भागी बनोगे.
यह कहना तो तभी युक्तियुक्त हो सकता है,जब #जन्मना-जाति मानने की ही व्यवस्था हो.
अर्जुन जन्म से क्षत्रिय है.क्षत्रिय का स्वधर्म है युद्ध करना.
यदि अर्जुन युद्ध नहीं करता है तो वह अपने धर्म की अवहेलना करता है और पापका भागी होता है.
*यदि जन्मजात वर्ण से धर्म निश्चित होता है तो कोई मनुष्य चाहे जो कर्म नहीं कर सकता.पर यदि कर्म से वर्ण निश्चित हो तो वह अपना कर्म अपनी इच्छा से चाहे जो निश्चित कर सकता है.*
फिर अर्जुन का युद्ध न करने का निर्णय बिलकुल भी गलत नही था।
गीता के १८वें अध्याय में भगवान् ने चारों वर्णों के कर्म बतलायें है और फिर कहा है कि यदि कोई मनुष्य अपने वर्ण का धर्म पालन करता है तो उसीसे वह परम उत्कर्ष को प्राप्त होता है.
#स्वे_स्वे_कर्मण्यभिरतः_संसिद्धिं_लभते_नरः||१८/४५||
अपने-अपने कर्म में अभिरत होने से मनुष्य संसिद्धि लाभ करता है.यह वचन #जन्मना-जाति की ही व्यवस्था देता है.यदि किसी का कर्म देखकर उसकी जाति निश्चित करनी हो तो कर्म के पीछे-पीछे जाति चलेगी और सबके कर्म स्वजाति के ही कर्म होने से सभी,गीता के उक्त वचन के अनुसार,मोक्ष के अधिकारी होंगे.परंतु यह तो एक ऐसी बात है,जिसका कुछ अर्थ नहीं.
गीता में श्रीकृष्ण बतलातें है कि कर्तव्याकर्तव्य के विषय में शास्त्र ही प्रमाण है--
#तस्माच्छास्त्रं_प्रमाणं_ते_कार्याकार्यव्यवस्थितौ ||१६/२४||
शास्त्रों में सब से पहले है वेद.ये ही सब शास्त्रों के आधार है.
#ऋग्वेद संहिता के १०/९०(पुरुषसूक्त)में तथा तैतरीय-संहिता के ७/१/१ में बतलाया है कि चार वर्ण प्रजापति ब्रह्माके चार अङ्गो से उत्पन्न हुए.
#छान्दोग्योपनिषद् के ५/१०/७ में यह वर्णन है कि जो लोग पुण्य कर्म करतें है,वे दूसरे जन्म में ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय अथवा वैश्य कुल में जन्म लेतें है और जो पापकर्म करतें है,वे चाण्डालादि योनियोंको प्राप्त होतें है.---
#रमणीयचरणा_रमणीयां_योनिमापद्येरन्_ब्राह्मणयोनिं_
#वा_क्षत्रिययोनिं_वा_वैश्ययोनिं_वा | #कपूयचरणाः_कपूयां_योनिमापद्येरन्_श्वयोनिं_वा_सूकरयोनिं_वा
#चण्डालयोनिं_वा ||
उपनीषद् वेदोंके ही भाग है.अतः वेदों के समान ही उनका प्रामाण्य है. #मनुस्मृति सुविख्यात धर्मशास्त्र है.महाभारत-काल से बहुत पहले इसकी रचना हुई थी.अतः गीता में जहाँ शास्त्र की बात आयी है-तस्माच्छास्त्रं...इत्यादि (१६/२४),वहाँ #वेदोपनिषदों के साथ मनुस्मृति भी अभिप्रेत होगी.
#मनुस्मृति_की_श्रेष्ठता-
इदं शास्त्रं तु कृत्वासौ मामेव स्वयमादितः।
विधिवद्ग्राहयामास मरीच्यादींस्त्वहं मुनीन्।।
एतद्वो$यं भृगुः शास्त्रं श्रावयिष्यत्यशेषतः।
एतद्धि मत्तो$धिजगे सर्वमेषो$खिलं मुनिः।।
ततस्तथा स तेनोक्तो महर्षिर्मनुना भृगुः।
तानब्रवीदृषीन्सर्वान्प्रीतात्मा श्रूयतामिति।।मनुः१/५८-६०।।
प्रजापतिने सृष्टिके पहले इस धर्मशास्त्रको बनाकर मुझे(मनुको)उपदेश दिया.फिर मैने(स्वायंभुव मनुने)मरीचि आदि मुनियोंको बताया.यह समग्र "धर्मशास्त्र" हे द्विजकुलनंदन भृगुजी आप लोगोको सुनायेंगे,जो मुजसे संपूर्ण पढा़ है.उसके बाद ब्रह्माजीके पुत्र स्वायंभुवमनु की आज्ञा पाकर महर्षि भृगुने ऋषियो को कहा.
"स्मर्यते इति स्मृतिः।। जो वेदार्थानुकुल स्मरण की जाय वह स्मृति है..कुल ६० स्मृतियाँ है.
स्मरण के न्यूनाधिक भावसे ही स्मृतियोंके प्रामाण्य में न्यूनाधिक भाव माना गया हैं.
इसलिए देवाचार्य-बृहस्पतिने कहा हैं कि -"वेदार्थोपनिबन्धत्वात्प्राधान्यं हि मनोः स्मृतम्।
मन्वर्थविपरिता तु या स्मृतिः सा न दृश्यते।।
वेदार्थके संकलन करनेसे मनुका प्राधान्य है और मनुस्मृति से विरुद्ध जो कोई स्मृति है वह प्रशंसनीय नहीं है.
पराशरने भी कहा हैं कि समस्तशास्त्रोंके जानकार मनुजी हैं-"मनुना चैवमेकेन सर्वशास्त्राणि जानता।।पाराशरस्मृ९/५१।।
ऋग्वेदमें- ऋग्वेदके प्रथम मण्डल के ८० वे सूक्तमें-"यामथर्वा मनुष्पिता दध्यङ् धियमत्नतः| तस्मिन् ब्रह्माणि पूर्वथेन्द्र उक्था समग्मतार्चन्ननु स्वराज्यम्||ऋग्वेद१/८०/१५|| यह प्रार्थना हैं कि हम मनुके मार्गसे कहीं गिर न जाएँ ।।
ब्राह्मणग्रन्थोमें-" यद् वै किंच मनुरवदत् तद् भेषजम्|| तै०सं०२/२/१०२|| मनुर्वै यत् किंचावदत् तत् भैषाज्यायै||ता०ब्रा०२३/१६/१७|| तैतरीय संहिता एवं तांड्य महाब्राह्मण के अनुसार मनुने जो कुछ कहा हैं,यह सब औषध हैं|"मानव्यो हि प्रजाः" मनुसे पैदा होनेके कारण हम मानव कहलातें हैं|
मनु कहतें है, एक ही जाति के माता-पिता से उत्पन्न सन्तान भी उसी जाति की होगी--
#सर्ववर्णेषु_तुल्यासु_पत्नीष्वक्षतयोनिषु ||
#आनुलोम्येन_सम्भूता_जात्या_ज्ञेयास्त_एव_हि ||१०/१५||
‘सब वर्णों की अक्षत-योनि तुल्य पत्नियों में गर्भाधान करने से जो सन्तान हो,उन्हें अनुलोमक्रमसे उन्हीं वर्णों की जानना चाहिये.अर्थात् ब्राह्मण पति-पत्नि से उत्पन्न सन्तान ब्राह्मण,क्षत्रिय पति-पत्नि से उत्पन्न सन्तान क्षत्रिय,वैश्य पति-पत्नि से उत्पन्न सन्तान वैश्य,शूद्र पति-पत्नि से उत्पन्न सन्तान शूद्र इस प्रकार जानना चाहिये.’
हारित संहिता में---
#ब्राह्मण्यां_ब्राह्मणेनैवमुत्पन्नो_ब्राह्मणः_स्मृतः ||१/१५||
‘ब्राह्मणी में ब्राह्मण से उत्पन्न सन्तान ब्राह्मण ही कहा गया है.’
अत्रि संहिता में--
#जन्मना_ब्राह्मणो_ज्ञेयः_संस्काराद्_द्विज_उच्यते||१/४०||
‘जन्म से ब्राह्मण जाना जाता है,संस्कार होनेपर उसकी द्विज-संज्ञा होती है.’
श्री कृष्ण ही जब अध्याय १६श्लोक २४ में शास्त्र को ही प्रमाण मानने को कहतें है, तब यह हो नहीं सकता कि अध्याय ४श्लोक १३ में वे जाति-निर्णय की कोई ऐसी व्यवस्था देते हों जो वेद,उपनिषद्, मनुस्मृति,अत्रिसंहिता,हारितसंहिता आदि शास्त्रग्रन्थो के वचनों के विरुद्ध हो.
अब प्रश्न होता है कि यदि श्रीकृष्ण का अभिप्राय यही है कि #जन्मसे ही वर्ण निश्चित है तो उन्हों ने अध्याय ४ श्लोक १३ में “गुणकर्मविभागशः" क्यों कहा है.यहाँ कर्म का अभिप्राय वृत्ति से नहीं है.कर्म का यहाँ अर्थ है कर्तव्य.कर्म-विभाग का अर्थ विभिन्न वर्णों के वे कर्तव्य है, जिन का उल्लेख गीता अध्याय १८ श्लोक ४२- ४४ “शमो_दमस्तपः ...इत्यादि से ...शूद्रस्यापि_स्वभावजम् || में हुआ है.
गुण का अभिप्राय है त्रिगुण अर्थात् सत्त्व,रज,तम--- इन तीन गुणों से. गुण विभाग का अर्थ है,जन्म के साथ ही लगे हुए इन गुणों के अनुसार मनुष्योंका वर्गीकरण .
#गीता अध्याय १८ श्लोक ४१ में भगवान् स्वयं यह गुण-कर्म विभाग क्या है,स्पष्ट करके बतलातें है---
#कर्माणि_प्रविभक्तानि_स्वभावप्रभवैर्गुणैः ||१८/४१|| ‘स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार कर्मों का विभाग हुआ है.’ “स्वभाव-प्रभव” शब्दों से ही यह प्रकट है कि #जन्मजात गुणों के द्वारा ही वर्ण निश्चित होता है.छान्दोग्योपनिषद् का जो वचन"(५/१०/७) के साथ भी इसकी ठीक संगति बैठती है.जो लोग पुण्यकर्म करतें है,उनमें मृत्यु के पश्चात् सत्त्वगुण का प्रभूत संचय होता है. अतः वे ब्राह्मण होकर जन्म लेतें है.गीता अध्याय १८ श्लोक ४८ में जो *‘सहजं_कर्म’* शब्द आयें है,उनसे भी जन्मना-जाति सूचित होती है.जन्मसे जाति और जातिसे धर्म निश्चित होता है.अर्थात् जन्म के साथ ही धर्म लगा हुआ है.यही ‘सहजं_कर्म’ है.
यह प्रश्न किया जा सकता है कि यदि जन्म से वर्ण निश्चित होता है तो विश्वामित्र ब्राह्मण कैसे हुए? इसका उत्तर यह है कि तप का अलौकिक प्रभाव होता है,उससे शरीर के परमाणुतक बदल सकते है और वर्ण का सम्बन्ध है जन्मजात शरीर से ही.यह प्रसिद्ध है कि विश्वामित्र ने महान् तप किया था.उनके तपःप्रभाव से उनका वर्ण बदला या नहीं,यह निश्चय करना भी वशिष्ठ जैसे महर्षिका ही काम था. तपःप्रभाव से वर्ण बदल जाने के और भी कुछ उदाहरण है.
अब महाभारत के कुछ ऐसे वचनोंपर हम विचार करै--- जो गुण देखकर वर्ण निश्चय करने की बात का समर्थन करते--- से मालूम होतें है. वनपर्व के १७९ वें अध्याय में सर्प ने प्रश्न किया है-- ब्राह्मण कौन है? युधिष्ठिर उत्तर देतें है-- ‘ब्राह्मण वह है,जिसमें सत्य,दानशीलता, क्षमा,सदाचार, मृदुता, और तप -- ये गुण हो.’ युधिष्ठिर आगे यह भी कहतें है कि ‘ ये गुण यदि किसी शूद्र में हों तो उसे ब्राह्मण कहना चाहिये और यदि ये गुण किसी ब्राह्मण में न हो तो वह ब्राह्मण नहीं है.’ ‘ब्राह्मण’ शब्द का प्रयोग स्पष्ट ही यहाँ दो विभिन्न अर्थों में हुआ है.यदि ऐसा न मानें तो यह कहना कि “जिस ब्राह्मण में ये गुण नहीं है,वह ‘ब्राह्मण’ नहीं है” ‘वदतो व्याघात’ होगा.उक्त वचन में ‘ब्राह्मण’ शब्द का प्रथम प्रयोग जन्मना ब्राह्मण के अर्थ में है.‘ब्राह्मण’ शब्द का दूसरा प्रयोग इस अर्थ में है कि जो गुण ब्राह्मण में होने चाहिये,वे उसमें नहीं है.यह वचन सत्य, क्षमा आदि गुणों की प्रशंसा कर ब्राह्मण को मिथ्या जात्यभिमान से बचाने के लिये आया है.इस वचन का अभिप्राय गुणोंको देखकर वर्ण कलित करना नहीं है.इसके विरुद्ध कई कारण है--(१) ‘वदतो_व्याघात’ होगा,जैसा कि--- (२)वेद,उपनिषद्, मनुसंहिता,अत्रिसंहिता,हारीतसंहिता आदि शास्त्र-ग्रन्थों के जो वचन पहले उद्धृत कर आयें है,जिन में #जन्मना-जाति की ही व्यवस्था है, उनके साथ इसका विरोध होगा.किसी वचन का ठीक अर्थ लगाते हुए हमें यह ध्यान में रखना चाहिये कि अन्य वचनों के साथ उसका कोई विरोध न हो.उपर्युक्त श्रृत्यादि के वचनों का इसके सिवा और कोई अर्थ नहीं है कि वर्ण या जाति जन्मपर ही निर्भर है.
#वनपर्व के उपर्युक्त वचन का सुसंगत अर्थ यही होता है कि सत्य, दान आदि गुण वरेण्य है.(३) किसी मनुष्य के असली गुणों को जान लेना बहुत ही कठीन है.(४) बहुत-से लोगों में सत्य,दानआदि गुण अत्यधिक परिमाण में होतें ही है.यह तो इस वचन में नहीं बतलाया गया है कि किस दर्जेतक कौन सा गुण हौने से कोई मनुष्य ब्राह्मण वर्ण का हो सकता है.(५) इस वचन में फिर दो ही वर्गों के नाम आये है-- ब्राह्मण और शूद्र.क्षत्रिय और वैश्य का कोई नाम नहीं है.फिर जिन में ये गुण है,वे यदि ब्राह्मण है और जिनमें ये गुण नहीं,वे ब्राह्मण नहीं,वे शूद्र,तो अखिल मानव-जाति के ब्राह्मण और शूद्र --- ये ही दौ वर्ण-विभाग हुए,चातुर्वर्ण्य नहीं रहा.अतः इन सब बातों से यही स्पष्ट होता है कि उक्त वचनका हेतु वर्ण-विभाग का सिद्धान्त बतलाना नहीं,बल्कि सत्य,सदाचारादि गुणों की श्रेष्ठता बतलाना ही है.वर्ण-विभाग का सिद्धान्त अन्य शास्त्र वचनों में निर्दिष्ट हो ही चुका है.ये शास्त्रवचन #जन्मना-जाति का ही निर्देश करतें है.अतः जो वचन ऐसे है,जिनसे गुणों और कर्मों के अनुसार जाति होने की बात सूचित होती है,उनका वास्तविक अभिप्राय कुछ और ही है.
#गुण या कर्म के अनुसार सब मनुष्यों की जाति निर्धारित करना व्यवहारतः संभव भी नहीं है.यह जो कहा जाता है कि जन्म नाम की आकस्मिक घटनापर किसी की जाति या वर्ण निश्चित करना ठीक नहीं,यह कहना भी युक्तियुक्त नहीं है. कारण,जन्म कोई आकस्मिक घटना नहीं,बल्कि हमारे पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है.कुछ लोग स्वस्थ और हट्टे-कट्टे पैदा होतें है और कुछ अंधे और रुग्ण,इसका यही तो कारण है.
यह कहना भी निराधार है कि हिंदुओं का चातुर्वर्ण्य ही हिंदू-समाज में पैदा हुई सब बुराईयों का कारण है.गीता में श्री भगवान् कहतें है--‘चातुर्वर्ण्य मैने उत्पन्न किया है’(४/१३)|| जो व्यवस्था भगवान् ने बना दी,वह किसी समाज के लिये कभी हानिकर नहीं हो सकती.हमारे राजनीतिक दासत्वमें हमारे ईर्ष्या-द्वेष,लड़ाई-झगड़े,भोग-विलास आदि अन्य कारण हो सकतें है.यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिये कि कोई भी राष्ट्र सदाके लिये अपनी स्वाधीनता बनाये नहीं रह सका है.ब्रिटेनपर रोमन और सैवसन दखल जमायें बैठे थे.सैवसनों को नार्मन लोगों ने जीता था.ग्रीस,रोम, कार्थेज-- पुरानी दुनिया के सभी देशों को कभी -न- कभी पराजित और पराधीन होकर रहना पड़ा था.फ्रांस,बेलजियम,जर्मनी और जापान का पराधीन होना अभी हालकी ही बात है.हिंदू सहस्रों वर्ष स्वाधीन रहने के बाद कुछ काल मुसल्मानों और ईसाइओं के अधीन भी होकर रहे.
अब फिर वे स्वाधीन है.
*प्राचीनों में एक हिंदू ही है,जो अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा किये हुए है,अब कि अन्य प्राचीन-सभ्यताएँ सब नष्ट हो गयीं.*
यह ईश्वर कृत वर्ण-व्यवस्था का ही सुपरिणाम है.इसी से हिंदूओं के धर्म,शौर्य, और श्रमशक्ति की रक्षा हुई है.यदि हम इस वर्ण-व्यवस्था को उठा देंगे तो महान् अनर्थ होगा---- वर्णसंकर होगा.भगवान् कहतें है--- "संकर से प्रजाओंका सब प्रकार से नाश होता है.(गीता ३/२४)||"
|| जय श्री राम || शेष पुनः
*साभार पुलकित शास्त्री जी*
*वैदिक ब्राह्मण ग्रुप गुजरात*
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