वेद में जन्मना वर्णव्यवस्था एवं संकरजाति का उल्लेख है
👉 वेद में जन्मना वर्णव्यवस्था एवं संकरजाति का उल्लेख है ही नहीं 👈
================ 👆 खंडन 👆 ================
गुणकर्मणा वर्णव्यवस्था के समर्थक कुछ लोग कहते है -
" वेद में संकरजाति का उल्लेख है ही नहीं, चातुर्वणमात्र का उल्लेख है । परवर्ती काल में अनार्य जातियों के साथ संमिश्रण प्रतिबंधित करने के लिए जन्मना वर्णव्यवस्था का प्रचलन एवं संकरजातियों की उत्पत्ति स्वीकृत हुई । "
हम ससम्मान उनकी दृष्टि शुक्लयजुर्वेदीय संहिता के त्रिश अध्याय के प्रति आकर्षित करते है, जहाँ पुरुषमेध यज्ञ का वर्णन है । पञ्चम मन्त्र से पुरुषमेध प्रदर्शित हुआ है । पञ्चम मन्त्र में वैश्य द्वारा क्षत्रिया स्त्री में उत्पन्न प्रतिलोम संकर #मागध_जाति का उल्लेख है ।
षष्ठ मन्त्र में #सूत_जाति का उल्लेख है । ब्राह्मणी के गर्भ में क्षत्रिय द्वारा उत्पन्न संतान को सूत कहा जाता है । इसी मन्त्र में #रथकार एवं #सूत्रधर_जाति का भी उल्लेख है । करण स्त्री के गर्भ में माहिष्य पुरुष द्वारा उत्पन्न जाति का नाम रथकार है एवं सूत्रधर को तक्षा कहा जाता है ।
सप्तम मन्त्र में #कुलाल , #कर्मकार , #मणिकार इत्यादि जातियों का उल्लेख है । यहाँ चतुर्थी विभक्तियुक्त पद देवतावाचक एवं द्वितीया विभक्तियुक्त पद मनुष्यजातिविशेष का वाचक है ।
शुक्लयजुर्वेदीय संहिता के षोडश अध्याय #रुद्राध्याय नाम से परिचित है । इस अध्याय की सताईस्वा मन्त्र में #रथकार, #कुलाल और #कर्मार शब्दों है ।महीधर एवं उवट के अनुसार - " #तक्षाणः_शिल्पजातयः ; #रथं_कुर्वन्ति_इति_रथकाराः_सूत्रधारविशेषाः ; #कुलालाः_कुंभकाराः ; #कर्माराः_लौहकाराः । "
शुक्लयजुर्वेदीय संहिता के त्रिश अध्याय, अष्टम मन्त्र में #निषाद एवं #विदलकारी जाति का उल्लेख है । बांस से पात्र निर्माणकारी पुरुष को विदलकार एवं स्त्री को विदलकारी कहा जाता है ।
एकादश मन्त्र में #हस्तिप , #अश्वप , #गोप , #अविपाल , #अजापाल , #सुराकार इत्यादि जातियों का उल्लेख है ।
द्वादश मन्त्र में #रजक एवं #वस्त्ररंजनकारिणी जाति का उल्लेख है । इसपर महीधरभाष्य में कहा गया - " #वासः_पलपुलीम् - #वाससां_प्रक्षालनकर्तारम् ; #पल्पुल - #प्रक्षालनच्छेदनयोः_रजयित्रीम्_वस्त्राणाम्_रंगकारिणीं_नारीम् । "
शुक्लयजुर्वेदीयसंहिता के उपरोक्त अध्याय की आलोचना से प्रतिभात होता है कि इस प्रसंग पर भारतवर्ष में प्रचलित प्रायः प्रत्येक जाति का ही उल्लेख यहाँ है । कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीय संहिता के पुरुषमेध प्रसंग पर भी हुबहू इन जातियों का उल्लेख मिलता है ।
अतएव वेद में जन्मना वर्णव्यवस्था अथवा संकरजाति का उल्लेख नहीं है - यह धारणा वस्तुतः एक भ्रममात्र ही है यह प्रमाणित होता है ।
सन्दर्भ :- शुक्लयजुर्वेदीय माध्यन्दिन संहिता, अध्याय ३०, १६ ; महीधरभाष्य एवं उवटभाष्य द्रष्टव्य
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गुणकर्मणा वर्णव्यवस्था के समर्थक कुछ लोग कहते है -
" वेद में संकरजाति का उल्लेख है ही नहीं, चातुर्वणमात्र का उल्लेख है । परवर्ती काल में अनार्य जातियों के साथ संमिश्रण प्रतिबंधित करने के लिए जन्मना वर्णव्यवस्था का प्रचलन एवं संकरजातियों की उत्पत्ति स्वीकृत हुई । "
हम ससम्मान उनकी दृष्टि शुक्लयजुर्वेदीय संहिता के त्रिश अध्याय के प्रति आकर्षित करते है, जहाँ पुरुषमेध यज्ञ का वर्णन है । पञ्चम मन्त्र से पुरुषमेध प्रदर्शित हुआ है । पञ्चम मन्त्र में वैश्य द्वारा क्षत्रिया स्त्री में उत्पन्न प्रतिलोम संकर #मागध_जाति का उल्लेख है ।
षष्ठ मन्त्र में #सूत_जाति का उल्लेख है । ब्राह्मणी के गर्भ में क्षत्रिय द्वारा उत्पन्न संतान को सूत कहा जाता है । इसी मन्त्र में #रथकार एवं #सूत्रधर_जाति का भी उल्लेख है । करण स्त्री के गर्भ में माहिष्य पुरुष द्वारा उत्पन्न जाति का नाम रथकार है एवं सूत्रधर को तक्षा कहा जाता है ।
सप्तम मन्त्र में #कुलाल , #कर्मकार , #मणिकार इत्यादि जातियों का उल्लेख है । यहाँ चतुर्थी विभक्तियुक्त पद देवतावाचक एवं द्वितीया विभक्तियुक्त पद मनुष्यजातिविशेष का वाचक है ।
शुक्लयजुर्वेदीय संहिता के षोडश अध्याय #रुद्राध्याय नाम से परिचित है । इस अध्याय की सताईस्वा मन्त्र में #रथकार, #कुलाल और #कर्मार शब्दों है ।महीधर एवं उवट के अनुसार - " #तक्षाणः_शिल्पजातयः ; #रथं_कुर्वन्ति_इति_रथकाराः_सूत्रधारविशेषाः ; #कुलालाः_कुंभकाराः ; #कर्माराः_लौहकाराः । "
शुक्लयजुर्वेदीय संहिता के त्रिश अध्याय, अष्टम मन्त्र में #निषाद एवं #विदलकारी जाति का उल्लेख है । बांस से पात्र निर्माणकारी पुरुष को विदलकार एवं स्त्री को विदलकारी कहा जाता है ।
एकादश मन्त्र में #हस्तिप , #अश्वप , #गोप , #अविपाल , #अजापाल , #सुराकार इत्यादि जातियों का उल्लेख है ।
द्वादश मन्त्र में #रजक एवं #वस्त्ररंजनकारिणी जाति का उल्लेख है । इसपर महीधरभाष्य में कहा गया - " #वासः_पलपुलीम् - #वाससां_प्रक्षालनकर्तारम् ; #पल्पुल - #प्रक्षालनच्छेदनयोः_रजयित्रीम्_वस्त्राणाम्_रंगकारिणीं_नारीम् । "
शुक्लयजुर्वेदीयसंहिता के उपरोक्त अध्याय की आलोचना से प्रतिभात होता है कि इस प्रसंग पर भारतवर्ष में प्रचलित प्रायः प्रत्येक जाति का ही उल्लेख यहाँ है । कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीय संहिता के पुरुषमेध प्रसंग पर भी हुबहू इन जातियों का उल्लेख मिलता है ।
अतएव वेद में जन्मना वर्णव्यवस्था अथवा संकरजाति का उल्लेख नहीं है - यह धारणा वस्तुतः एक भ्रममात्र ही है यह प्रमाणित होता है ।
सन्दर्भ :- शुक्लयजुर्वेदीय माध्यन्दिन संहिता, अध्याय ३०, १६ ; महीधरभाष्य एवं उवटभाष्य द्रष्टव्य
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